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कच्‍चायन धातु मञ्‍जूसा-Kachchayana Dhatu Manjusa

कच्‍चायन धातु मञ्‍जूसा

॥ नमो तस्स भगवतो अरहतो सम्मासम्बुद्धस्स॥

निरुत्ति निकरा’पार-पारवार’न्तगं मुनिं,

वन्दित्वा धातुमञ्‍जूसं-ब्रूमि पावचनञ्‍जसं॥

सोगतागम मा’गम्म-तं तंव्याकरणानि च,

पाठे चा’पठितापे’त्थ धात्वत्था च पवुच्‍चरे॥

छन्द’हानित्थमो’कारं-धात्वन्तानं सियाक्‍व चि, यूनं दीघो च धातुम्हा-पुब्बम’त्थपदं अपि।

१.

भू सत्तायं पच पाके गमुसप्प गतिम्हि (च)।

सिलोक (धातु) सङ्घाते सकि सङ्काय (वत्तते।)॥

२.

(अथो) कुक-वका’दाने के सद्दे अकि लक्खणे।

कु सद्दे कुच्छिते टङ्क धारणे मकि मण्डने॥

३.

वकि कोटिल्‍लयात्रासु सक्‍क-टीकद्वयं गते।

ककि लोलत्तने याते तकी (इध) गतादिसु॥

४. वव, लोकनवित्तिसु चक्खवुतिम्हि (तु) रुक्ख (च) खे थिरहिंसखणे निय, मो’पनयिट्ठि वतादिस मुण्डिसु दिक्ख (’थ) कक्ख-कखा हसने तुर, हिंसनवुद्धिगतीसु (हि) दक्ख’दनम्हि (तु) जक्ख (च) भक्ख (मता) अन, जालदुखेसु (तु) दिक्ख (च) दुक्ख (च) इक्ख दिस’ङ्क न को’ख सुसे।

५. [अ] निक्ख चुम्बने’(पि) सिक्ख विज्‍जु’पादु’ पासानम्हि रक्ख गुत्तिवारणे (पि) उञ्छने (सिया’पि) भिक्ख यावलद्ध्य’लद्धिसू (पि) वक्ख रोससंहतेसु मोक्ख मुत्तियं चजे (पि) चिक्ख वाचबोधनेसु।

[ब] नख मख रख नङ्खामङ्खरक्खी’खीलङ्खा लख वख इख इङ्खा उङ्ख वङ्खू’ख गत्यं वखि मखि कखि कङ्खे खी खये उक्ख सेके खु खुतधनिसु (वुत्तो) खे(’थ) खादे सुपे (च।)

६.

अग्गो (तु) गतिकोटिल्‍ले लग सङ्गे मगे’सने।

अगी इगी रिगी लिगी वगी गत्य’त्थधातवो॥

७.

सिलाघ कत्थने जग्घ हसने अग्घ अग्घने।

सिघी आघायने (होति) लघि सोसगतीसु (च।)॥

८.

वच ब्यत्तवचे याच याचने रुच दित्तियं।

सुच सोके कुच सद्दे (अथो) विच विवेचने॥

९.

अञ्‍च पूजागते वञ्‍च गमने किञ्‍चा’वमद्दने।

लुञ्‍चा’पनयने नच्‍च नच्‍चने मच रोचने॥

१०.

अच्‍चा’च्‍चने चु वचने सचो (तु) समवायने।

पच याते कचि-वच्‍च दित्तियं मचि धारणे॥

११.

पुच्छ सम्पुच्छने मुच्छ मोहस्मिं लञ्छ लक्खणे।

अञ्छा’यामे (भवे) पुञ्छ पुञ्छने उञ्छ उञ्छने॥

१२.

तच्छो तनुकिरये पिञ्छ पिञ्छने राज दित्तियं।

वजा’जगमने रञ्‍ज रागे भञ्‍जा’वमद्दने॥

१३.

अञ्‍जु ब्यत्तिगतीकन्ति मक्खणेस्वे’ज कम्पने।

भज संसेवने सञ्‍ज सङ्गे (तु) इञ्‍ज कम्पने॥

१४.

यज देवच्‍चने दानसङ्गतीकरणेसु (च)।

तिजक्खमनिसानेसु दाने(’पि) चज हानियं॥

१५.

सजा’लिङ्गन विस्सज्‍ज निम्माणे मुज्‍ज मुज्‍जने।

मज्‍ज संसुद्धियं लज्‍ज लज्‍जने तज्‍ज तज्‍जने॥

१६.

अज्‍ज-सज्‍जा’ज्‍जने सज्‍ज निम्माणे गज्‍ज सद्दने।

गुज-कुज द्वयं सद्दे अख्यत्ते खज्‍ज भक्खणे॥

१७.

भज्‍ज पाके विजि भयचलने वीज वीजने।

खजी गमनवेकल्‍ले जी जये जु जवे (सिया।)॥

१८.

झे चिन्तायुज्झ उस्सग्गे गमने अट-पट द्वयं।

नट नच्‍चे रट परिभासने वट वेठने॥

१९.

वट्ट आवत्तने वण्ट वण्टत्थे कट मद्दने।

फुटो विसरणादीसु कट संवरणे गते॥

२०.

घुट घोसे पतिघाते विट’क्‍कोसे (च) पेसने।

भट भत्यं कुट-कोट्टच्छेदने लुट लोटने॥

२१.

जट-झट-पिट सङ्घाते चिटु’त्तासे घटी’हने।

घटि सङ्घट्टने तट्ट च्छेदने मुट मद्दने॥

२२.

पठ ब्यत्तवचे हेठ बाधायं वेठ वेठने।

सुठी-कुठी द्वयं सोसे पीठ हिंसनधारणे॥

२३.

कठ सोसनपाकेसु वठ थुलत्तने (भवे)।

कठि सोसे रुठ-लुठो’पघाते सठ केतवे॥

२४.

(सिया हठ बलक्‍कारे कडिभेदे कडिच्छिदे।

मण्ड विभूसने चण्ड चण्डिक्‍के भडि भङ्डने॥

२५.

पडि उप्पण्डने लिङ्गवेकल्‍ले मुडि खण्डने,

गडि वत्ते’कदेसम्हि गडि सन्‍निवये(’पिच।)।

२६.

रडि-एरडि हिंसायं पिडि सङ्घातआदिसु,

कुडि दाहे पडि गते हिडि आहिण्डने (सिया।)।

२७.

करण्ड भाजन’त्थम्हि (अथो) लडि जिगुच्छने,

(वत्तते) मेडिकोटिल्‍ले सडि गुम्बत्थमीरणे।

२८.

(अथो’पि) अडि अण्डत्थे (दिस्सते) तुडि तोडने,

वड्ढ संवड्ढने कड्ढ कड्ढणे भण भासने।

२९.

सोण वण्णे गुण’भ्यासे इण-फेण द्वयं गते,

पण वोहारथोमेसु (वत्तते) कण मिलने।

३०.

अण-रण-कण-मुण-क्‍वण-कुण सद्दे,

यत पतियतने जुत दित्तिम्हि।

अत-पत गमने चित सञ्‍ञाणे,

कित वासा’दो वतु वत्तुम्हि॥

३१.

(भवे) कत्थ सिलाघायं मथ-मत्थ विलोळने,

नाथ याचनसन्ताप इस्सेरा’सिंसनेसु (च।)

३२.

पुथ (चे) पुथु वित्थारे ब्यथ भीतिचलेसु (च),

गोत्थु वंसे पथ-पन्थ गते नन्द समिद्धियं।

३३.

वन्दा’भिवादथोमेसु गद ब्यत्तवचे’(पिच),

(अथो) निन्द गरहायं खदि पक्खन्दनादिसु।

३४.

एदी (तु) किञ्‍चिचलेन चदि कन्तिहिळादने,

किलिदी परिदेवादो उदिस्सवकिलेदने।

३५.

इदी (तु) परमिस्सरिये अदिअन्दु (च) बन्धने,

भगन्द सेवने (होति) भद्द कल्याणकम्मनि।

३६.

सिद सिङ्गारपाकेसु सद्दुहरितसोसने,

मदि बल्ये मुद-मदा सन्तोसे मद्द मद्दने।

३७.

सन्दु पस्सवनादीसु कन्द’व्हाने (च’) रोदने,

विद लाभे दद दाने रुदि अस्सुविमोचने।

३८.

सदो विसरणा’दानगमने (चा’)वसादने,

हिळाद (तु) सुखे सूदक्खरणे रद विलेखणे।

३९.

साद अस्सादनादीसु गद ब्यत्तवचे’(पिच),

नद अब्यत्तसद्दे (तु) रदा’दा-खाद-भक्खणे।

४०.

अद्द याचनयात्रादिस्व (थो) मिद सिनेहने,

(सिया) खुद जिगच्छायं दळिद्द दुग्गच्‍चं (हि तु।)

४१.

दा दवे दु गतीवुद्धयं दा दाने विद जानने,

तदि आलसिये बाध बाधायं गुध कीळने।

४२.

(अथो) गाध पतिट्ठायं वुठु-एध (च) वुद्धियं,

धा (होति) धारणे (चेव) चिन्तायं बुध बोधने।

४३.

सिधु गतिम्हि युध सम्पहारे विध वेधने,

राध हिंसायसंराधे बध-बन्ध (च) बन्धने।

४४.

सिध-साध (च) सिद्धिम्हि धे पाने इन्ध दित्तियं,

मान पूजाय वन-सन सम्भवे अन पाणने।

कन दित्तिगतीकन्त्यं खन-खन्व’वदारणे॥

४५.

गुप गोपनके गुप संवरणे तप सन्तापे तप इस्सरिये,

चुप मन्दगते तपुउब्बेगे रप-लप वाक्ये सप अक्‍कोसे।

४६.

जप-जप्प वचे’ब्यत्ते तप्प सन्तप्पने (सिया),

कपि किञ्‍चिचले कप्प सामत्थे वेपु कम्पने।

४७.

तप्प सन्तगतेच्छेदे तक्‍के हिंसादिसु’(च्‍चते),

वप बीजविनिक्खेपे धूप सन्तपने’(पि च)।

४८.

चप सान्त्वे पु पवने झप दाहे सुपो सये,

पुप्फ विकसने (होति) रम्ब’लम्बवसंसने।

४९.

चुम्ब वदनसंयोगे कम्ब संवरणे (मतो),

अम्ब सद्दे (च) अस्सादे तायने सबि मण्डने।

५०.

गब्ब दप्पे’ब्ब-सब्बा’(पि) गमने पुब्ब पूरणे,

गुम्ब’ब्बगुम्बने चब्ब अदने उब्ब धारणे।

५१.

लभ लाभे जम्भ गत्तविनामे सुभ सोभने,

भी भये रभ राभस्से (चा)’रम्भे खुभ सञ्‍चले।

५२.

थम्भ-खम्भ पतिबन्धे गब्भ पागब्भिये वधे,

सुम्भ संसुम्भने सम्भ विस्सासे यभ मेथुने।

५३.

दुभ जीगिंसने दब्भ गन्थने उद्रभा’दने,

कमू (तु) पदविक्खेपे खमू (तु) सहणे (सिया।)

५४.

भमु अनवट्ठाने (च) वमु उग्गिरणादिसु,

किलमु-क्‍लमू गेलञ्‍ञे रमु कीळा’य (मीरितो।)

५५.

दमो दमे नम नमे (अथो) सम परिस्समे,

यमु उपरमे नासे अम याते मु बन्धने।

५६.

धमो पुमो (च) धमने तम सङ्काविभूसने,

धुम-थीम (च) सङ्घाते तम सान्त्व’वसादिये।

५७.

अयो वयो पय-मयो नयो रयगतिम्हि (च)

दय दानगतीरक्खा हिंसादिसु यु मिस्सने।

चाय सम्पूजने ताय सन्ताने पाय वुद्धियं,

(अथो) उसूय दोसा’विकरणे साय सायने।

५८.

तर तरणस्मिं थर सन्थरणे भर भरणस्मिं फर सम्फरणे,

सर गति चिन्ता हिंसा सद्दे फुर चलनादो हर हरणस्मिं।

५९.

रि सन्ततिस्मिं रि गते रु सद्दे खुरच्छिदस्मिं धर धारणम्हि,

जर जीरणत्थे मरपाणचागे खर सेकनासे घर सेवनम्हि।

६०.

गरो निगरेण सेके दर डाहे विदारणे,

चर गतिभक्खणेसु वर संवरणादिसु।

६१.

चरच्छेदे अरनासे गते (च) पूर पूरणे,

कुर क्‍कोसे नर नये जागर सुपिनक्खये।

६२.

पीलु-पलू-सल-हुला गत्य’त्था चल कम्पने,

खल सञ्‍चलने फुल्‍ल विकासे जल दित्तियं।

६३.

फल निप्फत्तियं (होति) दल दित्तिविदारणे,

दल दुग्गतियं नील वण्णे मील निमीलने।

६४.

सिल समाधिम्हि कील बन्धे गल-गिला’दने,

कूल आवरणे सूल रुजायं बलपाणने।

६५.

तल-मूल पतिट्ठायं वल-वल्‍ल निवारणे,

पल्‍ल निन्‍ने (च) गमने मल-मल्‍ल’वधारणे।

६६.

(वत्तते) खिल काठिन्‍ने कलिले अल-कल द्वयं,

वेल्‍ल सञ्‍चलने कल्‍ल सज्‍जने अलिबन्धने।

६७.

चुल्‍ल हावकिरये थूला’कस्सने चूल मद्दने,

(वत्तते) खल सोचेय्यो पल रक्खगतेसु(पि।)

६८.

केल-खेल-चेल-पेल-वेल-सञ्‍चलनादिसु,

अव रक्खणे जीव पाणधारणे (तु) प्‍लवो गते।

६९.

कण्डुवनम्हि कण्डुवो सरणे छेदने दवे,

दवो (तु) दवने देवु देवने सेवु सेवने।

७०.

धाव गमनवुद्धिम्हि (पठितो) धोवु धोवने।

वे-वी द्वे तन्तुसन्ताने वे-वु संवरणे (सिया)

ह्वे अव्हाने केव सेके धुव यात्रा थिरेसु (च।)।

७१.

अस गस अदने घस अदनस्मिं-इस परियेसे इसुइच्छायं,

ससु पाणनगतिहिंसा’द्य’त्थे-मस आमसने मुस सम्मोसे।

७२.

कुस अक्‍कोसे दुस अप्पीते-तुस सन्तोसे पुस पोसम्हि,

रुस आलेपे रुस हिंसायं-मसु मच्छेरे उसु दाहे (’पि।)

७३.

हस हसनस्मिं घुस सद्दस्मिं-तस उब्बेगे त्रस उब्बेगे,

लस कन्त्य’त्थे रस अस्सादे-(पुन)भस भस्मिकरणे(चा’पि।)

७४.

गवेस मग्गणे पंस नासने दिस पेक्खणे,

सासा’नुसिट्ठियं हंस पितियं पास बन्धने।

७५.

संस पसंसने इस्स इस्सायं कस्स कस्सने,

धंस पधंसने सिंस इच्छायं घंस घंसने।

७६.

संस-दंसा (तु) डसने भास वाचाय दित्तियं,

(सिया) भुस अलङ्कारे (अथो) आसू’पवेसने।

७७.

वस कन्तिनिवासेसु वस्ससेचनसद्दने,

किस साणे कस गते कस हिंसाविलेखने।

७८.

दिसा’तिसज्‍जना’दीसु कास दित्तिम्हि सज्‍जने,

(दुवे धातु) खस-झस हिंसायं मिस मिलने।

७९.

सु हिंसाकुलसन्धानयात्रा’दीसु सु पस्सवे,

सु सद्दे सु पसवने सि सये (च) सि सेवने।

८०.

मह पूजाया’रहपूजायं-गुह संवरणे लिह अस्सादे,

रह चागस्मिं मुह मुच्छायं-मह सत्तायं बहु संख्याने।

८१.

सह खमे दह भस्मिकरणे (च) पतिट्ठायं,

रुह सञ्‍जनने ऊह वितक्‍के वह पापणे।

८२.

दुह’प्पपूरणे नासे दिहो उपचये (मतो),

निन्दायं गरहो ईह घट्टने मिह सेवने।

८३.

गाह विलोळने ब्रूह-बह-ब्रह (च) वुद्धियं,

व्हे सद्दम्हि हसने हा चागे लुळ मन्थने

कीळविहारम्हि लळ विलासे’(मेसवुद्धिका।)


तुदादयो अवुद्धिका

८४.

तुद ब्यथायं (तु) नुद क्खेपणे लिख लेखणे,

कुच सङ्कोचने रिच क्खरणे खच बन्धने।

८५.

उच सद्दे समवाये विजी भयचलेसु (च),

(वत्तते) भुज कोटिल्‍ले वलञ्‍जो (तु) वलञ्‍जने।

८६.

भज सेवापुथक्‍कारे रुज रोगे अटा’टने,

कुटच्छेदे (च) कोटिल्‍ले अगा सज्झायना’दिसु।

८७.

पुणो सुभ किरये वत्त वत्तने चत याचने,

पुथ पाके पूतिभावे कुथसंक्‍लेसने’(पि च।)

८८.

(उभो धातु) पुथ-पथ वित्थारे विद जानने,

हद उच्‍चार उस्सग्गे-चिन्तायं मिद हिंसने।

८९.

नन्ध विनन्धने थीन-पुन सङ्घातवाचिनो,

कप अच्छादने वप्प वारणे खिप पेरणे।

९०.

सुपो सये छुपो फस्से (वत्तते) चप सान्त्वने,

नभ (धातु) विहिंसायं रुम्भ उप्पीळनादिसु।

९१.

सुम्भ संसुम्भने जम्भ जम्भने जुभ निच्छुभे,

ठुभ निट्ठुभने चमु अदने छमु हीळने।

९२.

झमु दाहे छमु अदने इरीय वत्तने’(पि च),

किर (धातु) विकिरणे गिरो निगिरणा’दिसु।

९३.

फुर सञ्‍चलनादीसु कुर सद्दा’दनेसु (च),

खुरच्छेदे विलिखणे घुर भीमे गिला’दने।

९४.

तिल स्नेहे चिल वासे हिल हावे सिलु’ञ्छने,

बिल भेदे थूल चये कुसच्छेदन पूरणे।

९५.

विसप्पवेसे फरणे दिसा’तिसज्‍जना’दिसु

फुल फस्से मुस थेय्ये थुस अप्पिकिरयाय (तु)

गुळ मोक्खे गुळ परिवत्तनम्हि (तुदादयो।)

हू भुवादयो लुत्तविकरणा

९६.

हू-भू सत्ताय (मु’च्‍चन्ति) इ अज्झाने गतिम्हि (च,)

खा-ख्या (द्वयं) पकथने जि जये ञा’वबोधने।

९७.

सी-ळी वेहासगमने ठा गतीविनिवुत्तियं,

नी पापणे मुन ञाणे हन हिंसागतीसु (’पि)

९८.

पारक्खणम्हि पा पाने ब्रू वाचायं वियत्तियं,

भा दित्तियं मा पमाणे (अथो) या पापुणे (सिया।)

९९.

(दुवेपि) रा-ला आदाने वा गतीगन्धनेसु (पि,)

अस (धातु) भुवि (ख्यातो) सि सये सा समत्थिये।


जुहोत्या’दयो सद्विभावलुत्तविकरणा।

१००.

हू दाने’(पि च) आदाने हव्यदाने (च वत्तते,)

हा चागे कमु यात्रायं दा दाने धा (च) धारणे।

अविकरणभूवादयो समत्ता।


रुधादयो

१०१.

रुधि आवरणे मुच मोचने रिच रेचने,

सिच सेके युज योगे भुज पालनभोजने।

१०२.

कतिच्छेदे छिदि द्वेधाकरणे भिद विदारणे

विद लाभे लुपच्छेदे विनासे लिपलिम्पने

पिस संचुण्णने हिसि विहिंसायं (रुधादयो।)


दिवादयो

१०३.

दिवु कीला विजिगिंसा वोहारज्‍जुति थोमिते,

सिवु तन्तूनसन्ताने खी खये खा पकासने।

१०४.

का-गा सद्दे (पि) घा गन्धो’पादाने रुच रोचने,

कच दित्यं मुच मोचे (अथो) विच विवेचने।

१०५.

रञ्‍ज रागे सञ्‍ज सङ्गे खलने मज्‍ज सुद्धियं,

युजो समाधिम्हि लुजो विनासे झा विचिन्तने।

१०६.

ता पालने छिदि द्वेधाकारे मिद सिनेहने,

मदु’म्मादे खिद दीनभावे भिद विदारणे।

१०७.

सिद पाके पदगते विद सत्ता विचिन्तने,

दी खये सुपने दा (च) दाने दात्व’वखण्डने।

१०८.

बुधा’वगमना’दीसु अत्थेसु युध युज्झने,

कुध कोपे सुध सोचे राध हिंसाय सिद्धियं।

१०९.

इध संसिद्धिवुद्धीसु सिध-साध (च) सिद्धियं,

विध वेधे गिध गेधे रुधि आवरणा’दिसु।

११०.

मन ञाणे जनु’प्पादे हन हिंसागतीसु (पि,)

सिना सोचे कुप कोपे तप सन्ताप पीणने।

१११.

लुपच्छेदे रुप नासे पकासे दिप दित्तियं,

दप हासे लभ लाभे लुभ गेधे खुभो चले।

११२.

समू’पसम खेदेसु हर-हिरी (च) लज्‍जने,

मिला गत्तवीनामे (च) गिला हासक्खये (पि च।)

११३.

ली सिलेसे द्रवीकारे वा गती बन्धनेसु (च,)

लिसि लेसे तुस तोसे सिलिसा’लिङ्गनादिसु।

११४.

किलिस कलिसो’पतापे (अथो) तस पिपासने,

रुस रोसे दिस-दुस अप्पीतिम्हि (दुवे सियुं।)

११५.

यसुप्पयतने असु खेपने (पि च वत्तते,)

सुस सोसे भस अधोपाते नस अदस्सने।

११६. सा’स्सादे सा’वसाने (च) सा तनूकरणे (पि च) हा चागे मुह वेचित्ते नह सज्‍जनबन्धने नह सोचे पिहिच्छायं सिनिह-सनिह पीतियं।


स्वादयो

११७. सु सवणे सक सत्तिम्हि खी खयम्हि गि सद्दने,

अप-सम्भू (च) पापुणने हि गतिम्हि वू संवरे।


कियादयो

११८.

की विनिमये चि चये जि जये ञा’वबोधने,

थव’भित्थवे कम्पने धु (अथो) पु पवने (सिया।)

११९.

पी तप्पणे मा पमाणे खिपक्खेपे मि हिंसने,

मि पमाणे मु बन्धे (च) लु पच्छेदे सि बन्धने

अस भक्खणे (अथो) गह उपादाने (कियादयो।)


तनादयो

१२०.

तनु वित्थारे सक सत्तिस्मिं-दु परितापे सनु दानस्मिं,

वन याचायं मनु बोधस्मिं-हि गते अप पापुणनस्मिं (हि,)

कर करणस्मिं(भवति)सि बन्धे-सु अभिस्सवने(तनु आदीनि।)

निच्‍चं णेणयन्ता चुरादयो।

१२१.

चुर थेय्ये लोक (धातु) दस्सने अकि लक्खणे,

सिया थक पतिघाते (पुन) तक्‍क वितक्‍कणे।

१२२.

लक्ख दस्सनअङ्केसु (वत्तते) मक्ख मक्खणे,

भक्खा’दने मोक्ख मोचे सुख-दुक्ख (च) तकिरये।

१२३.

लिङ्ग चित्तकिरया’दीसु मग-मग्ग गवेसने,

(पुना’पि) पच वित्थारे क्‍लेसे वञ्‍च पलम्भने॥

१२४.

वच्‍च अज्झायने अच्‍च पूजायं वच भासने,

रच पतियतने सुच पेसुञ्‍ञे रुच रोचने।

१२५.

मुचप्पमोचने लोच दस्सने कच दित्तियं,

सज्‍जा’ज्‍ज अज्‍जने तज्‍ज तज्‍जने वज्‍ज वज्‍जने।

१२६.

युज संयमने पूज पूजायं तिज तेजने,

पज मग्ग संवरणे गते भज विभाजने।

१२७.

(अथो) भाज पुथक्‍कारे सभाज पीतिदस्सने,

(अथो तु) घट सङ्घाते घट्ट सञ्‍चलना’दिसु।

१२८.

कुट-कोट्टच्छेदने (द्वे) कुट आकोटना’दिसु,

नट नच्‍चे चट-पुट भेदे वण्ट विभाजने।

१२९.

तुवट्ट एकसयने घटो विसरणे (सिया),

गुण्ठ ओगुण्ठने हेठ बाधायं वेठ वेठने

गुडि वेठे कडि-खडि भेदने मडि भूसने।

१३०.

पण्ड-भण्ड परिभासे दडि आणाय (मीरितो),

तडि संताळने पिण्ड सङ्घाते छड्ड छड्डने।

१३१.

वण्ण संवण्णने चुण्ण चुण्णने आण पेसने,

गण संकलने कण्ण सवणे चिन्त चिन्तने।

१३२.

सन्त सङ्कोचने मन्त गुत्त भासन जानने,

चित संचेतना’दिसु कित्त संसद्दने (भवे।)

१३३.

यत नीय्यातने गन्थ सन्दब्भे अत्थ याचने,

कथ वाक्यप्पबन्धे (च) विद ञाणे नुदे चुद।

१३४.

छदा’पवारणे छद्द वमने छन्द इच्छयं,

वदी’भिवाद थोमेसु भदिकल्याणकम्मनि।

१३५.

हिळाद (तु) सुखे गन्ध सूचने विध कम्पने,

रन्ध पाके (अथो) मान पूजायं नु त्थुतिम्हि (तु।)

१३६.

थन देवसद्दे ऊन परिहाने थेन चोरिये,

धन सद्दे ञप तोस निसान मारणा’दिसु।

१३७.

लप वाक्ये झप दाहे रुप रोपणआदिसु,

पी तप्पने (सिया) कप्प वितक्‍के लभि वञ्‍चने।

१३८.

(अथो) वहि गरहायं समु सान्त्वन दस्सने,

कमु इच्छाय कन्तिम्हि (सिया) थोम सिलाघने।

१३९.

तिमु तेमन सङ्कासु अम रोगगता’दिसु,

संगाम युद्धे (वत्तेय्य) ईर वाचा पकम्पने।

१४०.

वर आवरणि’च्छासु याचायं धर धारणे,

तीर कम्म समत्तिम्हि पार सामत्थिया’दिसु।

१४१.

तुलु’म्माने खल सोवे सञ्‍चये पालरक्खणे,

कल सङ्कलना’दीसु (भवे) मील निमीलने।

१४२.

सीलू’पधारणे मूल रोहणे लल इच्छने,

दुल उक्खेपणे पूल महत्तन समुस्सये।

१४३.

घुस सद्दे पिस पेसे भुसा’लङ्करणे (सिया,)

रुस पारुसिये खुंस अक्‍कोसे पुस पोसने।

१४४.

दिस उच्‍चारणा’दीसु वस अच्छादने (सिया,)

रस’स्सादे रवे स्नेहे (अथो) सिस विसेसने।

१४५.

सि बन्धे मिस्स सम्मिस्से कुह विम्भापने सिया,

रह चागे गते (चा’पि) मह पूजाय (मीरितो।)

१४६.

पिहि’च्छायं सिया वीळ लज्‍जायं एळ फाळने

हीळ गारहिये पीळ बाधायं तळ ताळने

लळ (धातू)’पसेवा’यं (वत्तती’मेचुरादयो।)

समत्ता सत्तगणा।

१४७.

भुवादी च रुधादी च-दिवादि स्वा’दयो गणा,

कियादी च तनादी च-चुरादीती’ध सत्तधा।

१४८.

किरयावाचित्तमक्खातु-मे’केकत्थो बहू’दितो,

पयोगतो’नुगन्तब्बा-अनेकत्था हि धातवो।

१४९.

हिताय मन्दबुद्धीनं-व्यत्तं वण्णक्‍कमा लहुं,

रचिता धातुमञ्‍जुसा-सीलवंसेन धीमता।

१५०.

सद्धम्मपङ्केरुहराजहंसो,

आसिट्ठधम्मट्ठिति सीलवंसो।

यक्खद्दिलेनाख्य निवासवासी,

यतिस्सरो सोयमिदं अकासि।

कच्‍चायन धातुमञ्‍जूसा समत्ता।

साचरियानुसिट्ठा परिसिट्ठपरिभासा

१.

एका नेकस्स रानन्तू-’भयेसं अन्तिमा सरा,

अङ्गानुबन्धा धातूनं-वुच्‍चन्ते’पि यथाक्‍कमं।

२.

धातुनो व्याञ्‍जना पुब्बे-निग्गहीतं सम’न्तिमा,

इवण्णेना’रुधादीन-मनुबन्धेन चिण्हितं।

३.

सेसा’नुबन्धा सब्बेसं-होन्ती’धु’च्‍चारणप्फला,

उच्‍चावचप्फला भास-न्तरम्पत्वा भ वन्ति’पि।

४.

नामधातुक भावो’पि-किरयाय अधिकारतो,

विरुद्धन्तराभावा-क्‍वचिदेव पयुज्‍जते।

५.

द्वन्दयुत्तिवसा क्‍वापि-आदेसो योविभत्तिया,

गुणादिभाव सद्दो’पि-तकिरयत्थे विधीयते।


कच्‍चायनब्याकरणं- Kachchayana Vyakaranam- Sutra Prakaranam

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