History

ধর্ম্মপালদেবের তাম্রশাসন-The Copper Plate of Dharma Pala Deva

The Copper Plate of Dharma Pala Deva

Discovered at Khalimpur Maldah District

ধর্ম্মপালদেবের[770-810 CE] তাম্রশাসন।

[খালিমপুর-লিপি]
প্রশস্তি-পরিচয়।

মালদহ জেলার অন্তর্গত খালিমপুর গ্রামের উত্তরাংশে হলকর্ষণ করিতে গিয়া, এক কৃষক এই তাম্রপট্টলিপি প্রাপ্ত হইয়াছিল। সে ইহাকে সিন্দুর লিপ্ত করিয়া, আমরণ পূজা করিয়াছিল;আবিষ্কার-কাহিনী।—কাহাকেও দান বা বিক্রয় করিতে সম্মত হয় নাই। পরলোকগত উমেশচন্দ্র বটব্যাল, এম, এ, মহোদয় মালদহের কলেক্টর হইয়া আসিবার পর, এই সমাচার অবগত হইয়া, ১৮৯৩ খৃষ্টাব্দে কৃষক-পত্নীর নিকট হইতে তাম্রপট্টখানি ক্রয় করিয়া লইলে, ইহার কথা সুধীসমাজে সুপরিচিত হইবার সূত্রপাত হয়। ইহা পালবংশীয় দ্বিতীয় নরপাল ধর্ম্মপালদেবের ভূমিদানের তাম্রশাসন;—খালিমপুরে আবিষ্কৃত হইয়াছিল বলিয়া, এক্ষণে “খালিমপুর-লিপি” নামে কথিত হইয়া আসিতেছে।

এই তাম্রশাসনখানি ক্রয় করিবার পর, বটব্যাল মহাশয় ইহার পাঠোদ্ধারে ব্যাপৃত হইয়াছিলেন। তৎকালে তাঁহার উদ্ধৃত পাঠে অনেক অসঙ্গতি এবং ভ্রমপ্রমাদ বর্ত্তমান থাকিলেও,পাঠোদ্ধার-কাহিনী। তাহাই এসিয়াটিক্ সোসাটীর পত্রিকায়[১] প্রকাশিত হইয়াছিল। পরে পরলোকগত অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ বহুযত্নে একটি বিশুদ্ধ পাঠ প্রকাশিত করিয়া গিয়াছেন।[২] কিন্তু বটব্যাল মহাশয়ের ভ্রমপ্রমাদপূর্ণ পাঠই এখনও সময়ে সময়ে অন্যান্য লেখকের গ্রন্থে উদ্ধৃত হইতেছে। ষষ্ঠ শ্লোকের প্রথম চরণে লিখিত আছে—

“ताभ्यां श्रीधर्म्मपालः समजनि सुजन-स्तूयमानावदानः।”

বটব্যাল মহাশয় ধর্ম্মপালের सुजन-स्तूयमानावदान: বিশেষণ-পদটি “सुजन-स्तूपमानावदानः” বলিয়া উদ্ধৃত করিয়াছিলেন। ১৮৯৪ খৃষ্টাব্দে এই পাঠ মুদ্রিত হয়। ১৮৯৭ খৃষ্টাব্দে অধ্যাপক কিল্‌হৰ্ণ প্রকৃত পাঠটি মুদ্রিত করিয়া দিয়াছিলেন। তাহার দ্বাদশ বৎসর পরেও [১৯১০ খৃষ্টাব্দে], এশিয়াটিক্ সোসাইটী কর্ত্তৃক প্রকাশিত “রামচরিত” নামক প্রাচীন কাব্যের ভূমিকায়, মহামহোপাধ্যায় পণ্ডিতবর শ্রীযুক্ত হরপ্রসাদ শাস্ত্রী এম, এ, [এই বিশেষণ-পদ হইতে “সুজন” শব্দটি ত্যাগ করিয়া,] “स्तूपमानावदातः” পাঠ কল্পনা করিয়া লিখিয়ছেন,—“ধর্ম্মপাল স্তূপের ন্যায় বৃহৎ এবং শুভ্রবর্ণ ছিলেন”।[৩] মূল তাম্রশাসনে এরূপ পাঠ নাই; রাজকবির পক্ষে এরূপ বর্ণনা লিপিবদ্ধ করিবারও সম্ভাবনা ছিল না।

বটব্যাল মহাশয় ইহার ব্যাখ্যা-কার্য্যে প্রবৃত্ত হইয়া, [কোনরূপ প্রতিবাদে কর্ণপাত না করিয়া] ইহাকে ধর্ম্মপাল-কর্ত্তৃক ভট্টনারায়ণ নামক স্বনামখ্যাত ব্ৰাহ্মণ-কবিকে ভূমিদান করিবারব্যাখ্যা-কাহিনী। তাম্রশাসন বলিয়া ব্যাখ্যা করিয়াছিলেন, এবং স্বমত-সমর্থনের জন্য নানা বিচার-বিতণ্ডারও অবতারণা করিয়াছিলেন। সে ব্যাখ্যা যে প্রকৃত ব্যাখ্যা নহে, তাহা এক্ষণে সুধীসমাজে সুপরিচিত হইয়াছে।[৪] কিন্তু এই তাম্রশাসনের মর্ম্ম এ পর্য্যন্ত বঙ্গভাষায় অনূদিত হয় নাই। ইহাতে বাঙ্গালার ইতিহাসের যে সকল তথ্য প্রচ্ছন্ন হইয়া রহিয়াছে, তাহাও বঙ্গসাহিত্যে সুপরিচিত হইতে পারে নাই।

এই তাম্রপট্টখানির আয়তন ১ ফুট ৪.৩/ ৮
ইঞ্চ দীর্ঘ এবং ১১.৩/ ৮
ইঞ্চ প্রস্থ। ইহার শীর্ষদেশে—মধ্যস্থলে—একটি রাজমুদ্রা সংযুক্ত আছে, এবং তন্মধ্যে “श्रीमान् धर्म्मपालदेवः” এই কয়েকটিলিপি-পরিচয়। অক্ষর উৎকীর্ণ রহিয়াছে। প্রকৃত প্রস্তাবে ইহা একটি বৌদ্ধমত-বিজ্ঞাপক ধর্ম্মচক্র-মুদ্রা,—মধ্যস্থলে ধর্ম্মচক্ৰচিহ্ন, উভয় পার্শ্বে মৃগ-মূর্ত্তি। এই তাম্রপট্টের এক পৃষ্ঠে ৩৩ পংক্তি এবং অপর পৃষ্ঠে ২৯ পংক্তি [সংস্কৃত ভাষায় রচিত পদ্যগদ্যাত্মক লিপি] উংকীর্ণ রহিয়াছে। তিন চারিটি অক্ষর ভিন্ন সমগ্র লিপিটি অক্ষুণ্ণ অবস্থায় প্রাপ্ত হওয়া গিয়াছে।

এই তাম্রশাসন উৎকীর্ণ করাইয়া, “পরমেশ্বর পরমভট্টারক মহারাজাধিরাজ শ্ৰীধর্ম্মপাল দেব” [৩০ পংক্তি] তদীয় বিজয়-রাজ্যের “সম্বৎ ৩২ মার্গ দিন ১২” [৬১ পংক্তি] তারিখে “পাটলিপুত্র-সমাবাসিতলিপি-বিবরণ। [২৮—২৯ পংক্তি] জয়স্কন্ধাবার হইতে “শ্রীপুণ্ড্রবর্দ্ধন-ভুক্ত্যন্তঃ-পাতি-ব্যাঘ্রতটীমণ্ডলসম্বদ্ধ-মহন্তাপ্রকাশ-বিষয়ে” [৩০—৩১ পংক্তি] এবং “স্থালীক্কটবিষয়সম্বদ্ধাম্রষণ্ডিকা-মণ্ডলান্তঃ-পাতি” [৪১-৪২ পংক্তি] স্থানে “মহাসামন্তাধিপতি শ্রীনারায়ণবর্ম্মার” [৪৯ পংক্তি] প্রার্থনাক্রমে, নারায়ণবর্ম্মা-কর্ত্তৃক “শুভস্থলীতে” নির্ম্মিত দেবকুলে প্রতিষ্ঠিত “ভগবন্নন্ন-নারায়ণের” ও “তৎপ্রতিপালক লাট-দ্বিজাদির” [৪৯-৫১ পংক্তি] ব্যবহারার্থ ভূমিদান করিয়াছিলেন। ইহাতে প্রসঙ্গক্রমে পাল-রাজবংশের অভ্যুদয় কাহিনী বিধৃত হইয়া রহিয়াছে। তজ্জন্য ইহা বাঙ্গালার ইতিহাসের একটি বিশিষ্ট উপাদান বলিয়া সুপরিচিত। এ পর্য্যন্ত পাল-রাজগণের যে সকল শাসন-লিপি আবিষ্কৃত হইয়াছে, তন্মধ্যে ইহাই সর্ব্বাপেক্ষা পুরাতন। ইহা এক্ষণে কলিকাতায় [এসিয়াটিক্ সোসাইটি কর্ত্তৃক] রক্ষিত হইতেছে। এই তাম্রফলকে কবির নাম উল্লিখিত নাই; শিল্পীর নাম উল্লিখিত আছে;一“ভোগটের পৌত্র, সুভটের পুত্র, গুণশালী শ্ৰীমান্ তাতট কর্ত্তৃক এই তাম্রশাসন উৎকীর্ণ হইয়াছিল।”

প্রশস্তি-পাঠ।

१ ॐ स्वस्ति [॥]
सर्व्वज्ञतां श्रियमिव स्थिर मास्थितस्य
वज्रास-
२ नस्य बहुमार-कुलोपलम्भाः।
देव्या महाकरुणया परिपा-
३ लितानि
रक्षन्तु वो दशबलानि दिशो जयन्ति॥(১)
श्रिय इव सुभगा-
४ याः सम्भवो वारिराशि-
श्‌शशधर इव भासो विश्व माह्लादयन्त्याः।
प्रकृति रवनिपानां सन्तते रुत्तमाया
अ-
५ जनि दयितविष्णुः सर्व्वविद्यावदातः॥(২)
आसीदासागरादुर्व्वीं गुर्व्वीभिः कीर्त्तिभिः कृती।
मण्डयन्

६ खण्डितारातिः श्लाघ्यः श्रीवप्यट स्ततः॥(৩)
मात्‌स्य‑न्याय मपोहितुं प्रकृतिभि र्लक्ष्म्याः करं ग्राहितः
श्रीगोपा-
७ ल इति क्षितीश-शिरसां चूड़ामणि स्तत्‌सुतः।
यस्यानुक्रियते सनातन-यशोराशि र्दिशामाशये
श्वेतिम्ना य-
८ दि पौर्णमास-रजनी ज्योत्‌स्नातिभारश्रिया॥(৪)
शीतांशो रिव रोहिणी हुतभुजः स्वाहेव तेजोनिधः
सर्व्वाणी-
९ व शिवस्य गुह्यकपते र्भद्रेव भद्रात्मजा।
पौलोमीव पुरन्दरस्य दयिता श्रीदेद्ददेवीत्यभूत्
देवी तस्य विनो-
१० दभू र्मुररिपो र्लक्ष्मी रिव क्ष्मापतेः॥(৫)
ताभ्यां श्रीधर्म्मपालः समजनि सुजन-स्तूयमानावदानः
स्वामी भूमी-
११ पतीना मखिल-वसुमती-मण्डलं शासदेकः।
चत्वार स्तीरमज्जत्-करिगण-चरण-न्यस्तमुद्राः समुद्रा
यात्रां य-
१२ स्य क्षमन्ते न भुवन-परिखा विश्वगाशा-जिगीषोः॥(৬)
यस्यिन्न द्दामलीला-चलित-बलभरे दिग्‌जयाय प्रवृत्ते
यान्त्या-
१३ म्बिश्वम्भरायां चलित-गिरि-तिरश्चीनतां तद्वशेन।
भाराभुग्नावमज्जन्-मणिविधुर-शिरश्चक्र-साहायकार्थं
शेषे-
१४ नोदस्त-दोष्णा त्वरिततर मधोध स्तमेवानुयातम्॥(৭)
यत्‑प्रस्थाने प्रचलित-बलास्फालना-दुल्ललद्भि-
र्धूलीपूरैः पिहि-
१५ त-सकल-व्योमभि र्भूतधात्र्याः।
संप्राप्तायाः परमतनुतां चक्रवालं फणानां
मग्नोन्मीलन्-मणि फणिपते र्ला-
१६ घवादुल्ललास॥(৮)
विरुद्ध‑विषय‑क्षोभाद् यस्य कोपाग्नि रौर्ववत्।
अनिर्वृति प्रजज्वाल चतुरम्भोधिवारितः॥(৯)
१७ येऽभूवन् पृथु-रामराघव-नल-प्राया धरित्रीभुज-
स्तानेकत्र दिदृक्षुणेव निचितान् सर्व्वान् सम म्वेधसा।
ध्व-
१८ स्ताशेष-नरेन्द्र-मानमहिमा श्रीधर्म्मपालः कलौ
लोल-श्री-करिणी-निबन्धन-महास्तम्भः समुत्तम्भितः॥(১০)
यासां
१९ नासीर-धूली-धवल-दशदिशां द्रागपश्यन्नियत्तां
धत्ते मान्धातृसैन्य-व्यतिकरचकितो ध्यानतन्द्री म्महेन्द्रः।
२०तासामप्याहवेच्छा-पुलकित-वपुषा म्वाहिनीना म्विधातुं
साहाय्यं यस्य वाह्वो र्निखिल-रिपुकुलध्वंसिनो र्ना-
२१ वकाशः॥(১১)
भोजैर्मत्स्यैः समद्रैः कुरु-यदु-यवनावन्ति-गन्धार-कीरै-
र्भूपै र्व्यालोल-मौलिप्रणति-परिणतैः
२२ साधु-सङ्गीर्य्यमाणः।
हृष्यत्-पञ्चालवृद्धोद्धृत-कनकमय-स्वाभिषेकोदकुम्भो
दत्तः श्रीकन्यकुब्ज स्‌सललित-च
२३ लित-भ्रूलता-लक्ष्म येन॥(১২)
गोपैः सीम्नि वनेचरै र्वनभुवि ग्रामोपकण्ठे जनैः
क्रीड़द्भिः प्रतिचत्वरं शिशुगणैः
२४ प्रत्यापणं मानपैः
लीला-वेश्मनि पञ्जरोदर-शुकै रुद्गीत मात्म-स्तवं
यस्याकर्णयत स्त्रपा-विवलिता-नम्रं स-
२५ दैवाननं॥(১৩)
स खलु भागीरथीपथ प्रवर्त्तमान-नानाविध-नौवाटक-सम्पादित-सेतुबन्ध-निहित-शैलशि-
२६खरश्रेणी-विभ्रमात् निरतिशय-घन-घनाघन-घटा-श्यामायमान-वासरलक्ष्मी-समारब्ध-सन्तत-जलदस-
२७ मय-सन्देहात् उदीचीनानेक-नरपति-प्र[ा]भृतिकृता-प्रमेय-हयवाहिनी-खरखुरोत्खात-धूली-धूसरित-दि-
२८ गन्तरालात् परमेश्वर-सेवासामायात-समस्तजम्बूद्वीप-भूपालानन्त-पादात-भर-नमदवनेः पाठलिपु-

२९त्र-समावासित-श्रीमज्जयस्कन्धावारात् परमसौगतो महाराजाधिराज-श्रीगोपालदेव-पादानुध्यातः प-
३०रमेश्वरः परमभट्टारको महाराजाधिराजः श्रीमान् धर्म्मपालदेवः कुशली॥ श्रीपुण्ड्रवर्द्धनभु-
३१क्त्यन्तःपाति-व्याघ्रतटी मण्डलसम्बद्ध-महन्ताप्रकाश-विषये क्रौञ्चश्वभ्र नाम ग्रामोऽस्य च सीमा पश्चि-
३२मेन गङ्गिनिका। उत्तरेण कादम्बरी-देवकुलिका खर्ज्जूरवृक्षश्च| पूर्व्वोत्तरेण राजपुत्र-देवट-कृतालिः। वी-
३३जपुरकङ्गत्वा प्रविष्टा। पूर्व्वेण विटकालिः खातकयानिकां गत्वा प्रविष्टा। जम्बूयानिका माक्रम्य जम्बूयानकं
३४गता। ततो निःसृत्य पुण्याराम-बिल्वार्द्ध-स्रोतिकां। ततोपि निःसृत्य न-
३५ल-चर्म्मटोत्तरान्तं गता नलचर्म्मटात् दक्षिणेन नामुण्डिकापि [हे
३६सदुम्मि] कायाः। खण्डमुण्डमुखं खण्डमुखा[त्]वेदसबिल्विका वेद[स]विल्विकातो रोहितवाटिः पिण्डारविटि-जोटिका-सीमा
३७उक्तारजोटस्य दक्षिणान्तः ग्रामबिल्वस्य च दक्षिणान्तः। देविका-सीमाविटि। धर्म्मायो-जोटिका। एवम्माढ़ा-शाल्मली ना-
३८म ग्रामः। अस्य चोत्तरेण गङ्गिनिका-सीमा ततः पूर्व्वेणार्द्धस्रोतिकया आम्रयानकोलर्द्धयानिकङ्गतः त-
३९तोपि दक्षिणेन कालिकाश्वभ्रः। अतोपि निःसृत्य श्रीफलभिषुकं यावत् पश्चिमेन ततोपि बिल्वङ्गोर्द्ध स्रोति-
४०कया गङ्गिनिकां प्रविष्टा। पालितके सीमा दक्षिणेन काणा-द्वीपिका। पूर्व्वेण कोण्ठिया-स्रोतः। उत्तरेण
४१गङ्गिनिका। पश्चिमेन जेनन्दायिका। एतद्ग्राम-सम्पारीण-परकर्म्मकृद्वीपः। स्थालीक्कट-विषय-
४२सम्बद्धाम्रषण्डिका-मण्डलान्तःपाति-गोपिप्पली-ग्रामस्य सीमा। पूर्व्वेण उड्रग्राम-मण्डल-पश्विमसीमा। दक्षि-

४३णेन जोलकः। पश्विमेन वेसानिकाख्या खाटिका। उत्तरेणोड्रग्राम-मण्डलसीमा-व्यवस्थितो गोमार्गः। एषु च-
४४तुरुषु (चतुर्षु) ग्रामेषु समुपगतान् सर्व्वानेव राजराजनक-राजपुत्र-राजामात्य-सेनापति-विषयपति-भोगपति-षष्ठाधि-
४५कृत-दण्डशक्ति-दण्डपाशिक-चौरोद्धरणिक-दौस्साधसाधनिक-दूत-खोल-समागमिकाभित्वरमाण-हस्त्यश्व-गोमहिषाजा-
४६विकाध्यक्ष-नाकाध्यक्ष٭১ बलाध्यक्ष-तरिक-शौल्किक-गौल्मिक-तदायुक्तक-विनियुक्तकादि-राजपादोपजीविनोऽन्यांश्चाकीर्त्ति-
४७तान् चाटभटजातीयान् यथाकालाध्यासिनो ज्येष्ठकायस्थ-महामहत्तर-महत्तर-दाशग्रामिकादि-विषयव्यवहारिणः
४८सकरणान् प्रतिवासिनः क्षेत्रकरांश्च ब्राह्मण-माननापूर्व्वकं यथार्हं मानयति बोधयति समाज्ञापयति च। मतमस्तु
४९भवतां महासामन्ताधिपति-श्रीनारायणवर्म्मणा दूतक-युवराज-श्रीत्रिभुवनपालमुखेन वय मेवं विज्ञापिताः यथाऽस्मा-
५०भि र्म्मातापित्रो रात्मनश्च पुण्याभिवृद्धये शुभस्थल्यान्देवकुलं कारित न्तत्र प्रतिष्ठापित-भगवन्नन्न-नारायण-भट्टारकाय तत्प्र-
५१तिपालक लाटद्विज-देवार्च्चकादि-पादमूल-समेताय पूजोपस्थानादि-कर्म्मणे चतुरो ग्रामान् अत्रत्य-हट्टिका-तलपाटक-
५२समेतान् ददातु देव इति। ततोऽस्माभि स्तदीय विज्ञप्त्या एते उपरिलिखितका श्चत्वारो ग्रामा स्तलपाटक-हट्टिकासमेताः स्व-
५३सीमापर्य्यन्ताः सोद्देशाः सदशापचाराः अकिञ्चित्प्रग्राह्याः परिहृत-सर्व्वपीड़ाः भूमिच्छिद्रन्यायेन चन्द्रार्कक्षिति-समकालं
५४तथैव प्रतिष्ठापिताः। यतो भवद्भि स्सर्व्वै रेव भूमे र्द्दानफल-गौरवादपहरणे च महानरक पातादि भयाद्दानमिद मनुमो-
५५द्य परिपालनीयम्। प्रतिवासिभिः क्षेत्रकरै श्वाज्ञाश्रवणविधेयै-

र्भूत्वा समुचित-कर-पिण्डकादि-सर्व्व-प्रत्यायोपनयः٭২ कार्य्य
५६इति॥

बहुभि र्व्वसुधा दत्ता राजभि स्सगरादिभिः।
यस्य यस्य यदा भूमि स्तस्य तस्य तदा फलम्॥(১৪)
षष्ठिं वर्षसहस्राणि स्वर्गे
५७मोदति भूमिदः।
आक्षेप्ता चानुमन्ता च तान्येव नरके वसेत्॥(১৫)
स्वदत्ताम्परदत्ताम्बा यो हरेत वसुन्धराम्।
स विष्ठायां कृमि र्भूत्वा पितृ-
५८भि स्सह पच्यते॥(১৬)
इति कमल-दलाम्बु-विन्दु-लोलां
श्रिय मनुचिन्त्य मनुष्य-जीवितञ्च।
सकलमिदमुदाहृत ञ्च बुद्ध्वा
न हि पुरु-
५९षैः पर-कीर्त्तयो विलोप्या:॥(১৭)
तड़ित्तुल्या लक्ष्मी स्तनुरपि च दीपानल-समा
भवो दुःखैकान्तः पर-कृतिमकीर्त्तिः क्षपयताम्।
यशां
६०स्याचन्द्रार्क्कं नियत मवताम[त्र] च नृपाः
करिष्यन्ते बुद्ध्वा यदभिरुचितं किं प्रवचनैः॥(১৮)
अभिवर्द्धमान-विजयराज्ये
६१सम्बत् ३२ मार्ग-दिनानि १२।
श्रीभोगटस्य पौत्रेण श्रीमत् सुभटसूनुना।
श्रीमता तातटेनेदं उत्कीर्णं गुण-शालिना॥(১৯)

বঙ্গানুবাদ।-Bengali Translation

ওঁ স্বস্তি॥

(১)

যিনি সর্ব্বজ্ঞতাকেই রাজশ্রীর ন্যায় স্থিরভাবে ধারণ করিয়াছিলেন, সেই বজ্রাসনের [বুদ্ধদেবের] বিপুল-করুণা-পরিপালিত বহু-মার-[৫] সেনাসমাকুল-দিঙ্মণ্ডল-বিজয়সাধনকারী দশবল[৬] তোমাদিগকে রক্ষা করুক।

(পক্ষান্তরে)

বজ্রতুল্য সুদৃঢ় সিংহাসনে অধিষ্ঠিত, সর্ব্বজ্ঞতার ন্যায় রাজশ্রীর স্থির আশ্রয় স্বরূপ, রাজাধিরাজ [ধর্ম্মপালের] মহাকরুণা-পরিপালিত যে সেনাসমূহ দুর্দ্দান্ত-শত্রুসেনাপরিব্যাপ্ত-দশদিকের বিজয় সাধন করিতেছে, তাহারা তোমাদিগকে রক্ষা করুক।

(২)

মনোহারিণী লক্ষ্মীর উৎপত্তিস্থান যেমন সমুদ্র, বিশ্বব্রহ্মাণ্ডের আহ্লাদ-জনয়িত্রী কান্তির উৎপত্তিস্থান [সম্ভব] যেমন শশধর, সেইরূপ অবনিপালকুলের সর্ব্বোৎকৃষ্ট বংশধরের বীজিপুরুষ [প্রকৃতি] সর্ব্ববিদ্যাবিশুদ্ধ[৭] দয়িতবিষ্ণু জন্ম গ্রহণ করিয়াছিলেন।

(৩)

যিনি বিপুলকীর্ত্তিকলাপে সসাগরা বসুন্ধরাকে বিভূষিত করিয়াছিলেন, অরাতি-নিধনকারী, [সর্ব্বকার্য্যে] কুশল, প্রশংসনীয়, সেই বপ্যট [দয়িতবিষ্ণু হইতে] জন্ম গ্রহণ করিয়াছিলেন।

(৪)

[দুর্ব্বলের প্রতি সবলের অত্যাচারমূলক] “মাৎস্য ন্যায়”[৮] [অরাজকতা] দূর করিবার অভিপ্রায়ে, প্রকৃতিপুঞ্জ যাঁহাকে রাজলক্ষ্মীর কর গ্রহণ করাইয়া [রাজা নির্ব্বাচিত করিয়া] দিয়াছিল, পূর্ণিমা-রজনীর [দিঙ্‌মণ্ডল-প্রধাবিত] জ্যোৎস্নারাশির অতিমাত্র ধবলতাই যাঁহার স্থায়ী যশোরাশির অনুকরণ করিতে পারিত, নরপাল-কুলচূড়ামণি গোপাল নামক সেই প্রসিদ্ধ রাজা বপ্যট হইতে জন্মগ্রহণ করিয়াছিলেন।

(৫)

চন্দ্রের যেমন রোহিণী, অগ্নির যেমন স্বাহা, শিবের যেমন সর্ব্বাণী, গুহ্যকপতি কুবেরের যেমন ভদ্রকন্যা[৯] ভদ্রা, ইন্দ্রের যেমন পুলোমজা, এবং বিষ্ণুর যেমন লক্ষ্মী, সেইরূপ সেই [গোপালদেব] রাজার দেদ্দদেবী নাম্নী চিত্তবিনোদনকারিণী প্রিয়তমা মহিষী ছিলেন।

(৬)

সেই গোপালদেব এবং দেদ্দদেবী হইতে ধর্ম্মপালদেব জন্মগ্রহণ করিয়াছিলেন। তাঁহার বিশুদ্ধ ক্রিয়াকলাপ [অবদান] সুজন কর্ত্তৃক প্রশংসিত [স্তূয়মান]।[১০] নৃপতিবৃন্দের অধীশ্বর সেই রাজা একাকী সমগ্র বসুমতীর শাসনকার্য্য পরিচালনা করিতেছেন। ভুবনমণ্ডলের পরিখা স্বরূপ দিঙ্মণ্ডলের বিজয়াভিলাষী সেই রাজার [যুদ্ধ] যাত্রাকালে তীর হইতে জলনিমজ্জনোন্মত্ত-করিচরণ-সংস্পর্শে সমুদ্রের চিহ্ন বিলুপ্ত হওয়ায়, চতুঃসমুদ্র সে বিজয়যাত্রার বেগ সহ্য করিতে পারে না।

(৭)

সেই রাজা [ধর্ম্মপাল] প্ৰকট-লীলাচলিত-সেনাবল-সমভিব্যাহারে দিগ্বিজয়ার্থ বহির্গত হইলে, সেনাভারাক্রান্ত বিচলিত পর্ব্বতমালা বক্রভাব প্রাপ্ত হয়; এবং তাহাতে মস্তকস্থিত নম্রীকৃত মণিদ্বারা মস্তকে বেদনা অনুভব করিয়া, সেই বেদনাক্রান্ত শিরঃসমূহের সাহায্যার্থে হস্তোদ্গম করিয়া, অনন্তদেব অধোদেশে [সেই রাজার] অনতিদূরবর্ত্তিরূপে ত্বরিতপদে অনুগমন করিয়া থাকেন।

(৮)

সেই রাজা যুদ্ধার্থ প্রস্থিত হইলে, প্রচলিত সেনাসমূহের আস্ফালনোত্থিত ধূলিপটলে আকাশমণ্ডল পরিব্যাপ্ত হইবার জন্য, পৃথিবী সূক্ষ্মভাব ধারণ করিলে, ভারের লাঘববশতঃ, মণিগুলি উন্মীলিত হইলে, অনন্তদেবের ফণাসকল উল্লসিত হইয়া থাকে।

(৯)

কেহ তাঁহার চিত্তকে অপ্রিয় আচরণের দ্বারা বিচলিত করিলে, যে কোপাগ্নি সমুদ্ভূত হয়, তাহা বাড়বাগ্নির ন্যায় চতুঃসাগর-বেষ্টিত ভূমণ্ডলে নিরন্তর [অনির্বৃতি] প্রজ্জ্বলিত হইয়া থাকে।

(১০)

পৃথু, রঘুবংশধর রামচন্দ্র,[১১] নল প্রভৃতি যে সকল [গুণাধার] নরপালগণ [ভিন্ন ভিন্ন সময়ে] ধরিত্ৰীতলে আবির্ভূত হইয়াছিলেন, তাঁহাদিগকে [এক সময়ে] একত্র দর্শন করিবার ইচ্ছায়, বিধাতা যেন নরপালকুল-গৌরব-সংহারক ধর্ম্মপাল নামক নরপালকে কলিযুগে চিরচঞ্চল-লক্ষ্মী-করিণীর বন্ধনোপযোগী মহাস্তম্ভরূপে সংস্থাপিত করিয়াছিলেন।

(১১)

অগ্রগামী [নাসীর নামক] সেনাসমূহের (চরণাঘাতোত্থিত] ধূলিপটলে দশদিক্ আচ্ছন্নকারী সেনাদলকে অগ্রসর হইতে দেখিয়া, তাহার ইয়ত্তা করিতে না পারিয়া, তাহাকে [পুরাণপ্রসিদ্ধ অসংখ্য] মান্ধাতৃ-সৈন্যের সংমিশ্রণ [ব্যতিকর] মনে করিয়া, মহেন্দ্র [ভয়ে] চক্ষু নিমীলিত করিয়াছিলেন; [কিন্তু] সেই সেনাদল যুদ্ধবাসনায় পুলকিতগাত্র হইলেও, তাহাদের পক্ষে [ধর্ম্মপাল] রাজার শত্ৰুকুলক্ষয়কারী বাহুযুগলের সাহায্য করিবার অবকাশ উপস্থিত হয় নাই।[১২]

(১২)

তিনি মনোহর ভ্রূভঙ্গি-বিকাশে [ইঙ্গিতমাত্রে] ভোজ, মৎস্য, মদ্র, কুরু, যদু, যবন, অবন্তি, গন্ধার, এবং কীর[১৩] প্রভৃতি বিভিন্ন জনপদের [সামন্ত?] নরপালগণকে প্রণতি-পরায়ণ-চঞ্চলাবনত-মস্তকে সাধু সাধু বলিয়া কীর্ত্তন করাইতে করাইতে, হৃষ্টচিত্ত পাঞ্চালবৃদ্ধকর্ত্তৃক মস্তকোপরি আত্মাভিষেকের স্বর্ণকলস উদ্ধৃত করাইয়া, কন্যকুব্জকে [অভিষিক্ত করাইয়া] রাজশ্রী প্রদান করিয়াছিলেন।[১৪]

(১৩)

সীমান্তদেশে গোপগণকর্ত্তৃক, বনে বনেচরগণকর্ত্তৃক, গ্রামসমীপে জনসাধারণকর্ত্তৃক, [গৃহ] চত্বরে ক্রীড়াশীল শিশুগণকর্ত্তৃক, প্রত্যেক ক্রয়বিক্রয়স্থানে বণিক্‌সমূহ (?) কর্ত্তৃক, এবং বিলাসগৃহের পিঞ্জরস্থিত শুকগণকর্ত্তৃক গীয়মান আত্মস্তব শ্রবণ করিয়া, [এই নরপতির] বদনমণ্ডল লজ্জাবশে নিয়ত ঈষৎ বক্রভাবে বিনম্র হইয়া রহিয়াছে।[১৫]

যেখানে[১৬] ভাগীরথী-প্রবাহ-প্রবর্ত্তমান নানাবিধ [নৌবাটক[১৭]] রণতরণী [সুবিখ্যাত] সেতুবন্ধনিহিত শৈলশিখরশ্রেণীরূপে [লোকের মনে] বিভ্রমের উৎপাদন করিয়া থাকে,—যেখানে নিরতিশয় ঘনসন্নিবিষ্ট [ঘনাঘন-নামক[১৮]] রণকুঞ্জর-নিকর [জলদজালবৎ প্রতিভাত হইয়া] দিনশোভাকে শ্যামায়মান করিয়া, [লোকের মনে] নিরবচ্ছিন্ন জলদসময়-সমাগম-সন্দেহের উৎপাদন করিয়া থাকে,—যেখানে উত্তরাঞ্চলাগত অগণ্য [মিত্র] রাজন্য-কর্ত্তৃক [প্রাভৃতীকৃত[১৯]] উপঢৌকনীকৃত অসংখ্য অশ্বসেনার প্রখর-খুরোৎক্ষিপ্ত-ধূলিপটল-সমাবেশে দিঙ্মণ্ডলের অন্তরাল নিরন্তর ধূসরিত হইয়া থাকে,—যেখানে রাজরাজেশ্বর-সেবার্থ-সমাগত সমস্ত জম্বূদ্বীপাধিপতিগণের অনন্ত-পদাতি-পদভরে[২০] বসুন্ধরা অবনত হইয়া থাকে,—সেই পাটলিপুত্রনগর-সমাবাসিত-শ্রীমজ্জয়স্কন্ধাবার হইতে, পরম সুগত-[বুদ্ধ]-মতাবলম্বী মহারাজাধিরাজ শ্রীগোপালদেবের পাদানুধ্যান-পরায়ণ, পরমেশ্বর পরমভট্টারক[২১] মহারাজাধিরাজ কুশলী[২২] শ্রীমান্ ধর্ম্মপালদেব শ্রীপুণ্ড্রবর্দ্ধন-“ভুক্তির” অন্তঃপাতি, ব্যাঘ্রতটী-“মণ্ডলের” অন্তর্ভুক্ত, মহন্তাপ্রকাশ নামক “বিষয়ের”[২৩] অন্তর্গত ক্রৌঞ্চশ্বভ্র নামক গ্রাম।[২৪] ইহার সীমা,—পশ্চিমে “গঙ্গিনিকা”,[২৫] উত্তরে “কাদম্বরী-দেবকুলিকা”[২৬] ও খর্জ্জূরবৃক্ষ। পূর্ব্বোত্তরে রাজপুত্র দেবট কৃত “আলি”,[২৭] [এই আলি] “বীজপূরকে”[২৮] গিয়া প্রবিষ্ট হইয়াছে। পূর্ব্বদিকে বিটক-কৃত “আলি”, তাহা[২৯] খাটক-যানিকাতে গিয়া প্রবেশ করিয়াছে।[৩০] [তাহার পর] জম্বূ যানিকা[৩১] আক্রমণ করিয়া [তন্নিকটবর্ত্তী হইয়া] জম্বূ-যানক পর্য্যন্ত গিয়াছে। তথা হইতে নিঃসৃত হইয়া, পুণ্যারাম-বিল্বার্দ্ধস্রোতিকা পর্য্যন্ত গিয়াছে। তথা হইতে নিঃসৃত হইয়া, নলচর্ম্মটের উত্তর সীমা পর্য্যন্ত গিয়াছে। নলচর্ম্মটের দক্ষিণে নামুণ্ডি-কায়িকা হইতে খণ্ডমুণ্ডমুখ পর্য্যন্ত, খণ্ডমুণ্ডমুখ হইতে বেদস-বিল্বিকা, তাহার পরে রোহিতবাটী-পিণ্ডারবিটি-জোটিকা-সীমা, উক্তারযোটের দক্ষিণ এবং গ্রামবিল্বের দক্ষিণ পর্য্যন্ত দেবিকা সীমাবিটি ধর্ম্মাযোজোটিকা। এই প্রকার মাঢ়াশাল্মলী নামক গ্রাম। তাহার উত্তরেও গঙ্গিনিকার সীমা; তাহার পূর্ব্বে অর্দ্ধস্রোতিকার সহিত [মিলিত হইয়া] আম্রযানকোলার্দ্ধযানিকা পর্য্যন্ত গিয়াছে। তাহার দক্ষিণে কালিকাশ্বভ্র, তথা হইতেও নিঃসৃত হইয়া, শ্ৰীফলভিষুক পর্য্যন্ত গিয়াছে, তাহার পশ্চিমে [গিয়া] বিল্বঙ্গর্দ্ধস্রোতিকার গঙ্গিনিকায় গিয়া প্রবিষ্ট হইয়াছে। পালিতকের সীমা দক্ষিণে কাণা-দ্বীপিকা, পূর্ব্বে কোণ্ঠিয়া-স্রোতঃ, উত্তরে গঙ্গিনিকা, পশ্চিমে জেনন্দায়িকা[৩২] এই গ্রামের শেষ সীমায় পরকর্ম্মকৃদ্বীপ,[৩৩] স্থালীক্কট-“বিষয়ের” অধীন আম্রষণ্ডিকা-“মণ্ডলের” অন্তর্গত গো-পিপ্পলীগ্রামের সীমা,—পূর্ব্বে উড্রগ্রামমণ্ডলের পশ্চিম সীমা, দক্ষিণে জোলক, পশ্চিমে বেসানিকা নামক খাটিকা, উত্তরে উড্রগ্রামমণ্ডলেব সীমায় অবস্থিত গোপথ[৩৪] এই গ্রামচতুষ্টয়ে সুবিদিত [সমুপগত] রাজ-রাজনক,[৩৫] রাজপুত্র, রাজামাত্য, সেনাপতি, বিষয়পতি, ভোগপতি, ষষ্ঠাধিকৃত, দণ্ডশক্তি, দণ্ডপাশিক, চৌরোদ্ধরণিক, দৌঃসাধসাধনিক, দূতখোল-গমাগমিক, অভিত্বরমাণ, হস্ত্যধ্যক্ষ, অশ্বাধ্যক্ষ, গবাধ্যক্ষ, মহিষাধ্যক্ষ, ছাগাধ্যক্ষ, মেষাধ্যক্ষ, নাকাধ্যক্ষ, বলাধ্যক্ষ, তরিক, শৌল্কিক, গৌল্মিক, তদাযুক্তক, বিনিযুক্তক, প্রভৃতি রাজপাদোপজীবিসকল,—এবং অকথিত আরও চাটভটজাতীয় যথাকালবাস্তব্য লোকসকল; জ্যেষ্ঠকায়স্থ মহামহত্তর দাশগ্রামিক প্রভৃতি বিষয়ব্যবহারী সকল; করণ ও প্রতিবাসী ক্ষেত্রকরসকল,[৩৬] ইহাদিগকে ব্রাহ্মণসম্মানপূর্ব্বক [অর্থাৎ অগ্ৰে ব্ৰাহ্মণের সম্মান করিয়া, পরে ইহাদিগকে যথাযোগ্যভাবে সম্মান করিয়া,] জানাইতেছেন ও আজ্ঞা করিতেছেন যে,—আপনাদিগের সম্মতি হউক, মহাসামন্তাধিপতি শ্রীনারায়ণ বর্ম্মা দূতক যুবরাজ শ্রীত্রিভুবনপাল[৩৭] দ্বারা আমাদিগকে জানাইয়াছেন যে,—“মাতাপিতার ও নিজের পুণ্যাভিবৃদ্ধির উদ্দেশ্যে আমরা “শুভস্থলী”-নামক স্থানে দেবগৃহ নির্ম্মাণ করাইয়াছি, সেই দেবগৃহ-রক্ষক লাটদেশীয় ব্রাহ্মণ[৩৮] ও দেবপূজক প্রভৃতি পাদমূল-সমেত[৩৯] [তাহাতে] প্ৰতিষ্ঠাপিত ভগবন্নন্ন-নারায়ণ[৪০] দেবের পূজোপস্থানাদি কর্ম্মের[৪১] জন্য তত্ৰত্য হট্টিকা ও তলপাটকসমেত চারিটি গ্ৰাম আপনি দান করুন।” তদনন্তর আমি, তদীয় বিজ্ঞপ্তি অনুসারে, তলপাটক ও হট্টিকাসমেত উপরি লিখিত এই চারিটি গ্ৰাম স্বসীমা পর্য্যন্ত যথোদ্দেশে দশাপচারের[৪২] সহিত, কোন কর ধার্য্য না করিয়া, [অৰ্থাৎ বিনা করে] সকল উৎপাত দূর করিয়া, “ভূমিচ্ছিদ্র-ন্যায়ানুসারে” চন্দ্ৰ, সূর্য্য ও পৃথিবীর অবস্থানকাল পর্য্যন্ত [নারায়ণ বর্ম্মা যেরূপভাবে প্ৰাৰ্থনা করিয়াছিলেন] সেইরূপেই প্ৰতিষ্ঠাপন করিলাম। আপনারা সকলেই ভূমির দানফলগৌরব ও তদপহরণে মহানরকপাতাদি ভয় [স্মরণ করিয়া] এই দান অনুমোদন করিয়া পরিপালন করিবেন। প্ৰতিবাসী ক্ষেত্ৰকর সকল [এই রাজ] আজ্ঞা শ্রবণ করিয়া, সমুচিত করপিণ্ডকাদি[৪৩] সর্ব্বপ্ৰকাৰ প্ৰদেয় বস্তু [পূর্ব্বোক্ত দেবসেবাৰ্থ] প্ৰদান করুক।

সগর প্রভৃতি বহু রাজগণ ভূমিদান করিয়া গিয়াছেন; যখন যে রাজা ভূমির অধিপতি হন, তখন তাঁহারই ফল হয়॥১৪॥[৪৪]

ভূমিদানকর্ত্তা ষষ্টিসহস্ৰ বৎসর স্বৰ্গভোগ করেন। দত্তভূমির হরণকারী ও হরণ বিষয়ের অনুমোদনকারী তৎ[পরিমিত]কাল পৰ্য্যন্ত নরকভোগ করেন॥১৫॥

যিনি স্বদত্ত অথবা পরদত্ত ভূমি হরণ করেন, তিনি পিতৃগণের সহিত, বিষ্ঠার কৃমি হইয়া, নরকযন্ত্ৰণা ভোগ করেন॥১৬॥

লক্ষ্মী ও মনুষ্যজীবন পদ্ম (কমল) পত্রস্থিত জলবিন্দুর ন্যায় চঞ্চল;—ইহা এবং পূর্ব্বোক্ত বাক্য সকল স্মরণ করিয়া, পরকীর্ত্তির বিলোপসাধন করা কোন পুরুষেরই কর্ত্তব্য নহে॥১৭॥

লক্ষ্মী বিদ্যুতের ন্যায় চঞ্চলা, মনুষ্যশরীর দীপশিখার ন্যায় ক্ষণস্থায়ী, সংসার দুঃখবহুল, পরকীর্ত্তি নষ্টকারীর অযশঃ ও নিয়ত পরকীর্ত্তি রক্ষাকারীর যশঃ, চন্দ্ৰসূর্য্যের স্থিতিকালপর্য্যন্ত স্থায়ী—এই সকল কথা মনে করিয়া, ভবিষ্যৎ রাজগণ যাহা অভিরুচি হয় করিবেন; অধিক বাক্যব্যয়ে ফল নাই॥১৮॥

অভিবর্দ্ধমান-বিজয়রাজ্য-সংবৎসর ৩২, অগ্ৰহায়ণ মাসের দ্বাদশ দিবসে॥[৪৫]

ভোগটের পৌত্ৰ, সুভটের পুত্ৰ, গুণশালী তাতটকর্ত্তৃক ইহা উৎকীৰ্ণ হইল॥১৯॥


মূল পাঠের টীকা


^٭ ওঙ্কার বলিয়া যাহা পঠিত হইতেছে, তাহা একটি মাঙ্গলিক চিহ্ণরূপে উৎকীর্ণ আছে।

^(১) বসন্ততিলক।

^(২) মালিনী। এই শ্লোকের “বারিরাশি” শব্দের পর বিসর্গ-চিহ্ন ব্যবহৃত হয় নাই, “শশধর” শব্দের পূর্ব্বে একটি শ্-অক্ষর সংযুক্ত হইয়াছে।

^(৩) অনুষ্টুভ্।

^(৪) শাৰ্দ্দূল-বিক্রীড়িত। এই শ্লোকের “করংগ্রাহিতঃ” মূল লিপিতে “করঙ্গ্রাহিতঃ” রূপে উৎকীর্ণ আছে। “গৌড়ের ইতিহাসে” তাহাই “করোগ্রাহিতঃ” রূপে মুদ্রিত হইয়াছে। এই গ্রন্থের মুদ্রিত পাঠে কত ভ্রমপ্রমাদ আছে, বাহুল্যভয়ে তাহা উল্লিখিত হইল না।

^(৫) শাৰ্দ্দূল-বিক্রীড়িত।

^(৬) স্রগ্ধরা।

^(৮) মন্দাক্রান্তা।

^(৯) অনুষ্টুভ্। এই শ্লোকের “অনির্বৃতি”-শব্দকে “অনির্বৃত্তি” রূপে পাঠ করিবার জন্য অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ নির্দ্দেশ করিয়াছেন। অতীতকাল-বিজ্ঞাপক [প্রজজ্বাল] ক্রিয়াপদের সহিত অন্বিত “অনির্বৃতি”-শব্দ কোনরূপ সঙ্গত অর্থ দ্যোতিত করিতে পারে কি না, তাহা চিন্তনীয়।

^(১০) শাৰ্দ্দূল-বিক্রীড়িত।

^(১১) স্রগ্ধরা।

^(১২) স্রগ্ধরা। এই শ্লোকে “কান্যকুব্জ”-শব্দ মূললিপিতে “কন্যকুব্জ” রূপে উৎকীর্ণ আছে। “दत्तः श्रीकन्यकुब्जः” লিপিকর-প্রমাদ বলিয়াই বোধ হয়। “दत्तश्रीः कन्यकुब्जः” পাঠ গ্রহণ করিলে, অর্থ-সঙ্গতি রক্ষিত হইতে পারে। এক সময়ে “কান্যকুব্জ” যে “কন্যকুব্জ” রূপেই লিখিত হইত, অন্যান্য তাম্রশাসনেও তাহা দেখিতে পাওয়া যায়। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ তাহার উল্লেখ না করিয়া, এখানে ‘কন্যকুব্জকে’ কান্যকুব্জ পাঠ করিবার উপদেশ দিয়া গিয়াছেন। কিন্তু কন্যকুব্জ-পাঠ লিপিকর-প্রমাদের নিদর্শন বলিয়া স্বীকার করা যায় না। ‘কন্যকুব্জ’ই এখন ‘কনোজ’ হইয়া পড়িয়াছে; আকারটি যে কত কাল বিলুপ্ত হইয়াছে, তাম্রশাসনের পাঠে তাহারই ঐতিহাসিক তথ্য প্রকটিত হইয়া রহিয়াছে।

^(১৩) শাৰ্দ্দূল-বিক্রীড়িত। এই শ্লোকের “মানপৈঃ” শব্দ “মানবৈঃ” হইতে পারে বলিয়া অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ অনুমান করিয়াছেন। প্রথম চরণে “জনৈঃ”-শব্দ থাকায়, পরবর্ত্তী চরণে তুল্যার্থবোধক “মানবৈঃ”-শব্দ প্রযুক্ত হইবার সম্ভাবনা অল্প। “মানপঃ”-শব্দ সংজ্ঞা-শব্দরূপে ব্যবহৃত হইয়াছে বলিয়াই বোধ হয়।

^٭১ অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ “नौकाध्यक्ष” পাঠ-যোজনা করিয়া গিয়াছেন; তদপেক্ষা “नाकाध्यक्ष” পাঠ যোজনা করিলেই ভাল হয়। কারণ, কিঞ্চিৎ পরেই আবার “तरिक” রহিয়াছে।

^٭২ অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ “प्रत्ययोपनयः” পাঠ মুদ্রিত করিয়াছেন। (উইকিসংকলন টীকা: কিল্‌হর্ণের পাঠে প্রত্যায়োপনয়ঃ-ই আছে। এখানে দেখুন।)

^(১৪) অনুষ্টুভ্।

^(১৫-১৬) অনুষ্টুভ্।

^(১৭) পুষ্পিতাগ্রা।

^(১৮) শিখরিণী।

^(১৯) অনুষ্টুভ্।


প্রশস্তি-পরিচয় ও অনুবাদ-অংশের টীকা
J. A. S. B. Vol. LXIII, Part I, p. 39.
Epigraphia Indica, Vol. IV, p. 243. অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ যে সকল তাম্রশাসনের পাঠ ও ব্যাখ্যা প্রকাশিত করিয়া গিয়াছেন, তাহাতে তাঁহার প্রগাঢ় পাণ্ডিত্য চিরস্মরণীয় হইয়া রহিবে। উত্তরকালে যাঁহারা এই কার্য্যে হস্তক্ষেপ করিতেছেন বা করিবেন, তাঁহাদিগকে মুক্তকণ্ঠে পরলোকগত অধ্যাপক মহাশয়ের নিকট নানা বিষয়ে ঋণ স্বীকার করিতে হইবে। এই লেখমালা সঙ্কলন করিবার সময়ে তাঁহার প্রকাশিত পাঠ ও ব্যাখ্যা অনেক স্থলেই পথপ্রদর্শকরূপে প্রভূত উপকার সাধন করিয়াছে। যেখানে মত-পার্থক্য ঘটিয়াছে, সেই সকল স্থলে অধ্যাপক কিল্‌হর্ণের ব্যাখ্যা বা মন্তব্য উদ্ধৃত এবং আলোচিত হইয়াছে।
In the Khàlimpur inscription, Dharamapāla is described as স্তূপমানাবদাতঃ i.e., he was fair and as high as a stupa.—Pandita Sástri in the Introduction (p. 6) to the Rāmacarita in the Memoirs of the Asiatic Society of Bengal, Vol III, No. I.
I must just mention here that surely Mr. Batavyāl has been rather rash in stating that the grant recorded in this inscription was made in favour of the poet Bhatta Náráyána—Prof. Kielhorn in Epigraphia Indica, Vol. IV, p. 243 Note.
“বহু-মারকুলোপলম্ভা”-শব্দটি “দিশো” এই কর্ম্মপদের বিশেষণ বলিয়া বোধ হয়। তদনুসারে “বহুমার কুলের উপলম্ভ (উপলব্ধি) হয় যাহাতে”—এইরূপ বহুব্রীহি সমাস সূচিত হইতে পারে। “বজ্রাসন-সাধনা” নামক বৌদ্ধতন্ত্র হইতে অধ্যাপক ফুসে কর্ত্তৃক উদ্ধৃত বজ্রাসন-বুদ্ধের ধ্যানে
“चतुर्म्मार-संघटित-महासिंहासनवरं तदुपरि विश्वपद्मवज्रे वज्रपर्य्यङ्कसंस्थितं”

এইরূপ বর্ণনা দেখিতে পাওয়া যায়। শাক্যসিংহকে সাধনপথ হইতে বিচলিত করিবার জন্য [স্কন্ধ, ক্লেশ, মৃত্যু এবং দেবপুত্র নামক] “চতুর্ম্মার” পুনঃ পুনঃ বলপ্রকাশ করিয়া পরাভূত হইবার কথা বৌদ্ধ-সাহিত্যে প্রসিদ্ধ আছে। কালিকা পুরাণে [ষষ্ঠ অধ্যায়ের ৩০-৫৫ শ্লোকে] মারগণোৎপত্তির যে আখ্যায়িকা দেখিতে পাওয়া যায়, তদনুসারে মারসৈন্য অসংখ্য। এই শ্লোকে বৌদ্ধসাহিত্য বিশ্রুত “চতুর্ম্মার”, অথবা কালিকাপুরাণোক্ত “বহুমার” সূচিত হইয়াছে, তাহা চিন্তণীয়।

दान-शील-क्षमा-वीर्य्य-ध्यान-प्रज्ञा बलानि च।
उपायः प्रणिधि-ज्ञानं दशबुद्धबलानि वै॥

अङ्गानि वेदा श्चत्वारो मीमांसा न्याय विस्तरः।
धर्म्मशास्त्रं पुराणञ्च विद्या ह्येता श्चतुर्द्दश॥
आयुर्व्वेदो धनुर्व्वेदो गान्धर्व्वश्चेति ते त्रयः।
अर्थशास्त्रं चतुर्थञ्च विद्या ह्यष्टादशैव तु॥

বিষ্ণুপুরাণোক্ত এই অষ্টাদশবিদ্যা সূচিত করিবার জন্যই “সর্ব্ববিদ্যাবদাত” বিশেষণটি প্রযুক্ত হইয়া থাকিতে পারে। “সর্ব্ববিদ্যার” মধ্যে “ধনুর্বিদ্যা” অবশ্যই অন্তর্নিবিষ্ট থাকিবে। সুতরাং দয়িতবিষ্ণুর তাহাতেও অধিকার থাকা বুঝিতে হইবে। কিন্তু “রামচরিতের” ভূমিকায় মহামহোপাধ্যায় শ্রীযুক্ত হরপ্রসাদ শাস্ত্রী, এম-এ দয়িতবিষ্ণু সম্বন্ধে লিখিয়াছেন—He was not even a military man. এরূপ সিদ্ধান্ত করিবার কারণ কি, তাহা উল্লিখিত হয় নাই। পক্ষান্তরে সর্ব্ববিদ্যার উল্লেখ থাকায়, তাহা হইতে ধনুর্বিদ্যাকে বর্জ্জন করিবার কারণ দেখিতে পাওয়া যায় না।
‘মাৎস্য ন্যায়’ সংস্কৃত সাহিত্যে সুপরিচিত একটি লৌকিক ন্যায়। তাহার অর্থ,—দুর্ব্বলের প্রতি সবলের অত্যাচারজনিত অরাজকতা। উদাসীন শ্রীরঘুনাথবর্ম্ম বিরচিত “লৌকিক ন্যায়সংগ্রহ” গ্রন্থে “মাৎস্য ন্যায়” এইরূপে ব্যাখ্যাত হইয়াছে। যথা—
“प्रबल-निर्बल विरोधे सबलेन निर्बल-बाधविवक्षायां तु मात्स्यन्यायावतारः। अयं प्रायः इतिहास-पुराणादिषु दृश्यते, यथाहि वासिष्टे प्रह्लादाख्याने तत्समाधिं प्रस्तुत्योक्त्रम्,—
एतावताय कालेन तद्रसातल-मण्डलं।
बभूवाराजकं तीक्ष्णं मात्स्यन्याय-कदर्थितम्॥
यथा—प्रबला मत्स्या निर्ब्बलां स्तान्नाशयन्तिस्मेति न्यायार्थः।”
অধ্যাপক বোধলিঙ্গ একটি কারিকা উদ্ধৃত করিয়া দেখাইয়াছেন যথা—

“परस्परामिषतया जगतो भिन्नवर्त्मनः।
दण्डाभावे परिध्वंसी मात्स्यो न्यायः प्रवर्त्तते॥”
—Von Bohtlingk’s Inde Spruche.
বঙ্গদেশে এক সময়ে এইরূপ ‘মাৎস্য ন্যায়’ প্রবর্ত্তিত হইলে, প্রজাপুঞ্জ তাহা দূরীভূত করিয়া, গোপালদেবকে রাজা নির্ব্বাচিত করিয়াছিল। গোপালদেবের পুত্র ধর্ম্মপালদেবের তাম্রশাসনের এই বিবরণটি তারানাথের গ্রন্থেও উল্লিখিত আছে। ইহা বাঙ্গালার ইতিহাসের একটি স্মরণীয় ঘটনা। ‘মাৎস্য ন্যায়ের’ ব্যাখ্যা করিতে গিয়া, “রামচরিতের” ভূমিকায় মহামহোপাধ্যায় পণ্ডিতবর শ্রীযুক্ত হরপ্রসাদ শাস্ত্রী, এম্ এ লিখিয়াছেন—“to escape from being absorbed into another kingdom or to avoid being swallowed up like a fish.”

অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ দেদ্দদেবীকে ভদ্র নামক এক রাজার কন্যা বলিয়া নির্দ্দেশ করিয়াছেন। তিনি তাহার কোনরূপ প্রমাণের উল্লেখ করেন নাই। এখানে কোন ঐতিহাসিক তথ্য প্রকটিত হইয়াছে বলিয়া বোধ হয় না, এখানে কেবল পৌরাণিক আখ্যায়িকাই সূচিত হইয়াছে।
পুরাতন বঙ্গলিপির ‘যকার’ এবং ‘পকার’ দেখিতে একরূপ বলিয়াই, অর্থসঙ্গতির প্রতি লক্ষ্য না করিয়া, কেহ কেহ স্তূয়মানকে ‘স্তূপমান’ পাঠ করিয়া থাকিবেন।
কেবল ‘রাম’ বলিলে পুরাণপ্রসিদ্ধ তিন ব্যক্তি সূচিত হইতে পারেন বলিয়া, এখানে রাম-শব্দের সঙ্গে ‘রাঘব’ শব্দটি ব্যবহৃত হইয়াছে।
এই শ্লোকে এবং ইহার পরবর্ত্তী শ্লোকে ধর্ম্মপালের শাসন সময়ের দুইটি উল্লেখযোগ্য ঐতিহাসিক ঘটনা সূচিত হইয়াছে বলিয়া বোধ হয়। একটি ঘটনা কান্যকুব্জাধিপতি ইন্দ্র [মহেন্দ্র] নামক নরপতির ধর্ম্মপালের হস্তে পরাজয়; অপর ঘটনা মহেন্দ্রের রাজ্যে ধর্ম্মপালকর্ত্তৃক চক্রায়ুধ নামক সামন্ত-নরপালের অভিষেক। মহেন্দ্র ধর্ম্মপালকে অসংখ্য সেনাবল লইয়া অগ্রসর হইতে দেখিয়া, যুদ্ধে পরাভব অনিবার্য্য মনে করিয়া, এতদূর বিহ্বল হইয়াছিলেন যে, ধর্ম্মপালের অসংখ্য সেনাবল যুদ্ধার্থ উৎসুক থাকিলেও, তাহাদিগকে রণশ্রম স্বীকার করিতে হয় নাই,—ধর্ম্মপাল রাজধানীতে উপনীত হইবামাত্রই তাহা অধিকার করিতে পারিয়াছিলেন। এই শ্লোকের মহেন্দ্র শব্দকে দেবরাজ ইন্দ্র বলিয়া গ্রহণ করিয়া, অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ ইন্দ্রের সহিত মান্ধাতার সখ্য প্রভৃতি পৌরাণিক প্রসঙ্গের অবতারণা করিতে গিয়া, ব্যতিকর শব্দের ভিন্নার্থ গ্রহণে একটি ব্যাখ্যা লিপিবদ্ধ করিয়া গিয়াছেন। স্বর্গীয় বটব্যাল মহাশয়ের ব্যাখ্যাকেও মূলানুগত বলিয়া গ্রহণ করিবার উপায় নাই। তিনিও পাদটীকায় মান্ধাতার সহিত ইন্দ্রের সখ্যের ইঙ্গিত করিয়া লিখিয়া গিয়াছেন,—The God Indra, when suddenly he sees the ten quarters of the globe whitened by the dust raised by the vanguard of his army, and fancies it to be the approach of the army of Mandhata, shuts his eyes and ponders. But there is no occasion today for his all conquering arms rendering the assistance of his warlike troops to Indra এবং অর্থটি সুব্যক্ত করিবার অভিপ্রায়ে পাদটীকায় লিখিয়া গিয়াছেন,—The meaning of the text is that, under the sway of Dharmapála the enemies of the Gods had ceased to exist. এই শ্লোকের ‘মহেন্দ্র’-শব্দ কান্যকুব্জাধিপতিকে না বুঝাইয়া, মান্ধাতৃ-বন্ধু দেবরাজ ইন্দ্রকে বুঝাইলে, তাঁহার পক্ষে মান্ধাতৃ-সৈন্যের [ব্যতিকরে] ‘চকিত’ হইয়া ‘ধ্যানতন্দ্রী’ ধারণ করিবার কারণ থাকিতে পারে না। এখানে ‘ব্যতিকর’-শব্দটি সংমিশ্রণ অর্থে ব্যবহৃত হইয়াছে বলিয়াই বোধ হয়।
ভোজ মৎস্যাদি দেশ সম্বন্ধে অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ লিখিয়া গিয়াছেন,—Kányakubja itself was in the country of the Pánchàlas in Madhyadesha. According to the topographical list of the Brihatsamhitá, the Kurus and Matsyas also belong to the middle country, the Madras to the North-West, the Gandháras to the northern and the Kiras to the North-East division of India. The Avantis are the people of Ujjayini in Málava. Yadus, according to the Lakkha Mandal Prasasti, were long ruling in part of the Punjab, but they are found also south of the Jamuná; and south of this river and north of the Narmadá probably were also the Bhojas who head the list — Epigraphia Indica Vol. IV, p. 246.
শ্রীধর্ম্মপালদেব [কান্যকুব্জেশ্বর] ইন্দ্ররাজকে পরাভূত করিয়া তাঁহার [মহোদয় নামক] কান্যকুব্জ-রাজ্যে চক্রায়ুধ নামক আপন সামন্তনরপালকে অভিষিক্ত করিবার কথা নারায়ণপালদেবের [ভাগলপুরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে [৩য় শ্লোকে] উল্লিখিত আছে। ধর্ম্মপাল কান্যকুব্জের স্বাধীনতা হরণ করিয়াও, তাহার জন্য একজন স্বতন্ত্র রাজা নিযুক্ত করায়, কান্যকুব্জ পুনরায় রাজশ্রী প্রাপ্ত হইয়াছিল; এবং [তদ্দেশের নিকটবর্ত্তী] অন্যান্য জনপদের নরপালগণও সাধু সাধু বলিয়া তৎকার্য্যের সাধুবাদ করিয়াছিলেন।
ধর্ম্মপাল কিরূপ লোকপ্রিয় ছিলেন, এই শ্লোকে তাহার পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়। পরবর্ত্তীকালে বরেন্দ্রমণ্ডলের ঘরে ঘরে মহীপালের গীত প্রচলিত হইয়াছিল। হয়ত একসময়ে ধর্ম্মপালের গীতও সেই ভাবে সকল স্থানেই প্রচলিত ছিল। কিন্তু এই শ্লোক ভিন্ন, তাহার অন্য কোনরূপ উল্লেখ সাহিত্যে বা জনশ্রুতিতে বর্ত্তমান নাই। এই শ্লোকের “मानप” শব্দ অপরিচিত, এবং “त्रपाविवलितानम्रं” একটি উল্লেখযোগ্য রচনা-মাধুর্য্যের নিদর্শন। বটব্যাল মহাশয় ইহাকে “त्रपाविचलितानम्रं” পাঠ করায়, ইহা একটি রচনা-দোষের নিদর্শন বলিয়াই প্রতিভাত হইয়াছিল। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ প্রকৃত পাঠ মুদ্রিত করিবার পরেও, বটব্যাল মহাশয়ের উদ্ধৃত পাঠই “গৌড়ের ইতিহাসে” মুদ্রিত হইয়াছে। সজ্জনগণ লজ্জায় “বিবলিত” হইতে পারেন; কিন্তু [কাহারও পক্ষেই] লজ্জায় “বিচলিত” হইবার সম্ভাবনা নাই। “त्रपाविवलितानम्रं सदैवाननं” ব্যাখ্যা করিবার জন্য অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ লিখিয়া গিয়াছেন,—“He always bashfully turns aside and bows down his face”.—Epigraphia Indica Vol. IV., P. 252.
পালবংশীয় নরপালগণের সকল তাম্রশাসনেই [বংশবিবৃতিসূচক শ্লোকাবলীর শেষে] এই গদ্যাংশের আরম্ভ দেখিতে পাওয়া যায়, এবং ইহাতেই তাঁহাদের “জয়স্কন্ধাবারের” পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া যায়। কিন্তু এই গদ্যাংশে অপ্রচলিত সংজ্ঞাশব্দের বাহুল্য এবং লিপিকর-প্রমাদের আতিশয্য বর্ত্তমান থাকায়, এপর্য্যন্ত কোন ভাষায় ইহার আদ্যন্তের মূলানুগত অনুবাদ প্রকাশিত হইতে পারে নাই। প্রাচ্যবিদ্যামহার্ণব শ্রীযুক্ত নগেন্দ্রনাথ বসু মহাশয় মদনপালদেবের [মনহলিগ্রামে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনের একটী সম্পূর্ণ বঙ্গানুবাদ “সাহিত্যপরিষৎ-পত্রিকায়” [১৩০৫ সালের দ্বিতীয় সংখ্যার ১৫৬-১৫৭ পৃষ্ঠায়] প্রকাশিত করিবার চেষ্টা করিয়াছিলেন। নানা কারণে, তাহাকে মূলানুগত অনুবাদ বলিয়া স্বীকার করিতে সাহস হয় না।
পালবংশীয় নরপালগণের কোন কোন তাম্রশাসনে “নৌবাটক” এবং কোন কোন তাম্রশাসনে “নৌবাট”-শব্দ উৎকীর্ণ আছে। নারায়ণপালদেবের [ভাগলপুরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনের গদ্যাংশের ইংরাজি অনুবাদসাধনে প্রবৃত্ত হইয়া, ডাক্তার রাজেন্দ্রলাল মিত্র “নৌবাটক” শব্দের “নৌ-সেতু” অর্থ লিপিবদ্ধ করিয়া গিয়াছেন। ডাক্তার হুল্‌জ্ তৎপ্রতি কটাক্ষ করিয়া, সে ব্যাখ্যা গ্রহণ করিতে না পারিয়া, [Indian Antiquary vol. XV., p. 309, Note 29] লিখিয়া গিয়াছেন,—“R. Mitra concludes from this passage that Náráyanapáladeva had made a bridge of boats across the Ganges. But the two words pravartamána and nánávidha render this explanation inadmissible. The panegyrist merely wants to say that the broad line of boats floating on the river resembled the famous bridge of Ráma. অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ “নৌবাটক”-শব্দকে বিজয়সেনদেবের [দেওপাড়ায় আবিষ্কৃত] প্রস্তরলিপির [২২ শ্লোকের] “নৌ-বিতান”-শব্দের তুল্যার্থ-বোধক মনে করিয়া, [Epigraphia Indica, Vol. IV., p. 252] “নৌ-সেতু”—অর্থ গ্রহণ করিতে অসমর্থ হইয়া, লিখিয়া গিয়াছেন,—“where the manifold fleets of boats, proceeding on the path of the Bhágirathi, make it seem as if a series of mountain-tops had been sunk to build another (?) causeway (for Ráma’s passage)” আদ্যন্তের সমালোচনা করিলে, “নৌ-সেতু” অর্থ গ্রহণ করিবার আকাঙ্ক্ষা উপস্থিত হয় না। “বাট” বা “বাটক” শব্দ “অমরকোষে” স্থান প্রাপ্ত হয় নাই। “বাট”-শব্দ [পুরুষোত্তমদেব-কৃত] “ত্রিকাণ্ড শেষে” এবং [হেমচন্দ্র-কৃত] “অভিধান-চিন্তামণিতে” যথাক্রমে
“वाटः पथश्च मार्गश्च,”
এবং
“वाटः पथि वृतौ वादं,”

বলিয়া উল্লিখিত থাকিলেও, “নৌবাটক”-শব্দকে “নৌপথ” বলিয়া ব্যাখ্যা করা যায় না। বাঙ্গালীর “নৌবল” চিরপরিচিত। মহাকবি কালিদাস বাঙ্গালীকে “নৌসাধনোদ্যতান্” বলিয়া তাহার পরিচয় প্রদান করিয়া গিয়াছেন। পালবংশীয় নরপালগণ বাঙ্গালী বলিয়া, তাঁহাদের “জয়স্কন্ধাবারে” হস্ত্যশ্বপদাতিবলের ন্যায় “নৌবলও” দেখিতে পাওয়া যাইত; এবং রাজ-কবি তজ্জন্যই “নৌবাটক”-শব্দের ব্যবহারে তাহার পরিচয় প্রদান করিয়া গিয়াছেন। ইহাই যে “নৌবাটক”-শব্দের প্রকৃত অর্থ, সৌভাগ্যক্রমে বৈদ্যদেবের [কমৌলিগ্রামে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে [একাদশ শ্লোকে] উল্লিখিত [নৌযুদ্ধ-বর্ণনায় ব্যবহৃত] “नौवाट हीहीरव” তাহার পরিচয় প্রদান করিতেছে। নৌবাট, নৌবিতান প্রভৃতি শব্দ যে নৌবাহিনীর প্রতিশব্দরূপে ব্যবহৃত হইত, তাহা এইরূপে বুঝিতে পারা যায়। মুসলমান-শাসন-সময়ে এই “নৌবাট” “নওয়ারা”-নামে পরিচিত হইয়াছিল। “নওয়ারা”-শব্দ এখনও অপ্রচলিত হয় নাই; কিন্তু তৎপূর্ব্ববর্ত্তী “নৌবাট”-শব্দ একেবারে অপ্রচলিত হইয়া পড়িয়াছে!

“ঘনাঘন”-শব্দে এক শ্রেণীর হস্তী সূচিত হইয়াছে। সেকালে এক শ্রেণীর রণদুর্ম্মদ ঘাতুক মত্ত হস্তী প্রতিপালিত হইত; তাহাই “ঘনাঘন”-নামে সুপরিচিত ছিল। ধরণি-কোষে তাহা
“आन्योन्यघट्टने चैव घातुके च घनाघनः”

বলিয়া উল্লিখিত আছে। অমর-কোষের নানার্থবর্গেও [৩৷৩৷১২০] সেই অর্থ সূচিত হইয়াছে। এই “ঘনাঘন”-নামক হস্তীর ব্যূহকে “ঘটা” বলিত। অমর-কোষে [২৷৮৷১০৭]

“करिणां घटनं घटा”

বলিয়া তাহা উল্লিখিত আছে। সেই অর্থে কথাসরিৎসাগরে [১৯৷১০৯] “গজেন্দ্র-ঘটা” ব্যবহৃত হইয়াছে। “ঘনাঘন-ঘটা,” ঘনঘটার ন্যায় প্রতিভাত হইয়া, জয়স্কন্ধাবারের দিনশোভাকে শ্যামায়মান করিয়া রাখিত বলিয়া, লোকের মনে বর্ষাসমাগমের সন্দেহ উপস্থিত হইত।

অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ এবং বটব্যাল-ধৃত এই তাম্রশাসনের “প্রভৃতীকৃত” শব্দ লিপিকর প্রমাদের নিদর্শন। প্রকৃত পাঠ—“প্রাভৃতীকৃত”। তাহার অর্থ—“উপঢৌকনরূপে উপহৃত”। অমরকোষে [২৷৮৷২৭] “প্রাভৃত”-শব্দ
“प्राभृतं तु प्रदर्शनं”

বলিয়া উল্লিখিত আছে। দেবতাকে বা মিত্ররাজাকে যাহা উপহাররূপে প্রদান করা যায়, তাহারই নাম “प्राभ्रतं” বলিয়া ভানুজীদীক্ষিত-কৃত অমর-টীকায় ব্যাখ্যা দেখিতে পাওয়া যায়। উত্তরাঞ্চলের রাজন্যগণ পালবংশীয় নরপালগণকে উপঢৌকনরূপে হয়-বাহিনী “প্রাভৃতীকৃত” করিতেন; রাজকবি রচনাকৌশলে এই ঐতিহাসিক তথ্যের সন্ধান প্রদান করিয়া গিয়াছেন,—সুতরাং তৎকালে উত্তরাঞ্চলের রাজন্যবর্গ পালবংশীয় নরপালগণের মিত্র-রাজন্য মধ্যে পরিগণিত হইতেন বলিয়াই বুঝিতে হইবে।

“पादात-भर-नमदवनेः” পাঠটি মদনপালদেবের [মনহলিগ্রামে-আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে [৩০ পংক্তিতে] “पादाभर नमदवनेः” রূপে উৎকীর্ণ আছে, এবং সাহিত্যপরিষৎ-পত্রিকায় “পাদভর নমদবনেঃ” রূপে মুদ্রিত হইয়াছে। উহা লিপিকর-প্রমাদ বলিয়াই বোধ হয়। সাহিত্য-পরিষৎ-পত্রিকায় মুদ্রিত “ভূপালগণের অনন্ত পাদভরে” সঙ্গত ব্যাখ্যা বলিয়া স্বীকৃত হইতে পারে না। কারণ ভূপালগণ, পদব্রজে গমনাগমন করিতেন না। “পাদাত”-শব্দের অর্থ অমরকোষে [২৷৮৷৬৭] এইরূপ লিখিত আছে,—
“अथ पादातं पत्तिसंहतिः,”

তাহার অর্থ “पदातीनां समूहः” বলিয়া, ভানুজীদীক্ষিত-কৃত টীকায় উল্লিখিত আছে। এই অর্থ প্রকটিত করিবার জন্য “पादात” শব্দই ব্যবহৃত হইয়াছিল। অতি পুরাকালে “हस्त्यश्वरथपादातं” লইয়া চতুরঙ্গ সেনা গঠিত হইত। কালক্রমে রথের ব্যবহার উঠিয়া গেলে, হস্তী অশ্ব ও পদাতি মাত্রই প্রচলিত ছিল। এখানে সেই সকল সেনাঙ্গের কথাই উল্লিখিত হইয়াছে। ভাগীরথীপ্রবাহ-প্রবর্ত্তমান “নৌবাট”-সমূহ এবং “ঘনাঘন”-নামক মদমত্ত হস্তিব্যূহ রাজাধিরাজের প্রবল প্রতাপ সূচিত করিত; উ্তরাঞ্চলের প্রসিদ্ধ অশ্ব তদ্দেশের মিত্ররাজকর্ত্তৃক উপঢৌকনরূপে প্রেরিত হইয়া, তত্তদ্দেশে রাজাধিরাজের আধিপত্যের পরিচয় প্রদান করিত; এবং যাহারা [দরবার উপলক্ষে] রাজধানীতে সমাগত হইতেন, সেই সকল সামন্তরাজ অসংখ্য পদাতিসেনা-সমভিব্যাহারে সম্মিলিত হইয়া, রাজধানীর গৌরব বর্দ্ধন করিতেন। রাজকবি রচনা-কৌশলে এই সকল ঐতিহাসিক তথ্যের উল্লেখ করিয়া, রাজাধিরাজের রাজধানীর একটি অত্যুজ্জ্বল দৃশ্যপট উদ্ঘাটিত করিয়া গিয়াছেন। এই বর্ণনা কেবল পালবংশীয় নরপালগণের তাম্রশাসনেই দেখিতে পাওয়া যায়।

“राजा भट्टारको देवः” বলিয়া অমরকোষে [১৷৩৷১৩] উল্লিখিত আছে।
“कुशली श्रीमान् धर्म्मपालदेवः” কর্ত্তৃপদ। ৪৮ পংক্তিতে উল্লিখিত “मानयति बोधयति समाज्ञापयति च” ইহার ক্রিয়াপদ। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ এবং ডাক্তার হুল্‌জ্, উভয়েই “কুশলী”-শব্দের “স্বাস্থ্য-সম্পন্ন”-অর্থ গ্রহণ করিয়া, “being in good health” বলিয়া, তাহার ইংরাজি অনুবাদ লিপিবদ্ধ করিয়া গিয়াছেন। বটব্যাল মহাশয় ইহাকে Prosperous বলিয়া গিয়াছেন।
এখানে “বিষয়” নামক বিভাগ “মণ্ডল” নামক বিভাগের অন্তর্গত, এবং “মণ্ডল” নামক বিভাগ “ভুক্তি” নামক বিভাগের অন্তর্গত বলিয়া উল্লিখিত। পাল-সাম্রাজ্য নানা “ভুক্তিতে” বিভক্ত ছিল। তন্মধ্যে দেবপালদেবের [মুঙ্গেরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে (৩০ পংক্তিতে) “শ্রীনগর-ভুক্তির”; নারায়ণপালদেবের [ভাগলপুরে আবিষ্কৃত] তাম্রশাসনে [২৯ পংক্তিতে] তীরভুক্তির, এবং অন্যান্য পাল-নরপালের তাম্রশাসনে “শ্রীপুণ্ড্রবর্দ্ধন-ভুক্তি” নামে আর একটি “ভুক্তির” পরিচয় প্রাপ্ত হওয়া গিয়াছে। এই তাম্রশাসনোক্ত “শ্রীপুণ্ড্রবর্দ্ধন”-ভুক্তির” অন্তর্গত “মণ্ডল”সমূহের মধ্যে ব্যাঘ্রতটী-নামক একটি “মণ্ডল” ছিল, তদন্তর্গত “বিষয়”-সমূহের মধ্যে মহন্তাপ্রকাশ নামক একটি “বিষয়” ছিল, ক্রৌঞ্চশ্বভ্র গ্রাম সেই “বিষয়ের” অন্তর্গত ছিল।
এই সকল স্থানের মধ্যে “শ্রীপুণ্ড্রবর্দ্ধন-ভুক্তির” নাম “বরেন্দ্ৰ” বলিয়া সুপরিচিত হইলেও, অনেক সময়ে “বরেন্দ্রের” বাহিরেও “শ্রীপুণ্ড্রবর্দ্ধন ভুক্তি” বিস্তৃতি লাভ করিবার প্রমাণ প্রাপ্ত হওয়া যায়। ব্যাঘ্রতটী, মহন্তাপ্রকাশ পালিতক এবং ক্রৌঞ্চশ্বভ্র কোথায় ছিল, তাহা এখনও নির্ণীত হয় নাই বলিয়া, তৎসম্বন্ধে নানা তর্ক বিতর্ক প্রচলিত হইয়াছে।
“গঙ্গিনিকা”-শব্দ এখনও “গাঙ্গিনা”-নামে বরেন্দ্র-মণ্ডলে প্রচলিত আছে। মরা নদীর পুরাতন খাত এই নামে কথিত হইয়া থাকে। সুতরাং বরেন্দ্র-মণ্ডলের কোন স্থানেই “গঙ্গিনিকার” অসদ্ভাব নাই।
“দেবকুল”-শব্দ হইতে “দেউল”-শব্দ প্রচলিত হইয়াছিল। “দেবকুলিকা” শব্দের অর্থ ক্ষুদ্র দেউল বা “মন্দির”। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ “দেবকুলিকাকে” ক্ষুদ্র দেবমন্দির [Small temple] বলিয়াই ব্যাখ্যা করিয়া গিয়াছেন। নীলাম্বর বলরাম “কদম্বর” বলিয়া, তাঁহার স্ত্রী “কাদম্বরী” নামে পরিচিতা। সরস্বতীও “কাদম্বরী” নামে পরিচিতা ছিলেন। তাহার পরিচয় “মেদিনীকোষে” উল্লিখিত আছে। যথা,—
“कादम्बरस्तु दध्यग्रे मद्यभेदे नपुंसकं।
स्त्री वारुणि-परभृता भारती-सारिकासु च॥”

অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ বা বটব্যাল মহাশয় ইহার ব্যাখ্যা করেন নাই, কিন্তু এখানে “কাদম্বরী-দেবকুলিকা” একটি “সরস্বতী-মন্দিরের” পরিচয় প্রদান করিতেছে বলিয়াই বোধ হয়।

“अालिः सग्वी सेतुगलि रालि रावलि रिष्यते।”

শাশ্বত-কোষের এই নির্দ্দেশে “আলি”-শব্দের “সেতু”-অর্থ থাকিলেও, এখানে আদ্যন্তের সঙ্গে তাহার সামঞ্জস্য না থাকায়, অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ ইহাকে dike বলিয়া, এবং বটব্যাল মহাশয় embankment বলিয়া ব্যাখ্যা করিয়া গিয়াছেন। বরেন্দ্র-মণ্ডলে প্রচলিত “বান্ধাইল”-শব্দে “আলির” স্মৃতি চিরস্মরণীয় হইয়া রহিয়াছে। কোন্ রাজপুত্র দেবট এই তাম্রশাসনোক্ত “আলি” বান্ধাইয়া দিয়া স্মরণীয় হইয়াছিলেন, তাহার পরিচয় অদ্যাপি আবিষ্কৃত হয নাই।

অমরকোষে [২৷৪৷৭৮] “বীজপূরঃ”—শব্দই দেখিতে পাওয়া যায়। স্বামিকৃত টীকায় “বীজপূরক”-শব্দেরও উল্লেখ আছে। যথা,—
“फलपूरो वीजपूरः केसरी वीजपूरकः।
वीजकः केसराम्लश्च मातुलुङ्गश्च पूरकः॥”

শব্দকল্পদ্রুমে “टावा लेवु इति वङ्गभाषा” এবং “विजौरा इति हिन्दीभाषा” বলিয়া তাহার ব্যাখ্যা লিখিত আছে। অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ [কিঞ্চিৎ সংশয় প্রকাশ করিয়া] ইহাকে citron-grove, এবং বটব্যাল মহাশয় [নিঃসংশয়ে] grove of lemons বলিয়া ব্যাখ্যা করিয়া গিয়াছেন।

অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ সমগ্র বর্ণনাটির অনুবাদ সাধনে অসমর্থ হইয়া লিখিয়া গিয়াছেন,—From here up to the end of the description of the boundaries of the village of Kraunchasvabhra I am unable to translate the text. গ্রামাদির চতুঃসীমার উল্লেখ করিতে গিয়া, কর্ত্তৃকর্ম্মক্রিয়াপদের সুপরিচিত সমাবেশরীতি সুরক্ষিত হইতে পারে নাই, এবং সংজ্ঞাশব্দের বাহুল্যের সঙ্গে লিপিকর-প্রমাদের আতিশয্য মিলিত হইয়া, এই গদ্যাংশকে দুর্ব্বোধ করিয়া রাখিয়াছে!
বটব্যাল মহাশয় “যানিকা”-শব্দের artificial water course বলিয়া অনুবাদ লিপিবদ্ধ করিয়া গিয়াছেন।
জম্বূ-যানিকাও water-course lined with Jambu trees বলিয়া অনূদিত হইয়াছে।
বটব্যাল মহাশয় “জৈনন্যায়িকা” পাঠ উদ্ধৃত করিয়া গিয়াছেন।
পরকর্ম্মকৃদ্বীপ burning ground of the village বলিয়া বটব্যাল মহাশয় কর্ত্তৃক ব্যাখ্যাত হইয়াছে।
সংজ্ঞা শব্দগুলির অর্থবোধ করা কঠিন। সংস্কৃত ভাষা-নিবদ্ধ তাম্রশাসনে উল্লিখিত হইলেও, সকল শব্দ সংস্কৃত ভাষার সুপরিচিত শব্দ বলিয়া বোধ হয় না। অনেক “দেশজ”-শব্দকেও সংস্কৃতের আবরণ প্রদান করা হইয়াছে বলিয়া বোধ হয়। যথা,—“খাটিকা”-শব্দ “খাড়ি” হইতে পারে।
“রাজনক” শব্দটি “রাজন্যক”-শব্দের অপভ্রংশ বলিয়াই বোধ হয়।
এই সকল রাজপুরুষাদির রাজপদের ও রাজকার্য্যের বিবরণ যথাযথভাবে নির্ণয় করিবার উপায় নাই। যতদূর জানিতে পারা গিয়াছে, তাহা “উপসংহারে” উল্লিখিত হইবে।
এই তাম্রশাসনে “যুবরাজ ত্রিভুবন পালের” নাম উল্লিখিত আছে। ইহা দেবপালদেবের নামান্তর কিনা, জানা যায় নাই। তজ্জন্য অনেকে অনুমান করিয়াছেন,—ধর্ম্মপালদেব বর্ত্তমান থাকিতেই, ত্রিভুবনপাল পরলোক গমন করায়, দেবপালদেব পিতৃ-সিংহাসনে আরোহণ করিয়াছিলেন! ইহার কোনরূপ প্রমাণ এখনও আবিষ্কৃত হয় নাই।
লাটদেশ বর্ত্তমানে গুজরাট নামে পরিচিত।
পাদমূলিক-শব্দ পালি সাহিত্যে ভৃত্যকে সূচিত করে, এবং এখানেও পাদমূল-শব্দ সেই অৰ্থে ব্যবহৃত হইয়াছে বলিয়া বোধ হয়।
“নন্ন-নারায়ণ”—শব্দ নন্ননামক কোনও ব্যক্তির নামানুসারে নারায়ণের নাম করণের পরিচয় প্ৰদান করিতে পারে। এরূপ প্ৰথা এখনও প্ৰচলিত আছে। পুরাকালেও যে ইহা প্ৰচলিত ছিল, তাম্রশাসনাদিতে তাহার উল্লেখ দেখিতে পাওয়া যায়। Epigraphia Indica, Vol. IV, p. 247, Note 6 দ্রষ্টব্য।
পূজা এবং উপস্থান।
দশাপচার-পাঠ সংশয়হীন বলিয়া বোধ হয় না।
অধ্যাপক কিল্‌হর্ণ এই অংশের অনুবাদে লিখিয়া গিয়াছেন—
“Should make over (to the donee) the customary taxes, means of subsistence, and all other kinds of revenue.”
“যাহার যাহার যেমন ভূমিদান, তাহার তাহার তেমনি ফল” বলিয়া প্ৰাচ্যবিদ্যামহার্ণব শ্রীযুক্ত নগেন্দ্ৰনাথ বসু সাহিত্যপরিষৎ-পত্ৰিকায় [১৩০৫ সালের দ্বিতীয় সংখ্যার ১৫৭ পৃষ্ঠায়] ব্যাখ্যা করিয়াছেন কেন, তাহা বোধগম্য হয় না। এরূপ ব্যাখ্যায়, এই শ্লোকটির তাম্রশাসনে উদ্ধৃত হইবার উদ্দেশ্যই ব্যৰ্থ হইয়া যায়। ভবিষ্যৎ ভূপালবৰ্গ যাহাতে কীর্ত্তিনাশ না করেন, সেই উদ্দেশ্যেই এই সকল শ্লোক উদ্ধৃত হইয়াছে; এবং প্ৰথম শ্লোকেই বলা হইয়াছে,—যিনি যখন ভূমির অধিপতি হইবেন, তিনি নিজে দান করেন নাই বলিয়া ইহা যেন নষ্ট না করেন; কারণ যিনিই দান করুন না কেন, যিনি যখন ভূমির অধিপতি থাকেন, তিনিই তখন তাহার পুণ্যফল লাভ করেন।
তারানাথের গ্রন্থে ধর্ম্ম-পালদেব দীৰ্ঘকাল রাজ্যভোগ করিবার যে কিংবদন্তী উল্লিখিত আছে, ইহাতে তাহার প্ৰমাণ প্ৰাপ্ত হওয়া যায়।

Source : গৌড়লেখমালা (প্রথম স্তবক) by অক্ষয়কুমার মৈত্রেয়


ॐ  स्वस्ति [॥]
सर्व्वज्ञतां श्रियमिव स्थिर मास्थितस्य वज्रासनस्य बहुमार-कुलोपलम्भाः।
देव्या महाकरुणया परिपालितानि रक्षन्तु वो दशबलानि दिशो जयन्ति॥(১)
श्रिय इव सुभगायाः सम्भवो वारिराशि-
श्‌शशधर इव भासो विश्व माह्लादयन्त्याः।
प्रकृति रवनिपानां सन्तते रुत्तमाया अजनि दयितविष्णुः सर्व्वविद्यावदातः॥(২)
आसीदासागरादुर्व्वीं गुर्व्वीभिः कीर्त्तिभिः कृती।
मण्डयन् खण्डितारातिः श्लाघ्यः श्रीवप्यट स्ततः॥(৩)
मात्‌स्य‑न्याय मपोहितुं प्रकृतिभि र्लक्ष्म्याः करं ग्राहितः
श्रीगोपाल इति क्षितीश-शिरसां चूड़ामणि स्तत्‌सुतः।
यस्यानुक्रियते सनातन-यशोराशि र्दिशामाशये
श्वेतिम्ना यदि पौर्णमास-रजनी ज्योत्‌स्नातिभारश्रिया॥(৪)
शीतांशो रिव रोहिणी हुतभुजः स्वाहेव तेजोनिधः
सर्व्वाणीव शिवस्य गुह्यकपते र्भद्रेव भद्रात्मजा।
पौलोमीव पुरन्दरस्य दयिता श्रीदेद्ददेवीत्यभूत्
देवी तस्य विनोदभू र्मुररिपो र्लक्ष्मी रिव क्ष्मापतेः॥(৫)
ताभ्यां श्रीधर्म्मपालः समजनि सुजन-स्तूयमानावदानः
स्वामी भूमीपतीना मखिल-वसुमती-मण्डलं शासदेकः।
चत्वार स्तीरमज्जत्-करिगण-चरण-न्यस्तमुद्राः समुद्रा
यात्रां यस्य क्षमन्ते न भुवन-परिखा विश्वगाशा-जिगीषोः॥(৬)
यस्यिन्न द्दामलीला-चलित-बलभरे दिग्‌जयाय प्रवृत्ते
यान्त्याम्बिश्वम्भरायां चलित-गिरि-तिरश्चीनतां तद्वशेन।
भाराभुग्नावमज्जन्-मणिविधुर-शिरश्चक्र-साहायकार्थं
शेषेनोदस्त-दोष्णा त्वरिततर मधोध स्तमेवानुयातम्॥(৭)
यत्‑प्रस्थाने प्रचलित-बलास्फालना-दुल्ललद्भि-
र्धूलीपूरैः पिहित-सकल-व्योमभि र्भूतधात्र्याः।
संप्राप्तायाः परमतनुतां चक्रवालं फणानां
मग्नोन्मीलन्-मणि फणिपते र्लाघवादुल्ललास॥(৮)
विरुद्ध‑विषय‑क्षोभाद् यस्य कोपाग्नि रौर्ववत्।
अनिर्वृति प्रजज्वाल चतुरम्भोधिवारितः॥(৯)
येऽभूवन् पृथु-रामराघव-नल-प्राया धरित्रीभुज स्तानेकत्र दिदृक्षुणेव निचितान् सर्व्वान् सम म्वेधसा।
ध्वस्ताशेष-नरेन्द्र-मानमहिमा श्रीधर्म्मपालः कलौ
लोल-श्री-करिणी-निबन्धन-महास्तम्भः समुत्तम्भितः॥(১০)
यासां नासीर-धूली-धवल-दशदिशां द्रागपश्यन्नियत्तां
धत्ते मान्धातृसैन्य-व्यतिकरचकितो ध्यानतन्द्री म्महेन्द्रः।
तासामप्याहवेच्छा-पुलकित-वपुषा म्वाहिनीना म्विधातुं
साहाय्यं यस्य वाह्वो र्निखिल-रिपुकुलध्वंसिनो र्नावकाशः॥(১১)
भोजैर्मत्स्यैः समद्रैः कुरु-यदु-यवनावन्ति-गन्धार-कीरै र्भूपै र्व्यालोल-मौलिप्रणति-परिणतैः
साधु-सङ्गीर्य्यमाणः।
हृष्यत्-पञ्चालवृद्धोद्धृत-कनकमय-स्वाभिषेकोदकुम्भो दत्तः श्रीकन्यकुब्ज स्‌सललित-चलित-भ्रूलता-लक्ष्म येन॥(১২)
गोपैः सीम्नि वनेचरै र्वनभुवि ग्रामोपकण्ठे जनैः
क्रीड़द्भिः प्रतिचत्वरं शिशुगणैः प्रत्यापणं मानपैः
लीला-वेश्मनि पञ्जरोदर-शुकै रुद्गीत मात्म-स्तवं
यस्याकर्णयत स्त्रपा-विवलिता-नम्रं सदैवाननं॥(১৩)
स खलु भागीरथीपथ प्रवर्त्तमान-नानाविध-नौवाटक-सम्पादित-सेतुबन्ध-निहित-शैलशिखरश्रेणी-विभ्रमात् निरतिशय-घन-घनाघन-घटा-श्यामायमान-वासरलक्ष्मी-समारब्ध-सन्तत-जलदसमय-सन्देहात् उदीचीनानेक-नरपति-प्रभृतिकृता-प्रमेय-हयवाहिनी-खरखुरोत्खात-धूली-धूसरित-दि-
गन्तरालात् परमेश्वर-सेवासामायात-समस्तजम्बूद्वीप-भूपालानन्त-पादात-भर-नमदवनेः पाठलिपुत्र-समावासित-श्रीमज्जयस्कन्धावारात् परमसौगतो महाराजाधिराज-श्रीगोपालदेव-पादानुध्यातः परमेश्वरः परमभट्टारको महाराजाधिराजः श्रीमान् धर्म्मपालदेवः कुशली॥ श्रीपुण्ड्रवर्द्धनभुक्त्यन्तःपाति-व्याघ्रतटी मण्डलसम्बद्ध-महन्ताप्रकाश-विषये क्रौञ्चश्वभ्र नाम ग्रामोऽस्य च सीमा पश्चिमेन गङ्गिनिका। उत्तरेण कादम्बरी-देवकुलिका खर्ज्जूरवृक्षश्च| पूर्व्वोत्तरेण राजपुत्र-देवट-कृतालिः। वीजपुरकङ्गत्वा प्रविष्टा। पूर्व्वेण विटकालिः खातकयानिकां गत्वा प्रविष्टा। जम्बूयानिका माक्रम्य जम्बूयानकं गता। ततो निःसृत्य पुण्याराम-बिल्वार्द्ध-स्रोतिकां। ततोपि निःसृत्य नल-चर्म्मटोत्तरान्तं गता नलचर्म्मटात् दक्षिणेन नामुण्डिकापि [हे
सदुम्मि] कायाः। खण्डमुण्डमुखं खण्डमुखा[त्]वेदसबिल्विका वेद[स]विल्विकातो रोहितवाटिः पिण्डारविटि-जोटिका-सीमा उक्तारजोटस्य दक्षिणान्तः ग्रामबिल्वस्य च दक्षिणान्तः। देविका-सीमाविटि। धर्म्मायो-जोटिका। एवम्माढ़ा-शाल्मली नाम ग्रामः। अस्य चोत्तरेण गङ्गिनिका-सीमा ततः पूर्व्वेणार्द्धस्रोतिकया आम्रयानकोलर्द्धयानिकङ्गतः ततोपि दक्षिणेन कालिकाश्वभ्रः। अतोपि निःसृत्य श्रीफलभिषुकं यावत् पश्चिमेन ततोपि बिल्वङ्गोर्द्ध स्रोतिकया गङ्गिनिकां प्रविष्टा। पालितके सीमा दक्षिणेन काणा-द्वीपिका। पूर्व्वेण कोण्ठिया-स्रोतः। उत्तरेणगङ्गिनिका। पश्चिमेन जेनन्दायिका। एतद्ग्राम-सम्पारीण-परकर्म्मकृद्वीपः। स्थालीक्कट-विषयसम्बद्धाम्रषण्डिका-मण्डलान्तःपाति-गोपिप्पली-ग्रामस्य सीमा। पूर्व्वेण उड्रग्राम-मण्डल-पश्विमसीमा। दक्षिणेन जोलकः। पश्विमेन वेसानिकाख्या खाटिका। उत्तरेणोड्रग्राम-मण्डलसीमा-व्यवस्थितो गोमार्गः। एषु चतुरुषु (चतुर्षु) ग्रामेषु समुपगतान् सर्व्वानेव राजराजनक-राजपुत्र-राजामात्य-सेनापति-विषयपति-भोगपति-षष्ठाधिकृत-दण्डशक्ति-दण्डपाशिक-चौरोद्धरणिक-दौस्साधसाधनिक-दूत-खोल-समागमिकाभित्वरमाण-हस्त्यश्व-गोमहिषाजाविकाध्यक्ष-नाकाध्यक्ष बलाध्यक्ष-तरिक-शौल्किक-गौल्मिक-तदायुक्तक-विनियुक्तकादि-राजपादोपजीविनोऽन्यांश्चाकीर्त्तितान् चाटभटजातीयान् यथाकालाध्यासिनो ज्येष्ठकायस्थ-महामहत्तर-महत्तर-दाशग्रामिकादि-विषयव्यवहारिणः सकरणान् प्रतिवासिनः क्षेत्रकरांश्च ब्राह्मण-माननापूर्व्वकं यथार्हं मानयति बोधयति समाज्ञापयति च। मतमस्तु भवतां महासामन्ताधिपति-श्रीनारायणवर्म्मणा दूतक-युवराज-श्रीत्रिभुवनपालमुखेन वय मेवं विज्ञापिताः यथाऽस्माभिर्म्मातापित्रो रात्मनश्च पुण्याभिवृद्धये शुभस्थल्यान्देवकुलं कारित न्तत्र प्रतिष्ठापित-भगवन्नन्न-नारायण-भट्टारकाय तत्प्रतिपालक लाटद्विज-देवार्च्चकादि-पादमूल-समेताय पूजोपस्थानादि-कर्म्मणे चतुरो ग्रामान् अत्रत्य-हट्टिका-तलपाटक-समेतान् ददातु देव इति। ततोऽस्माभि स्तदीय विज्ञप्त्या एते उपरिलिखितका श्चत्वारो ग्रामा स्तलपाटक-हट्टिकासमेताः स्व- सीमापर्य्यन्ताः सोद्देशाः सदशापचाराः अकिञ्चित्प्रग्राह्याः परिहृत-सर्व्वपीड़ाः भूमिच्छिद्रन्यायेन चन्द्रार्कक्षिति-समकालं तथैव प्रतिष्ठापिताः। यतो भवद्भि स्सर्व्वै रेव भूमे र्द्दानफल-गौरवादपहरणे च महानरक पातादि भयाद्दानमिद मनुमोद्य परिपालनीयम्। प्रतिवासिभिः क्षेत्रकरै श्वाज्ञाश्रवणविधेयैर्भूत्वा समुचित-कर-पिण्डकादि-सर्व्व-प्रत्यायोपनयः कार्य्य इति॥

बहुभि र्व्वसुधा दत्ता राजभि स्सगरादिभिः।
यस्य यस्य यदा भूमि स्तस्य तस्य तदा फलम्॥(১৪)
षष्ठिं वर्षसहस्राणि स्वर्गे मोदति भूमिदः।
आक्षेप्ता चानुमन्ता च तान्येव नरके वसेत्॥(১৫)
स्वदत्ताम्परदत्ताम्बा यो हरेत वसुन्धराम्।
स विष्ठायां कृमि र्भूत्वा पितृभि स्सह पच्यते॥(১৬)
इति कमल-दलाम्बु-विन्दु-लोलां
श्रिय मनुचिन्त्य मनुष्य-जीवितञ्च।
सकलमिदमुदाहृत ञ्च बुद्ध्वा
न हि पुरुषैः पर-कीर्त्तयो विलोप्या:॥(১৭)
तड़ित्तुल्या लक्ष्मी स्तनुरपि च दीपानल-समा
भवो दुःखैकान्तः पर-कृतिमकीर्त्तिः क्षपयताम्।
यशांस्याचन्द्रार्क्कं नियत मवताम[त्र] च नृपाः
करिष्यन्ते बुद्ध्वा यदभिरुचितं किं प्रवचनैः॥(১৮)
अभिवर्द्धमान-विजयराज्ये सम्बत् ३२ मार्ग-दिनानि १२।
श्रीभोगटस्य पौत्रेण श्रीमत् सुभटसूनुना।
श्रीमता तातटेनेदं उत्कीर्णं गुण-शालिना॥
(১৯)


King Dharmapala [8th Century CE]

Categories: History

Tagged as: