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नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः [ DEVI SUKTAM]

Sanskrit

अथ तन्त्रोक्तं देविसुक्तम

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मतां ॥१॥

रौद्राय नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ॥२॥

कल्याण्यै प्रणता वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः।
नैरृत्यै भूभृतां लक्ष्मै शर्वाण्यै ते नमो नमः ॥३॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ॥४॥

अतिसौम्यतिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ॥५॥

यादेवी सर्वभूतेषू विष्णुमायेति शब्धिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥६॥

यादेवी सर्वभूतेषू चेतनेत्यभिधीयते।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥७॥

यादेवी सर्वभूतेषू बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥८॥

यादेवी सर्वभूतेषू निद्रारूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥९॥

यादेवी सर्वभूतेषू क्षुधारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१०॥

यादेवी सर्वभूतेषू छायारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥११॥

यादेवी सर्वभूतेषू शक्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१२॥

यादेवी सर्वभूतेषू तृष्णारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१३॥

यादेवी सर्वभूतेषू क्षान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१४॥

यादेवी सर्वभूतेषू जातिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१५॥

यादेवी सर्वभूतेषू लज्जारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१६॥

यादेवी सर्वभूतेषू शान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१७॥

यादेवी सर्वभूतेषू श्रद्धारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१८॥

यादेवी सर्वभूतेषू कान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥१९॥

यादेवी सर्वभूतेषू लक्ष्मीरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२०॥

यादेवी सर्वभूतेषू वृत्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२१॥

यादेवी सर्वभूतेषू स्मृतिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२२॥

यादेवी सर्वभूतेषू दयारूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२३॥

यादेवी सर्वभूतेषू तुष्टिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२४॥

यादेवी सर्वभूतेषू मातृरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२५॥

यादेवी सर्वभूतेषू भ्रान्तिरूपेण संस्थिता
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२६॥

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्ति देव्यै नमो नमः ॥२७॥

चितिरूपेण या कृत्स्नमेत द्व्याप्य स्थिता जगत्
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,नमस्तस्यै नमोनमः ॥२८॥

स्तुतासुरैः पूर्वमभीष्ट संश्रयात्तथा
सुरेन्द्रेण दिनेषुसेविता।
करोतुसा नः शुभहेतुरीश्वरी
शुभानि भद्राण्य भिहन्तु चापदः ॥२९॥

या साम्प्रतं चोद्धतदैत्यतापितै
रस्माभिरीशाचसुरैर्नमश्यते।
याच स्मता तत्क्षण मेव हन्ति नः
सर्वा पदोभक्तिविनम्रमूर्तिभिः ॥३०॥


TRANSLATION

We bow to the Goddess, to the Great Goddess, to the energy of infinite goodness. We prostrate, with hands together, to Nature, to the excellent one.

We bow to the reliever of sufferings, to the eternal, to the embodiment of rays of light. We continually bow to the Goddess who manifests light, to the form of devotion, to Happiness.

We bow to change, to perfection, to dissolution, to the wealth which sustains earth, to the wife of Shiva, the Blessed Mother of the World, we bow.

We bow to the one who removes difficulties, who moves beyond all difficulties, to the essence. We continually bow to the doer of all, to perception and to the unknowable one.

We bow to the extremely beautiful and to the extremely fierce. We bow to the establisher of the perceivable world and who is mundane existence, we bow.

We bow to the divine Goddess existing in all, who is the power of Lord Vishnu. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides throughout Consciousness and is known by the reflections of mind. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of wisdom. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of sleep. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of hunger. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of the shadow of the Real Being. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of divine energy. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of thirst. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of patient forgiveness. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of social classification . We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of humility. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of peace. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of faith. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of beauty enhanced by love. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of true wealth. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of change. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of memory. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of compassion. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of satisfaction. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of Mother. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

We bow to the divine Goddess existing in all, who resides in the form of confusion. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

Presiding over the senses of all beings and pervading all existence, to the omnipresent Goddess who individualizes creation we bow, we bow.

In the form of consciousness, She distinguishes the individual phenomena of the perceivable universe. We bow to Her, we bow to Her and we continually bow to Her.

Let the Goddess who brings good fortune, who is praised by the Gods, who is served by Devendra, who is praised by Devas troubled by the Asuras, who is praised and remembered as devotion to her solves all, who is the source of all good in the world, let that Goddess destroy all obstacles.

 

Maharishi Dayanand Saraswati on Christianity[ 1875]

LORD VISHNU

त्रयोदश समुल्लास

अनुभूमिका ()

जो यह बाइबल का मत है कि वह केवल ईसाइयों का है सो नहीं किन्तु इससे यहूदी आदि भी गृहीत होते हैं। जो यहां तेरहवें समुल्लास में ईसाई मत के विषय में लिखा है इसका यही अभिप्राय है कि आजकल बाइबल के मत में ईसाई मुख्य हो रहे हैं और यहूदी आदि गौण हैं। मुख्य के ग्रहण से गौण का ग्रहण हो जाता है, इससे यहूदियों का भी ग्रहण समझ लीजिये। इनका जो विषय यहां लिखा है सो केवल बाइबल में से कि जिसको ईसाई और यहूदी आदि सब मानते हैं और इसी पुस्तक को अपने धर्म का मूल कारण समझते हैं। इस पुस्तक के भाषान्तर बहुत से हुए हैं जो कि इनके मत में बड़े-बडे़ पादरी हैं उन्हीं ने किये हैं। उनमें से देवनागरी व संस्कृत भाषान्तर देख कर मुझको बाइबल में बहुत सी शंका हुई हैं। उनमें से कुछ थोड़ी सी इस १३ तेरहवें समुल्लास में सब के विचारार्थ लिखी हैं। यह लेख केवल सत्य की वृद्धि औेर असत्य के ह्रास होने के लिये है न कि किसी को दुःख देने वा हानि करने अथवा मिथ्या दोष लगाने के अर्थ ही। इसका अभिप्राय उत्तर लेख में सब कोई समझ लेंगे कि यह पुस्तक कैसा है और इनका मत भी कैसा है? इस लेख से यही प्रयोजन है कि सब मनुष्यमात्र को देखना, सुनना, लिखना आदि करना सहज होगा और पक्षी, प्रतिपक्षी होके विचार कर ईसाई मत का आन्दोलन सब कोई कर सकेंगे। इससे एक यह प्रयोजन सिद्ध होगा कि मनुष्यों को धर्मविषयक ज्ञान बढ़ कर यथायोग्य सत्याऽसत्य मत और कर्त्तव्याकर्त्तव्य कर्म सम्बन्धी विषय विदित होकर सत्य और कर्त्तव्य कर्म का स्वीकार, असत्य और अकर्त्तव्य कर्म का परित्याग करना सहजता से हो सकेगा। सब मनुष्यों को उचित है कि सब के मतविषयक पुस्तकों को देख समझ कर कुछ सम्मति वा असम्मति देवें वा लिखें; नहीं तो सुना करें। क्योंकि जैसे पढ़ने से पण्डित होता है वैसे सुनने से बहुश्रुत होता है। यदि श्रोता दूसरे को नहीं समझा सके तथापि आप स्वयं तो समझ ही जाता है। जो कोई पक्षपातरूप यानारूढ़ होके देखते हैं उनको न अपने और न पराये गुण, दोष विदित हो सकते हैं। मनुष्य का आत्मा यथायोग्य सत्याऽसत्य के निर्णय करने का सामर्थ्य रखता है। जितना अपना पठित वा श्रुत है उतना निश्चय कर सकता है। यदि एक मत वाले दूसरे मतवाले के विषयों को जानें और अन्य न जानें तो यथावत् संवाद नहीं हो सकता, किन्तु अज्ञानी किसी भ्रमरूप बाड़े में गिर जाते हैं। ऐसा न हो इसलिये इस ग्रन्थ में, प्रचरित सब मतों का विषय थोड़ा-थोड़ा लिखा है। इतने ही से शेष विषयों में अनुमान कर सकता है कि वे सच्चे हैं वा झूठे? जो-जो सर्वमान्य सत्य विषय हैं वे तो सब में एक से हैं। झगड़ा झूठे विषयों में होता है। अथवा एक सच्चा और दूसरा झूठा हो तो भी कुछ थोड़ा सा विवाद चलता है। यदि वादी प्रतिवादी सत्याऽसत्य निश्चय के लिये वाद प्रतिवाद करें तो अवश्य निश्चय हो जाये।

अब मैं इस १३वें समुल्लास में ईसाई मत विषयक थोड़ा सा लिख कर सब के सम्मुख स्थापित करता हूं; विचारिये कि कैसा है।

अलमतिलेखेन विचक्षणवरेषु।

अथ त्रयोदशसमुल्लासारम्भः

अथ कृश्चीनमतविषयं व्याख्यास्यामः

अब इसके आगे ईसाइयों के मत विषय में लिखते हैं जिससे सब को विदित हो जाय कि इनका मत निर्दोष और इनकी बाइबल पुस्तक ईश्वरकृत है वा नहीं? प्रथम बाइबल के तौरेत का विषय लिखा जाता है-

१-आरम्भ में ईश्वर ने आकाश और पृथिवी को सृजा।। और पृथिवी बेडौल और सूनी थी और गहिराव पर अन्धियारा था और ईश्वर का आत्मा जल के ऊपर डोलता था।। -तौरेत उत्पत्ति पुस्तक पर्व १। आय० १।२ ।।

(समीक्षकआरम्भ किसको कहते हो?

(ईसाईसृष्टि के प्रथमोत्पत्ति को।

(समीक्षकक्या यही सृष्टि प्रथम हुई; इसके पूर्व कभी नहीं हुई थी?

(ईसाईहम नहीं जानते हुई थी वा नहीं; ईश्वर जाने।

(समीक्षकजब नहीं जानते तो इस पुस्तक पर विश्वास क्यों किया कि जिससे सन्देह का निवारण नहीं हो सकता और इसी के भरोसे लोगों को उपदेश कर इस सन्देह के भरे हुए मत में क्यों फंसाते हो? और निःसन्देह सर्वशंकानिवारक वेदमत को स्वीकार क्यों नहीं करते? जब तुम ईश्वर की सृष्टि का हाल नहीं जानते तो ईश्वर को कैसे जानते होगे? आकाश किसको मानते हो?

(ईसाईपोल और ऊपर को।

(समीक्षकपोल की उत्पत्ति किस प्रकार हुई क्योंकि यह विभु पदार्थ और अति सूक्ष्म है और ऊपर नीचे एक सा है। जब आकाश नहीं सृजा था तब पोल और अवकाश था वा नहीं? जो नहीं था तो ईश्वर, जगत् का कारण और जीव कहां रहते थे? विना अवकाश के कोई पदार्थ स्थित नहीं हो सकता इसलिये तुम्हारी बाइबल का कथन युक्त नहीं। ईश्वर बेडौल, उसका ज्ञान कर्म बेडौल होता है वा सब डौल वाला?

(ईसाईडौल वाला होता है।

(समीक्षकतो यहां ईश्वर की बनाई पृथिवी बेडौल थी ऐसा क्यों लिखा?

(ईसाईबेडौल का अर्थ यह है कि ऊंची नीची थी; बराबर नहीं थी।

(समीक्षकफिर बराबर किसने की? और क्या अब भी ऊंची नीची नहीं है? इसलिये ईश्वर का काम बेडौल नहीं हो सकता क्योंकि वह सर्वज्ञ है, उसके काम में न भूल, न चूक कभी हो सकती है। और बाइबल में ईश्वर की सृष्टि बेडौल लिखी इसलिये यह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता। प्रथम ईश्वर का आत्मा क्या पदार्थ है?

(ईसाईचेतन।

(समीक्षकवह साकार है वा निराकार तथा व्यापक है वा एकदेशी।

(ईसाईनिराकार, चेतन और व्यापक है परन्तु किसी एक सनाई पर्वत, चौथा आसमान आदि स्थानों में विशेष करके रहता है।

(समीक्षकजो निराकार है तो उसको किसने देखा? और व्यापक का जल पर डोलना कभी नहीं हो सकता। भला! जब ईश्वर का आत्मा जल पर डोलता था तब ईश्वर कहां था? इससे यही सिद्ध होता है कि ईश्वर का शरीर कहीं अन्यत्र स्थित होगा अथवा अपने कुछ आत्मा के एक टुकड़े को जल पर डुलाया होगा। जो ऐसा है तो विभु और सर्वज्ञ कभी नहीं हो सकता। जो विभु नहीं तो जगत् की रचना, धारण, पालन और जीवों के कर्मों की व्यवस्था वा प्रलय कभी नहीं कर सकता क्योंकि जिस पदार्थ का स्वरूप एकदेशी है उसके गुण, कर्म, स्वभाव भी एकदेशी होते हैं, जो ऐसा है तो वह ईश्वर नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक, अनन्त गुण, कर्म, स्वभावयुक्त सच्चिदानन्दस्वरूप, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्तस्वभाव, अनादि, अनन्तादि लक्षणयुक्त वेदों में कहा है। उसी को मानो तभी तुम्हारा कल्याण होगा, अन्यथा नहीं।।१।।

२-और ईश्वर ने कहा कि उजियाला होवे और उजियाला हो गया।। और ईश्वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० १। आ० ३। ४ ।।

(समीक्षकक्या ईश्वर की बात जड़रूप उजियाले ने सुन ली? जो सुनी हो तो इस समय भी सूर्य्य और दीप अग्नि का प्रकाश हमारी तुम्हारी बात क्यों नहीं सुनता? प्रकाश जड़ होता है वह कभी किसी की बात नहीं सुन सकता। क्या जब ईश्वर ने उजियाले को देखा तभी जाना कि उजियाला अच्छा है? पहले नहीं जानता था? जो जानता होता तो देख कर अच्छा क्यों कहता? जो नहीं जानता था तो वह ईश्वर ही नहीं। इसीलिए तुम्हारी बाइबल ईश्वरोक्त और उसमें कहा हुआ ईश्वर सर्वज्ञ नहीं है।।२।।

३-और ईश्वर ने कहा कि पानियों के मध्य में आकाश होवे और पानियों को पानियों से विभाग करे।। तब ईश्वर ने आकाश को बनाया और आकाश के नीचे के पानियों को आकाश के ऊपर के पानियों से विभाग किया और ऐसा हो गया।। और ईश्वर ने आकाश को स्वर्ग कहा और सांझ और बिहान दूसरा दिन हुआ।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० १। आ० ६। ७। ८।।

(समीक्षकक्या आकाश और जल ने भी ईश्वर की बात सुन ली? और जो जल के बीच में आकाश न होता तो जल रहता ही कहां? प्रथम आयत में आकाश को सृजा था पुनः आकाश का बनाना व्यर्थ हुआ। जो आकाश को स्वर्ग कहा तो वह सर्वव्यापक है इसलिये सर्वत्र स्वर्ग हुआ फिर ऊपर को स्वर्ग है यह कहना व्यर्थ है। जब सूर्य्य उत्पन्न ही नहीं हुआ था तो पुनः दिन और रात कहां से हो गई? ऐसी ही असम्भव बातें आगे की आयतों में भरी हैं।।३।।

४-तब ईश्वर ने कहा कि हम आदम को अपने स्वरूप में अपने समान बनावें।। तब ईश्वर ने आदम को अपने स्वरूप में उत्पन्न किया, उसने उसे ईश्वर के स्वरूप में उत्पन्न किया, उसने उन्हें नर और नारी बनाया।। और ईश्वर ने उन्हें आशीष दिया।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० १। आ० २६। २७। २८ ।।

(समीक्षकयदि आदम को ईश्वर ने अपने स्वरूप में बनाया तो ईश्वर का स्वरूप पवित्र ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय आदि लक्षणयुक्त है उसके सदृश आदम क्यों नहीं हुआ? जो नहीं हुआ तो उसके स्वरूप में नहीं बना और आदम को उत्पन्न किया तो ईश्वर ने अपने स्वरूप ही की उत्पत्ति वाला किया पुनः वह अनित्य क्यों नहीं? और आदम को उत्पन्न कहां से किया?

(ईसाईमट्टी से बनाया।

(समीक्षकमट्टी कहां से बनाई?

(ईसाईअपनी कुदरत अर्थात् सामर्थ्य से।

(समीक्षकईश्वर का सामर्थ्य अनादि है वा नवीन?

(ईसाईअनादि है।

(समीक्षकजब अनादि है तो जगत् का कारण सनातन हुआ। फिर अभाव से भाव क्यों मानते हो?

(ईसाईसृष्टि के पूर्व ईश्वर के विना कोई वस्तु नहीं था।

(समीक्षकजो नहीं था तो यह जगत् कहां से बना? और ईश्वर का सामर्थ्य द्रव्य है वा गुण? जो द्रव्य है तो ईश्वर से भिन्न दूसरा पदार्थ था और जो गुण है तो गुण से द्रव्य कभी नहीं बन सकता जैसे रूप से अग्नि और रस से जल नहीं बन सकता। और जो ईश्वर से जगत् बना होता तो ईश्वर के सदृश गुण, कर्म, स्वभाव वाला होता। उसके गुण, कर्म, स्वभाव के सदृश न होने से यही निश्चय है कि ईश्वर से नहीं बना किन्तु जगत् के कारण अर्थात् परमाणु आदि नाम वाले जड़ से बना है। जैसी कि जगत् की उत्पत्ति वेदादि शास्त्रें में लिखी है वैसी ही मान लो जिससे ईश्वर जगत् को बनाता है। जो आदम के भीतर का स्वरूप जीव और बाहर का मनुष्य के सदृश है तो वैसा ईश्वर का स्वरूप क्यों नहीं? क्योंकि जब आदम ईश्वर के सदृश बना तो ईश्वर आदम के सदृश अवश्य होना चाहिये।।४।।

५-तब परमेश्वर ईश्वर ने भूमि की धूल से आदम को बनाया और उसके नथुनों में जीवन का श्वास फूंका और आदम जीवता प्राण हुआ।। और परमेश्वर ईश्वर ने अदन में पूर्व की ओर एक बारी लगाई और उस आदम को जिसे उसने बनाया था उसमें रक्खा।। और उस बारी के मध्य में जीवन का पेड़ और भले बुरे के ज्ञान का पेड़ भूमि से उगाया।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० २। आ० ७। ८। ९ ।।

(समीक्षकजब ईश्वर ने अदन में बाड़ी बनाकर उसमें आदम को रक्खा तब ईश्वर नहीं जानता था कि इसको पुनः यहाँ से निकालना पड़ेगा? और जब ईश्वर ने आदम को धूली से बनाया तो ईश्वर का स्वरूप नहीं हुआ, और जो है तो ईश्वर भी धूली से बना होगा? जब उसके नथुनों में ईश्वर ने श्वास फूंका तो वह श्वास ईश्वर का स्वरूप था वा भिन्न? जो भिन्न था तो आदम ईश्वर के स्वरूप में नहीं बना। जो एक है तो आदम और ईश्वर एक से हुए। और जो एक से हैं तो आदम के सदृश जन्म, मरण, वृद्धि, क्षय, क्षुधा, तृषा आदि दोष ईश्वर में आये, फिर वह ईश्वर क्योंकर हो सकता है? इसलिए यह तौरेत की बात ठीक नहीं विदित होती और यह पुस्तक भी ईश्वरकृत नहीं है।।५।।

६-और परमेश्वर ईश्वर ने आदम को बड़ी नींद में डाला और वह सो गया। तब उसने उसकी पसलियों में से एक पसली निकाली और संति मांस भर दिया।। और परमेश्वर ईश्वर ने आदम की उस पसली से एक नारी बनाई और उसे आदम के पास लाया। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० २।। आ० २१। २२ ।।

(समीक्षकजो ईश्वर ने आदम को धूली से बनाया तो उसकी स्त्री को धूली से क्यों नहीं बनाया? और जो नारी को हड्डी से बनाया तो आदम को हड्डी

से क्यों नहीं बनाया? और जैसे नर से निकलने से नारी नाम हुआ तो नारी से नर नाम भी होना चाहिए। और उनमें परस्पर प्रेम भी रहै, जैसे स्त्री के साथ पुरुष प्रेम करै वैसे पुरुष के साथ स्त्री भी प्रेम करे। देखो विद्वान् लोगो! ईश्वर की कैसी पदार्थविद्या अर्थात् ‘फिलासफी’ चलकती है! जो आदम की एक पसली निकाल कर नारी बनाई तो सब मनुष्यों की एक पसली कम क्यों नहीं होती? और स्त्री के शरीर में एक पसली होनी चाहिये क्योंकि वह एक पसली से बनी है। क्या जिस सामग्री से सब जगत् बनाया उस सामग्री से स्त्री का शरीर नहीं बन सकता था? इसलिए यह बाइबल का सृष्टिक्रम सृष्टिविद्या से विरुद्ध है।।६।।

७-अब सर्प्प भूमि के हर एक पशु से जिसे परमेश्वर ईश्वर ने बनाया था; धूर्त था। और उसने स्त्री से कहा, क्या निश्चय ईश्वर ने कहा है कि तुम इस बारी के हर एक पेड़ से फल न खाना।। और स्त्री ने सर्प्प से कहा कि हम तो इस बारी के पेड़ों का फल खाते हैं।। परन्तु उस पेड़ का फल जो बारी के बीच में है ईश्वर ने कहा है कि तुम उससे न खाना और न छूना; न हो कि मर जाओ।। तब सर्प्प ने स्त्री से कहा कि तुम निश्चय न मरोगे।। क्योंकि ईश्वर जानता है कि जिस दिन तुम उस्से खाओगे तुम्हारी आँखें खुल जायेंगी और तुम भले और बुरे की पहिचान में ईश्वर के समान हो जाओगे।। और जब स्त्री ने देखा वह पेड़ खाने में सुस्वाद और दृष्टि में सुन्दर और बुद्धि देने के योग्य है तो उसके फल में से लिया और खाया और अपने पति को भी दिया और उसने खाया।। तब उन दोनों की आखें खुल गईं और वे जान गये कि हम नंगे हैं सो उन्होंने गूलर के पत्तों को मिला के सिया और अपने लिये ओढ़ना बनाया। तब परमेश्वर ईश्वर ने सर्प्प से कहा कि जो तू ने यह किया है इस कारण तू सारे ढोर और हर एक वन के पशु से अधिक स्रापित होगा। तू अपने पेट के बल चलेगा और अपने जीवन भर धूल खाया करेगा।। और मैं तुझ में और स्त्री में और तेरे वंश और उसके वंश में वैर डालूंगा।। वह तेरे सिर को कुचलेगा और तू उसकी एड़ी को काटेगा।। और उसने स्त्री को कहा कि मैं तेरी पीड़ा और गर्भ- धारण को बहुत बढ़ाऊंगा। तू पीड़ा से बालक जनेगी और तेरी इच्छा तेरे पति पर होगी और वह तुझ पर प्रभुता करेगा।। और उसने आदम से कहा कि तूने जो अपनी पत्नी का शब्द माना है और जिस पेड़ का फल मैंने तुझे खाने से वर्जा था तूने खाया है। इस कारण भूमि तेरे लिये स्रापित है। अपने जीवन भर तू उस्से पीड़ा के साथ खायेगा।। और वह कांटे और ऊंटकटारे तेरे लिये उगायेगी और तू खेत का सागपात खायेगा।।

-तौरेत उत्पत्ति० पर्व० ३। आ० १। २। ३। ४। ५। ६। ७। १४। १५। १६। १७। १८।।

(समीक्षकजो ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ होता तो इस धूर्त सर्प्प अर्थात् शैतान को क्यों बनाता? और जो बनाया तो वही ईश्वर अपराध का भागी है क्योंकि जो वह उसको दुष्ट न बनाता तो वह दुष्टता क्यों करता? और वह पूर्व जन्म नहीं मानता तो विना अपराध उसको पापी क्यों बनाया? और सच पूछो तो वह सर्प्प नहीं था किन्तु मनुष्य था। क्योंकि जो मनुष्य न होता तो मनुष्य की भाषा क्योंकर बोल सकता? और जो आप झूठा और दूसरे को झूठ में चलावे उसको शैतान कहना चाहिये सो यहां शैतान सत्यवादी और इससे उसने उस स्त्री को नहीं बहकाया किन्तु सच कहा और ईश्वर ने आदम और हव्वा से झूठ कहा कि इसके खाने से तुम मर जाओगे। जब वह पेड़ ज्ञानदाता और अमर करने वाला था तो उसके फल खाने से क्यों वर्जा? और जो वर्जा तो वह ईश्वर झूठा और बहकाने वाला ठहरा। क्योंकि उस वृक्ष के फल मनुष्यों को ज्ञान और सुखकारक थे; अज्ञान और मृत्युकारक नहीं। जब ईश्वर ने फल खाने से वर्जा तो उस वृक्ष की उत्पत्ति किसलिये की थी? जो अपने लिए की तो क्या आप अज्ञानी और मृत्युधर्मवाला था? और दूसरों के लिये बनाया तो फल खाने में अपराध कुछ भी न हुआ। और आजकल कोई भी वृक्ष ज्ञानकारक और मृत्युनिवारक देखने में नहीं आता। क्या ईश्वर ने उसका बीज भी नष्ट कर दिया? ऐसी बातों से मनुष्य छली कपटी होता है तो ईश्वर वैसा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि जो कोई दूसरे से छल कपट करेगा वह छली कपटी क्यों न होगा? और जो इन तीनों को शाप दिया वह विना अपराध से है। पुनः वह ईश्वर अन्यायकारी भी हुआ और यह शाप ईश्वर को होना चाहिये क्योंकि वह झूठ बोला और उनको बहकाया। यह ‘फिलासफी’ देखो! क्या विना पीड़ा के गर्भधारण और बालक का जन्म हो सकता था? और विना श्रम के कोई अपनी जीविका कर सकता है? क्या प्रथम कांटे आदि के वृक्ष न थे? और जब शाक पात खाना सब मनुष्यों को ईश्वर के कहने से उचित हुआ तो जो उत्तर में मांस खाना बाइबल में लिखा वह झूठा क्यों नहीं? और जो वह सच्चा हो तो यह झूठा है। जब आदम का कुछ भी अपराध सिद्ध नहीं होता तो ईसाई लोग सब मनुष्यों को आदम के अपराध से सन्तान होने पर अपराधी क्यों कहते हैं? भला ऐसा पुस्तक और ऐसा ईश्वर कभी बुद्धिमानों के मानने योग्य हो सकता है? ।।७।।

८-और परमेश्वर ईश्वर ने कहा कि देखो! आदम भले बुरे के जानने में हम में से एक की नाईं हुआ और अब ऐसा न होवे कि वह अपना हाथ डाले और जीवन के पेड़ में से भी लेकर खावे और अमर हो जाय।। सो उसने आदम को निकाल दिया और अदन की बारी की पूर्व ओर करोबीम ठहराये और चमकते हुए खड्ग को जो चारों ओर घूमता था; जिसते जीवन के पेड़ के मार्ग की रखवाली करें।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० ३। आ० २२। २४।।

(समीक्षकभला! ईश्वर को ऐसी ईर्ष्या और भ्रम क्यों हुआ कि ज्ञान में हमारे तुल्य हुआ? क्या यह बुरी बात हुई? यह शंका ही क्यों पड़ी? क्योंकि ईश्वर के तुल्य कभी कोई नहीं हो सकता। परन्तु इस लेख से यह भी सिद्ध हो सकता है कि वह ईश्वर नहीं था किन्तु मनुष्य विशेष था। बाइबल में जहां कहीं ईश्वर की बात आती है वहां मनुष्य के तुल्य ही लिखी आती है। अब देखो! आदम के ज्ञान की बढ़ती में ईश्वर कितना दुःखी हुआ और फिर अमर वृक्ष के फल खाने में कितनी ईर्ष्या की। और प्रथम जब उसको बारी में रक्खा तब उसको भविष्यत् का ज्ञान नहीं था कि इसको पुनः निकालना पड़ेगा, इसलिये ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ नहीं था। और चमकते खड्ग का पहिरा रक्खा यह भी मनुष्य का काम है; ईश्वर का नहीं।।८।।

९-और कितने दिनों के पीछे यों हुआ कि काइन भूमि के फलों में से परमेश्वर के लिये भेंट लाया।। और हाबिल भी अपनी झुंड में से पहिलौठी और मोटी-मोटी भेड़ लाया और परमेश्वर ने हाबिल का और उसकी भेंट का आदर किया।। परन्तु काबिल का और उसकी भेंट का आदर न किया इसलिये काबिल अति कुपित हुआ और अपना मुंह फुलाया।। तब परमेश्वर ने काबिल से कहा कि तू क्यों क्रुद्ध है और तेरा मुंह क्यों फूल गया।।

-तौरेत उत्पत्ति पर्व० ४। आ० ३। ४। ५। ६।।

(समीक्षकयदि ईश्वर मांसाहारी न होता तो भेड़ की भेंट और हाबिल का सत्कार और काइन का तथा उसकी भेंट का तिरस्कार क्यों करता? और ऐसा झगड़ा लगाने और हाबिल के मृत्यु का कारण भी ईश्वर ही हुआ और जैसे आपस में मनुष्य लोग एक दूसरे से बातें करते हैं वैसी ही ईसाइयों के ईश्वर की बातें हैं। बगीचे में आना जाना उसका बनाना भी मनुष्यों का कर्म है। इससे विदित होता है कि यह बाइबल मनुष्यों की बनाई है; ईश्वर की नहीं।।९।।

१०-जब परमेश्वर ने काबिल से कहा तेरा भाई हाबिल कहां है और वह बोला मैं नहीं जानता। क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूँ। तब उसने कहा तूने क्या किया? तेरे भाई के लोहू का शब्द भूमि से मुझे पुकारता है।। और अब तू पृथिवी से स्रापित है। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० ४। आ० ९। १०। ११।।

(समीक्षकक्या ईश्वर काइन से पूछे विना हाबिल का हाल नहीं जानता था और लोहू का शब्द भूमि से कभी किसी को पुकार सकता है? ये सब बातें अविद्वानों की हैं, इसीलिये यह पुस्तक न ईश्वर और न विद्वान् का बनाया हो सकता है।।१०।।

११-और हनूक मतूसिलह की उत्पत्ति के पीछे तीन सौ वर्ष लों ईश्वर के साथ-साथ चलता था।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० ५। आ० २२।।

(समीक्षकभला! ईसाइयों का ईश्वर मनुष्य न होता तो हनूक के साथ-साथ क्यों चलता? इससे जो वेदोक्त निराकार व्यापक ईश्वर है उसी को ईसाई लोग मानें तो उनका कल्याण होवे।।११।।

१२-और यों हुआ कि जब आदमी पृथिवी पर बढ़ने लगे और उनसे बेटियां उत्पन्न हुईं।। तो ईश्वर के पुत्रें ने आदम की पुत्रियों को देखा कि वे सुन्दरी हैं और उनमें से जिन्हें उन्होंने चाहा उन्हें व्याहा।। और उन दिनों में पृथिवी पर दानव थे और उसके पीछे भी जब ईश्वर के पुत्र आदम की पुत्रियों से मिले तो उनसे बालक उत्पन्न हुए जो बलवान् हुए जो आगे से नामी थे।। और ईश्वर ने देखा कि आदम की दुष्टता पृथिवी पर बहुत हुई और उनके मन की चिन्ता और भावना प्रतिदिन केवल बुरी होती है।। तब आदमी को पृथिवी पर उत्पन्न करने से परमेश्वर पछताया और उसे अति शोक हुआ।। तब परमेश्वर ने कहा कि आदमी को जिसे मैंने उत्पन्न किया; आदमी से लेके पशुन लों और रेंगवैयों को और आकाश के पक्षियों को पृथिवी पर से नष्ट करूंगा क्योंकि उन्हें बनाने से मैं पछताता हूँ।।

-तौन पर्व० ६। आ० १। २। ३। ४। ५। ६।।

(समीक्षकईसाइयों से पूछना चाहिये कि ईश्वर के बेटे कौन हैं? और ईश्वर की स्त्री, सास, श्वसुर, साला, और सम्बन्धी कौन हैं? क्योंकि अब तो आदम की बेटियों के साथ विवाह होने से ईश्वर उनका सम्बन्धी हुआ और जो उनसे उत्पन्न होते हैं वे पुत्र और प्रपौत्र हुए। क्या ऐसी बात ईश्वर और ईश्वर के पुस्तक की हो सकती है? किन्तु यह सिद्ध होता है कि उन जंगली मनुष्यों ने यह पुस्तक बनाया है। वह ईश्वर ही नहीं जो सर्वज्ञ न हो; न भविष्यत् की बात जाने; वह जीव है। क्या जब सृष्टि की थी तब आगे मनुष्य दुष्ट होंगे ऐसा नहीं जानता था? और पछताना अति शोकादि होना भूल से काम करके पीछे पश्चात्ताप करना आदि

ईसाइयों के ईश्वर में घट सकता है; वेदोक्त ईश्वर में नहीं। और इससे यह भी सिद्ध हो सकता है कि ईसाइयों का ईश्वर पूर्ण विद्वान् योगी भी नहीं था, नहीं तो शान्ति और विज्ञान से अति शोकादि से पृथक् हो सकता था। भला पशु पक्षी भी दुष्ट हो गये! यदि वह ईश्वर सर्वज्ञ होता तो ऐसा विषादी क्यों होता? इसलिये न यह ईश्वर और न यह ईश्वरकृत पुस्तक हो सकता है। जैसे वेदोक्त परमेश्वर सब पाप, क्लेश, दुःख, शोकादि से रहित ‘सच्चिदानन्दस्वरूप’ है उसको ईसाई लोग मानते वा अब भी मानें तो अपने मनुष्यजन्म को सफल कर सकें।।१२।।

१३-उस नाव की लम्बाई तीन सौ हाथ और चौड़ाई पचास हाथ और ऊँचाई तीस हाथ की होवे।। तू नाव में जाना तू और तेरे बेटे और तेरी पत्नी और तेरे बेटों की पत्नियां तेरे साथ।। और सारे शरीरों में से जीवता जन्तु दो-दो अपने साथ नाव में लेना जिसतें वे तेरे साथ जीते रहें वे नर और नारी होवें।। पंछी में से उसके भांति-भांति के और ढोर में से उसके भांति-भांति के और पृथिवी के हर एक रेंगवैये में से भाँति-भाँति के हर एक में से दो-दो तुझ पास आवें जिसते जीते रहें।। और तू अपने लिये खाने को सब सामग्री अपने पास इकट्ठा कर वह तुम्हारे और उनके लिये भोजन होगा।। सो ईश्वर की सारी आज्ञा के समान नूह ने किया।।

-तौरेत उत्पत्ति पर्व० ६। आ० १५। १८। १९। २०। २१। २२।।

(समीक्षकभला कोई भी विद्वान् ऐसी विद्या से विरुद्ध असम्भव बात के वक्ता को ईश्वर मान सकता है? क्योंकि इतनी बड़ी चौड़ी ऊंची नाव में हाथी, हथनी, ऊंट, ऊंटनी आदि क्रोड़ों जन्तु और उनके खाने पीने की चीजें वे सब कुटुम्ब के भी समा सकते हैं? यह इसीलिये मनुष्यकृत पुस्तक है। जिसने यह लेख किया है वह विद्वान् भी नहीं था।।१३।।

१४-और नूह ने परमेश्वर के लिए एक वेदी बनाई और सारे पवित्र पशु और हर एक पवित्र पंछियों में से लिये और होम की भेंट उस वेदी पर चढ़ाई।। और परमेश्वर ने सुगन्ध सूंघा और परमेश्वर ने अपने मन में कहा कि आदमी के लिये मैं पृथिवी को फिर कभी स्राप न दूँगा इस कारण कि आदमी के मन की भावना उसकी लड़काई से बुरी है और जिस रीति से मैंने सारे जीवधारियों को मारा फिर कभी न मारूंगा।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० ८। आ० २०। २१ ।।

(समीक्षकवेदी के बनाने, होम करने के लेख से यही सिद्ध होता है कि ये बातें वेदों से बाइबल में गई हैं। क्या परमेश्वर के नाक भी है कि जिससे सुगन्ध सूँघा? क्या यह ईसाइयों का ईश्वर मनुष्यवत् अल्पज्ञ नहीं है कि कभी स्राप देता है और कभी पछताता है। कभी कहता है स्राप न दूंगा। पहले दिया था और फिर भी देगा। प्रथम सब को मार डाला और अब कहता है कि कभी न मारूंगा!!! ये बातें सब लड़केपन की हैं, ईश्वर की नहीं, और न किसी विद्वान् की क्योंकि विद्वान् की भी बात और प्रतिज्ञा स्थिर होती है।।१४।।

१५-और ईश्वर ने नूह को और उसके बेटों को आशीष दिया और उन्हें कहा कि हर एक जीता चलता जन्तु तुम्हारे भोजन के लिये होगा।। मैंने हरी तरकारी के समान सारी वस्तु तुम्हें दिईं केवल मांस उनके जीव अर्थात् उसके लोहू समेत मत खाना।। -तौरेत उत्पत्ति पर्व० ९। आ० १। २। ३। ४।।

(समीक्षकक्या एक को प्राणकष्ट देकर दूसरों को आनन्द कराने से दयाहीन ईसाइयों का ईश्वर नहीं है? जो माता पिता एक लड़के को मरवा कर

दूसरे को खिलावें तो महापापी नहीं हों? इसी प्रकार यह बात है क्योंकि ईश्वर के लिये सब प्राणी पुत्रवत् हैं। ऐसा न होने से इनका ईश्वर कसाईवत् काम करता है और सब मनुष्यों को हिसक भी इसी ने बनाये हैं। इसलिये ईसाइयों का ईश्वर निर्दय होने से पापी क्यों नहीं।।१५।।

१६-और सारी पृथिवी पर एक ही बोली और एक ही भाषा थी।। फिर उन्होंने कहा कि आओ हम एक नगर और एक गुम्मट जिसकी चोटी स्वर्ग लों पहुंचे अपने लिए बनावें और अपना नाम करें। न हो कि हम सारी पृथिवी पर छिन्न-भिन्न हो जायें।। तब परमेश्वर उस नगर और उस गुम्मट को जिसे आदम के सन्तान बनाते थे; देखने को उतरा।। तब परमेश्वर ने कहा कि देखो! ये लोग एक ही हैं और उन सब की एक ही बोली है। अब वे ऐसा-ऐसा कुछ करने लगे सो वे जिस पर मन लगावेंगे उससे अलग न किये जायेंगे।। आओ हम उतरें और वहां उनकी भाषा को गड़बड़ावें जिसते एक दूसरे की बोली न समझें।। तब परमेश्वर ने उन्हें वहां से सारी पृथिवी पर छिन्न-भिन्न किया और वे उस नगर के बनाने से अलग रहे।। -तौन उ० पर्व० ११। आ० १। ४। ५। ६। ७। ८।।

(समीक्षकजब सारी पृथिवी पर एक भाषा और बोली होगी उस समय सब मनुष्यों को परस्पर अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुआ होगा परन्तु क्या किया जाय, यह ईसाइयों के ईर्ष्यक ईश्वर ने सबकी भाषा गड़बड़ा के सब का सत्यानाश किया। उसने यह बड़ा अपराध किया। क्या यह शैतान के काम से भी बुरा काम नहीं है? और इससे यह भी विदित होता है कि ईसाइयों का ईश्वर सनाई पहाड़ आदि पर रहता था और जीवों की उन्नति भी नहीं चाहता था। यह विना एक अविद्वान् के ईश्वर की बात और यह ईश्वरोक्त पुस्तक क्यों कर हो सकता है? ।।१६।।

१७-तब उसने अपनी पत्नी सरी से कहा कि देख मैं जानता हूं तू देखने में सुन्दर स्त्री है।। इसलिये यों होगा कि जब मिस्री तुझे देखें तब वे कहेंगे कि यह उसकी पत्नी है और मुझे मार डालेंगे परन्तु तुझे जीती रखेंगे।। तू कहियो कि मैं उसकी बहिन हूं जिसते तेरे कारण मेरा भला होय और मेरा प्राण तेरे हेतु से जीता रहै।। -तौन उ० पर्व० १२। आ० ११। १२। १३।।

(समीक्षकअब देखिये! जो अबिरहाम बड़ा पैगम्बर ईसाई और मुसलमानों का बजता है और उसके कर्म मिथ्याभाषणादि बुरे हैं भला! जिनके ऐसे पैगम्बर हों उनको विद्या वा कल्याण का मार्ग कैसे मिल सके? ।।१७।।

१८-और ईश्वर ने अब्राहम से कहा-तू और तेरे पीछे तेरा वंश उनकी पीढ़ियों में मेरे नियम को माने।। तुम मेरा नियम जो मुझ से और तुम से और तेरे पीछे तेरे वंश से है जिसे तुम मानोगे सो यह है कि तुम में से हर एक पुरुष का खतनः किया जाय।। और तुम अपने शरीर की खलड़ी काटो और वह मेरे और तुम्हारे मध्य में नियम का चिह्न होगा। और तुम्हारी पीढ़ियों में हर एक आठ दिन के पुरुष का खतनः किया जाय। जो घर में उत्पन्न होय अथवा जो किसी परदेशी से; जो तेरे वंश का न हो; रूपे से मोल लिया जाय।। जो तेरे घर में उत्पन्न हुआ हो और तेरे रूपे से मोल लिया गया हो; अवश्य उसका खतनः किया जाय और मेरा नियम तुम्हारे मांस में सर्वदा नियम के लिये होगा।। और जो अखतनः बालक जिसकी खलड़ी का खतनः न हुआ हो सो प्राणी अपने लोग से कट जाय कि उसने मेरा नियम तोड़ा है।। -तौन उ० पर्व० १७। आ० ९। १०। ११। १२। १३। १४।।

(समीक्षकअब देखिये ईश्वर की अन्यथा आज्ञा। कि जो यह खतनः करना ईश्वर को इष्ट होता तो उस चमडे़ को आदि सृष्टि में बनाता ही नहीं और जो यह बनाया गया है वह रक्षार्थ है; जैसा आंख के ऊपर का चमड़ा। क्योंकि वह गुप्तस्थान अति कोमल है। जो उस पर चमड़ा न हो तो एक कीड़ी के भी काटने और थोड़ी सी चोट लगने से बहुत सा दुःख होवे और यह लघुशंका के पश्चात् कुछ मूत्रंश कपड़ों में न लगे इत्यादि बातों के लिये है। इसका काटना बुरा है और अब ईसाई लोग इस आज्ञा को क्यों नहीं करते? यह आज्ञा सदा के लिये है। इसके न करने से ईसा की गवाही जो कि व्यवस्था के पुस्तक का एक विन्दु भी झूठा नहीं है; मिथ्या हो गई। इसका सोच विचार ईसाई कुछ भी नहीं करते।।१८।।

१९-तब उस से बात करने से रह गया और अबिरहाम के पास से ईश्वर ऊपर जाता रहा।। -तौन उ० पर्व० १७। आ० २२।।

(समीक्षकइससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर मनुष्य वा पक्षिवत् था जो ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर आता जाता रहता था। यह कोई इन्द्रजाली पुरुषवत् विदित होता है।।१९।।

२०-फिर ईश्वर उसे ममरे के बलूतों में दिखाई दिया और वह दिन को घाम के समय में अपने तम्बू के द्वार पर बैठा था।। और उसने अपनी आंखें उठाईं और क्या देखा कि तीन मनुष्य उसके पास खड़े हैं और उन्हें देख के वह तम्बू के द्वार पर से उनकी भेंट को दौड़ा और भूमि लों दण्डवत् किई।। और कहा हे मेरे स्वामी! यदि मैंने अब आप की दृष्टि में अनुग्रह पाया है तो मैं आपकी विनती करता हूं कि अपने दास के पास से चले न जाइये।। इच्छा होय तो थोड़ा जल लाया जाय और अपने चरण धोइये और पेड़ तले विश्राम कीजिये।। और मैं एक कौर रोटी लाऊं और आप तृप्त हूजिये। उसके पीछे आगे बढ़िये। क्योंकि आप इसीलिये दास के पास आये हैं।। तब वे बोले कि जैसा तू ने कहा तैसा कर।। और अबिरहाम तम्बू में सरः पास उतावली से गया और उसे कहा कि फुरती कर और तीन नपुआ चोखा पिसान ले के गूँध और उसके फुलके पका।। और अबिरहाम झुंड की ओर दौड़ा गया और एक अच्छा कोमल बछड़ा ले के दास को दिया। उसने भी उसे सिद्ध करने में चटक किया।। और उसने मक्खन और दूध और वह बछड़ा जो पकाया था; लिया और उनके आगे धरा और आप उनके पास पेड़ तले खड़ा रहा और उन्होंने खाया।। -तौन पर्व० १८। आ० १। २। ३। ४। ५। ६। ७। ८।।

(समीक्षकअब देखिये सज्जन लोगो! जिनका ईश्वर बछड़े का मांस खावे उसके उपासक गाय, बछड़े आदि पशुओं को क्यों छोड़ें? जिसको कुछ दया नहीं और मांस के खाने में आतुर रहे वह विना हिसक मनुष्य के ईश्वर कभी हो सकता है? और ईश्वर के साथ दो मनुष्य न जाने कौन थे? इससे विदित होता है कि जंगली मनुष्यों की एक मण्डली थी। उनका जो प्रधान मनुष्य था। उसका नाम बाइबल में ईश्वर रक्खा होगा। इन्हीं बातों से बुद्धिमान् लोग इनके पुस्तक को ईश्वरकृत नहीं मान सकते और न ऐसे को ईश्वर समझते हैं।।२०।।

२१-और परमेश्वर ने अबिहराम से कहा कि सरः क्यों यह कहके मुसकुराई कि जो मैं बुढ़िया हूं सचमुच बालक जनूँगी।। क्या परमेश्वर के लिये कोई बात असाध्य है।। -तौन पर्व० १८। आ० १३। १४।।

(समीक्षकअब देखिये कि क्या-क्या ईसाइयों के ईश्वर की लीला! कि जो लड़के वा स्त्रियों के समान चिढ़ता और ताना मारता है!!! ।।२१।।

२२-तब परमेश्वर ने समूद और अमूरः पर गन्धक और आग परमेश्वर की ओर से स्वर्ग से वर्षाया।। और उन नगरों को और सारे चौगान को और नगरों के सारे निवासियों को और जो कुछ भूमि पर उगता था; उलट दिया।। -तौन उत्प० पर्व० १९। आ० २४। २५।।

(समीक्षकअब यह भी लीला बाइबल के ईश्वर की देखिये कि जिसको बालक आदि पर भी कुछ दया न आई! क्या वे सब ही अपराधी थे जो सब को भूमि उलटा के दबा मारा? यह बात न्याय, दया और विवेक से विरुद्ध है। जिनका ईश्वर ऐसा काम करे उनके उपासक क्यों न करें? ।।२२।।

२३-आओ हम अपने पिता को दाख रस पिलावें और हम उसके साथ शयन करें कि हम अपने पिता से वंश जुगावें।। तब उन्होंने उस रात अपने पिता को दाख रस पिलाया और पहिलोठी गई और अपने पिता के साथ शयन किया।। हम उसे आज रात भी दाख रस पिलावें तू जाके शयन कर।। सो लूत की दोनों बेटियां अपने पिता से गर्भिणी हुईं।। -तौन उत्प० पर्व० १९। आ० ३२। ३३। ३४। ३६।।

(समीक्षकदेखिये पिता पुत्री भी जिस मद्यपान के नशे में कुकर्म करने से न बच सके ऐसे दुष्ट मद्य को जो ईसाई आदि पीते हैं उनकी बुराई का क्या पारावार है? इसलिये सज्जन लोगों को मद्य के पीने का नाम भी न लेना चाहिये।।२३।।

२४-और अपने कहने के समान परमेश्वर ने सरः से भेंट किया और अपने वचन के समान परमेश्वर ने सरः के विषय में किया।। और सरः गर्भिणी हुई।। -तौन उत्प० पर्व० २१। आ० १। २।।

(समीक्षकअब विचारिये कि सरः से भेंट कर गर्भवती की यह काम कैसे हुआ! क्या विना परमेश्वर और सरः के तीसरा कोई गर्भस्थापन का कारण दीखता है? ऐसा विदित होता है कि सरः परमेश्वर की कृपा से गर्भवती हुई!!!।।२४।।

२५-तब अबिहराम ने बड़े तड़के उठ के रोटी और एक पखाल में जल लिया और हाजिरः के कन्धे पर धर दिया और लड़के को भी उसे सौंप के उसे विदा किया।। उसने उस लड़के को एक झाड़ी के तले डाल दिया।। और वह उसके सम्मुख बैठ के चिल्ला-चिल्ला रोई।। तब ईश्वर ने उस बालक का शब्द सुना।।

-तौन उत्प० पर्व० २१। आ० १४। १५। १६। १७।।

(समीक्षकअब देखिये! ईसाइयों के ईश्वर की लीला कि प्रथम तो सरः का पक्षपात करके हाजिरः को वहां से निकलवा दी और चिल्ला-चिल्ला रोई हाजिरः और शब्द सुना लड़के का। यह कैसी अद्भुत बात है? यह ऐसा हुआ होगा कि ईश्वर को भ्रम हुआ होगा कि यह बालक ही रोता है। भला यह ईश्वर और ईश्वर की पुस्तक की बात कभी हो सकती है? विना साधारण मनुष्य के वचन के इस पुस्तक में थोड़ी सी बात सत्य के सब असार भरा है।।२५।।

२६-और इन बातों के पीछे यों हुआ कि ईश्वर ने अबिरहाम की परीक्षा किई, और उसे कहा हे अबिरहाम! तू अपने बेटे का अपने इकलौते इजहाक को जिसे तू प्यार करता है; ले। उसे होम की भेंट के लिए चढ़ा।। और अपने बेटे इजहाक को बांध के उस वेदी में लकड़ियों पर धरा।। और अबिरहाम ने छुरी लेके अपने बेटे का घात करने के लिये हाथ बढ़ाया।। तब परमेश्वर के दूत ने स्वर्ग पर से उसे पुकारा कि अबिरहाम अबिरहाम।। अपना हाथ लड़के पर मत बढ़ा, उसे कुछ मत कर, क्योंकि अब मैं जानता हूं कि तू ईश्वर से डरता है।।

-तौन उत्प० पर्व० २२। आ० १। २। ९। १०। ११। १२।।

(समीक्षकअब स्पष्ट हो गया कि यह बाइबल का ईश्वर अल्पज्ञ है सर्वज्ञ नहीं। और अबिरहाम भी एक भोला मनुष्य था, नहीं तो ऐसी चेष्टा क्यों करता? और जो बाइबल का ईश्वर सर्वज्ञ होता तो उसकी भविष्यत् श्रद्धा को भी सर्वज्ञता से जान लेता। इससे निश्चित होता है कि ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ नहीं।।२६।।

२७-सो आप हमारी समाधिन में से चुन के एक में अपने मृतक को गाड़िये जिस तें आप अपने मृतक को गाड़ें। -तौन उत्प० पर्व० २३। आ० ६।।

(समीक्षकमुर्दों के गाड़ने से संसार को बड़ी हानि होती है क्योंकि वह सड़ के वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देता है।

(प्रश्नदेखो! जिससे प्रीति हो उसको जलाना अच्छी बात नहीं और गाड़ना जैसा कि उसको सुला देना है इसलिए गाड़ना अच्छा है।

(उत्तरजो मृतक से प्रीति करते हो तो अपने घर में क्यों नहीं रखते? और गाड़ते भी क्यों हो? जिस जीवात्मा से प्रीति थी वह निकल गया, अब दुर्गन्धमय मट्टी से क्या प्रीति? और जो प्रीति करते हो तो उसको पृथिवी में क्यों गाड़ते हो क्योंकि किसी से कोई कहे कि तुझ को भूमि में गाड़ देवें तो वह सुन कर प्रसन्न कभी नहीं होता। उसके मुख आंख और शरीर पर धूल, पत्थर, ईंट, चूना डालना, छाती पर पत्थर रखना कौन सा प्रीति का काम है? और सन्दूक में डाल के गाड़ने से बहुत दुर्गन्ध होकर पृथिवी से निकल वायु को बिगाड़ कर दारुण रोगोत्पत्ति करता है। दूसरा एक मुर्दे के लिए कम से कम ६ हाथ लम्बी और ४ हाथ चौड़ी भूमि चाहिए। इसी हिसाब से सौ, हजार वा लाख अथवा क्रोड़ों मनुष्यों के लिए कितनी भूमि व्यर्थ रुक जाती है। न वह खेत, न बगीचा, और न वसने के काम की रहती है। इसलिये सब से बुरा गाड़ना है, उससे कुछ थोड़ा बुरा जल में डालना, क्योंकि उसको जलजन्तु उसी समय चीर फाड़ के खा लेते हैं परन्तु जो कुछ हाड़ वा मल जल में रहेगा वह सड़ कर जगत् को दुःखदायक होगा। उससे कुछ एक थोड़ा बुरा जंगल में छोड़ना है क्योंकि उसको मांसाहारी पशु पक्षी लूंच खायेंगे तथापि जो उसके हाड़, हाड़ की मज्जा और मल सड़ कर जितना दुर्गन्ध करेगा उतना जगत् का अनुपकार होगा; और जो जलाना है वह सर्वोत्तम है क्योंकि उसके सब पदार्थ अणु होकर वायु में उड़ जायेंगे।

(प्रश्नजलाने से भी दुर्गन्ध होता है।

(उत्तरजो अविधि से जलावे तो थोड़ा सा होता है परन्तु गाड़ने आदि से बहुत कम होता है। और जो विधिपूर्वक जैसा कि वेद में लिखा है-वेदी मुर्दे के तीन हाथ गहिरी, साढ़े तीन हाथ चौड़ी, पांच हाथ लम्बी, तले में डेढ़ हाथ बीता अर्थात् चढ़ा उतार खोद कर शरीर के बराबर घी उसमें एक सेर में रत्ती भर कस्तूरी, मासा भर केशर डाल न्यून से न्यून आध मन चन्दन अधिक चाहें जितना ले, अगर-तगर कपूर आदि और पलाश आदि की लकड़ियों को वेदी में जमा, उस पर मुर्दा रख के पुनः चारों ओर ऊपर वेदी के मुख से एक-एक बीता तक भर के उस घी की आहुति देकर जलाना लिखा है। उस प्रकार से दाह करें तो कुछ भी दुर्गन्ध न हो किन्तु इसी का नाम अन्त्येष्टि, नरमेध, पुरुषमेध यज्ञ है। और जो दरिद्र हो तो बीस सेर से कम घी चिता में न डालें, चाहे वह भीख मांगने वा जाति वाले के देने अथवा राज से मिलने से प्राप्त हो परन्तु उसी प्रकार दाह करे। और जो घृतादि किसी प्रकार न मिल सके तथापि गाड़ने आदि से केवल लकड़ी से भी मृतक का जलाना उत्तम है क्योंकि एक विश्वा भर भूमि में अथवा एक वेदी में लाखों क्रोड़ों मृतक जल सकते हैं। भूमि भी गाड़ने के समान अधिक नहीं बिगड़ती और कबर के देखने से भय भी होता है। इससे गाड़ना आदि सर्वथा निषिद्ध है।।२७।।

२८-परमेश्वर मेरे स्वामी अबिरहाम का ईश्वर धन्य है जिसने मेरे स्वामी को अपनी दया और अपनी सच्चाई विना न छोड़ा। मार्ग में परमेश्वर ने मेरे स्वामी के भाइयों के घर की ओर मेरी अगुआई किई।। -तौन उत्प० पर्व० २४। आ० २७।।

(समीक्षकक्या वह अबिरहाम ही का ईश्वर था? और जैसे आजकल बिगारी वा अगवे लोग अगुआई अर्थात् आगे-आगे चलकर मार्ग दिखलाते हैं तथा ईश्वर ने भी किया तो आजकल मार्ग क्यों नहीं दिखलाता? और मनुष्यों से बातें क्यों नहीं करता? इसलिए ऐसी बातें ईश्वर वा ईश्वर के पुस्तक की कभी नहीं हो सकतीं किन्तु जंगली मनुष्य की हैं।।२८।।

२९-इसमअऐल के बेटों के नाम ये हैं-इसमअऐल का पहिलौठा नबीत और कीदार और अदबिएल और मिबसाम।। और मिसमाअ और दूमः और मस्सा।। हदर और तैमा इतूर, नफीस और किदिमः।।

-तौन उत्प० पर्व० २५। आ० १३। १४। १५।।

(समीक्षकयह इसमअऐल अबिरहाम से उसकी हाजिरः दासी का पुत्र हुआ था।।२९।।

३०-मैं तेरे पिता की रुचि के समान स्वादित भोजन बनाऊंगी।। और तू अपने पिता के पास ले जाइयो जिसतें वह खाय और अपने मरने से आगे तुझे आशीष देवे।। और रिबकः ने घर में से अपने जेठे बेटे एसौ का अच्छा पहिरावा लिया।। और बकरी के मेम्नों का चमड़ा उसके हाथों और गले की चिकनाई पर लपेटा।। तब यअकूब अपने पिता से बोला कि मैं आपका पहिलौठा एसौ हूं। आपके कहने के समान मैंने किया है, उठ बैठिये और मेरे अहेर के मांस में से खाइये जिसतें आप का प्राण मुझे आशीष दे।। -तौन उत्प० पर्व० २७। आ० ९। १०। १५। १६। १९।।

(समीक्षकदेखिये! ऐसे झूठ कपट से आशीर्वाद ले के पश्चात् सिद्ध और पैगम्बर बनते हैं क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? और ऐसे ईसाइयों के अगुआ हुए हैं पुनः इनके मत की गड़बड़ में क्या न्यूनता हो? ।।३०।।

३१-और यअकूब बिहान को तड़के उठा और उस पत्थर को जिसे उसने अपना तकिया किया था खम्भा खड़ा किया और उस पर तेल डाला।। और उस स्थान का नाम बैतएल रक्खा।। और यह पत्थर जो मैंने खम्भा खड़ा किया ईश्वर का घर होगा।। -तौन उत्प० पर्व० २८। आ० १८। १९। २२।।

(समीक्षकअब देखिये जंगलियों के काम। इन्होंने पत्थर पूजे और पुजवाये और इसको मुसलमान लोग ‘बैतएलमुकद्दस’ कहते हैं। क्या यही पत्थर ईश्वर का घर और उसी पत्थरमात्र में ईश्वर रहता था? वाह-वाह जी! क्या कहना है ईसाई लोगो! महाबुत्परस्त तो तुम्हीं हो।।३१।।

३२-और ईश्वर ने राहेल को स्मरण किया और ईश्वर ने उसकी सुनी और उसकी कोख को खोला।। और वह गर्भिणी हुई और बेटा जनी और बोली कि ईश्वर ने मेरी निन्दा दूर किई।। -तौन उत्प० पर्व० ३०। आ० २२। २३।।

(समीक्षकवाह ईसाइयों के ईश्वर! क्या बड़ा डाक्तर है! स्त्रियों की कोख खोलने को कौन से शस्त्र वा औषध थे जिनसे खोली, ये सब बातें अन्धाधुन्ध की हैं।।३२।।

३३-परन्तु ईश्वर अरामी लावन कने स्वप्न में रात को आया और उसे कहा कि चौकस रह तू यअकूब को भला बुरा मत कहना।। क्योंकि तू अपने पिता के घर का निपट अभिलाषी है तूने किसलिये मेरे देवों को चुराया है।।

-तौन उत्प० पर्व० ३१। आ० २४। ३०।।

(समीक्षकयह हम नमूना लिखते हैं, हजारों मनुष्यों को स्वप्न में आया, बातें किईं, जागृत साक्षात् मिला, खाया, पिया, आया, गया आदि बाइबल में लिखा है परन्तु अब न जाने वह है वा नहीं? क्योंकि अब किसी को स्वप्न वा जागृत में भी ईश्वर नहीं मिलता और यह भी विदित हुआ कि ये जंगली लोग पाषाणादि मूर्तियों को देव मानकर पूजते थे परन्तु ईसाइयों का ईश्वर भी पत्थर ही को देव मानता है, नहीं तो देवों का चुराना कैसे घटे? ।।३३।।

३४-और यअकूब अपने मार्ग चला गया और ईश्वर के दूत उसे आ मिले।। और यअकूब ने उन्हें देख के कहा कि यह ईश्वर की सेना है।। -तौनउत्पन पर्व० ३२। आ० १। २।।

(समीक्षकअब ईसाइयों का ईश्वर मनुष्य होने में कुछ भी सन्दिग्ध नहीं रहा, क्योंकि सेना भी रखता है। जब सेना हुई तब शस्त्र भी होंगे और जहाँ तहाँ चढ़ाई करके लड़ाई भी करता होगा, नहीं तो सेना रखने का क्या प्रयोजन है? ।।३४।।

३५-और यअकूब अकेला रह गया और वहां पौ फटे लों एक जन उससे मल्लयुद्ध करता रहा। और जब उसने देखा कि वह उस पर प्रबल न हुआ तो उसकी जांघ को भीतर से छूआ। तब यअकूब के जांघ की नस उसके संग मल्लयुद्ध करने में चढ़ गई।। तब वह बोला कि मुझे जाने दे क्योंकि पौ फटती है और वह बोला मैं तुझे जाने न देऊंगा जब लों तू मुझे आशीष न देवे।। तब उसने उससे कहा कि तेरा नाम क्या ? और वह बोला कि यअकूब।। तब उसने कहा कि तेरा नाम आगे को यअकूब न होगा परन्तु इसराएल, क्योंकि तूने ईश्वर के आगे और मनुष्यों के आगे राजा की नाईं मल्लयुद्ध किया और जीता।। तब यअकूब ने यह कहिके उससे पूछा कि अपना नाम बताइये और वह बोला कि तू मेरा नाम क्यों पूछता है और उसने उसे वहां आशीष दिया।। और यअकूब ने उस स्थान का नाम फनूएल रक्खा क्योंकि मैंने ईश्वर को प्रत्यक्ष देखा और मेरा प्राण बचा है।। और जब वह फनूएल से पार चला तो सूर्य की ज्योति उस पर पड़ी और वह अपनी जाँघ से लँगड़ाता था।। इसलिये इसरायल के वंश उस जांघ की नस को जो चढ़ गई थी आज लों नहीं खाते क्योंकि उसने यअकूब के जांघ की नस को जो चढ़ गई थी; छूआ था।।

-तौन उत्प० पर्व० ३२। आ० २४। २५। २६। २७। २८। २९। ३०। ३१। ३२।।

(समीक्षकजब ईसाइयों का ईश्वर अखाड़मल्ल है तभी तो सरः और राखल पर पुत्र होने की कृपा की। भला यह कभी ईश्वर हो सकता है? अब देखो लीला! कि एक जना नाम पूछे तो दूसरा अपना नाम ही न बतावे? और ईश्वर ने उसकी नाड़ी को चढ़ा तो दी और जीत गया परन्तु जो डाक्टर होता तो जांघ

की नाड़ी को अच्छी भी करता। और ऐसे ईश्वर की भक्ति से जैसा कि यअकूब लंगड़ाता रहा तो अन्य भक्त भी लंगड़ाते होंगे। जब ईश्वर को प्रत्यक्ष देखा और मल्लयुद्ध किया यह बात विना शरीर वाले के कैसे हो सकती है? यह केवल लड़कपन की लीला है।।३५।।

३६-ईश्वर का मुंह देखा।। -तौनउत्पन पर्व० ३३। आ० १०।।

(समीक्षकजब ईश्वर के मुंह है और भी सब अवयव होंगे और वह जन्म मरण वाला भी होगा।।३६।।

३७-और यहूदाह का पहिलौठा एर परमेश्वर की दृष्टि में दुष्ट था सो परमेश्वर ने उसे मार डाला। तब यहूदाह ने ओनान को कहा कि अपने भाई की पत्नी पास जा और उससे ब्याह कर अपने भाई के लिए वंश चला।। और ओनान ने जाना कि यह वंश मेरा न होगा और यों हुआ कि जब वह अपने भाई की पत्नी पास गया तो वीर्य्य को भूमि पर गिरा दिया।। और उसका वह कार्य्य परमेश्वर की दृष्टि में बुरा था इसलिये उसने उसे भी मार डाला।।

-तौनउत्पन पर्व० ३८। आ० ७। ८। ९। १०।।

(समीक्षकअब देख लीजिये! ये मनुष्यों के काम हैं कि ईश्वर के? जब उसके साथ नियोग हुआ तो उसको क्यों मार डाला? उसकी बुद्धि शुद्ध क्यों न कर दी? और वेदोक्त नियोग भी प्रथम सर्वत्र चलता था। यह निश्चय हुआ कि नियोग की बातें सब देशों में चलती थीं।।३७।।

तौरेत यात्र की पुस्तक

३८-जब मूसा सयाना हुआ और अपने भाइयों में से एक इबरानी को देखा कि मिस्री उसे मार रहा है।। तब उसने इधर-उधर दृष्टि किई देखा कि कोई नहीं तब उसने उस मिस्री को मार डाला और बालू में उसे छिपा दिया।। जब वह दूसरे दिन बाहर गया तो देखा, दो इबरानी आपस में झगड़ रहे हैं तब उसने उस अंधेरी को कहा कि तू अपने परोसी को क्यों मारता है।। तब उसने कहा कि किसने तुझे हम पर अध्यक्ष अथवा न्यायी ठहराया, क्या तू चाहता है कि जिस रीति से मिस्री को मार डाला मुझे भी मार डाले।। तब मूसा डरा औेर भाग निकला।।

-तौन या० प० २। आ० ११। १२। १३। १४। १५।।

(समीक्षकअब देखिये! जो बाइबल का मुख्य सिद्धकर्त्ता मत का आचार्य मूसा कि जिसका चरित्र क्रोधादि दुर्गुणों से युक्त, मनुष्य की हत्या करने वाला और चोरवत् राजदण्ड से बचनेहारा अर्थात् जब बात को छिपाता था तो झूठ बोलने वाला भी अवश्य होगा, ऐसे को भी जो ईश्वर मिला वह पैगम्बर बना उसने यहूदी आदि का मत चलाया वह भी मूसा ही के सदृश हुआ। इसलिये ईसाइयों के जो मूल पुरुषा हुए हैं वे सब मूसा से आदि लेकर के जंगली अवस्था में थे, विद्यावस्था में नहीं, इत्यादि।।३८।।

३९-जब परमेश्वर ने देखा कि वह देखने को एक अलंग फिरा तो ईश्वर ने झाड़ी के मध्य में से उसे पुकार के कहा कि हे मूसा हे मूसा! तब वह बोला मैं यहां हूं।। तब उसने कहा कि इधर पास मत आ, अपने पाओं से जूता उतार, क्योंकि यह स्थान जिस पर तू खड़ा है; पवित्र भूमि है।

-तौन या० पु० प० ३। आ० ४। ५।।

(समीक्षकदेखिये! ऐसे मनुष्य जो कि मनुष्य को मार के बालू में गाड़ने वाले से इनके ईश्वर की मित्रता और उसको पैगम्बर मानते हैं। और देखो जब तुम्हारे ईश्वर ने मूसा से कहा कि पवित्र स्थान में जूती न ले जानी चाहिए। तुम ईसाई इस आज्ञा के विरुद्ध क्यों चलते हो? ।।

(प्रश्नहम जूती के स्थान में टोपी उतार लेते हैं।

(उत्तरयह दूसरा अपराध तुमने किया क्योंकि टोपी उतारना न ईश्वर ने कहा न तुम्हारे पुस्तक में लिखा है। और उतारने योग्य को नहीं उतारते, जो नहीं उतारना चाहिये उसको उतारते हो, दोनों प्रकार तुम्हारे पुस्तक से विरुद्ध हैं।

(प्रश्नहमारे यूरोप देश में शीत अधिक है इसलिये हम लोग जूती नहीं उतारते।

(उत्तरक्या शिर में शीत नहीं लगता? जो यही है तो यूरोप देश में जाओ तब ऐसा ही करना। परन्तु जब हमारे घर में वा बिछौने में आया करो तब तो जूती उतार दिया करो और जो न उतारोगे तो तुम अपने बाइबल पुस्तक के विरुद्ध चलते हो; ऐसा तुम को न करना चाहिये।।३९।।

४०-तब ईश्वर ने उसे कहा कि तेरे हाथ में यह क्या है और वह बोला कि छड़ी।। तब उसने कहा कि उसे भूमि पर डाल दे और उसने भूमि पर डाल दिया और वह सर्प्प बन गई और मूसा उसके आगे से भागा।। तब परमेश्वर ने मूसा से कहा कि अपना हाथ बढ़ा और उसकी पूंछ पकड़ ले, तब उसने अपना हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ लिया और वह उसके हाथ में छड़ी हो गई।। तब परमेश्वर ने उसे कहा कि फिर तू अपना हाथ अपनी गोद में कर और उसने अपना हाथ अपनी गोद में किया जब उसने उसे निकाला तो देखा कि उसका हाथ हिम के समान कोढ़ी था।। और उसने कहा कि अपना हाथ फिर अपनी गोद में कर। उसने फिर अपने हाथ को अपनी गोद में किया और अपनी गोद से उसे निकाला तो देखा कि जैसी उसकी सारी देह थी वह वैसा फिर हो गया।। तू नील नदी का जल लेके सूखी पर ढालियो और वह जल जो तू नदी से निकालेगा सो सूखी पर लोहू हो जायेगा।। -तौन या० प० ४। आ० २। ३। ४। ६। ७। ९।।

(समीक्षकअब देखिये! कैसे बाजीगर का खेल, खिलाड़ी ईश्वर, उसका सेवक मूसा और इन बातों को मानने हारे कैसे हैं? क्या आजकल बाजीगर लोग इससे कम करामात करते हैं? यह ईश्वर क्या, यह तो बड़ा खिलाड़ी है। इन बातों को विद्वान् क्यों कर मानेंगे? और हर एक बार मैं परमेश्वर हूं और अबिरहाम, इजहाक और याकूब का ईश्वर हूं इत्यादि हर एक से अपने मुख से प्रशंसा करता फिरता है, यह बात उत्तम जन की नहीं हो सकती किन्तु दम्भी मनुष्य की हो सकती है।।४०।।

४१-और फसह मेम्ना मारो।। और एक मूठी जूफा लेओ और उसे उस लोहू में जो बासन में है बोर के, ऊपर की चौखट के और द्वार की दोनों ओर उससे छापो और तुम में से कोई बिहान लों अपने घर के द्वार से बाहर न जावे।। क्योंकि परमेश्वर मिस्र के मारने के लिये आर-पार जायेगा और जब वह ऊपर की चौखट पर और द्वार की दोनों ओर लोहू को देखे तब परमेश्वर द्वार से बीत जायेगा और नाशक तुम्हारे घरों में जाने न देगा कि मारे।। -तौन या० प० १२। आ० २१। २२। २३।।

(समीक्षकभला यह जो टोने टामन करने वाले के समान है वह ईश्वर सर्वज्ञ कभी हो सकता है? जब लोहू का छापा देखे तभी इसरायल कुल का घर जाने, अन्यथा नहीं। यह काम क्षुद्र बुद्धि वाले मनुष्य के सदृश है। इससे यह विदित होता है कि ये बातें किसी जंगली मनुष्य की लिखी हैं।।४१।।

४२-और यों हुआ कि परमेश्वर ने आधी रात को मिस्र के देश में सारे पहिलौठे जो फिरऊन के पहिलौठे से लेके जो अपने सिहासन पर बैठता था उस बन्धुआ के पहिलौठे लों जो बन्दीगृह में था पशुन के पहिलौठों समेत नाश किये। और रात को फिरऊन उठा, वह और उसके सब सेवक और सारे मिस्री उठे और मिस्र में बड़ा विलाप था क्योंकि कोई घर न रहा जिस में एक न मरा।। -तौन या० प० १२। आ० २९। ३०।।

(समीक्षकवाह! अच्छा आधी रात को डाकू के समान निर्दयी होकर ईसाइयों के ईश्वर ने लड़के बाले, वृद्ध और पशु तक भी विना अपराध मार दिये और कुछ भी दया न आई और मिस्र में बड़ा विलाप होता रहा तो भी ईसाइयों के ईश्वर के चित्त से निष्ठुरता नष्ट न हुई! ऐसा काम ईश्वर का तो क्या किन्तु किसी साधारण मनुष्य के भी करने का नहीं है। यह आश्चर्य नहीं, क्योंकि लिखा है ‘मांसाहारिणः कुतो दया’ जब ईसाइयों का ईश्वर मांसाहारी है तो उसको दया करने से क्या काम है? ।।४२।।

४३-परमेश्वर तुम्हारे लिये युद्ध करेगा।। इसराएल के सन्तान से कह कि वे आगे बढें़।। परन्तु तू अपनी छड़ी उठा और समुद्र पर अपना हाथ बढ़ा और उसे दो भाग कर और इसराएल के सन्तान समुद्र के बीचों बीच से सूखी भूमि में होकर चले जायेंगे।। -तौन या० प० १४। आ० १४। १५। १६।।

(समीक्षकक्यों जी! आगे तो ईश्वर भेड़ों के पीछे गड़रिये के समान इस्रायेल कुल के पीछे-पीछे डोला करता था। अब न जाने कहां अन्तर्धान हो गया? नहीं तो समुद्र के बीच में से चारों ओर की रेलगाड़ियों की सड़क बनवा लेते जिससे सब संसार का उपकार होता और नाव आदि बनाने का श्रम छूट जाता। परन्तु क्या किया जाय, ईसाइयों का ईश्वर न जाने कहाँ छिप रहा है? इत्यादि बहुत सी मूसा के साथ असम्भव लीला बाइबल के ईश्वर ने की हैं परन्तु यह विदित हुआ कि जैसा ईसाइयों का ईश्वर है वैसे ही उसके सेवक और ऐसी ही उसकी बनाई पुस्तक है। ऐसी पुस्तक और ऐसा ईश्वर हम लोगों से दूर रहै तभी अच्छा है।।४३।।

४४-क्योंकि मैं परमेश्वर तेरा ईश्वर ज्वलित सर्वशक्तिमान् हूं। पितरों के अपराध का दण्ड उनके पुत्रें को जो मेरा वैर रखते हैं उनकी तीसरी और चौथी पीढ़ी लों देवैया हूं।। -तौन या० प० २०। आ० ५।।

(समीक्षकभला यह किस घर का न्याय है कि जो पिता के अपराध से चार पीढ़ी तक दण्ड देना अच्छा समझना। क्या अच्छे पिता के दुष्ट और दुष्ट के अच्छे सन्तान नहीं होते? जो ऐसा है तो चौथी पीढ़ी तक दण्ड कैसे दे सकेगा? और जो पांचवीं पीढ़ी से आगे दुष्ट होगा उसको दण्ड न दे सकेगा। विना अपराध किसी को दण्ड देना अन्यायकारी की बात है।।४४।।

४५-विश्राम के दिन को उसे पवित्र रखने के लिये स्मरण कर।। छः दिन लों तू परिश्रम कर।। परन्तु सातवां दिन परमेश्वर तेरे ईश्वर का विश्राम है।। परमेश्वर ने विश्राम दिन को आशीष दिई।। -तौन या० प० २०। आ० ८। ९। १०। ११।।

(समीक्षकक्या रविवार एक ही पवित्र और छः दिन अपवित्र हैं? और क्या परमेश्वर ने छः दिन तक कड़ा परिश्रम किया था कि जिससे थक के सातवें दिन सो गया? और जो रविवार को आशीर्वाद दिया तो सोमवार आदि छः दिन को क्या दिया? अर्थात् शाप दिया होगा। ऐसा काम विद्वान् का भी नहीं तो ईश्वर का क्यों कर हो सकता है? भला रविवार में क्या गुण और सोमवार आदि ने क्या दोष किया था कि जिससे एक को पवित्र तथा वर दिया और अन्यों को ऐसे ही अपवित्र कर दिये।।४५।।

४६-अपने परोसी पर झूठी साक्षी मत दे।। अपने परोसी की स्त्री और उसके दास उसकी दासी और उसके बैल और उसके गदहे और किसी वस्तु का जो तेरे परोसी की है; लालच मत कर।। -तौन या० प० २०। आ० १६। १७।।

(समीक्षकवाह! तभी तो ईसाई लोग परदेशियों के माल पर ऐसे झुकते हैं कि जानो प्यासा जल पर, भूखा अन्न पर। जैसी यह केवल मतलब सिन्धु और पक्षपात की बात है ऐसा ही ईसाइयों का ईश्वर अवश्य होगा। यदि कोई कहे कि हम सब मनुष्य मात्र को परोसी मानते हैं तो सिवाय मनुष्य के अन्य कौन स्त्री और दासी आदि वाले हैं कि जिनको अपरोसी गिनें? इसलिये ये बातें स्वार्थी मनुष्यों की हैं; ईश्वर की नहीं।।४६।।

४७-जो कोई किसी मनुष्य को मारे और वह मर जाये वह निश्चय घात किया जाय।। और वह मनुष्य घात में न लगा हो परन्तु ईश्वर ने उसके हाथ में सौंप दिया हो तब मैं तुझे भागने का स्थान बता दूँगा।।

-तौन या० प० २१। आ० १२। १३।।

(समीक्षकजो यह ईश्वर का न्याय सच्चा है तो मूसा एक आदमी को मार गाड़ कर भाग गया था उसको यह दण्ड क्यों न हुआ? जो कहो ईश्वर ने मूसा को मारने के निमित्त सौंपा था तो ईश्वर पक्षपाती हुआ क्योंकि उस मूसा का राजा से न्याय क्यों न होने दिया? ।।४७।।

४८-और कुशल का बलिदान बैलों से परमेश्वर के लिए चढ़ाया।। और मूसा ने आधा लोहू लेके पात्रें में रक्खा और आधा लोहू वेदी पर छिड़का।। और मूसा ने उस लोहू को लेके लोगों पर छिड़का और कहा कि यह लोहू उस नियम का है जिसे परमेश्वर ने इन बातों के कारण तुम्हारे साथ किया है।। और परमेश्वर ने मूसा से कहा कि पहाड़ पर मुझ पास आ और वहां रह और मैं तुझे पत्थर की पटियां और व्यवस्था और आज्ञा मैने लिखी है; दूंगा।।

-तौन या० प० २२। आ० ५। ६। ८। १२।।

(समीक्षकअब देखिये! ये सब जंगली लोगों की बातें हैं वा नहीं? और परमेश्वर बैलों का बलिदान लेता और वेदी पर लोहू छिड़कना यह कैसी जंगलीपन और असभ्यता की बात है? जब ईसाइयों का खुदा भी बैलों का बलिदान लेवे तो उसके भक्त बैल गाय के बलिदान की प्रसादी से पेट क्यों न भरें? और जगत् की हानि क्यों न करें? ऐसी-ऐसी बुरी बातें बाइबल में भरी हैं। इसी के कुसंस्कारों से वेदों में भी ऐसा झूठा दोष लगाना चाहते हैं परन्तु वेदों में ऐसी बातों का नाम भी नहीं। और यह भी निश्चय हुआ कि ईसाइयों का ईश्वर एक पहाड़ी मनुष्य था, पहाड़ पर रहता था। जब वह खुदा स्याही, लेखनी, कागज, नहीं बना जानता और न उसको प्राप्त था इसीलिये पत्थर की पटियों पर लिख-लिख देता था और इन्हीं जंगलियों के सामने ईश्वर भी बन बैठा था।।४८।।

४९-और बोला कि तू मेरा रूप नहीं देख सकता क्योंकि मुझे देख के कोई मनुष्य न जीयेगा।। और परमेश्वर ने कहा कि देख एक स्थान मेरे पास है और तू उस टीले पर खड़ा रह।। और यों होगा कि जब मेरा विभव चल निकलेगा तो मैं तुझे पहाड़ के दरार में रक्खूँगा और जब लों जा निकलूं तुझे अपने हाथ से ढांपूंगा।। और अपना हाथ उठा लूंगा और तू मेरा पीछा देखेगा परन्तु मेरा रूप दिखाई न देगा।। -तौन या० प० ३३। आ० २०। २१। २२। २३।।

(समीक्षकअब देखिये! ईसाइयों का ईश्वर केवल मनुष्यवत् शरीर- धारी और मूसा से कैसा प्रपञ्च रच के आप स्वयम् ईश्वर बन गया। जो पीछा देखेगा, रूप न देखेगा तो हाथ से उसको ढांप दिया भी न होगा। जब खुदा ने अपने हाथ से मूसा को ढांपा होगा तब क्या उसके हाथ का रूप उसने न देखा होगा? ।।४९।।

लैव्य व्यवस्था की पुस्तक तौ०

५०-और परमेश्वर ने मूसा को बुलाया और मण्डली के तम्बू में से यह वचन उसे कहा।। कि इसराएल के सन्तानों से बोल और उन्हें कह यदि कोई तुम्में से परमेश्वर के लिये भेंट लावे तो तुम ढोर में से अर्थात् गाय बैल और भेड़ बकरी में से अपनी भेंट लाओ।। -तौन लैव्य व्यवस्था की पुस्तक, प० १। आ० १। २।।

(समीक्षकअब विचारिये! ईसाइयों का परमेश्वर गाय बैल आदि की भेंट लेने वाला जो कि अपने लिये बलिदान कराने के लिये उपदेश करता है। वह बैल गाय आदि पशुओं के लोहू मांस का प्यासा भूखा है वा नहीं? इसी से वह अहिसक और ईश्वर कोटि में गिना कभी नहीं जा सकता किन्तु मांसाहारी प्रपञ्ची मनुष्य के सदृश है।।५०।।

५१-और वह उस बैल को परमेश्वर के आगे बलि करे और हारून के बेटे याजक लोहू को निकट लावें और लोहू को यज्ञवेदी के चारों ओर जो मण्डली के तम्बू के द्वार पर है; छिड़कें।। तब वह उस भेंट के बलिदान की खाल निकाले और उसे टुकड़ा-टुकड़ा करे।। और हारून के बेटे याजक यज्ञवेदी पर आग रक्खें और उस पर लकड़ी चुनें।। और हारून के बेटे याजक उसके टुकड़ों को और सिर और चिकनाई को उन लकड़ियों पर जो यज्ञवेदी की आग पर हैं; विधि से धरें।। जिसतें बलिदान की भेंट होवे जो आग से परमेश्वर के सुगन्ध के लिये भेंट किया गया।। -तौन लै० व्यवस्था की पुस्तक, प० १। आ० ५। ६। ७। ८। ९।।

(समीक्षकतनिक विचारिये! कि बैल को परमेश्वर के आगे उसके भक्त मारें और वह मरवावे और लोहू को चारों ओर छिड़कें, अग्नि में होम करें, ईश्वर सुगन्ध लेवे, भला यह कसाई के घर से कुछ कमती लीला है? इसी से न बाइबल ईश्वरकृत और न वह जंगली मनुष्य के सदृश लीलाधारी ईश्वर हो सकता है।।५१।।

५२-फिर परमेश्वर मूसा से यह कह के बोला।। यदि वह अभिषेक किया हुआ याजक लोगों के पाप के समान पाप करे तो वह अपने पाप के कारण जो उसने किया है अपने पाप की भेंट के लिए निसखोट एक बछिया को परमेश्वर के लिये लावे।। और बछिया के शिर पर अपना हाथ रक्खे और बछिया को परमेश्वर के आगे बलि करे।। -तौन लै० व्य० प० ४। आ० १। ३। ४।।

(समीक्षकअब देखिये पापों के छुड़ाने के प्रायश्चित्त ! स्वयं पाप करें, गाय आदि उत्तम पशुओं की हत्या करें और परमेश्वर करवावे। धन्य हैं ईसाई लोग कि ऐसी बातों के करने करानेहारे को भी ईश्वर मान कर अपनी मुक्ति आदि की आशा करते हैं!!! ।।५२।।

५३-जब कोई अध्यक्ष पाप करे। तब वह बकरी का निसखोट नर मेम्ना अपनी भेंट के लिये लावे।। और उसे परमेश्वर के आगे बलि करे यह पाप की भेंट है।। -तौन लै० प० ४। आ० २२। २३। २४।।

(समीक्षकवाह जी? वाह? यदि ऐसा है तो इनके अध्यक्ष अर्थात् न्यायाधीश तथा सेनापति आदि पाप करने से क्यों डरते होंगे? आप तो यथेष्ट पाप करें और प्रायश्चित्त के बदले में गाय, बछिया, बकरे आदि के प्राण लेवें। तभी तो ईसाई लोग किसी पशु वा पक्षी के प्राण लेने में शंकित नहीं होते। सुनो ईसाई लोगो! अब तो इस जंगली मत को छोड़ के सुसभ्य धर्ममय वेदमत को स्वीकार करो कि जिससे तुम्हारा कल्याण हो।।५३।।

५४-और यदि उसे भेड़ लाने की पूंजी न हो तो वह अपने किये हुए अपराध के लिए दो पिंडुकियाँ और कपोत के दो बच्चे परमेश्वर के लिये लावे।। और उसका सिर उसके गले के पास से मरोड़ डाले परन्तु अलग न करे।। उसके किये हुए पाप का प्रायश्चित्त करे और उसके लिये क्षमा किया जायगा।। पर यदि उसे दो पिंडुकियाँ और कपोत के दो बच्चे लाने की पूंजी न हो तो सेर भर चोखा पिसान का दशवाँ हिस्सा पाप की भेंट के लिये लावे· उस पर तेल न डाले।। और वह क्षमा किया जायेगा।। -तौन लै० प० ५। आ० ७। ८। १०। ११। १३।।

(समीक्षकअब सुनिये! ईसाइयों में पाप करने से कोई धनाढ्य न डरता होगा और न दरिद्र भी, क्योंकि इनके ईश्वर ने पापों का प्रायश्चित्त करना सहज कर रक्खा है। एक यह बात ईसाइयों की बाइबल में बड़ी अद्भुत है कि विना कष्ट किये पाप से छूट जाय। क्योंकि एक तो पाप किया और दूसरे जीवों की हिसा की और खूब आनन्द से मांस खाया और पाप भी छूट गया। भला! कपोत के बच्चे का गला मरोड़ने से वह बहुत देर तक तड़फता होगा तब भी ईसाइयों को दया नहीं आती। दया क्योंकर आवे! इनके ईश्वर का उपदेश ही हिसा करने का है। और जब सब पापों का ऐसा प्रायश्चित्त है तो ईसा के विश्वास से पाप छूट जाता है यह बड़ा आडम्बर क्यों करते हैं।।५४।।

५५-सो उसी बलिदान की खाल उसी याजक की होगी जिसने उसे चढ़ाया।।

  • इस ईश्वर को धन्य है कि जिसने बछड़ा, भेड़ी और बकरी का बच्चा, कपोत और पिसान (आटे) तक लेने का नियम किया । अद्भुत बात तो यह है कि कपोत के बच्चे ‘‘गरदन मरोड़वा के’’ लेता था अर्थात् गर्दन तोड़ने का परिश्रम न करना पड़े । इन सब बातों के देखने से विदित होता है कि जंगलियों में कोई चतुर पुरुष था वह पहाड़ पर जा बैठा और अपने को ईश्वर प्रसिद्ध किया । जंगली अज्ञानी थे, उन्होंने उसी को ईश्वर स्वीकार कर लिया । अपनी युक्तियों से वह पहाड़ पर ही खाने के लिए पशु, पक्षी और अन्नादि मंगा लिया करता था और मौज करता था । उसके दूत फरिश्ते काम किया करते थे । सज्जन लोग विचारें कि कहां तो बाइबल में बछड़ा, भेड़ी, बकरी का बच्चा, कपोत और ‘‘अच्छे’’ पिसान का खाने वाला ईश्वर और कहां सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, अजन्मा, निराकार, सर्वशक्तिमान् और न्यायकारी इत्यादि उत्तम गुणयुक्त वेदोक्त ईश्वर ?

और समस्त भोजन की भेंट जो तन्दूर में पकाई जावें और सब जो कड़ाही में अथवा तवे पर सो उसी याजक की होगी।। -तौन लै० प० ७। आ० ८। ९।।

(समीक्षकहम जानते थे कि यहाँ देवी के भोपे और मन्दिरों के पुजारियों की पोपलीला विचित्र है परन्तु ईसाइयों के ईश्वर और उनके पुजारियों की पोपलीला इससे सहस्रगुणी बढ़कर है। क्योंकि चाम के दाम और भोजन के पदार्थ खाने को आवें फिर ईसाइयों के याजकों ने खूब मौज उड़ाई होगी? और अब भी उड़ाते होंगे। भला कोई मनुष्य एक लड़के को मरवावे और दूसरे लड़के को उसका मांस खिलावे ऐसा कभी हो सकता है? वैसे ही ईश्वर के सब मनुष्य और पशु, पक्षी आदि सब जीव पुत्रवत् हैं। परमेश्वर ऐसा काम कभी नहीं कर सकता। इसी से यह बाइबल ईश्वरकृत और इसमें लिखा ईश्वर और इसके मानने वाले धर्मज्ञ कभी नहीं हो सकते। ऐसे ही सब बातें लैव्य व्यवस्था आदि पुस्तकों में भरी हैं; कहाँ तक गिनावें।।५५।।

गिनती की पुस्तक

५६-सो गदही ने परमेश्वर के दूत को अपने हाथ में तलवार खींचे हुए मार्ग में खड़ा देखा तब गदही मार्ग से अलग खेत में फिर गई, उसे मार्ग में फिरने के लिये बलआम ने गदही को लाठी से मारा। तब परमेश्वर ने गदही का मुंह खोला और उसने बलआम से कहा कि मैंने तेरा क्या किया है कि तूने मुझे अब तीन बार मारा।। -तौन गि० प० २२। आ० २३। २८।।

(समीक्षकप्रथम तो गदहे तक ईश्वर के दूतों को देखते थे और आज कल बिशप पादरी आदि श्रेष्ठ वा अश्रेष्ठ मनुष्यों को भी खुदा वा उसके दूत नहीं दीखते हैं। क्या आजकल परमेश्वर और उसके दूत हैं वा नहीं? यदि हैं तो क्या बड़ी नींद में सोते हैं? वा रोगी अथवा अन्य भूगोल में चले गये? वा किसी अन्य धन्धे में लग गये? वा अब ईसाइयों से रुष्ट हो गये? अथवा मर गये? विदित नहीं होता कि क्या हुआ? अनुमान तो ऐसा होता है कि जो अब नहीं हैं, नहीं दीखते तो तब भी नहीं थे और न दीखते होंगे। किन्तु ये केवल मनमाने गपोड़े उड़ाये हैं।।५६।।

५७-सो अब लड़कों में से हर एक बेटे को और हर एक स्त्री को जो पुरुष से संयुक्त हुई हो प्राण से मारो।। परन्तु वे बेटियां जो पुरुष से संयुक्त नहीं हुई हैं उन्हें अपने लिये जीती रक्खो।। -तौन गिनती प० ३१। आ० १७। १८।।

(समीक्षकवाह जी ! मूसा पैगम्बर और तुम्हारा ईश्वर धन्य है कि जो स्त्री, बालक, वृद्ध और पशु की हत्या करने से भी अलग न रहे। और इससे स्पष्ट निश्चित होता है कि मूसा विषयी था। क्योंकि जो विषयी न होता तो अक्षतयोनि अर्थात् पुरुषों से समागम न की हुई कन्याओं को अपने लिये क्यों मंगवाता वा उनको ऐसी निर्दयी वा विषयीपन की आज्ञा क्यों देता? ।।५७।।

समुएल की दूसरी पुस्तक

५८-और उसी रात ऐसा हुआ कि परमेश्वर का वचन यह कह के नातन को पहुंचा।। कि जा और मेरे सेवक दाऊद से कह कि परमेश्वर यों कहता है कि क्या मेरे निवास के लिए तू एक घर बनवायेगा।। क्योंकि जब से इसराएल के सन्तान को मिस्र से निकाल लाया मैंने तो आज के दिन लों घर में वास न किया परन्तु तम्बू में और डेरे में फिरा किया।। -तौन समुएल की दूसरी पु० प० ७। आ० ४। ५। ६।।

(समीक्षकअब कुछ सन्देह न रहा कि ईसाइयों का ईश्वर मनुष्यवत् देहधारी नहीं है और उलहना देता है कि मैंने बहुत परिश्रम किया, इधर उधर डोलता फिरा, अब दाऊद घर बनादे तो उसमें आराम करूं। क्यों ईसाइयों को ऐसे ईश्वर और ऐसे पुस्तक को मानने में लज्जा नहीं आती? परन्तु क्या करें बिचारे फंस ही गये। अब निकलने के लिए बड़ा पुरुषार्थ करना उचित है।।५८।।

राजाओं की पुस्तक

५९-और बाबेल के राजा नबुखुदनजर के राज्य के उन्नीसवें बरस के पांचवें मास सातवीं तिथि में बाबुल के राजा का एक सेवक नबूसर अद्दान जो निज सेना का प्रधान अध्यक्ष था, यरूसलम में आया।। और उसने परमेश्वर का मन्दिर और राजा का भवन और यरूसलम के सारे घर और हर एक बड़े घर को जला दिया।। और कसदियों की सारी सेना ने जो उस निज सेना के अध्यक्ष के साथ थी यरूसलम की भीतों को चारों ओर से ढा दिया।।

-तौन रा० पु० २। प० २५। आ० ८। ९। १०।।

(समीक्षकक्या किया जाय? ईसाइयों के ईश्वर ने तो अपने आराम के लिये दाऊद आदि से घर बनवाया था। उसमें आराम करता होगा, परन्तु नबूसर अद्दान ने ईश्वर के घर को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और ईश्वर वा उसके दूतों की सेना कुछ भी न कर सकी। प्रथम तो इनका ईश्वर बड़ी-बड़ी लड़ाइयां मारता था और विजयी होता था परन्तु अब अपना घर जला तुड़वा बैठा। न जाने चुपचाप क्यों बैठा रहा? और न जाने उसके दूत किधर भाग गये? ऐसे समय पर कोई भी काम न आया और ईश्वर का पराक्रम भी न जाने कहाँ उड़ गया? यदि यह बात सच्ची हो तो जो जो विजय की बातें प्रथम लिखीं सो-सो सब व्यर्थ हो गईं। क्या मिस्र के लड़के लड़कियों के मारने में ही शूरवीर बना था? अब शूरवीरों के सामने चुपचाप हो बैठा? यह तो ईसाइयों के ईश्वर ने अपनी निन्दा और अप्रतिष्ठा करा ली। ऐसी ही हजारों इस पुस्तक में निकम्मी कहानियां भरी हैं।।५९।।

जबूर का दूसरा भाग

काल के समाचार की पहली पुस्तक

६०-सो परमेश्वर ने इसराएल पर मरी भेजी और इसराएल में से सत्तर सहस्र पुरुष गिर गये।। -जबूर २। काल० पु० प० २१। आ० १४।।

(समीक्षकअब देखिये इसराएल के ईसाइयों के ईश्वर की लीला! जिस इसराएल कुल को बहुत से वर दिये थे और रात दिन जिनके पालन में डोलता था अब झट क्रोधित होकर मरी डाल के सत्तर सहस्र मनुष्यों को मार डाला। जो यह किसी कवि ने लिखा है सत्य है कि-

क्षणे रुष्टः क्षणे तुष्टो रुष्टस्तुष्टः क्षणे क्षणे ।

अव्यवस्थितचित्तस्य प्रसादोऽपि भयंकरः ।।

जैसे कोई मनुष्य क्षण में प्रसन्न, क्षण में अप्रसन्न होता है, अर्थात् क्षण-क्षण

में प्रसन्न अप्रसन्न होवे उसकी प्रसन्नता भी भयदायक होती है वैसी लीला ईसाइयों के ईश्वर की है।।६०।।

ऐयूब की पुस्तक

६१-और एक दिन ऐसा हुआ कि परमेश्वर के आगे ईश्वर के पुत्र आ खड़े हुए और शैतान भी उनके मध्य में परमेश्वर के आगे आ खड़ा हुआ।। और परमेश्वर ने शैतान से कहा कि तू कहां से आता है? तब शैतान ने उत्तर दे के परमेश्वर से कहा कि पृथिवी पर घूमते और इधर उधर से फिरते चला आता हूं।। तब परमेश्वर ने शैतान से पूछा कि तूने मेरे दास ऐयूब को जांचा है कि उसके समान पृथिवी में कोई नहीं है वह सिद्ध और खरा जन ईश्वर से डरता और पाप से अलग रहता है और अब लों अपनी सच्चाई को धर रक्खा है और तूने मुझे उसे अकारण नाश करने को उभारा है।। तब शैतान ने उत्तर दे के परमेश्वर से कहा कि चाम के लिये चाम हां जो मनुष्य का है सो अपने प्राण के लिये देगा।। परन्तु अब अपना हाथ बढ़ा और उसके हाड़ मांस को छू तब वह निःसन्देह तुझे तेरे सामने त्यागेगा।। तब परमेश्वर ने शैतान से कहा कि देख वह तेरे हाथ में है, केवल उसके प्राण को बचा।। तब शैतान परमेश्वर के आगे से चला गया और ऐयूब को सिर से तलवे लों बुरे फोड़ों से मारा।।

-जबूर ऐयू० प० २। आ० १। २। ३। ४। ५। ६। ७।।

(समीक्षकअब देखिये ईसाइयों के ईश्वर का सामर्थ्य ! कि शैतान उसके सामने उसके भक्तों को दुःख देता है। न शैतान को दण्ड, न अपने भक्तों को बचा सकता है और न दूतों में से कोई उसका सामना कर सकता है। एक शैतान ने सब को भयभीत कर रक्खा है। और ईसाइयों का ईश्वर भी सर्वज्ञ नहीं है। जो सर्वज्ञ होता तो ऐयूब की परीक्षा शैतान से क्यों कराता? ।।६१।।

उपदेश की पुस्तक

६२-हां! अन्तःकरण ने बुद्धि और ज्ञान बहुत देखा है।। और मैंने बुद्धि और बौड़ाहपन और मूढ़ता जान्ने को मन लगाया। मैंने जान लिया कि यह भी मन का झंझट है।। क्योंकि अधिक बुद्धि में बड़ा शोक है और जो ज्ञान में बढ़ता है सो दुःख में बढ़ता है।। -जन उ० प० १। आ० १६। १७। १८।।

(समीक्षकअब देखिये ! जो बुद्धि और ज्ञान पर्यायवाची हैं उनको दो मानते हैं। और बुद्धि वृद्धि में शोक और दुःख मानना विना अविद्वानों के ऐसा लेख कौन कर सकता है? इसलिये यह बाइबल ईश्वर की बनाई तो क्या किसी विद्वान् की भी बनाई नहीं है।।६२।।

यह थोड़ा सा तौरेत जबूर के विषय में लिखा। इसके आगे कुछ मत्तीरचित आदि इञ्जील के विषय में लिखा जाता है कि जिसको ईसाई लोग बहुत प्रमाणभूत मानते हैं। जिसका नाम इञ्जील रक्खा है उसकी परीक्षा थोड़ी सी लिखते हैं कि यह कैसी है।

मत्ती रचित इञ्जील

६३-यीशु ख्रीष्ट का जन्म इस रीति से हुआ-उसकी माता मरियम की यूसफ से मंगनी हुई थी पर उनके इकट्ठे होने के पहिले ही वह देख पड़ी कि पवित्र आत्मा से गर्भवती है।। देखो परमेश्वर के एक दूत ने स्वप्न में उसे दर्शन दे कहा, हे दाऊद के सन्तान यूसफ ! तू अपनी स्त्री मरियम को यहां लाने से मत डर क्योंकि उसको जो गर्भ रहा है सो पवित्र आत्मा से है।।

-इं० प० १। आ० १८। २०।।

(समीक्षकइन बातों को कोई विद्वान् नहीं मान सकता कि जो प्रत्यक्षादि प्रमाण और सृष्टिक्रम से विरुद्ध हैं। इन बातों का मानना मूर्ख मनुष्य जंगलियों का काम है; सभ्य विद्वानों का नहीं। भला ! जो परमेश्वर का नियम है उसको कोई तोड़ सकता है? जो परमेश्वर भी नियम को उलटा पलटा करे तो उसकी आज्ञा को कोई न माने और वह भी सर्वज्ञ और निर्भ्रम न रहै। ऐसे तो जिस-जिस कुमारिका के गर्भ रह जाय तब सब कोई ऐसे कह सकते हैं कि इसमें गर्भ का रहना ईश्वर की ओर से है और झूठ मूठ कह दे कि परमेश्वर के दूत ने मुझ को स्वप्न में कह दिया है कि यह गर्भ परमात्मा की ओर से है। जैसा यह असम्भव प्रपञ्च रचा है वैसा ही सूर्य्य से कुन्ती का गर्भवती होना भी पुराणों में असम्भव लिखा है। ऐसी-ऐसी बातों को आंख के अन्धे और गांठ के पूरे लोग मान कर भ्रमजाल में गिरते हैं। यह ऐसी बात हुई होगी कि किसी पुरुष के साथ समागम होने से गर्भवती मरियम हुई होगी। उसने वा किसी दूसरे ने ऐसी असम्भव बात उड़ा दी होगी कि इस में गर्भ ईश्वर की ओर से है।।६३।।

६४-तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया कि शैतान से उसकी परीक्षा की जाय।। वह चालीस दिन और चालीस रात उपवास करके पीछे भूखा हुआ।। तब परीक्षा करनेहारे ने कहा कि जो तू ईश्वर का पुत्र है तो कह दे कि ये पत्थर रोटियां बन जावें।। -इं० मत्ती प० ४। आ० १। २। ३।।

(समीक्षकइससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ नहीं। क्योंकि जो सर्वज्ञ होता तो उसकी परीक्षा शैतान से क्यों कराता? स्वयं जान लेता। भला ! किसी ईसाई को आज कल चालीस रात चालीस दिन भूखा रक्खें तो कभी बच सकेगा? और इससे यह भी सिद्ध हुआ कि न वह ईश्वर का बेटा और न कुछ उसमें करामात अर्थात् सिद्धि थी। नहीं तो शैतान के सामने पत्थर की रोटियां क्यों न बना देता? और आप भूखा क्यों रहता? और सिद्धान्त यह है कि जो परमेश्वर ने पत्थर बनाये हैं उनको रोटी कोई भी नहीं बना सकता और ईश्वर भी पूर्वकृत नियम को उलटा नहीं कर सकता क्योंकि वह सर्वज्ञ और उसके सब काम बिना भूल चूक के हैं।।६४।।

६५-उसने उनसे कहा मेरे पीछे आओ मैं तुमको मनुष्यों के मछुवे बनाऊंगा।। वे तुरन्त जालों को छोड़ के उसके पीछे हो लिये। -इं० मत्ती प० ४। आ० १९। २०।।

(समीक्षकविदित होता है कि इसी पाप अर्थात् जो तौरेत में दश आज्ञाओं में लिखा है कि सन्तान लोग अपने माता पिता की सेवा और मान्य करें जिससे उनकी उमर बढ़े’ सो ईसा ने न अपने माता पिता की सेवा की और दूसरों को भी माता पिता की सेवा से छुड़ाये, इसी अपराध से चिरंजीवी न रहा। और यह भी विदित हुआ कि ईसा ने मनुष्यों के फंसाने के लिये एक मत चलाया है कि जाल में मच्छी के समान मनुष्यों को स्वमत जाल में फंसाकर अपना प्रयोजन साधें। जब ईसा ही ऐसा था तो आज कल के पादरी लोग अपने जाल में मनुष्यों को फंसावें तो क्या आश्चर्य है? क्योंकि जैसे बड़ी-बड़ी और बहुत मच्छियों को जाल में फंसाने वाले की प्रतिष्ठा और जीविका अच्छी होती है, ऐसे ही जो बहुतों को अपने मत में फंसा ले उसकी अधिक प्रतिष्ठा और जीविका होती है। इसी से ये लोग जिन्होंने वेद और शास्त्रें को न पढ़ा न सुना उन बिचारे भोले मनुष्यों को अपने जाल में फंसा के उस के मां बाप कुटुम्ब आदि से पृथक् कर देते हैं। इससे सब विद्वान् आर्यों को उचित है कि स्वयम् इनके भ्रमजाल से बच कर अन्य अपने भोले भाइयों को बचाने में तत्पर रहैं।।६५।।

६६-तब यीशु सारे गालील देश में उनकी सभाओं में उपदेश करता हुआ और राज्य का सुसमाचार प्रचार करता हुआ और लोगों में हर एक रोग और हर एक व्याधि को चंगा करता हुआ फिरा किया।। सब रोगियों को जो नाना प्रकार के रोगों और पीड़ाओं से दुःखी थे और भूतग्रस्तों और मृगी वाले अर्द्धांगियों को उसके पास लाये और उसने उन्हें चंगा किया।। -इं० मत्ती प० ४। आ० २३। २४।।

(समीक्षकजैसे आजकल पोपलीला निकालने मन्त्र पुरश्चरण आशीर्वाद ताबीज और भस्म की चुटुकी देने से भूतों को निकालना रोगों को छुड़ाना सच्चा हो तो वह इञ्जील की बात भी सच्ची होवे। इस कारण भोले मनुष्यों के भ्रम में फंसाने के लिये ये बातें हैं। जो ईसाई लोग ईसा की बातों को मानते हैं तो यहां के देवी भोपों की बातें क्यों नहीं मानते? क्योंकि वे बातें इन्हीं के सदृश हैं।।६६।।

६७-धन्य वे जो मन में दीन हैं क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है।। क्योंकि मैं तुमसे सच कहता हूँ कि जब लों आकाश और पृथिवी टल न जायें तब लों व्यवस्था से एक मात्र अथवा एक बिन्दु बिना पूरा हुए नहीं टलेगा।। इसलिये इन अति छोटी आज्ञाओं में से एक को लोप करे और लोगों को वैसे ही सिखावे वह स्वर्ग के राज्य में सब से छोटा कहावेगा।। -इं० मत्ती प० ५। आ० ३। १८। १९।।

(समीक्षकजो स्वर्ग एक है तो राजा भी एक होना चाहिये। इसलिये जितने दीन हैं वे सब स्वर्ग को जावेंगे तो स्वर्ग में राज्य का अधिकार किसको होगा। अर्थात् परस्पर लड़ाई-भिड़ाई करेंगे और राज्यव्यवस्था खण्ड-बण्ड हो जायेगी। और दीन के कहने से जो कंगले लोगे, तब तो ठीक नहीं। जो निरभिमानी लोगे तो भी ठीक नहीं; क्योंकि दीन और निर् अभिमान का एकार्थ नहीं। किन्तु जो मन में दीन होता है उसको सन्तोष कभी नहीं होता इसलिये यह बात ठीक नहीं। जब आकाश पृथिवी टल जायें तब व्यवस्था भी टल जायेगी ऐसी अनित्य व्यवस्था मनुष्यों की होती है; सर्वज्ञ ईश्वर की नहीं। और यह एक प्रलोभन और भयमात्र दिया है कि जो इन आज्ञाओं को न मानेगा वह स्वर्ग में सब से छोटा गिना जायेगा।।६७।।

६८-हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे।। अपने लिए पृथिवी पर धन का संचय मत करो।। -इं० म० प० ६। आ० ११। १९।।

(समीक्षकइससे विदित होता है कि जिस समय ईसा का जन्म हुआ है उस समय लोग जंगली और दरिद्र थे तथा ईसा भी वैसा ही दरिद्र था। इसी से तो दिन भर की रोटी की प्राप्ति के लिये ईश्वर की प्रार्थना करता और सिखलाता है। जब ऐसा है तो ईसाई लोग धन संचय क्यों करते हैं? उनको चाहिये कि ईसा के वचन से विरुद्ध न चल कर सब दान पुण्य करके दीन हो जायें।।६८।।

६९-हर एक जो मुझ से हे प्रभु हे प्रभु कहता है स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा।। -इं० म० प० ७। आ० २१।।

(समीक्षकअब विचारिये! बडे़-बड़े पादरी बिशप साहेब और कृश्चीन लोग जो यह ईसा का वचन सत्य है ऐसा समझें तो ईसा को प्रभु अर्थात् ईश्वर कभी न कहें। यदि इस बात को न मानेंगे तो पाप से कभी नहीं बच सकेंगे।।६९।।

७०-उस दिन में बहुतेरे मुझ से कहेंगे।। तब मैं उनसे खोल के कहूँगा मैंने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म्म करनेहारो! मुझ से दूर होओ।।

-इं० म० प० ७। आ० २२। २३।।

(समीक्षकदेखिये! ईसा जंगली मनुष्यों को विश्वास कराने के लिए स्वर्ग में न्यायाधीश बनना चाहता था। यह केवल भोले मनुष्यों को प्रलोभन देने की बात है।।७०।।

७१-और देखो एक कोढ़ी ने आ उसको प्रणाम कर कहा हे प्रभु ! जो आप चाहें तो मुझे शुद्ध कर सकते हैं।। यीशु ने हाथ बढ़ा उसे छूके कहा मैं तो चाहता हूँ शुद्ध हो जा और उसका कोढ़ तुरन्त शुद्ध हो गया।।

-इं० म० प० ८। आ० २। ३।।

(समीक्षकये सब बातें भोले मनुष्यों के फंसाने की हैं। क्योंकि जब ईसाई लोग इन विद्या सृष्टिक्रमविरुद्ध बातों को सत्य मानते हैं तो शुक्राचार्य्य, धन्वन्तरि, कश्यप आदि की बातें जो पुराण और भारत में अनेक दैत्यों की मरी हुई सेना को जिला दी। बृहस्पति के पुत्र कच को टुकड़ा-टुकड़ा कर जानवर मच्छियों को खिला दिया, फिर भी शुक्राचार्य्य ने जीता कर दिया। पश्चात् कच को मार कर शुक्राचार्य्य को खिला दिया फिर उसको पेट में जीता कर बाहर निकाला। आप मर गया उसको कच ने जीता किया। कश्यप ऋषि ने मनुष्यसहित वृक्ष को तक्षक से भस्म हुए पीछे पुनः वृक्ष और मनुष्य को जिला दिया। धन्वन्तरि ने लाखों मुर्दे जिलाये। लाखों कोढ़ी आदि रोगियों को चंगा किया। लाखों अन्वमे और बहिरों को आंख और कान दिये इत्यादि कथा को मिथ्या क्यों कहते हैं? जो उक्त बातें मिथ्या हैं तो ईसा की बातें मिथ्या क्यों नहीं? जो दूसरे की बातों को मिथ्या और अपनी झूठी को सच्ची कहते हैं तो हठी क्यों नहीं। इसलिये ईसाइयों की बातें केवल हठ और लड़कों के समान हैं।।७१।।

७२-तब दो भूतग्रस्त मनुष्य कबरस्थान में से निकलते हुए उससे आ मिले। जो यहां लों अतिप्रचण्ड थे कि उस मार्ग से कोई नहीं जा सकता था।। और देखो उन्होंने चिल्ला के कहा हे यीशु ईश्वर पुत्र ! आपको हम से क्या काम, क्या आप समय के आगे हमें पीड़ा देने को यहां आये हैं।। सो भूतों ने उससे विनती कर कहा जो आप हमें निकालते हैं तो सूअरों के झुण्ड में पैठने दीजिये।। उसने उनसे कहा जाओ और वे निकल के सूअरों के झुण्ड में पैठे।। और देखो सूअरों का सारा झुण्ड कड़ाड़े पर से समुद्र में दौड़ गया और पानी में डूब मरा।।

-इं० म० प० ८। आ० २८। २९। ३१। ३२।।

(समीक्षकभला! यहां तनिक विचार करें तो ये बातें सब झूठी हैं, क्योंकि मरा हुआ मनुष्य कबरस्थान से कभी नहीं निकल सकता। वे किसी पर न जाते न संवाद करते हैं। ये सब बातें अज्ञानी लोगों की हैं। जो कि महा जंगली हैं वे

ऐसी बातों पर विश्वास लाते हैं। और उन सूअरों की हत्या कराई। सूअरवालों की हानि करने का पाप ईसा को हुआ होगा। और ईसाई लोग ईसा को पाप क्षमा और पवित्र करने वाला मानते हैं तो उन भूतों को पवित्र क्यों न कर सका? और सूअर वालों की हानि क्यों न भर दी? क्या आजकल के सुशिक्षित ईसाई अंग्रेज लोग इन गपोड़ों को भी मानते होंगे? यदि मानते हैं तो भ्रमजाल में पड़े हैं।।७२।।

७३-देखो ! लोग एक अर्धांगी को जो खटोले पर पड़ा था उस पास लाये और यीशु ने उनका विश्वास देख के उस अर्धांगी से कहा हे पुत्र ! ढाढस कर, तेरे पाप क्षमा किये गये हैं।। मैं धर्मियों को नहीं परन्तु पापियों को पश्चात्ताप के लिये बुलाने आया हूँ।। -इं० म० प० ९। आ० २। १३।।

(समीक्षकयह भी बात वैसी ही असम्भव है जैसी पूर्व लिख आये हैं और जो पाप क्षमा करने की बात है वह केवल भोले लोगों को प्रलोभन देकर फंसाना है। जैसे दूसरे के पिये मद्य, भांग अफीम खाये का नशा दूसरे को नहीं प्राप्त हो सकता वैसे ही किसी का किया हुआ पाप किसी के पास नहीं जाता किन्तु जो करता है वही भोगता है, यही ईश्वर का न्याय है। यदि दूसरे का किया पाप-पुण्य दूसरे को प्राप्त होवे अथवा न्यायावमीश स्वयं ले लेवें वा कर्त्ताओं ही को यथायोग्य फल ईश्वर न देवे तो वह अन्यायकारी हो जावे। देखो ! धर्म ही कल्याणकारक है; ईसा वा अन्य कोई नहीं। और धर्मात्माओं के लिये ईसा की कुछ आवश्यकता भी नहीं और न पापियों के लिये क्योंकि पाप किसी का नहीं छूट सकता।।७३।।

७४-यीशु ने अपने बारह शिष्यों को अपने पास बुला के उन्हें अशुद्ध भूतों पर अधिकार दिया कि उन्हें निकालें और हर एक रोग और हर एक व्याधि को चंगा करें।। बोलनेहारे तो तुम नहीं हो परन्तु तुम्हारे पिता का आत्मा तुम में बोलता है।। मत समझो कि मैं पृथिवी पर मिलाप करवाने को नहीं परन्तु खड्ग चलवाने आया हूँ।। मैं मनुष्य को उसके पिता से और बेटी को उसकी मां से और पतोहू को उसकी सास से अलग करने आया हूँ।। मनुष्य के घर ही के लोग उसके वैरी होंगे।। -इं० म० प० १०। आ० १। २०। ३४। ३५। ३६।।

(समीक्षकये वे ही शिष्य हैं जिन में से एक ३०) रुपये के लोभ पर ईसा को पकड़ावेगा और अन्य बदल कर अलग-अलग भागेंगे। भला ! ये बातें जब विद्या ही से विरुद्ध हैं कि भूतों का आना वा निकालना, विना ओषधि वा पथ्य के व्याधियों का छूटना सृष्टिक्रम से असम्भव है। इसलिए ऐसी-ऐसी बातों का मानना अज्ञानियों का काम है। यदि जीव बोलनेहारे नहीं, ईश्वर बोलनेहारा है तो जीव क्या काम करते हैं? और सत्य वा मिथ्याभाषण का फल सुख वा दुःख को ईश्वर ही भोगता होगा, यह भी एक मिथ्या बात है। और जैसा ईसा फूट कराने और लड़ाने को आया था वही आज कल कलह लोगों में चल रहा है। यह कैसी बड़ी बुरी बात है कि फूट कराने से सर्वथा मनुष्यों को दुःख होता है और ईसाइयों ने इसी को गुरुमन्त्र समझ लिया होगा। क्योंकि एक दूसरे की फूट ईसा ही अच्छी मानता था तो ये क्यों नहीं मानते होंगे? यह ईसा ही का काम होगा कि घर के लोगों के शत्रु घर के लोगों को बनाना, यह श्रेष्ठ पुरुष का काम नहीं।।७४।।

७५-तब यीशु ने उनसे कहा तुम्हारे पास कितनी रोटियां हैं। उन्होंने कहा सात और छोटी मछलियां।। तब उसने लोगों को भूमि पर बैठने की आज्ञा दी।। और उसने उन सात रोटियों को और मछलियों को धन्य मान के तोड़ा और अपने शिष्यों को दिया और शिष्यों ने लोगों को दिया।। सो सब खा के तृप्त हुए और जो टुकड़े बच रहे उनके सात टोकरे भरे उठाये।। जिन्होंने खाया सो स्त्रियों और बालकों को छोड़ चार सहस्र पुरुष थे।।

-इं० म० प० १५। आ० ३४। ३५। ३६। ३७। ३८।।

(समीक्षकअब देखिये ! क्या यह आजकल के झूठे सिद्धों इन्द्रजाली आदि के समान छल की बात नहीं है? उन रोटियों में अन्य रोटियां कहां से आ गईं? यदि ईसा में ऐसी सिद्धियां होतीं तो आप भूखा हुआ गूलर के फल खाने को क्यों भटका करता था? अपने लिये मिट्टी पानी और पत्थर आदि से मोहनभोग, रोटियां क्यों न बना लीं? ये सब बातें लड़कों के खेलपन की हैं। जैसे कितने ही साधु वैरागी ऐसे छल की बातें करके भोले मनुष्यों को ठगते हैं वैसे ही ये भी हैं।।७५।।

७६-और तब वह हर एक मनुष्य को उसके कार्य्य के अनुसार फल देगा।। -इं० म० प० १६। आ० २७।।

(समीक्षकजब कर्मानुसार फल दिया जायेगा तो ईसाइयों का पाप क्षमा होने का उपदेश करना व्यर्थ है और वह सच्चा हो तो यह झूठा होवे। यदि कोई कहे कि क्षमा करने के योग्य क्षमा किये जाते और क्षमा न करने के योग्य क्षमा नहीं किये जाते हैं यह भी ठीक नहीं। क्योंकि सब कर्मों के फल यथायोग्य देने ही से न्याय और पूरी दया होती है।।७६।।

७७-हे अविश्वासी और हठीले लोगो।। मैं तुमसे सत्य कहता हूँ यदि तुमको राई के एक दाने के तुल्य विश्वास होय तो तुम इस पहाड़ से जो कहोगे कि यहाँ से वहां चला जा, वह जायेगा और कोई काम तुम से असाध्य नहीं होगा।।

-इं० म० प० १७। आ० १७। २०।।

(समीक्षकअब जो ईसाई लोग उपदेश करते फिरते हैं कि ‘आओ हमारे मत में क्षमा कराओ मुक्ति पाओ’ आदि, वह सब मिथ्या है। क्योंकि जो ईसा में पाप छुड़ाने विश्वास जमाने और पवित्र करने का सामर्थ्य होता तो अपने शिष्यों के आत्माओं को निष्पाप, विश्वासी, पवित्र क्यों न कर देता? जो ईसा के साथ-साथ घूमते थे जब उन्हीं को शुद्ध, विश्वासी और कल्याण न कर सका तो वह मरे पर न जाने कहां है? इस समय किसी को पवित्र नहीं कर सकेगा। जब ईसा के चेले राई भर विश्वास से रहित थे और उन्हीं ने यह इञ्जील पुस्तक बनाई है तब इसका प्रमाण नहीं हो सकता। क्योंकि जो अविश्वासी, अपवित्रत्मा, अधर्मी मनुष्यों का लेख होता है उस पर विश्वास करना कल्याण की इच्छा करने वाले मनुष्य का काम नहीं। और इसी से यह भी सिद्ध हो सकता है कि जो ईसा का यह वचन सच्चा है तो किसी ईसाई में एक राई के दाने के समान विश्वास अर्थात् ईमान नहीं है जो कोई कहे कि हम में पूरा वा थोड़ा विश्वास है तो उससे कहना कि आप इस पहाड़ को मार्ग में से हटा देवें। यदि उनके हटाने से हट जाये तो भी पूरा विश्वास नहीं किन्तु एक राई के दाने के बराबर है और जो न हटा सके तो समझो एक छींटा भी विश्वास, ईमान अर्थात् धर्म का ईसाइयों में नहीं है। यदि कोई कहे कि यहां अभिमान आदि दोषों का नाम पहाड़ है तो भी ठीक नहीं, क्योंकि जो ऐसा हो तो मुर्दे, अन्धे, कोढ़ी, भूतग्रस्तों को चंगा करना भी आलसी, अज्ञानी, विषयी और भ्रान्तों को बोध करके सचेत कुशल किया होगा। जो ऐसा मानें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि जो ऐसा होता तो स्वशिष्यों को ऐसा क्यों न कर सकता? इसलिए असम्भव बात कहना ईसा की अज्ञानता का प्रकाश करता है। भला ! जो कुछ भी ईसा में विद्या होती तो ऐसी अटाटूट जंगलीपन की बात क्यों कह देता? तथापि यत्र देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते।’ जिस देश में कोई भी वृक्ष न हो तो उस देश में एरण्ड का वृक्ष ही सब से बड़ा और अच्छा गिना जाता है वैसे महाजंगली देश में ईसा का भी होना ठीक था। पर आजकल ईसा की क्या गणना हो सकती है।।७७।।

७८-मैं तुम्हें सच कहता हूँ जो तुम मन न फिराओ और बालकों के समान न हो जाओ तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने न पाओगे।।

-इं० म० प० १८। आ० ३।।

(समीक्षकजब अपनी ही इच्छा से मन का फिराना स्वर्ग का कारण और न फिराना नरक का कारण है तो कोई किसी का पाप पुण्य कभी नहीं ले सकता ऐसा सिद्ध होता है। और बालक के समान होने के लेख से विदित होता है कि ईसा की बातें विद्या और सृष्टिक्रम से बहुत सी विरुद्ध थीं। और यह भी उसके मन में था कि लोग मेरी बातों को बालक के समान मान लें। पूछें गाछें कुछ भी नहीं, आंख मीच के मान लेवें। बहुत से ईसाइयों की बालबुद्धिवत् चेष्टा है। नहीं तो ऐसी युक्ति, विद्या से विरुद्ध बातें क्यों मानते? और यह भी सिद्ध हुआ जो ईसा आप विद्याहीन बालबुद्धि न होता तो अन्य को बालवत् बनने का उपदेश क्यों करता? क्योंकि जो जैसा होता है वह दूसरे को भी अपने सदृश बनाना चाहता ही है।।७८।।

७९-मैं तुम से सच कहता हूँ, धनवान् को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना कठिन होगा।। फिर भी मैं तुम से कहता हूं कि ईश्वर के राज्य में धनवान् के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से जाना सहज है।।

-इं० म० प० १९। आ० २३। २४।।

(समीक्षकइससे यह सिद्ध होता है कि ईसा दरिद्र था। धनवान् लोग उस की प्रतिष्ठा नहीं करते होंगे, इसलिये यह लिखा होगा। परन्तु यह बात सच नहीं क्योंकि धनाढ्यों और दरिद्रों में अच्छे बुरे होते हैं। जो कोई अच्छा काम करे वह अच्छा और बुरा करे वह बुरा फल पाता है। और इससे यह भी सिद्ध होता है कि ईसा ईश्वर का राज्य किसी एक देश में मानता था; सर्वत्र नहीं। जब ऐसा हो तो वह ईश्वर ही नहीं, जो ईश्वर है उसका राज्य सर्वत्र है। पुनः उसमें प्रवेश करेगा वा न करेगा यह कहना केवल अविद्या की बात है। और इससे यह भी आया कि जितने ईसाई धनाढ्य हैं क्या वे सब नरक ही में जायेंगे? और दरिद्र सब स्वर्ग में जायेंगे? भला तनिक सा विचार तो ईसामसीह करते कि जितनी सामग्री धनाढ्यों के पास होती है उतनी दरिद्रों के पास नहीं। यदि धनाढ्य लोग विवेक से धर्ममार्ग में व्यय करें तो दरिद्र नीच गति में पड़े रहें और धनाढ्य उत्तम गति को प्राप्त हो सकते हैं।।७९।।

८०-यीशु ने उनसे कहा मैं तुम से सच कहता हूँ कि नई सृष्टि में जब

मनुष्य का पुत्र अपने ऐश्वर्य के सिहासन पर बैठेगा तब तुम भी जो मेरे पीछे हो लिये हो; बारह सिहासनों पर बैठ के इस्राएल के बारह कुलों का न्याय करोगे।। जिस किसी ने मेरे नाम के लिये घरों वा भाइयों वा बहिनों वा पिता वा माता वा स्त्री वा लड़कों वा भूमि को त्यागा है सो सौ गुणा पावेगा और अनन्त जीवन का अधिकारी होगा।। -इं० म० प० १९। आ० २८। २९।।

(समीक्षकअब देखिये ईसा के भीतर की लीला! मेरे जाल से मरे पीछे भी लोग न निकल जायें और जिसने ३०) रुपये के लोभ से अपने गुरु को पकड़ा, मरवाया वैसे पापी भी इसके पास सिहासन पर बैठेंगे और इस्राएल के कुल का पक्षपात से न्याय ही न किया जायेगा किन्तु उनके सब गुनाह माफ और अन्य कुलों का न्याय करेंगे। अनुमान होता है इसी से ईसाई लोग ईसाइयों का बहुत पक्षपात कर किसी गोरे ने काले को मार दिया हो तो भी बहुधा पक्षपात से निरपराधी कर छोड़ देते हैं। ऐसा ही ईसा के स्वर्ग का भी न्याय होगा और इससे बड़ा दोष आता है क्योंकि एक सृष्टि की आदि में मरा और एक ‘कयामत’ की रात के निकट मरा। एक तो आदि से अन्त तक आशा ही में पड़ा रहा कि कब न्याय होगा ? और दूसरे का उसी समय न्याय हो गया। यह कितना बड़ा अन्याय है और जो नरक में जायगा सो अनन्त काल तक नरक भोगे और जो स्वर्ग में जायेगा वह सदा स्वर्ग भोगेगा यह भी बड़ा अन्याय है। क्योंकि अन्त वाले साधन और कर्मों का फल भी अन्त वाला होना चाहिये। और तुल्य पाप व पुण्य दो जीवों का भी नहीं हो सकता। इसीलिये तारतम्य से अधिक न्यून सुख दुःख वाले अनेक स्वर्ग और नरक हों तभी सुख दुःख भोग सकते हैं। सो ईसाइयों के पुस्तक में कहीं व्यवस्था नहीं। इसलिये यह पुस्तक ईश्वरकृत वा ईसा ईश्वर का बेटा कभी नहीं हो सकता। यह बड़े अनर्थ की बात है कि कदापि किसी के मां बाप सौ सौ नहीं हो सकते किन्तु एक की एक मां और एक ही बाप होता है। अनुमान है कि मुसलमानों ने एक को ७२ स्त्रियाँ बहिश्त में मिलती हैं; लिखा है।।८०।।

८१-भोर को जब वह नगर को फिर जाता था तब उसको भूख लगी।। और मार्ग में एक गूलर का वृक्ष देख के वह उस के पास आया परन्तु उस में और कुछ न पाया केवल पत्ते। और उसको कहा तुझ में फिर कभी फल न लगेंगे। इस पर गूलर का पेड़ तुरन्त सूख गया।। -इं० म० प० २१। आ० १८। १९।।

(समीक्षकसब पादरी लोग ईसाई कहते हैं कि वह बड़ा शान्त क्षमान्वित और क्रोधादि दोषरहित था। परन्तु इस बात को देख क्रोधी, ऋतु का ज्ञानरहित ईसा था और वह जंगली मनुष्यपन के स्वभावयुक्त वर्त्तता था। भला जो वृक्ष जड़ पदार्थ है। उसका क्या अपराध था कि उसको शाप दिया और वह सूख गया। उसके शाप से तो न सूखा होगा किन्तु कोई ऐसी औषधि डालने से सूख गया हो तो आश्चर्य नहीं।।८१।।

८२-उन दिनों के क्लेश के पीछे तुरन्त सूर्य अन्धियारा हो जायगा और चांद अपनी ज्योति न देगा! तारे आकाश से गिर पङेंगे और आकाश की सेना डिग जायेगी।। -इं० म० प० २४। आ० २९।।

(समीक्षकवाह जी ईसा! तारों को किस विद्या से गिर पड़ना आपने जाना और आकाश की सेना कौन सी है जो डिग जायेगी? जो कभी ईसा थोड़ी

भी विद्या पढ़ता तो अवश्य जान लेता कि ये तारे सब भूगोल हैं क्योंकर गिरेंगे। इससे विदित होता है कि ईसा बढ़ई के कुल में उत्पन्न हुआ था। सदा लकड़े चीरना, छीलना, काटना और जोड़ना करता रहा होगा। जब तरंग उठी कि मैं भी इस जंगली देश में पैगम्बर हो सकूंगा; बातें करने लगा। कितनी बातें उस के मुख से अच्छी भी निकलीं और बहुत सी बुरी। वहां के लोग जंगली थे; मान बैठे। जैसा आज कल यूरोप देश उन्नति युक्त है वैसा पूर्व होता तो ईसा की सिद्धाई कुछ भी न चलती। अब कुछ विद्या हुए पश्चात् भी व्यवहार के पेच और हठ से इस पोल मत को न छोड़ कर सर्वथा सत्य वेदमार्ग की ओर नहीं झुकते; यही इनमें न्यूनता है।।८२।।

८३-आकाश और पृथिवी टल जायेंगे परन्तु मेरी बातें कभी न टलेंगी।।

-इं० म० प० २४। आ० ३५।।

(समीक्षकयह भी बात अविद्या और मूर्खता की है। भला ! आकाश हिल कर कहाँ जायगा? जब आकाश अति सूक्ष्म होने से नेत्र से दीखता ही नहीं तो इसका हिलना कौन देख सकता है? और अपने मुख से अपनी बड़ाई करना अच्छे मनुष्यों का काम नहीं।।८३।।

८४-तब वह उनसे जो बाईं ओर हैं कहेगा हे स्रापित लोगो ! मेरे पास से उस अनन्त आग में जाओ जो शैतान और उसके दूतों के लिये तैयार की गई है।। -इं० म० प० २५। आ० ४१।।

(समीक्षकभला यह कितनी बड़ी पक्षपात की बात है! जो अपने शिष्य हैं उनको स्वर्ग और जो दूसरे हैं उनको अनन्त आग में गिराना। परन्तु जब आकाश ही न रहेगा लिखा तो अनन्त आग नरक बहिश्त कहाँ रहेगी? जो शैतान और उसके दूतों को ईश्वर न बनाता तो इतनी नरक की तैयारी क्यों करनी पड़ती? और एक शैतान ही ईश्वर के भय से न डरा तो वह ईश्वर ही क्या है? क्योंकि उसी का दूत होकर बागी हो गया और ईश्वर उसको प्रथम ही पकड़ कर बन्दीगृह में न डाल सका, न मार सका, पुनः उसकी ईश्वरता क्या? जिसने ईसा को भी चालीस दिन दुःख दिया। ईसा भी उसका कुछ न कर सका तो ईश्वर का बेटा होना व्यर्थ हुआ। इसलिये ईसा ईश्वर का न बेटा और न बाइबल का ईश्वर, ईश्वर हो सकता है।।८४।।

८५-तब बारह शिष्यों में से एक यिहूदा इस्करियोती नाम एक शिष्य प्रधान याजकों के पास गया।। और कहा जो मैं यीशु को आप लोगों के हाथ पकड़वाऊं तो आप लोग मुझे क्या देंगे ? उन्होंने उसे तीस रुपये देने को ठहराया।। -इं० म० प० २६।। आ० १४। १५।।

(समीक्षकअब देखिये! ईसा की सब करामात और ईश्वरता यहां खुल गई। क्योंकि जो उसका प्रधान शिष्य था वह भी उसके साक्षात् संग से पवित्रत्मा न हुआ तो औरों को वह मरे पीछे पवित्रत्मा क्या कर सकेगा ? और उसके विश्वासी लोग उसके भरोसे में कितने ठगाये जाते हैं क्योंकि जिसने साक्षात् सम्बन्ध में शिष्य का कुछ कल्याण न किया वह मरे पीछे किसी का कल्याण क्या कर सकेगा।।८५।।

८६-जब वे खाते थे तब यीशु ने रोटी लेके धन्यवाद किया और उसे तोड़ के शिष्यों को दिया और कहा लेओ खाओ यह मेरा देह है।। और उसने कटोरा ले के धन्य माना और उनको देके कहा तुम इससे पीओ।। क्योंकि यह मेरा लोहू

अर्थात् नये नियम का लोहू है।। -इं० म० प० २६। आ० २६। २७। २८।।

(समीक्षकभला यह ऐसी बात कोई भी सभ्य करेगा? विना अविद्वान् जंगली मनुष्य के, शिष्यों से खाने की चीज को अपने मांस और पीने की चीजों को लोहू नहीं कह सकता। और इसी बात को आजकल के ईसाई लोग प्रभु-भोजन कहते हैं अर्थात् खाने पीने की चीजों में ईसा के मांस और लोहू की भावना कर खाते पीते हैं; यह कितनी बुरी बात है? जिन्होंने अपने गुरु के मांस लोहू को भी खाने पीने की भावना से न छोड़ा तो और को कैसे छोड़ सकते हैं? ।।८६।।

८७-और वह पितर को और जबदी के दोनों पुत्रें को अपने संग ले गया और शोक करने और बहुत उदास होने लगा।। तब उसने उनसे कहा, मेरा मन यहां लों अति उदास है कि मैं मरने पर हूँ।। और थोड़ा आगे बढ़ के वह मुंह के बल गिरा और प्रार्थना की, हे मेरे पिता ! जो हो सके तो यह कटोरा मेरे पास से टल जाय।। -इं० म० प० २६। आ० ३७। ३८। ३९।।

(समीक्षकदेखो ! जो वह केवल मनुष्य न होता, ईश्वर का बेटा और त्रिकालदर्शी और विद्वान् होता तो ऐसी अयोग्य चेष्टा न करता। इससे स्पष्ट विदित होता है कि यह प्रपञ्च ईसा ने अथवा उसके चेलों ने झूठमूठ बनाया है कि ईश्वर का बेटा भूत भविष्यत् का वेत्ता और पाप क्षमा का कर्त्ता है। इससे समझना चाहिये यह केवल साधारण सूधा सच्चा अविद्वान् था, न विद्वान्, न योगी, न सिद्ध था।।८७।।

८८-वह बोलता ही था कि देखो यिहूदा जो बाहर शिष्यों में से एक था; आ पहुंचा। और लोगों के प्रधान याजकों और प्राचीनों की ओर से बहुत लोग खड्ग और लाठियां लिये उसके संग।। यीशु के पकड़वानेहारे ने उन्हें यह पता दिया था जिसको मैं चूमूं उसको पकड़ो।। और वह तुरन्त यीशु पास आ बोला, हे गुरु ! प्रणाम और उसको चूमा।। तब उन्होंने यीशु पर हाथ डाल के उसे पकड़ा।। तब सब शिष्य उसे छोड़ के भागे।। अन्त में दो झूठ साक्षी आके बोले, इसने कहा कि मैं ईश्वर का मन्दिर ढहा सकता हूँ और तीन दिन में फिर बना सकता हूं।। तब महायाजक ने खड़ा हो यीशु से कहा तू कुछ उत्तर नहीं देता है ये लोग तेरे विरुद्ध क्या साक्षी देते हैं।। परन्तु यीशु चुप रहा इस पर महायाजक ने उससे कहा मैं तुझे जीवते ईश्वर की क्रिया देता हूँ। हम से कह तू ईश्वर का पुत्र ख्रीष्ट है कि नहीं।। यीशु उससे बोला तू तो कह चुका।। तब महायाजक ने अपने वस्त्र फाड़ के कहा यह ईश्वर की निन्दा कर चुका है अब हमें साक्षियों का और क्या प्रयोजन? देखो तुमने अभी उसके मुख से ईश्वर की निन्दा सुनी है।। तुम क्या विचार करते हो? तब उन्होंने उत्तर दिया वह वध के योग्य है।। तब उन्होंने उसके मुंह पर थूंका और उसे घूंसे मारे। औरों ने थपेड़े मार के कहा-हे ख्रीष्ट ! हमसे भविष्यद्वाणी बोल किसने तुझे मारा।। पितर बाहर अंगने में बैठा था और एक दासी उसके पास आके बोली तू भी यीशु गालीली के संग था।। उसने सबों के सामने मुकर के कहा मैं नहीं जानता तू क्या कहती है।। जब वह बाहर डेवढ़ी में गया तो दूसरी दासी ने उसे देख के जो लोग वहां थे उनसे कहा यह भी यीशु नासरी के संग था।। उसने क्रिया खाके फिर मुकरा कि मैं उस मनुष्य को नहीं जानता हूँ।। तब वह धिक्कार देने और क्रिया खाने लगा कि मैं उस मनुष्य को नहीं जानता हूँ।।

-इं० म० प० २६। आ० ४७। ४८। ४९। ५०। ६१। ६२। ६३। ६४। ६५। ६६।

६७। ६८। ६९। ७०। ७१। ७२। ७४।।

(समीक्षकअब देख लीजिये कि जिसका इतना भी सामर्थ्य वा प्रताप नहीं था कि अपने चेले का भी दृढ़ विश्वास करा सके। और वे चेले चाहे प्राण भी क्यों न जाते तो भी अपने गुरु को लोभ से न पकड़ाते, न मुकरते, न मिथ्याभाषण करते, न झूठी क्रिया खाते। और ईसा भी कुछ करामाती नहीं था, जैसा तौरेत में लिखा है कि-लूत के घर पर पाहुनों को बहुत से मारने को चढ़ आये थे। वहां ईश्वर के दो दूत थे उन्होंने उन्हीं को अन्धा कर दिया। यद्यपि वह भी बात असम्भव है तथापि ईसा में तो इतना भी सामर्थ्य न था और आज कल कितना भड़वा उसके नाम पर ईसाइयों ने बढ़ा रक्खा है। भला ! ऐसी दुर्दशा से मरने से आप स्वयं जूझ वा समाधि चढ़ा अथवा किसी प्रकार से प्राण छोड़ता तो अच्छा था परन्तु वह बुद्धि विना विद्या के कहां से उपस्थित हो? वह ईसा यह भी कहता है कि-।।८८।।

८९-मैं अभी अपने पिता से विनती नहीं करता हूँ और वह मेरे पास स्वर्गदूतों की बारह सेनाओं से अधिक पहुँचा न देगा? -इं० म० प० २६। आ० ५३।।

(समीक्षकधमकाता जाता, अपनी और अपने पिता की बड़ाई भी करता जाता पर कुछ भी नहीं कर सकता। देखो आश्चर्य की बात ! जब महायाजक ने पूछा था कि ये लोग तेरे विरुद्ध साक्षी देते हैं इसका उत्तर दे तो ईसा चुप रहा। यह भी ईसा ने अच्छा न किया क्योंकि जो सच था वह वहां अवश्य कह देता तो भी अच्छा होता। ऐसी बहुत सी अपने घमण्ड की बातें करनी उचित न थीं और जिन्होंने ईसा पर झूठा दोष लगाकर मारा उनको भी उचित न था। क्योंकि ईसा का उस प्रकार का अपराध नहीं था जैसा उसके विषय में उन्होंने किया। परन्तु वे भी तो जंगली थे। न्याय की बातों को क्या समझें? यदि ईसा झूठ-मूठ ईश्वर का बेटा न बनता और वे उसके साथ ऐसी बुराई न वर्त्तते तो दोनों के लिये उत्तम काम था। परन्तु इतनी विद्या, धर्म्मात्मता और न्यायशीलता कहां से लावें? ।।८९।।

९०-यीशु अध्यक्ष के आगे खड़ा हुआ और अध्यक्ष ने उससे पूछा क्या तू यहूदियों का राजा है? यीशु ने उनसे कहा आप ही तो कहते हैं।। जब प्रधान याजक और प्राचीन लोग उस पर दोष लगाते थे तब उसने कुछ उत्तर नहीं दिया।। तब पिलात ने उससे कहा क्या तू नहीं सुनता कि ये लोग तेरे विरुद्ध कितनी साक्षी देते हैं।। परन्तु उसने एक बात का भी उसको उत्तर न दिया। यहां लों कि अध्यक्ष ने बहुत अचम्भा किया।। पिलात ने उनसे कहा तो मैं यीशु से जो ख्रीष्ट कहावता है क्या करूं।। सभों ने उससे कहा वह क्रूश पर चढ़ाया जावे।। और यीशु को कोड़े मार के क्रूश पर चढ़ाया जाने को सौंप दिया।। तब अध्यक्ष के योद्धाओं ने यीशु को भवन में ले जा के सारी पलटन उस पास इकट्ठी की।। और उन्होंने उसका वस्त्र उतार के उसे लाल बाना पहिराया।। और कांटों का मुकुट गूँथ के उसके शिर पर रक्खा और उसके दाहिने हाथ में नर्कट दिया।। और उसके आगे घुटने टेक के यह कह के उससे ठट्ठा किया हे यहूदियों के राजा प्रणाम।। और उन्होंने उस पर थूका और उस नर्कट को ले उसके शिर पर मारा।। जब वे उससे ठट्ठा कर चुके तब उससे वह बागा उतार के उसी का वस्त्र पहिरा के उसे क्रूश पर चढ़ाने को ले गये।। जब वे एक स्थान पर जो गलगथा था अर्थात् खोपड़ी का स्थान कहाता है; पहुँचे।। तब उन्होंने सिरके में पित्त मिला के उसे पीने को दिया परन्तु उसने चीख के पीना न चाहा।। तब उन्होंने उसको क्रूश पर चढ़ाया।। और उन्होंने

उसका दोषपत्र उसके शिर के ऊपर लगाया।। तब दो डाकू एक दाहिनी ओर और दूसरा बाईं ओर उसके संग क्रूशों पर चढ़ाये गये।। जो लोग उधर से आते जाते थे उन्होंने अपने शिर हिला के और यह कह के उसकी निन्दा की।। हे मन्दिर के ढहानेहारे अपने को बचा, जो तू ईश्वर का पुत्र है तो क्रूश पर से उतर आ।। इसी रीति से प्रधान याजकों ने भी अध्यापकों और प्राचीनों के संगियों ने ठट्ठा कर कहा।। उसने औरों को बचाया अपने को बचा नहीं सकता है, जो वह इस्राएल का राजा है तो क्रूश पर से अब उतर आवे और हम उसका विश्वास करेंगे।। वह ईश्वर पर भरोसा रखता है, यदि ईश्वर उसे चाहता है तो उसको बचावे क्योंकि उसने कहा मैं ईश्वर का पुत्र हूँ।। जो डाकू उसके संग चढ़ाये गये उन्होंने भी इसी रीति से उसकी निन्दा की।। दो प्रहर से तीसरे प्रहर लों सारे देश में अन्धकार हो गया।। तीसरे प्रहर के निकट यीशु ने बड़े शब्द से पुकार के कहा ‘एली एली लामा सबक्तनी’ अर्थात् हे मेरे ईश्वर! हे मेरे ईश्वर! तूने क्यों मुझे त्यागा है।। जो लोग वहां खडे़ थे उनमें से कितनों ने यह सुनके कहा, वह एलीयाह को बुलाता है।। उनमें से एक ने तुरन्त दौड़ के इस्पंज लेके सिरके में भिगोया और नल पर रख के उसे पीने को दिया।। तब यीशु ने फिर बडे़ शब्द से पुकार के प्राण त्यागा।। -इं० म० प० २७। आ० ११। १२। १३। १४। २२। २३। २४। २६। २७। २८।२९। ३०।

३१। ३३। ३४। ३५। ३७। ३८। ३८। ३९। ४०। ४१। ४२। ४३। ४४। ४५। ४६। ४७। ४८। ५०।।

(समीक्षकसर्वथा यीशु के साथ उन दुष्टों ने बुरा काम किया। परन्तु यीशु का भी दोष है। क्योंकि ईश्वर का न कोई पुत्र न वह किसी का बाप है। क्योंकि वह किसी का बाप होवे तो किसी का श्वसुर, श्याला सम्बन्धी आदि भी होवे। और जब अध्यक्ष ने पूछा था तब जैसा सच था; उत्तर देना था। और यह ठीक है कि जो-जो आश्चर्य-कर्म्म प्रथम किये हुए सच्चे होते तो अब भी क्रूश पर से उतर कर सब को अपने शिष्य बना लेता। और जो वह ईश्वर का पुत्र होता तो ईश्वर भी उसको बचा लेता। जो वह त्रिकालदर्शी होता तो सिर्के में पित्त मिले हुए को चीख के क्यों छोड़ता। वह पहले ही से जानता होता। और जो वह करामाती होता तो पुकार-पुकार के प्राण क्यों त्यागता? इससे जानना चाहिये कि चाहे कोई कितनी भी चतुराई करे परन्तु अन्त में सच-सच और झूठ-झूठ हो जाता है। इससे यह भी सिद्ध हुआ कि यीशु एक उस समय के जंगली मनुष्यों में से कुछ अच्छा था। न वह करामाती, न वह ईश्वर का पुत्र और न विद्वान् था। क्योंकि जो ऐसा होता तो ऐसा वह दुःख क्यों भोगता? ।।९०।।९१-और देखो, बड़ा भुईंडोल हुआ कि परमेश्वर का एक दूत उतरा और आ के कबर के द्वार पर से पत्थर लुढ़का के उस पर बैठा।। वह यहां नहीं है, जैसे उसने कहा वैसे जी उठा है।। जब वे उसके शिष्यों को सन्देश देने को जाती थीं, देखो यीशु उनसे आ मिला, कहा कल्याण हो और उन्होंने निकट आ, उसके पांव पकड़ के उसको प्रणाम किया।। तब यीशु ने कहा मत डरो, जाके मेरे भाइयों से कह दो वे गालील को जावें और वहां वे मुझे देखेंगे।। ग्यारह शिष्य गालील में उस पर्वत पर गये जो यीशु ने उन्हें बताया था।। और उन्होंने उसे देख के उसको प्रणाम किया पर कितनों का सन्देह हुआ।। यीशु ने उनके पास आ उनसे कहा, स्वर्ग में और पृथिवी पर समस्त अधिकार मुझको दिया गया है।। और देखो मैं जगत्

के अन्त लों सब दिन तुम्हारे संग हूँ।। -इं० म० प० २८। आ० २। ६। ९। १०। १६। १७। १८। २०।।

(समीक्षकयह बात भी मानने योग्य नहीं, क्योंकि सृष्टिक्रम और विद्याविरुद्ध है। प्रथम ईश्वर के पास दूतों का होना, उनको जहां-तहां भेजना, ऊपर से उतरना, क्या तहसीलदारी, कलेक्टरी के समान ईश्वर को बना दिया? क्या उसी शरीर से स्वर्ग को गया और जी उठा? क्योंकि उन स्त्रियों ने उसके पग पकड़ के प्रणाम किया तो क्या वही शरीर था? और वह तीन दिन लों सड़ क्यों न गया? और अपने मुख से सब का अधिकारी बनना केवल दम्भ की बात है। शिष्यों से मिलना और उनसे सब बातें करनी असम्भव हैं। क्योंकि जो ये बातें सच हों तो आजकल भी कोई क्यों नहीं जी उठते? और उसी शरीर से स्वर्ग को क्यों नहीं जाते? यह मत्तीरचित्त इञ्जील का विषय हो चुका। अब मार्करचित इञ्जील के विषय में लिखा जाता है।।९१।।

मार्क रचित इञ्जील

९२-यह क्या बढ़ई नहीं है। -इंनमार्क प० ६। आ० ३।।

(समीक्षकअसल में यूसफ बढ़ई था, इसलिये ईसा भी बढ़ई था। कितने ही वर्ष तक बढ़ई का काम करता था। पश्चात् पैगम्बर बनता-बनता ईश्वर का बेटा ही बन गया और जंगली लोगों ने बना लिया तभी बड़ी कारीगरी चलाई। काट कूट फूट फाट करना उसका काम है।।९२।।

लूका रचित इञ्जील

९३-यीशु ने उससे कहा तू मुझे उत्तम क्यों कहता है, कोई उत्तम नहीं है, केवल एक अर्थात् ईश्वर।। -इं० लू० प० १८। आ० १९।।

(समीक्षकजब ईसा ही एक अद्वितीय ईश्वर कहाता है तो ईसाइयों ने पवित्रत्मा पिता और पुत्र तीन कहां से बना लिये? ।।९३।।

९४-तब उसे हेरोद के पास भेजा।। हेरोद यीशु को देख के अति आनन्दित हुआ क्योंकि वह उसको बहुत दिनों से देखने चाहता था इसलिये कि उसके विषय में बहुत सी बातें सुनी थीं और उसका कुछ आश्चर्य कर्म्म देखने की उसको आशा हुई।। उसने उससे बहुत बातें पूछीं परन्तु उसने उसे कुछ उत्तर न दिया।।

-इं० लू० प० २३। आ० ७। ८। ९।।

(समीक्षकयह बात मत्तीरचित में नहीं है इसलिए ये साक्षी बिगड़ गये। क्योंकि साक्षी एक से होने चाहियें और जो ईसा चतुर और करामाती होता तो उत्तर देता और करामात भी दिखलाता। इससे विदित होता है कि ईसा में विद्या और करामात कुछ भी न थी।।९४।।

योहन रचित सुसमाचार

९५-आदि में वचन था और वचन ईश्वर के संग था और वचन ईश्वर था।। वह आदि में ईश्वर के संग था।। सब कुछ उसके द्वारा सृजा गया और जो सृजा गया है कुछ भी उस बिना नहीं सृजा गया। उसमें जीवन था और वह जीवन मनुष्यों का उजियाला था।। -यो०प० १। आ० १। २। ३। ४।।

(समीक्षकआदि में वचन विना वक्ता के नहीं हो सकता और जो वचन ईश्वर के संग था तो यह कहना व्यर्थ हुआ। और वचन ईश्वर कभी नहीं हो सकता क्योंकि जब वह आदि में ईश्वर के संग था तो पूर्व वचन वा ईश्वर था; यह नहीं घट सकता। वचन के द्वारा सृष्टि कभी नहीं हो सकती जब तक उसका कारण न हो। और वचन के विना भी चुपचाप रह कर कर्त्ता सृष्टि कर सकता है। जीवन किस में वा क्या था, इस वचन से जीव अनादि मानोगे, जो अनादि है तो आदम के नथुनों में श्वास फूंकना झूठा हुआ और क्या जीवन मनुष्यों ही का उजियाला है; पश्वादि का नहीं? ।।९५।।

९६-और बियारी के समय में जब शैतान शिमोन के पुत्र यिहूदा इस्करियोती के मन में उसे पकड़वाने का मत डाल चुका था।। -यो० प० १३। आ० २।।

(समीक्षकयह बात सच नहीं। क्योंकि जब कोई ईसाइयों से पूछेगा कि शैतान सब को बहकाता है तो शैतान को कौन बहकाता है? जो कहो शैतान आप से आप बहकता है तो मनुष्य भी आप से आप बहक सकते हैं पुनः शैतान का क्या काम? और यदि शैतान का बनाने और बहकाने वाला परमेश्वर है तो वही शैतान का शैतान ईसाइयों का ईश्वर ठहरा। परमेश्वर ही ने सब को उसके द्वारा बहकाया। भला ऐसे काम ईश्वर के हो सकते हैं? सच तो यही है कि यह पुस्तक ईसाइयों का और ईसा ईश्वर का बेटा जिन्होंने बनाये वे शैतान हों तो हों किन्तु न यह ईश्वरकृत पुस्तक, न इसमें कहा ईश्वर और न ईसा ईश्वर का बेटा हो सकता है।।९६।।

९७-तुम्हारा मन व्याकुल न होवे। ईश्वर पर विश्वास करो और मुझ पर विश्वास करो।। मेरे पिता के घर में बहुत से रहने के स्थान हैं। नहीं तो मैं तुम से कहता मैं तुम्हारे लिये स्थान तैयार करने जाता हूँ।। और जो मैं जाके तुम्हारे लिये स्थान तैयार करूं तो फिर आके तुम्हें अपने यहां ले जाऊंगा कि जहां मैं रहूं तहां तुम भी रहो।। यीशु ने उससे कहा मैं ही मार्ग और सत्य और जीवन हूँ। विना मेरे द्वारा से कोई पिता के पास नहीं पहुँचता है।। जो तुम मुझे जानते तो मेरे पिता को भी जानते।। -यो० प० १४। आ० १। २। ३। ६। ७।।

(समीक्षकअब देखिये ! ये ईसा के वचन क्या पोपलीला से कमती हैं? जो ऐसा प्रपंच न रचता तो उसके मत में कौन फंसता? क्या ईसा ने अपने पिता को ठेके में ले लिया है? और जो वह ईसा के वश्य है तो पराधीन होने से वह ईश्वर ही नहीं। क्योंकि ईश्वर किसी की सिफारिश नहीं सुनता। क्या ईसा के पहले कोई भी ईश्वर को नहीं प्राप्त हुआ होगा? ऐसा स्थान आदि का प्रलोभन देता और जो अपने मुख से आप मार्ग, सत्य और जीवन बनता है वह सब प्रकार से दम्भी कहाता है। इससे यह बात सत्य कभी नहीं हो सकती।।९७।।

९८-मैं तुमसे सच-सच कहता हूँ जो मुझ पर विश्वास करे। जो काम मैं करता हूँ उन्हें वह भी करेगा और इनसे बड़े काम करेगा।।

-यो० प० १४। आ० १२।।

(समीक्षकअब देखिये ! जो ईसाई लोग ईसा पर पूरा विश्वास रखते हैं वैसे ही मुर्दे जिलाने आदि का काम क्यों नहीं कर सकते? और जो विश्वास से भी आश्चर्य काम नहीं कर सकते तो ईसा ने भी आश्चर्य कर्म नहीं किये थे

ऐसा निश्चित जानना चाहिये। क्योंकि स्वयम् ईसा ही कहता है कि तुम भी आश्चर्य काम करोगे तो भी इस समय ईसाई एक भी नहीं कर सकता तो किसकी हिये की आंख फूट गई है वह ईसा को मुर्दे जिलाने आदि काम का कर्त्ता मान लेवे।।९८।।

९९-जो अद्वैत सत्य ईश्वर है।। -यो०प० १७। आ० ३।।

(समीक्षकजब अद्वैत एक ईश्वर है तो ईसाइयों का तीन कहना सर्वथा मिथ्या है।।९९।।

इसी प्रकार बहुत ठिकाने इञ्जील में अन्यथा बातें भरी हैं।

योहन के प्रकाशित वाक्य

अब योहन की अद्भुत बातें सुनो-

१००-और अपने-अपने शिर पर सोने के मुकुट दिये हुए थे।। और सात अग्निदीपक सिहासन के आगे जलते थे जो ईश्वर के सातों आत्मा हैं। और सिहासन के आगे कांच का समुद्र है और सिहासन के आस-पास चार प्राणी हैं जो आगे और पीछे नेत्रें से भरे हैं।। -यो० प्र० प० ४। आ० ४। ५। ६।।

(समीक्षकअब देखिये ! एक नगर के तुल्य ईसाइयों का स्वर्ग है। और इनका ईश्वर भी दीपक के समान अग्नि है और सोने का मुकुटादि आभूषण धारण करना और आगे पीछे नेत्रें का होना असम्भावित है। इन बातों को कौन मान सकता है? और वहां सिहादि चार पशु भी लिखे हैं।।१००।।

१०१-और मैंने सिहासन पर बैठने हारे के दाहिने हाथ में एक पुस्तक देखा जो भीतर और पीठ पर लिखा हुआ था और सात छापों से उस पर छाप दी हुई थी।। यह पुस्तक खोलने और उसकी छापें तोड़ने योग्य कौन है।। और न स्वर्ग में और न पृथिवी पर न पृथिवी के नीचे कोई वह पुस्तक खोल अथवा उसे देख सकता था।। और मैं बहुत रोने लगा इसलिए कि पुस्तक खोलने और पढ़ने अथवा उसे देखने योग्य कोई नहीं मिला।। -यो० प्र० पर्व० ५। आ० १। २। ३। ४।।

(समीक्षकअब देखिये ! ईसाइयों के स्वर्ग में सिहासनों और मनुष्यों का ठाठ और पुस्तक कई छापों से बंध किया हुआ जिसको खोलने आदि कर्म करने वाला स्वर्ग और पृथिवी पर कोई नहीं मिला। योहन का रोना और पश्चात् एक प्राचीन ने कहा कि वही ईसा खोलने वाला है। प्रयोजन यह है कि जिसका विवाह उसका गीत! देखो! ईसा ही के ऊपर सब माहात्म्य झुकाये जाते हैं परन्तु ये बातें केवल कथनमात्र हैं।।१०१।।

१०२-और मैंने दृष्टि की और देखो सिहासन के चारों प्राणियों के बीच में और प्राचीनों के बीच में एक मेम्ना जैसा बंध किया हुआ खड़ा है जिसके सात सींग और सात नेत्र हैं जो सारी पृथिवी में भेजे हुए ईश्वर के सातों आत्मा हैं।।

-यो० प्र० प० ५। आ० ६।।

(समीक्षकअब देखिये इस योहन के स्वप्न का मनोव्यापार ! उस स्वर्ग के बीच में सब ईसाई और चार पशु तथा ईसा भी है और कोई नहीं! यह बड़ी अद्भुत बात हुई कि यहां तो ईसा के दो नेत्र थे और सींग का नाम भी न था और स्वर्ग में जाके सात सींग और सात नेत्र वाला हुआ ! और वे सातों ईश्वर के आत्मा ईसा के सींग और नेत्र बन गए थे ! हाय ! ऐसी बातों को ईसाइयों

ने क्यों मान लिया? भला कुछ तो बुद्धि काम में लाते।।१०२।।

१०३-और जब उसने पुस्तक लिया तब चारों प्राणी और चौबीसों प्राचीन मेम्ने के आगे गिर पड़े और हर एक के पास वीणा थी और धूप से भरे हुए सोने के पियाले जो पवित्र लोगों की प्रार्थनाएं हैं।। -यो० प्र० प० ५। आ० ८।।

(समीक्षकभला जब ईसा स्वर्ग में न होगा तब ये बिचारे धूप, दीप, नैवेद्य, आर्ति आदि पूजा किसकी करते होंगे? और यहां प्रोटेस्टेंट ईसाई लोग बुत्परस्ती (मूर्तिपूजा) का खण्डन करते हैं और इनका स्वर्ग बुत्परस्ती का घर बन रहा है।।१०३।।

१०४-और जब मेम्ने ने छापों में से एक को खोला तब मैंने दृष्टि की चारों प्राणियों में से एक को जैसे मेघ गर्जने के शब्द को यह कहते हुए सुना कि आ और देख।। और मैंने दृष्टि की और देखो एक श्वेत घोड़ा है और जो उस पर बैठा है उस पास धनुष् है और उसे मुकुट दिया गया और वह जय करता हुआ और जय करने को निकला।। और जब उसने दूसरी छाप खोली।। दूसरा घोड़ा जो लाल था निकला उसको दिया गया कि पृथिवी पर से मेल उठा देवे।। और जब उसने तीसरी छाप खोली; देखो एक काला घोड़ा है।। और जब उसने चौथी छाप खोली।। और देखो एक पीला सा घोड़ा है और जो उस पर बैठा है उसका नाम मृत्यु है; इत्यादि।। -यो० प्र० प० ६। आ० १। २। ३। ४। ५। ७। ८।।

(समीक्षकअब देखिये यह पुराणों से भी अधिक मिथ्या लीला है वा नहीं? भला! पुस्तकों के बन्धनों के छापे के भीतर घोड़ा सवार क्योंकर रह सके होंगे? यह स्वप्ने का बरड़ाना जिन्होंने इसको भी सत्य माना है। उनमें अविद्या जितनी कहें उतनी ही थोड़ी है।।१०४।।

१०५-और वे बड़े शब्द से पुकारते थे कि हे स्वामी पवित्र और सत्य! कब लों तू न्याय नहीं करता है और पृथिवी के निवासियों से हमारे लोहू का पलटा नहीं लेता है।। और हर एक को उजला वस्त्र दिया गया और उनसे कहा गया कि जब लों तुम्हारे संगी दास भी और तुम्हारे भाई जो तुम्हारी नाईं बंध किये जाने पर हैं न पूरे हों तब लों और थोड़ी बेर विश्राम करो।। -यो० प्र० प० ६। आ० १०। ११।।

(समीक्षकजो कोई ईसाई होंगे वे दौड़े सुपुर्द होकर ऐसे न्याय कराने के लिये रोया करेंगे। जो वेदमार्ग का स्वीकार करेगा उसके न्याय होने में कुछ भी देर न होगी। ईसाइयों से पूछना चाहिये क्या ईश्वर की कचहरी आजकल बन्द है? और न्याय का काम भी नहीं होता? न्यायाधीश निकम्मे बैठे हैं? तो कुछ भी ठीक-ठीक उत्तर न दे सकेंगे। और ईश्वर को भी बहका कर और इनका ईश्वर बहक भी जाता है क्योंकि इनके कहने से झट इनके शत्रु से पलटा लेने लगता है। और दंशिले स्वभाव वाले हैं कि मरे पीछे स्ववैर लिया करते हैं, शान्ति कुछ भी नहीं। और जहां शान्ति नहीं वहां दुःख का क्या पारावार होगा।।१०५।।

१०६-और जैसे बड़ी बयार से हिलाए जाने पर गूलर के वृक्ष से उसके कच्चे गूलर झड़ते हैं, तैसे आकाश के तारे पृथिवी पर गिर पड़े।। और आकाश पत्र की नाईं जो लपेटा जाता है अलग हो गया।। -यो० प्र० प० ६। आ० १३। १४।।

(समीक्षकअब देखिये! योहन भविष्यद्वक्ता ने जब विद्या नहीं है तभी तो ऐसी अण्ड बण्ड कथा गाई। भला! तारे सब भूगोल हैं एक पृथिवी पर कैसे

गिर सकते हैं? और सूर्यादि का आकर्षण उनको इधर-उधर क्यों आने जाने देगा? और क्या आकाश को चटाई के समान समझता है? यह आकाश साकार पदार्थ नहीं है जिस को कोई लपेटे वा इकट्ठा कर सके। इसलिये योहन आदि सब जंगली मनुष्य थे। उनको इन बातों की क्या खबर? ।।१०६।।

१०७-मैंने उनकी संख्या सुनी, इस्राएल के सन्तानों के समस्त कुल में से एक लाख चवालीस सहस्र पर छाप दी गई।। यिहूदा के कुल में से बारह सहस्र पर छाप दी गई।। -यो० प्र० प० ७। आ० ४। ५।।

(समीक्षकक्या जो बाइबल में ईश्वर लिखा है वह इस्राएल आदि कुलों का स्वामी है वा सब संसार का? ऐसा न होता तो उन्हीं जंगलियों का साथ क्यों देता? और उन्हीं का सहाय करता था। दूसरे का नाम निशान भी नहीं लेता। इससे वह ईश्वर नहीं। और इस्राएल कुलादि के मनुष्यों पर छाप लगाना अल्पज्ञता अथवा योहन की मिथ्या कल्पना है।।१०७।।

१०८-इस कारण वे ईश्वर के सिहासन के आगे हैं और उसके मन्दिर में रात और दिन उसकी सेवा करते हैं।। -यो० प्र० प० ७। आ० १५।।

(समीक्षकक्या यह महाबुत्परस्ती नहीं है? अथवा उनका ईश्वर देह- धारी मनुष्य तुल्य एकदेशी नहीं है? और ईसाइयों का ईश्वर रात में सोता भी नहीं है । यदि सोता है तो रात में पूजा क्योंकर करते होंगे? तथा उसकी नींद भी उड़ जाती होगी और जो रात दिन जागता होगा तो विक्षिप्त वा अति रोगी होगा।।१०८।।

१०९-और दूसरा दूत आके वेदी के निकट खड़ा हुआ जिस पास सोने की धूपदानी थी और उसको बहुत धूप दिया गया।। और धूप का धुंआ पवित्र लोगों की प्रार्थनाओं के संग दूत के हाथ में से ईश्वर के आगे चढ़ गया।। और दूत ने वह धूपदानी लेके उसमें वेदी की आग भर के उसे पृथिवी पर डाला और शब्द और गर्जन और बिजलियाँ और भुईंडोल हुए।। -यो० प्र० प० ८। आ० ३। ४। ५।।

(समीक्षकअब देखिये ! स्वर्ग तक वेदी, धूप, दीप, नैवेद्य, तुरही के शब्द होते हैं, क्या वैरागियों के मन्दिर से ईसाइयों का स्वर्ग कम है? कुछ धूम- धाम अधिक ही है।।१०९।।

११०-पहिले दूत ने तुरही फूंकी और लोहू से मिले हुए ओले और आग हुए और वे पृथिवी पर डाले गये और पृथिवी की एक तिहाई जल गई।। -यो० प्र० प० ८। आ० ७।।

(समीक्षकवाह रे ईसाइयों के भविष्यद्वक्ता! ईश्वर, ईश्वर के दूत, तुरही का शब्द और प्रलय की लीला केवल लड़कों ही का खेल दीखता है।।११०।।

१११-और पांचवें दूत ने तुरही फूंकी और मैंने एक तारे को देखा जो स्वर्ग में से पृथिवी पर गिरा हुआ था और अथाह कुण्ड के कूप की कुंजी उसको दी गई।। और उसने अथाह कुण्ड का कूप खोला और कूप में से बड़ी भट्ठी के धुंए की नाईं धुंआ उठा।। और उस धुंए में से टिड्डियां पृथिवी पर निकल गईं और जैसा पृथिवी के बीछुओं को अधिकार होता है तैसा उन्हें अधिकार दिया गया।। और उनसे कहा गया कि उन मनुष्यों को जिनके माथे पर ईश्वर की छाप नहीं है।। पांच मास उन्हें पीड़ा दी जाय।। -यो० प्र० प० ९। आ० १। २। ३। ४। ५।।

(समीक्षकक्या तुरही का शब्द सुनकर तारे उन्हीं दूतों पर और उसी स्वर्ग में गिरे होंगे? यहां तो नहीं गिरे। भला वह कूप वा टिड्डियां भी प्रलय के लिये ईश्वर ने पाली होंगी और छाप को देख बांच भी लेती होंगी कि छाप वालों को मत काटो? यह केवल भोले मनुष्यों को डरा के ईसाई बना लेने का धोखा देना है कि जो तुम ईसाई न होगे तो तुमको टिड्डियां काटेंगी परन्तु ऐसी बातें विद्याहीन देश में चल सकती हैं आर्य्यावर्त्त में नहीं। क्या वह प्रलय की बात हो सकती है।।१११।।

११२-और घुड़चढ़ों की सेनाओं की संख्या बीस करोड़ थी।।

-यो० प्र० प० ९। आ० १६।।

(समीक्षकभला ! इतने घोड़े स्वर्ग में कहां ठहरते, कहां चरते और कहां रहते और कितनी लीद करते थे? और उसका दुर्गन्ध भी स्वर्ग में कितना हुआ होगा? बस ऐसे स्वर्ग, ऐसे ईश्वर और ऐसे मत के लिये हम सब आर्य्यों ने तिलाञ्जलि दे दी है। ऐसा बखेड़ा ईसाइयों के शिर पर से भी सर्वशक्तिमान् की कृपा से दूर हो जाय तो बहुत अच्छा हो।।११२।।

११३-और मैंने दूसरे पराक्रमी दूत को स्वर्ग से उतरते देखा जो मेघ को ओढ़े था और उसके सिर पर मेघधनुष् था और उसका मुंह सूर्य्य की नाईं और उसके पांव आग के खम्भों के ऐसे थे।। और उसने अपना दाहिना पांव समुद्र पर और बायां पृथिवी पर रक्खा।। -यो० प्र० प० १०। आ० १। २।।

(समीक्षकअब देखिये इन दूतों की कथा ! जो पुराणों वा भाटों की कथाओं से भी बढ़ कर है।।११३।।

११४-और लोगों के समान एक नर्कट मुझे दिया गया और कहा गया कि उठ! ईश्वर के मन्दिर को और वेदी को और उसमें के भजन करनेहारों को नाप।। -यो० प्र० प० ११। आ० १।।

(समीक्षकयहां तो क्या परन्तु ईसाइयों के तो स्वर्ग में भी मन्दिर बनाये और नापे जाते हैं। अच्छा है, उनका जैसा स्वर्ग वैसी ही बातें हैं। इसीलिए यहां प्रभुभोजन में ईसा के शरीरावयव मांस लोहू की भावना करके खाते पीते हैं और गिर्जा में भी क्रूश आदि का आकार बनाना आदि भी बुतपरस्ती है।।११४।।

११५-और स्वर्ग में ईश्वर का मन्दिर खोला गया और उसके नियम का सन्दूक उसके मन्दिर में दिखाई दिया।। -यो० प्र० प० ११। आ० १९।।

(समीक्षकस्वर्ग में जो मन्दिर है सो हर समय बन्द रहता होगा। कभी-कभी खोला जाता होगा। क्या परमेश्वर का भी कोई मन्दिर हो सकता है? जो वेदोक्त परमात्मा सर्वव्यापक है उसका कोई भी मन्दिर नहीं हो सकता। हां ! ईसाइयों का जो परमेश्वर आकारवाला है उसका चाहे स्वर्ग में हो चाहे भूमि में। और जैसी लीला टं टन् पूं पूं की यहां होती है वैसी ही ईसाइयों के स्वर्ग में भी। और नियम का सन्दूक भी कभी-कभी ईसाई लोग देखते होंगे। उससे न जाने क्या प्रयोजन सिद्ध करते होंगे? सच तो यह है कि ये सब बातें मनुष्यों को लुभाने की हैं।।११५।।

११६-और एक बड़ा आश्चर्य स्वर्ग में दिखाई दिया अर्थात् एक स्त्री जो सूर्य्य पहिने है और चांद उसके पांवों तले है और उसके सिर पर बारह तारों का मुकुट है।। और वह गर्भवती होके चिल्लाती है क्योंकि प्रसव की पीड़ा उसे लगी और वह जनने को पीड़ित है।। और दूसरा आश्चर्य स्वर्ग में दिखाई दिया और देखो एक बड़ा लाल अजगर है जिसके सात सिर और दस सींग हैं और उसके सिरों पर सात राजमुकुट हैं।। और उसकी पूंछ ने आकाश के तारों की एक तिहाई को खींच के उन्हें पृथिवी पर डाला।। -यो० प्र० प० १२। आ० १। २। ३। ४।।

(समीक्षकअब देखिये लम्बे चौड़े गपोड़े ! इनके स्वर्ग में भी विचारी स्त्री चिल्लाती है। उसका दुःख कोई नहीं सुनता, न मिटा सकता है। और उस अजगर की पूंछ कितनी बड़ी थी जिसने एक तिहाई तारों को पृथिवी पर डाला? भला! पृथिवी तो छोटी है और तारे भी बडे़-बड़े लोक हैं। इस पृथिवी पर एक भी नहीं समा सकता। किन्तु यहां यही अनुमान करना चाहिये कि ये तारों की तिहाई इस बात के लिखने वाले के घर पर गिरे होंगे और जिस अजगर की पूंछ इतनी बड़ी थी जिससे सब तारों की तिहाई लपेट कर भूमि पर गिरा दी वह अजगर भी उसी के घर में रहता होगा।।११६।।

११७-और स्वर्ग में युद्ध हुआ मीखायेल और उसके दूत अजगर से लडे़ और अजगर और उसके दूत लड़े।। -यो० प्र० प० १२। आ० ७।।

(समीक्षकजो कोई ईसाइयों के स्वर्ग में जाता होगा वह भी लड़ाई में दुःख पाता होगा। ऐसे स्वर्ग की यहीं से आशा छोड़ हाथ जोड़ बैठ रहो। जहां शान्तिभंग और उपद्रव मचा रहे वह ईसाइयों के योग्य है।।११७।।

११८-और वह बड़ा अजगर गिराया गया। हां ! वह प्राचीन सांप जो दियाबल और शैतान कहावता है जो सारे संसार का भरमानेहारा है।।

-यो० प्र० प० १२। आ० ९।।

(समीक्षकक्या जब वह शैतान स्वर्ग में था तब लोगों को नहीं भरमाता था? और उसको जन्म भर बन्दीगृह में घिरा अथवा मार क्यों न डाला? उसको पृथिवी पर क्यों डाल दिया? जो सब संसार का भरमाने वाला शैतान है तो शैतान को भरमाने वाला कौन है? यदि शैतान स्वयं भर्मा है तो शैतान के विना भरमनेहारे भर्मेंेगे और जो भरमानेहारा परमेश्वर है तो वह ईश्वर ही नहीं ठहरा। विदित तो यह होता है कि ईसाइयों का ईश्वर भी शैतान से डरता होगा क्योंकि जो शैतान से प्रबल है तो ईश्वर ने उसको अपराध करते समय ही दण्ड क्यों न दिया ? जगत् में शैतान का जितना राज है उसके सामने सहस्रांश भी ईसाइयों के ईश्वर का राज नहीं। इसीलिये ईसाइयों का ईश्वर उसे हटा नहीं सकता होगा। इससे यह सिद्ध हुआ कि जैसा इस समय के राज्याधिकारी ईसाई डाकू चोर आदि को शीघ्र दण्ड देते हैं वैसा भी ईसाइयों का ईश्वर नहीं । पुनः कौन ऐसा निर्बुद्धि मनुष्य है जो वैदिक मत को छोड़ पोकल ईसाई मत स्वीकार करे? ।।११८।।

११९-हाय पृथिवी और समुद्र के निवासियो! क्योंकि शैतान तुम पास उतरा है।। -यो० प्र० प० १२। आ० १२।।

(समीक्षकक्या वह ईश्वर वहीं का रक्षक और स्वामी है? पृथिवी के मनुष्यादि प्राणियों का रक्षक और स्वामी नहीं है? यदि भूमि का भी राजा है तो शैतान को क्यों न मार सका? ईश्वर देखता रहता है और शैतान बहकाता फिरता है तो भी उसको वर्जता नहीं।। विदित तो यह होता है कि एक अच्छा ईश्वर और एक समर्थ दुष्ट दूसरा ईश्वर हो रहा है।।११९।।

१२०-और बयालीस मास लों युद्ध करने का अधिकार उसे दिया गया।। और उसने ईश्वर के विरुद्ध निन्दा करने को अपना मुंह खोला कि उसके नाम की और उसके तम्बू की और स्वर्ग में वास करनेहारों की निन्दा करे।। और उसको यह दिया गया कि पवित्र लोगों से युद्ध करे और उन पर जय करे और हर एक कुल और भाषा और देश पर उसको अधिकार दिया गया।।

-यो० प्र० प० १३। आ० ५। ६। ७।।

(समीक्षकभला ! जो पृथिवी के लोगों को बहकाने के लिये शैतान और पशु आदि को भेजे और पवित्र मनुष्यों से युद्ध करावे वह काम डाकुओं के सरदार के समान है वा नहीं। ऐसा काम ईश्वर वा ईश्वर के भक्तों का नहीं हो सकता।।१२०।।

१२१-और मैंने दृष्टि की और देखो मेम्ना सियोन पर्वत पर खड़ा है और उसके संग एक लाख चवालीस सहस्र जन थे जिनके माथे पर उसका नाम और उसके पिता का नाम लिखा है।। -यो० प्र० प० १४। आ० १।।

(समीक्षकअब देखिये ! जहां ईसा का बाप रहता था वहीं उसी सियोन पहाड़ पर उसका लड़का भी रहता था। परन्तु एक लाख चवालीस सहस्र मनुष्यों की गणना क्योंकर की? एक लाख चवालीस सहस्र ही स्वर्ग के वासी हुए। शेष करोड़ों ईसाइयों के शिर पर न मोहर लगी? क्या ये सब नरक में गये? ईसाइयों को चाहिये कि सियोन पर्वत पर जाके देखें कि ईसा का उक्त बाप और उनकी सेना वहां है वा नहीं? जो हों तो यह लेख ठीक है; नहीं तो मिथ्या। यदि कहीं से वहां आया है तो कहां से आया? जो कहो स्वर्ग से; तो क्या वे पक्षी हैं कि इतनी बड़ी सेना और आप ऊपर नीचे उड़ कर आया जाया करें? यदि वह आया जाया करता है तो एक जिले के न्यायाधीश के समान हुआ। और वह एक दो या तीन हो तो नहीं बन सकेगा किन्तु न्यून एक-एक भूगोल में एक-एक ईश्वर चाहिए। क्योंकि एक दो तीन अनेक ब्रह्माण्डों का न्याय करने और सर्वत्र युगपत् घूमने में समर्थ कभी नहीं हो सकते।।१२१।।

१२२-आत्मा कहता है हां कि वे अपने परिश्रम से विश्राम करेंगे परन्तु उनके कार्य्य उनके संग हो लेते हैं।। -यो० प्र० प० १४। आ० १३।।

(समीक्षकदेखिये ! ईसाइयों का ईश्वर तो कहता है उनके कर्म उन के संग रहेंगे अर्थात् कर्मानुसार फल सब को दिये जायेंगे और ये लोग कहते हैं कि ईसा पापों को ले लेगा और क्षमा भी किये जायेंगे। यहां बुद्धिमान् विचारें कि ईश्वर का वचन सच्चा वा ईसाइयों का ? एक बात में दोनों तो सच्चे हो ही नहीं सकते। इनमें से एक झूठा अवश्य होगा। हम को क्या ! चाहे ईसाइयों का ईश्वर झूठा हो वा ईसाई लोग।।१२२।।

१२३-और उसे ईश्वर के कोप के बडे़ रस के कुण्ड में डाला। और रस के कुण्ड का रौंदन नगर के बाहर किया गया और रस के कुण्ड में से घोड़ों के लगाम तक लोहू एक सौ कोश तक बह निकला।।

-यो० प्र० प० १४। आ० १९। २०।।

(समीक्षकअब देखिये ! इनके गपोड़े पुराणों से भी बढ़कर हैं वा नहीं? ईसाइयों का ईश्वर कोप करते समय बहुत दुःखित हो जाता होगा और उसके कोप

के कुण्ड भरे हैं क्या उसका कोप जल है? वा अन्य द्रवित पदार्थ है कि जिससे कुण्ड भरे हैं? और सौ कोश तक रुधिर का बहना असम्भव है क्योंकि रुधिर वायु लगने से झट जम जाता है पुनः क्यों कर बह सकता है? इसलिये ऐसी बातें मिथ्या होती हैं।।१२३।।

१२४-और देखो स्वर्ग में साक्षी के तम्बू का मन्दिर खोला गया।। -यो० प्र० प० १५। आ० ५।।

(समीक्षकजो ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ होता तो साक्षियों का क्या काम? क्योंकि वह स्वयं सब कुछ जानता होता। इससे सर्वथा यही निश्चय होता है कि इनका ईश्वर सर्वज्ञ नहीं किन्तु मनुष्यवत् अल्पज्ञ है। वह ईश्वरता का क्या काम कर सकता है? नहि नहि नहि, और इसी प्रकरण में दूतों की बड़ी-बड़ी असम्भव बातें लिखी हैं उनको सत्य कोई नहीं मान सकता। कहां तक लिखें इस प्रकरण में सर्वथा ऐसी ही बातें भरी हैं।।१२४।।

१२५-और ईश्वर ने उसके कुकर्मों को स्मरण किया है।। जैसा उसने तुम्हें दिया है तैसा उसको भर देओ और उसके कर्मों के अनुसार दूना उसे दे देओ।।

-यो० प्र० प० १८। आ० ५। ६।।

(समीक्षकदेखो! प्रत्यक्ष ईसाइयों का ईश्वर अन्यायकारी है। क्योंकि न्याय उसी को कहते हैं कि जिसने जैसा वा जितना कर्म किया उसको वैसा और उतना ही फल देना। उससे अधिक न्यून देना अन्याय है। जो अन्यायकारी की उपासना करते हैं वे अन्यायकारी क्यों न हों।।१२५।।

१२६-क्योंकि मेम्ने का विवाह आ पहुंचा है और उसकी स्त्री ने अपने को तैयार किया है।। -यो० प्र० प० १९। आ० ७।।

(समीक्षकअब सुनिये! ईसाइयों के स्वर्ग में विवाह भी होते हैं! क्योंकि ईसा का विवाह ईश्वर ने वहीं किया। पूछना चाहिये कि उसके श्वसुर, सासू, सालादि कौन थे और लड़के बाले कितने हुए? और वीर्य के नाश होने से बल, बुद्धि, पराक्रम आयु आदि के भी न्यून होने से अब तक ईसा ने वहां शरीर त्याग किया होगा क्योंकि संयोगजन्य पदार्थ का वियोग अवश्य होता है। अब तक ईसाइयों ने उसके विश्वास में धोखा खाया और न जाने कब तक धोखे में रहेंगे।।१२६।।

१२७-और उसने अजगर को अर्थात् प्राचीन सांप को जो दियाबल और शैतान है पकड़ के उसे सहस्र वर्ष लों बांध रक्खा।। और उसको अथाह कुण्ड में डाला और बन्द करके उसे छाप दी जिसतें वह जब लों सहस्र वर्ष पूरे न हों तब लों फिर देशों के लोगों को न भरमावे।। -यो० प्र० प० २०। आ० २। ३।।

(समीक्षकदेखो ! मरूं मरूं करके शैतान को पकड़ा और सहस्र वर्ष तक बन्ध किया; फिर भी छूटेगा। क्या फिर न भरमावेगा? ऐसे दुष्ट को तो बन्दीगृह में ही रखना वा मारे विना छोड़ना ही नहीं। परन्तु यह शैतान का होना ईसाइयों का भ्रममात्र है वास्तव में कुछ भी नहीं। केवल लोगों को डरा के अपने जाल में लाने का उपाय रचा है। जैसे किसी धूर्त्त ने किन्हीं भोले मनुष्य से कहा कि चलो ! तुमको देवता का दर्शन कराऊं। किसी एकान्त देश में ले जाके एक मनुष्य को चतुर्भुज बना कर रक्खा। झाड़ी में खड़ा करके कहा कि आंख मीच लो। जब मैं कहूं तब खोलना और फिर जब कहूँ तभी मीच लो । जो न मीचेगा वह अन्धा हो जायेगा। वैसी इन मत वालों की बातें हैं कि जो हमारा मजहब न मानेगा वह शैतान का बहकाया हुआ है। जब वह सामने आया तब कहा-देखो! और पुनः शीघ्र कहा कि मीच लो। जब फिर झाड़ी में छिप गया तब कहा-खोलो! देखा नारायण को, सब ने दर्शन किया ! वैसी लीला मजहबियों की है। इसलिये इनकी माया में किसी को न फंसना चाहिये।।१२७।।

१२८-जिसके सम्मुख से पृथिवी और आकाश भाग गये और उनके लिये जगह न मिली।। और मैंने क्या छोटे क्या बड़े सब मृतकों को ईश्वर के आगे खड़े देखा और पुस्तक खोले गये और दूसरा पुस्तक अर्थात् जीवन का पुस्तक खोला गया और पुस्तकों में लिखी हुई बातों से मृतकों का विचार उनके कर्मों के अनुसार किया गया।। -यो० प्र० प० २०। आ० ११। १२।।

(समीक्षकयह देखो लड़कपन की बात! भला पृथिवी और आकाश कैसे भाग सकेंगे? और वे किस पर ठहरेंगे? जिनके सामने से भगे। और उसका सिहासन और वह कहाँ ठहरा? और मुर्दे परमेश्वर के सामने खड़े किये गये तो परमेश्वर भी बैठा वा खड़ा होगा? क्या यहां की कचहरी और दूकान के समान ईश्वर का व्यवहार है जो कि पुस्तक लेखानुसार होता है? और सब जीवों का हाल ईश्वर ने लिखा वा उसके गुमाश्तों ने? ऐसी-ऐसी बातों से अनीश्वर को ईश्वर और ईश्वर को अनीश्वर ईसाई आदि मत वालों ने बना दिया।।१२८।।

१२९-उनमें से एक मेरे पास आया और मेरे संग बोला कि आ मैं दुलहिन को अर्थात् मेम्ने की स्त्री को तुझे दिखाऊंगा।। -यो० प्र० प० २१। आ० ९।।

(समीक्षकभला! ईसा ने स्वर्ग में दुलहिन अर्थात् स्त्री अच्छी पाई, मौज करता होगा। जो जो ईसाई वहां जाते होंगे उनको भी स्त्रियां मिलती होंगी और लड़के बाले होते होंगे औेर बहुत भीड़ के हो जाने के कारण रोगोत्पत्ति होकर मरते भी होंगे। ऐसे स्वर्ग को दूर से हाथ ही जोड़ना अच्छा है।।१२९।।

१३०-और उसने उस नल से नगर को नापा कि साढ़े सात सौ कोश का है। उसकी लम्बाई और चौड़ाई और ऊँचाई एक समान है।। और उसने उसकी भीत को मनुष्य के अर्थात् दूत के नाप से नापा कि एक सौ चवालीस हाथ की है।। और उसकी भीत की जुड़ाई सूर्य्यकान्त की थी और नगर निर्मल सोने का था जो निर्मल कांच के समान था।। और नगर की भीत की नेवें हर एक बहुमूल्य पत्थर से सँवारी हुई थीं। पहिली नेव सूर्य्यकान्त की थी; दूसरी नीलमणि की; तीसरी लालड़ी की, चौथी मरकत की।। पांचवीं गोमेदक की, छठवीं माणिक्य की, सातवीं पीतमणि की, आठवीं पेरोज की, नवीं पुखराज की, दशवीं लहसनिये की, ग्यारहवीं धूम्रकान्त की, बारहवीं मर्टीष की।। और बारह फाटक बारह मोती थे, एक-एक मोती से एक-एक फाटक बना था और नगर की सड़क स्वच्छ कांच के ऐसे निर्मल सोने की थी।। -यो० प्र० प० २१। आ० १६। १७। १८। १९। २०। २१।।

(समीक्षकसुनो ईसाइयों के स्वर्ग का वर्णन! यदि ईसाई मरते जाते और जन्मते जाते हैं तो इतने बड़े शहर में कैसे समा सकेंगे? क्योंकि उसमें मनुष्यों का आगम होता है और उससे निकलते नहीं और जो यह बहुमूल्य रत्नों की बनी हुई नगरी मानी है और सर्व सोने की है इत्यादि लेख केवल भोले-भोले मनुष्यों को बहका कर फंसाने की लीला है। भला लम्बाई चौड़ाई तो उस नगर की लिखी सो हो सकती परन्तु ऊँचाई साढ़े सात सौ कोश क्योंकर हो सकती है? यह सर्वथा मिथ्या कपोलकल्पना की बात है और इतने बड़े मोती कहां से आये होंगे। इस लेख के लिखने वाले के घर के घड़े में से। यह गपोड़ा पुराण का भी बाप है।।१३०।।

१३१-और कोई अपवित्र वस्तु अथवा घिनित कर्म करनेहारा अथवा झूठ पर चलने हारा उसमें किसी रीति से प्रवेश न करेगा।। -यो० प्र० प० २१। आ० २७।।

(समीक्षकजो ऐसी बात है तो ईसाई लोग क्यों कहते हैं कि पापी लोग भी स्वर्ग में ईसाई होने से जा सकते हैं। यह बात ठीक नहीं है। यदि ऐसा है तो योहन्ना स्वप्ने की मिथ्या बातों का करनेहारा स्वर्ग में प्रवेश कभी न कर सका होगा और ईसा भी स्वर्ग में न गया होगा क्योंकि जब अकेला पापी स्वर्ग को प्राप्त नहीं हो सकता तो जो अनेक पापियों के पाप के भार से युक्त है वह क्योंकर स्वर्गवासी हो सकता है।।१३१।।

१३२-और अब कोई श्राप न होगा और ईश्वर का और मेम्ने का सिहासन उसमें होगा और उसके दास उसकी सेवा करेंगे।। और ईश्वर उसका मुंह देखेंगे और उसका नाम उनके माथे पर होगा।। और वहां रात न होगी और उन्हें दीपक का अथवा सूर्य्य की ज्योति का प्रयोजन नहीं क्योंकि परमेश्वर ईश्वर उन्हें ज्योति देगा, वे सर्वदा राज्य करेंगे।। -यो० प्र० प० २२। आ० ३। ४। ५।।

(समीक्षकदेखिये यही ईसाइयों का स्वर्गवास ! क्या ईश्वर और ईसा सिहासन पर निरन्तर बैठे रहेंगे? और उनके दास उनके सामने सदा मुंह देखा करेंगे। अब यह तो कहिये तुम्हारे ईश्वर का मुंह यूरोपियन के सदृश गोरा वा अफ्रीका वालों के सदृश काला अथवा अन्य देश वालों के समान है? यह तुम्हारा स्वर्ग भी बन्धन है क्योंकि जहां छोटाई बड़ाई है और उसी एक नगर में रहना अवश्य है तो वहां दुःख क्यों न होता होगा जो मुख वाला है वह ईश्वर सर्वज्ञ सर्वेश्वर कभी नहीं हो सकता।।१३२।।

१३३-देख ! मैं शीघ्र आता हूँ और मेरा प्रतिफल मेरे साथ है जिसतें हर एक को जैसा उसका कार्य ठहरेगा वैसा फल देऊंगा।। -यो० प्र० प० २२। आ० १२।।

(समीक्षकजब यही बात है कि कर्मानुसार फल पाते हैं तो पापों की क्षमा कभी नहीं होती और जो क्षमा होती है तो इञ्जील की बातें झूठीं। यदि कोई कहे कि क्षमा करना भी इञ्जील में लिखा है तो पूर्वापर विरुद्ध अर्थात् ‘हल्फदरोगी’ हुई तो झूठ है। इसका मानना छोड़ देओ। अब कहां तक लिखें इनकी बाइबल में लाखों बातें खण्डनीय हैं। यह तो थोड़ा सा चिह्न मात्र ईसाइयों की बाइबल पुस्तक का दिखलाया है। इतने ही से बुद्धिमान् लोग बहुत समझ लेंगे। थोड़ी सी बातों को छोड़ शेष सब झूठ भरा है। जैसे झूठ के संग से सत्य भी शुद्ध नहीं रहता वैसा ही बाइबल पुस्तक भी माननीय नहीं हो सकता किन्तु वह सत्य तो वेदों के स्वीकार में गृहीत होता ही है।।१३३।।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनिर्मिते सत्यार्थप्रकाशे

सुभाषाविभूषिते कृश्चीनमतविषये त्रयोदश समुल्लास सम्पूर्ण ।।१३।।

Maharishi Dayanand Saraswati on Islam[ 1875]

LORD VISHNU

चौदहवें समुल्लास

 

अनुभूमिका ()

जो यह १४ चौदहवां समुल्लास मुसलमानों के मतविषय में लिखा है सो केवल कुरान के अभिप्राय से। अन्य ग्रन्थ के मत से नहीं क्योंकि मुसलमान कुरान पर ही पूरा-पूरा विश्वास रखते हैं यद्यपि फिरके होने के कारण किसी शब्द अर्थ आदि विषय में विरुद्ध बात है तथापि कुरान पर सब ऐकमत्य हैं। जो कुरान अर्बी भाषा में है उस पर मौलवियों ने उर्दू में अर्थ लिखा है, उस अर्थ का देवनागरी अक्षर और आर्य्यभाषान्तर करा के पश्चात् अर्बी के बड़े-बड़े विद्वानों से शुद्ध करवा के लिखा गया है। यदि कोई कहे कि यह अर्थ ठीक नहीं है तो उस को उचित है कि मौलवी साहबों के तर्जुमों का पहले खण्डन करे पश्चात् इस विषय पर लिखे। क्योंकि यह लेख केवल मनुष्यों की उन्नति और सत्यासत्य के निर्णय के लिये है। सब मतों के विषयों का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होवे, इससे मनुष्यों को परस्पर विचार करने का समय मिले और एक दूसरे के दोषों का खण्डन कर गुणों का ग्रहण करें। न किसी अन्य मत पर न इस मत पर झूठ मूठ बुराई या भलाई लगाने का प्रयोजन है किन्तु जो-जो भलाई है वही भलाई और जो बुराई है वही बुराई सब को विदित होवे। न कोई किसी पर झूठ चला सके और न सत्य को रोक सके और सत्यासत्य विषय प्रकाशित किये पर भी जिस की इच्छा हो वह न माने वा माने। किसी पर बलात्कार नहीं किया जाता। और यही सज्जनों की रीति है कि अपने वा पराये दोषों को दोष और गुणों को गुण जानकर गुणों का ग्रहण और दोषों का त्याग करें। और हठियों का हठ दुराग्रह न्यून करें करावें, क्योंकि पक्षपात से क्या-क्या अनर्थ जगत् में न हुए और न होते हैं। सच तो यह है कि इस अनिश्चित क्षणभंग जीवन में पराई हानि करके लाभ से स्वयं रिक्त रहना और अन्य को रखना मनुष्यपन से बहिः है। इसमें जो कुछ विरुद्ध लिखा गया हो उस को सज्जन लोग विदित कर देंगे तत्पश्चात् जो उचित होगा तो माना जायेगा क्योंकि यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिये किया गया है न कि इन को बढ़ाने के अर्थ। क्योंकि एक दूसरे की हानि करने से पृथक् रह परस्पर को लाभ पहुँचाना हमारा मुख्य कर्म है। अब यह १४ चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों का मतविषय सब सज्जनों के सामने निवेदन करता हूँ। विचार कर इष्ट का ग्रहण अनिष्ट का परित्याग कीजिये।

अलमतिविस्तरेण बुद्धिमद्वर्य्येषु।

इत्यनुभूमिका।।

अथ चतुर्दशसमुल्लासारम्भः

अथ यवनमतविषयं व्याख्यास्यामः

इसके आगे मुसलमानों के मतविषय में लिखेंगे

१-आरम्भ साथ नाम अल्लाह के क्षमा करने वाला दयालु।।

-मंजिल १। सिपारा १। सूरत १।।

(समीक्षकमुसलमान लोग ऐसा कहते हैं कि यह कुरान खुदा का कहा है परन्तु इस वचन से विदित होता है कि इस को बनाने वाला कोई दूसरा है क्योंकि जो परमेश्वर का बनाया होता तो “आरम्भ साथ नाम अल्लाह के” ऐसा न कहता किन्तु ष्आरम्भ वास्ते उपदेश मनुष्यों केष् ऐसा कहता। यदि मनुष्यों को शिक्षा करता है कि तुम ऐसा कहो तो भी ठीक नहीं। क्योंकि इस से पाप का आरम्भ भी खुदा के नाम से होकर उसका नाम भी दूषित हो जाएगा। जो वह क्षमा और दया करनेहारा है तो उसने अपनी सृष्टि में मनुष्यों के सुखार्थ अन्य प्राणियों को मार, दारुण पीड़ा दिला कर, मरवा के मांस खाने की आज्ञा क्यों दी? क्या वे प्राणी अनपराधी और परमेश्वर के बनाये हुए नहीं हैं? और यह भी कहना था कि “परमेश्वर के नाम पर अच्छी बातों का आरम्भ” बुरी बातों का नहीं। इस कथन में गोलमाल है। क्या चोरी, जारी, मिथ्याभाषणादि अधर्म का भी आरम्भ परमेश्वर के नाम पर किया जाय? इसी से देख लो कसाई आदि मुसलमान, गाय आदि के गले काटने में भी ‘बिस्मिल्लाह’ इस वचन को पढ़ते हैं। जो यही इसका पूर्वोक्त अर्थ है तो बुराइयों का आरम्भ भी परमेश्वर के नाम पर मुसलमान करते हैं और मुसलमानों का ‘खुदा’ दयालु भी न रहेगा क्योंकि उस की दया उन पशुओं पर न रही। और जो मुसलमान लोग इस का अर्थ नहीं जानते तो इस वचन का प्रकट होना व्यर्थ है। यदि मुसलमान लोग इस का अर्थ और करते हैं तो सूधा अर्थ क्या है ? इत्यादि।।१।।

२-सब स्तुति परमेश्वर के वास्ते हैं जो परवरदिगार अर्थात् पालन करनेहारा है सब संसार का।। क्षमा करने वाला दयालु है ।।

-मं० १। सि० १। सूरतुल्फातिहा आयत १। २।।

(समीक्षकजो कुरान का खुदा संसार का पालन करने हारा होता और सब पर क्षमा और दया करता होता तो अन्य मत वाले और पशु आदि को भी मुसलमानों के हाथ से मरवाने का हुक्म न देता । जो क्षमा करनेहारा है तो क्या पापियों पर भी क्षमा करेगा ? और जो वैसा है तो आगे लिखेंगे कि ष्काफिरों को कतल करोष् अर्थात् जो कुरान और पैगम्बर को न मानें वे काफिर हैं ऐसा क्यों कहता ? इसलिये कुरान ईश्वरकृत नहीं दीखता।।२।।

३-मालिक दिन न्याय का।। तुझ ही को हम भक्ति करते हैं और तुझ ही से सहाय चाहते हैं।। दिखा हम को सीधा रास्ता।।

-मंन१। सि० १। सू० १। आ० ३। ४। ५।।

(समीक्षकक्या खुदा नित्य न्याय नहीं करता ? किसी एक दिन न्याय करता है ? इस से तो अन्धेर विदित होता है! उसी की भक्ति करना और उसी से सहाय चाहना तो ठीक परन्तु क्या बुरी बात का भी सहाय चाहना ? और सूधा मार्ग एक मुसलमानों ही का है वा दूसरे का भी ? सूधे मार्ग को मुसलमान क्यों नहीं ग्रहण करते ? क्या सूधा रास्ता बुराई की ओर का तो नहीं चाहते? यदि भलाई सब की एक है तो फिर मुसलमानों ही में विशेष कुछ न रहा और जो दूसरों की भलाई नहीं मानते तो पक्षपाती हैं।।३।।

४-दिखा उन लोगों का रास्ता कि जिन पर तूने निआमत की।। और उनका मार्ग मत दिखा कि जिन के ऊपर तू ने गजब अर्थात् अत्यन्त क्रोध की दृष्टि की और न गुमराहों का मार्ग हमको दिखा।। -मं० १। सि० १। सू० १। आ० ६। ७।।

(समीक्षकजब मुसलमान लोग पूर्वजन्म और पूर्वकृत पाप पुण्य नहीं मानते तो किन्हीं पर निआमत अर्थात् फजल वा दया करने और किन्हीं पर न करने से खुदा पक्षपाती हो जायगा। क्योंकि विना पाप-पुण्य सुख-दुःख देना केवल अन्याय की बात है। और विना कारण किसी पर दया और किसी पर क्रोधदृष्टि करना भी स्वभाव से बहिः है क्योंकि विना भलाई बुराई के वह दया अथवा क्रोध नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व संचित पुण्य पाप ही नहीं तो किसी पर दया और किसी पर क्रोध करना नहीं हो सकता। और इस सूरत की टिप्पन पर यह “सूर अल्लाह साहेब ने मनुष्यों के मुख से कहलाई कि सदा इस प्रकार से कहा करें।” जो यह बात है तो ‘अलिफ बे’ आदि अक्षर भी खुदा ही ने पढ़ाये होंगे, जो कहो कि नहीं तो विना अक्षर ज्ञान के इस सूरः को कैसे पढ़ सके ? क्या कण्ठ ही से बुलाये और बोलते गये ? जो ऐसा है तो सब कुरान ही कण्ठ से पढ़ाया होगा। इस से ऐसा समझना चाहिये कि जिस पुस्तक में पक्षपात की बातें पाई जायें वह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता। जैसा कि अरबी भाषा में उतारने से अरब वालों को इस का पढ़ना सुगम, अन्य भाषा बोलने वालों को कठिन होता है। इसी से खुदा में पक्षपात आता है। और जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्यायदृष्टि से सब देशभाषाओं से विलक्षण संस्कृत भाषा कि जो सब देशवालों के लिये एक से परिश्रम से विदित होती है उसी में वेदों का प्रकाश किया है, यह करता तो कुछ भी दोष नहीं होता।।४।।

५-यह पुस्तक कि जिस में सन्देह नहीं; परहेजगारों को मार्ग दिखलाती है।। जो कि ईमान लाते हैं साथ गैब (परोक्ष) के, नमाज पढ़ते, और उस वस्तु से जो हम ने दी खर्च करते हैं।। और वे लोग जो उस किताब पर ईमान लाते हैं जो रखते हैं तेरी ओर वा तुझ से पहिले उतारी गई, और विश्वास कयामत पर रखते हैं।। ये लोग अपने मालिक की शिक्षा पर हैं और ये ही छुटकारा पाने वाले हैं।। निश्चय जो काफिर हुए उन पर तेरा डराना न डराना समान है। वे ईमान न लावेंगे।। अल्लाह ने उन के दिलों, कानों पर मोहर कर दी और उन की आंखों पर पर्दा है और उन के वास्ते बड़ा अ-जाब है।। -मं० १। सि०१। सूरत २। आ० १। २। ३। ४। ५। ६। ७।।

(समीक्षकक्या अपने ही मुख से अपनी किताब की प्रशंसा करना खुदा की दम्भ की बात नहीं? जब ‘परहे-जगार’ अर्थात् धार्मिक लोग हैं वे तो स्वतः सच्चे मार्ग पर हैं और जो झूठे मार्ग पर हैं उन को यह कुरान मार्ग ही नहीं दिखला सकता, फिर किस काम का रहा? ।।१।। क्या पाप पुण्य और पुरुषार्थ के विना खुदा अपने ही खजाने से खर्च करने को देता है ? जो देता है तो सब को क्यों नहीं देता? और मुसलमान लोग परिश्रम क्यों करते हैं? ।।२।। और जो बाइबल इञ्जील आदि पर विश्वास करना योग्य है तो मुसलमान इञ्जील आदि पर ईमान जैसा कुरान पर है वैसा क्यों नहीं लाते? और जो लाते हैं तो कुरान१ का होना किसलिये? जो कहें कि कुरान में अधिक बातें हैं तो पहली किताब में लिखना खुदा भूल गया होगा! और जो नहीं भूला तो कुरान का बनाना निष्प्रयोजन है। और हम देखते हैं तो बाइबल और कुरान की बातें कोई-कोई न मिलती होंगी नहीं तो सब मिलती हैं। एक ही पुस्तक जैसा कि वेद है क्यों न बनाया? कयामत पर ही विश्वास रखना चाहिये; अन्य पर नहीं? ।।३।। क्या जो ईसाई और मुसलमान ही खुदा की शिक्षा पर हैं उन में कोई भी पापी नहीं है? क्या ईसाई और मुसलमान अधर्मी हैं वे भी छुटकारा पावें और दूसरे धर्मात्मा भी न पावें तो बड़े अन्याय और अन्धेर की बात नहीं है? ।।४।। और क्या जो लोग मुसलमानी मत को न मानें उन्हीं को काफिर कहना वह एकतर्फी डिगरी नहीं है? ।।५ ।। जो परमेश्वर ही ने उनके अन्तःकरण और कानों पर मोहर लगाई और उसी से वे पाप करते हैं तो उन का कुछ भी दोष नहीं। यह दोष खुदा ही का है फिर उन पर सुख-दुःख वा पाप-पुण्य नहीं हो सकता पुनः उन को सजा जजा क्यों करता है? क्योंकि उन्होंने पाप वा पुण्य स्वतन्त्रता से नहीं किया।।५।।

६-उनके दिलों में रोग है, अल्लाह ने उन का रोग बढ़ा दिया।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० १०।।

(समीक्षकभला विना अपराध खुदा ने उन का रोग बढ़ाया, दया न आई, उन बिचारों को बड़ा दुःख हुआ होगा! क्या यह शैतान से बढ़कर शैतानपन का काम नहीं है? किसी के मन पर मोहर लगाना, किसी का रोग बढ़ाना, यह खुदा का काम नहीं हो सकता क्योंकि रोग का बढ़ना अपने पापों से है।।६।।

७-जिस ने तुम्हारे वास्ते पृथिवी बिछौना और आसमान की छत को बनाया।।

-मंन१। सि०१। सू०२। आ० २२।।

(समीक्षकभला आसमान छत किसी की हो सकती है? यह अविद्या की बात है। आकाश को छत के समान मानना हंसी की बात है। यदि किसी प्रकार की पृथिवी को आसमान मानते हों तो उनकी घर की बात है।।७ ।।

८-जो तुम उस वस्तु से सन्देह में हो जो हम ने अपने पैगम्बर के ऊपर उतारी तो उस कैसी एक सूरत ले आओ और अपने साक्षी अपने लोगों को पुकारो अल्लाह के विना जो तुम सच्चे हो।। जो तुम और कभी न करोगे तो उस आग से डरो कि जिस का इन्धन मनुष्य है, और काफिरों के वास्ते पत्थर तैयार किये गये हैं।। -मंन१। सि०१। सू०२। आ०२३। २४।।

(समीक्षकभला यह कोई बात है कि उस के सदृश कोई सूरत न बने? क्या अकबर बादशाह के समय में मौलवी फैजी ने विना नुकते का कुरान नहीं बना लिया था? वह कौन सी दो-जख की आग है? क्या इस आग से न डरना चाहिये ? इस का भी इन्धन जो कुछ पड़े सब है। जैसे कुरान में लिखा है कि काफिरों के वास्ते दोजख की आग तैयार की गई है तो वैसे पुराणों में लिखा है

– वास्तव में यह शब्द ‘‘क़ुरआन’’ है परन्तु भाषा में लोगों के बोलने में क़ुरान आता है इसलिये ऐसा ही लिखा है ।

कि म्लेच्छों के लिये घोर नरक बना है! अब कहिये किस की बात सच्ची मानी जाय ? अपने-अपने वचन से दोनों स्वर्गगामी और दूसरे के मत से दोनों नरकगामी होते हैं। इसलिए इन सब का झगड़ा झूठा है किन्तु जो धार्मिक हैं वे सुख और जो पापी हैं वे सब मतों में दुःख पावेंगे।।८।।

९-और आनन्द का सन्देशा दे उन लोगों को कि ईमान लाए और काम किए अच्छे। यह कि उन के वास्ते बहिश्तें हैं जिन के नीचे से चलती हैं नहरें। जब उन में से मेवों के भोजन दिये जावेंगे तब कहेंगे कि यह वो वस्तु हैं जो हम पहिले इस से दिये गये थे—— और उन के लिये पवित्र बीवियाँ सदैव वहाँ रहने वाली हैं।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० २५।।

(समीक्षकभला! यह कुरान का बहिश्त संसार से कौन सी उत्तम बात वाला है ? क्योंकि जो पदार्थ संसार में हैं वे ही मुसलमानों के स्वर्ग में हैं और इतना विशेष है कि यहाँ जैसे पुरुष जन्मते मरते और आते जाते हैं उसी प्रकार स्वर्ग में नहीं। किन्तु यहाँ की स्त्रियाँ सदा नहीं रहतीं और वहाँ बीवियाँ अर्थात् उत्तम स्त्रियाँ सदा काल रहती हैं तो जब तक कयामत की रात न आवेगी तब तक उन बिचारियों के दिन कैसे कटते होंगे ? हां जो खुदा की उन पर कृपा होती होगी! और खुदा ही के आश्रय समय काटती होंगी तो ठीक है। क्योंकि यह मुसलमानों का स्वर्ग गोकुलिये गुसाँइयों के गोलोक और मन्दिर के सदृश दीखता है क्योंकि वहाँ स्त्रियों का मान्य बहुत, पुरुषों का नहीं। वैसे ही खुदा के घर में स्त्रियों का मान्य अधिक और उन पर खुदा का प्रेम भी बहुत है उन पुरुषों पर नहीं। क्योंकि बीवियों को खुदा ने बहिश्त में सदा रक्खा और पुरुषों को नहीं। वे बीवियां विना खुदा की मर्जी स्वर्ग में कैसे ठहर सकतीं ? जो यह बात ऐसी ही हो तो खुदा स्त्रियों में फंस जाय!।।९।।

१०-आदम को सारे नाम सिखाये। फिर फरिश्तों के सामने करके कहा जो तुम सच्चे हो मुझे उन के नाम बताओ।। कहा हे आदम! उन को उन के नाम बता दे। तब उस ने बता दिये तो खुदा ने फरिश्तों से कहा कि क्या मैंने तुम से नहीं कहा था कि निश्चय मैं पृथिवी और आसमान की छिपी वस्तुओं को और प्रकट छिपे कर्मों को जानता हूँ ।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ३०। ३१।।

(समीक्षकभला ऐसे फरिश्तों को धोखा देकर अपनी बड़ाई करना खुदा का काम हो सकता है ? यह तो एक दम्भ की बात है। इस को कोई विद्वान् नहीं मान सकता और न ऐसा अभिमान करता। क्या ऐसी बातों से ही खुदा अपनी सिद्धाई जमाना चाहता है ? हाँ! जंगली लोगों में कोई कैसा ही पाखण्ड चला लेवे चल सकता है; सभ्य जनों में नहीं ।।१०।।

११-जब हमने फरिश्तों से कहा कि बाबा आदम को दण्डवत् करो, देखा सभों ने दण्डवत् किया परन्तु शैतान ने न माना और अभिमान किया क्योंकि वो भी एक काफिर था।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ३४।।

(समीक्षकइस से खुदा सर्वज्ञ नहीं अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान की पूरी बातें नहीं जानता। जो जानता हो तो शैतान को पैदा ही क्यों किया ? और खुदा में कुछ तेज भी नहीं है क्योंकि शैतान ने खुदा का हुक्म ही न माना और खुदा उस का कुछ भी न कर सका। और देखिये! एक शैतान काफिर ने खुदा का भी छक्का छुड़ा दिया तो मुसलमानों के कथनानुसार भिन्न जहाँ क्रोड़ों काफिर हैं वहाँ मुसलमानों के खुदा और मुसलमानों की क्या चल सकती है? कभी-कभी खुदा भी किसी का रोग बढ़ा देता, किसी को गुमराह कर देता है। खुदा ने ये बातें शैतान से सीखी होंगी और शैतान ने खुदा से। क्योंकि विना खुदा के शैतान का उस्ताद और कोई नहीं हो सकता।।११।।

१२-हमने कहा कि ओ आदम! तू और तेरी जोरू बहिश्त में रह कर आनन्द में जहाँ चाहो खाओ परन्तु मत समीप जाओ उस वृक्ष के कि पापी हो जाओगे।। शैतान ने उन को डिगाया और उन को बहिश्त के आनन्द से खो दिया। तब हम ने कहा कि उतरो तुम्हारे में कोई परस्पर शत्रु है। तुम्हारा ठिकाना पृथिवी है और एक समय तक लाभ है।। आदम अपने मालिक की कुछ बातें सीखकर पृथिवी पर आ गया।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ३५। ३६। ३७।।

(समीक्षकअब देखिये खुदा की अल्पज्ञता! अभी तो स्वर्ग में रहने का आशीर्वाद दिया और पुनः थोड़ी देर में कहा कि निकलो। जो भविष्यत् बातों को जानता होता तो वर ही क्यों देता? और बहकाने वाले शैतान को दण्ड देने से असमर्थ भी दीख पड़ता है। और वह वृक्ष किस के लिये उत्पन्न किया था? क्या अपने लिये वा दूसरे के लिये ? जो अपने लिये किया तो उस को क्या जरूरत थी? और जो दूसरे के लिये तो क्यों रोका? इसलिये ऐसी बातें न खुदा की और न उसके बनाये पुस्तक में हो सकती हैं। आदम साहेब खुदा से कितनी बातें सीख आये? और जब पृथिवी पर आदम साहेब आये तब किस प्रकार आये? क्या वह बहिश्त पहाड़ पर है वा आकाश पर? उस से कैसे उतर आये? अथवा पक्षी के तुल्य आये अथवा जैसे ऊपर से पत्थर गिर पड़े? इस में यह विदित होता है कि जब आदम साहेब मट्टी से बनाये गये तो इन के स्वर्ग में भी मट्टी होगी। और जितने वहाँ और हैं वे भी वैसे ही फरिश्ते आदि होंगे, क्योंकि मट्टी के शरीर विना इन्द्रिय भोग नहीं हो सकता। जब पार्थिव शरीर है तो मृत्यु भी अवश्य होना चाहिये। यदि मृत्यु होता है तो वे वहाँ से कहां जाते हैं? और मृत्यु नहीं होता तो उन का जन्म भी नहीं हुआ। जब जन्म है तो मृत्यु अवश्य ही है। यदि ऐसा है तो कुरान में लिखा है कि बीबियां सदैव बहिश्त में रहती हैं सो झूठा हो जायगा क्योंकि उन का भी मृत्यु अवश्य होगा। जब ऐसा है तो बहिश्त में जाने वालों का भी मृत्यु अवश्य ही होगा।।१२।।

१३-उस दिन से डरो जब कोई जीव किसी जीव से कुछ भरोसा न रक्खेगा। न उस की सिफारिश स्वीकार की जावेगी, न उस से बदला लिया जावेगा और न वे सहाय पावेंगे।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ४८।।

(समीक्षक०क्या वर्त्तमान दिनों में न डरें? बुराई करने में सब दिन डरना चाहिये। जब सिफारिश न मानी जावेगी तो फिर पैगम्बर की गवाही वा सिफारिश से खुदा स्वर्ग देगा यह बात क्योंकर सच हो सकेगी? क्या खुदा बहिश्त वालों ही का सहायक है; दोजखवालों का नहीं? यदि ऐसा है तो खुदा पक्षपाती है।।१३।।

१४-हमने मूसा को किताब और मौजिजे दिये।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० ५३।।

(समीक्षकजो मूसा को किताब दी तो कुरान का होना निरर्थक है। और उस को आश्चर्यशक्ति दी यह बाइबल और कुरान में भी लिखा है परन्तु यह बात मानने योग्य नहीं। क्योंकि जो ऐसा होता तो अब भी होता, जो अब नहीं तो पहले भी न था। जैसे स्वार्थी लोग आज कल भी अविद्वानों के सामने विद्वान् बन जाते हैं वैसे उस समय भी कपट किया होगा। क्योंकि खुदा और उस के सेवक अब भी विद्यमान हैं पुनः इस समय खुदा आश्चर्यशक्ति क्यों नहीं देता? और नहीं कर सकते? जो मूसा को किताब दी थी तो पुनः कुरान का देना क्या आवश्यक था? क्योंकि जो भलाई बुराई करने न करने का उपदेश सर्वत्र एक सा हो तो पुनः भिन्न-भिन्न पुस्तक करने से पुनरुक्त दोष होता है। क्या मूसा जी आदि को दी हुई पुस्तकों में खुदा भूल गया था? ।।१४।।

१५-और कहो कि क्षमा मांगते हैं हम क्षमा करेंगे तुम्हारे पाप और अधिक भलाई करने वालों के।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ५२।।

(समीक्षकभला यह खुदा का उपदेश सब को पापी बनाने वाला है वा नहीं? क्योंकि जब पाप क्षमा होने का आश्रय मनुष्यों को मिलता है तब पापों से कोई भी नहीं डरता। इसलिये ऐसा कहने वाला खुदा और यह खुदा का बनाया हुआ पुस्तक नहीं हो सकता क्योंकि वह न्यायकारी है, अन्याय कभी नहीं करता और पाप क्षमा करने में अन्यायकारी हो जाता है किन्तु यथापराध दण्ड ही देने में न्यायकारी हो सकता है।।१५।।

१६-जब मूसा ने अपनी कौम के लिये पानी मांगा, हम ने कहा कि अपना असा (दण्ड) पत्थर पर मार। उस में से बारह चश्मे बह निकले।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० ६०।।

(समीक्षकअब देखिये! इन असम्भव बातों के तुल्य दूसरा कोई कहेगा? एक पत्थर की शिला में डण्डा मारने से बारह झरनों का निकलना सर्वथा असम्भव है। हां! उस पत्थर को भीतर से पोलाकर उस में पानी भर बाहर छिद्र करने से सम्भव है; अन्यथा नहीं।।१६।।

१७-हम ने उन को कहा कि तुम निन्दित बन्दर हो जाओ यह एक भय दिया जो उन के सामने और पीछे थे उन को और शिक्षा ईमानदारों को।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० ६५। ६६।।

(समीक्षकजो खुदा ने निन्दित बन्दर हो जाना केवल भय देने के लिए कहा था तो उस का कहना मिथ्या हुआ वा छल किया। जो ऐसी बातें करता और जिस में ऐसी बातें हैं वह न खुदा और न यह पुस्तक खुदा का बनाया हो सकता है।।१७।।

१८-इस तरह खुदा मुर्दों को जिलाता है और तुम को अपनी निशानियाँ दिखलाता है कि तुम समझो।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ७३।।

(समीक्षकक्या मुर्दों को खुदा जिलाता था तो अब क्यों नहीं जिलाता? क्या कयामत की रात तक कबरों में पड़े रहेंगे? आजकल दौड़ासुपुर्द हैं? क्या इतनी ही ईश्वर की निशानियां हैं? पृथिवी, सूर्य, चन्द्रादि निशानियां नहीं हैं? क्या संसार में जो विविध रचना विशेष प्रत्यक्ष दीखती हैं ये निशानियां कम हैंे? ।।१८।।

१९- वे सदैव काल बहिश्त अर्थात् वैकुण्ठ में वास करने वाले हैं।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ८२।।

(समीक्षककोई भी जीव अनन्त पाप पुण्य करने का सामर्थ्य नहीं रखता इसलिये सदैव स्वर्ग नरक में नहीं रह सकते। और जो खुदा ऐसा करे तो वह अन्यायकारी और अविद्वान् हो जावे। कयामत की रात न्याय होगा तो मनुष्यों के पाप पुण्य बराबर होना उचित है। जो अनन्त नहीं है उस का फल अनन्त कैसे हो सकता है? और सृष्टि हुए सात आठ हजार वर्षों से इधर ही बतलाते हैं। क्या इस के पूर्व खुदा निकम्मा बैठा था? और कयामत के पीछे भी निकम्मा रहेगा? ये बातें सब लड़कों के समान हैं क्योंकि परमेश्वर के काम सदैव वर्त्तमान रहते हैं और जितने जिस के पाप पुण्य हैं उतना ही उसको फल देता है इसलिये कुरान की यह बात सच्ची नहीं।।१९।।

२०-जब हम ने तुम से प्रतिज्ञा कराई न बहाना लोहू अपने आपस के और किसी अपने आपस को घरों से न निकालना, फिर प्रतिज्ञा की तुम ने, इस के तुम ही साक्षी हो।। फिर तुम वे लोग हो कि अपने आपस को मार डालते हो, एक फिरके को आप में से घरों उन के से निकाल देते हो। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ८४। ८५।।

(समीक्षकभला! प्रतिज्ञा करानी और करनी अल्पज्ञों की बात है वा परमात्मा की जब परमेश्वर सर्वज्ञ है तो ऐसी कड़ाकूट संसारी मनुष्य के समान क्यों करेगा? भला यह कौन सी भली बात है कि आपस का लोहू न बहाना, अपने मत वालों को घर से न निकालना, अर्थात् दूसरे मत वालों का लोहू बहाना, और घर से निकाल देना? यह मिथ्या मूर्खता और पक्षपात की बात है। क्या परमेश्वर प्रथम ही से नहीं जानता था कि ये प्रतिज्ञा से विरुद्ध करेंगे? इस से विदित होता है कि मुसलमानों का खुदा भी ईसाइयों की बहुत सी उपमा रखता है और यह कुरान स्वतन्त्र नहीं बन सकता क्योंकि इसमें से थोड़ी सी बातों को छोड़कर बाकी सब बातें बायबिल की हैं।।२०।।

२१-ये वे लोग हैं कि जिन्होंने आखरत के बदले जिन्दगी यहाँ की मोल ले ली। उन से पाप कभी हलका न किया जावेगा और न उन को सहायता दी जावेगी।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ८६।।

(समीक्षकभला ऐसी ईर्ष्या द्वेष की बातें कभी ईश्वर की ओर से हो सकती हैं? जिन लोगों के पाप हलके किये जायेंगे वा जिन को सहायता दी जावेगी वे कौन हैं? यदि वे पापी हैं और पापों का दण्ड दिये विना हलके किये जावेंगे तो अन्याय होगा। जो सजा देकर हलके किये जावेंगे तो जिन का बयान इस आयत में है ये भी सजा पाके हलके हो सकते हैं। और दण्ड देकर भी हलके न किये जावेंगे तो भी अन्याय होगा। जो पापों से हलके किये जाने वालों से प्रयोजन धर्मात्माओं का है तो उन के पाप तो आप ही हलके हैं; खुदा क्या करेगा? इस से यह लेख विद्वान् का नहीं। और वास्तव में धर्मात्माओं को सुख और अधिर्म्मयों को दुःख उन के कर्मों के अनुसार सदैव देना चाहिये।।२१।।

२२-निश्चय हम ने मूसा को किताब दी और उस के पीछे हम पैम्बर को लाये और मरियम के पुत्र ईसा को प्रकट मौजिजे अर्थात् दैवीशक्ति और सामर्थ्य दिये उस को साथ रूहल्कुद्स१ के। जब तुम्हारे पास उस वस्तु सहित पैम्बर आया कि जिस को तुम्हारा जी चाहता नहींफिर तुम ने अभिमान किया। एक मत को झुठलाया और एक को मार डालते हो।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० ८७।।

– रूहल्कुद्स कहते हैं जबरईल को जो कि हरदम मसीह के साथ रहता था ।

(समीक्षकजब कुरान में साक्षी है कि मूसा को किताब दी तो उस का मानना मुसलमानों को आवश्यक हुआ और जो-जो उस पुस्तक में दोष हैं वे भी मुसलमानों के मत में आ गिरे और ‘मौजिजे’ अर्थात् दैवी शक्ति की बातें सब अन्यथा हैं भोले भाले मनुष्यों को बहकाने के लिये झूंठ मूंठ चला ली हैं क्योंकि सृष्टिक्रम और विद्या से विरुद्ध सब बातें झूंठी ही होती हैं जो उस समय ‘‘मौजिजे’’ थे तो इस समय क्यों नहीं। जो इस समय भी नहीं तो उस समय भी न थे इस में कुछ भी सन्देह नहीं।।२२।।

२३-और इस से पहिले काफिरों पर विजय चाहते थे जो कुछ पहिचाना था जब उन के पास वह आया झट काफिर हो गये। काफिरों पर लानत है अल्लाह की।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ८९।।

(समीक्षकक्या जैसे तुम अन्य मत वालों को काफिर कहते हो वैसे वे तुम को काफिर नहीं कहते हैं? और उन के मत के ईश्वर की ओर से धिक्कार देते हैं फिर कहो कौन सच्चा और कौन झूठा? जो विचार कर देखते हैं तो सब मत वालों में झूठ पाया जाता है जो सच है सो सब में एक सा है, ये सब लड़ाइयां मूर्खता की हैं।।२३।।

२४-आनन्द का सन्देशा ईमानदारों को।। अल्लाह, फरिश्तों, पैगम्बरों जिबरईल और मीकाईल का जो शत्रु है अल्लाह भी ऐसे काफिरों का शत्रु है।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० ९७।९८।।

(समीक्षकजब मुसलमान कहते हैं कि ‘खुदा लाशरीक’ है फिर यह फौज की फौज ‘शरीक’ कहां से कर दी? क्या जो औरों का शत्रु वह खुदा का भी शत्रु है। यदि ऐसा है तो ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर किसी का शत्रु नहीं हो सकता।।२४।।

२५-और अल्लाह खास करता है जिस को चाहता है साथ दया अपनी के।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० १०३।।

(समीक्षकक्या जो मुख्य और दया करने के योग्य न हो उस को भी प्रधान बनाता और उस पर दया करता है? जो ऐसा है तो खुदा बड़ा गड़बड़िया है क्योंकि फिर अच्छा काम कौन करेगा? और बुरे कर्म को कौन छोड़ेगा? क्योंकि खुदा की प्रसन्नता पर निर्भर करते हैं, कर्मफल पर नहीं, इस से सब को अनास्था होकर कर्मोच्छेदप्रसंग होगा।।२५।।

२६-ऐसा न हो कि काफिर लोग ईर्ष्या करके तुम को ईमान से फेर देवें क्योंकि उन में से ईमान वालों के बहुत से दोस्त हैं।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० १०१।।

(समीक्षकअब देखिये! खुदा ही उन को चिताता है कि तुम्हारे ईमान को काफिर लोग न डिगा देवें। क्या वह सर्वज्ञ नहीं है? ऐसी बातें खुदा की नहीं हो सकती हैं।।२६।।

२७-तुम जिधर मुंह करो उधर ही मुंह अल्लाह का है।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ११५।।

(समीक्षकजो यह बात सच्ची है तो मुसलमान ‘किबले’ की ओर मुंह क्यों करते हैं? जो कहें कि हम को किबले की ओर मुंह करने का हुक्म है तो यह भी हुक्म है कि चाहें जिधर की ओर मुख करो। क्या एक बात सच्ची और दूसरी बात झूठी होगी? और जो अल्लाह का मुख है तो वह सब ओर हो ही नहीं सकता। क्योंकि एक मुख एक ओर रहेगा, सब ओर क्योंकर रह सकेगा? इसलिए यह संगत नहीं।।२७।।

२८-जो आसमान और भूमि का उत्पन्न करने वाला है। जब वो कुछ करना चाहता है यह नहीं कि उस को करना पड़ता है किन्तु उसे कहता है कि हो जा! बस हो जाता है।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० ११७।।

(समीक्षकभला खुदा ने हुक्म दिया कि हो जा तो हुक्म किस ने सुना? और किस को सुनाया? और कौन बन गया? किस कारण से बनाया? जब यह लिखते हैं कि सृष्टि के पूर्व सिवाय खुदा के कोई भी दूसरा वस्तु न था तो यह संसार कहां से आया? विना कारण के कोई भी कार्य्य नहीं होता तो इतना बड़ा जगत् कारण के विना कहां से हुआ? यह बात केवल लड़कपन की है।

(पूर्वपक्षीनहीं नहीं, खुदा की इच्छा से ।

(उत्तरपक्षीक्या तुम्हारी इच्छा से एक मक्खी की टांग भी बन जा सकती है? जो कहते हो कि खुदा की इच्छा से यह सब कुछ जगत् बन गया।

(पूर्वपक्षीखुदा सर्वशक्तिमान् है इसलिये जो चाहे सो कर लेता है।

(उत्तरपक्षीसर्वशक्तिमान् का क्या अर्थ है?

(पूर्वपक्षीजो चाहे सो कर सके।

(उत्तरपक्षीक्या खुदा दूसरा खुदा भी बना सकता है? अपने आप मर सकता है? मूर्ख रोगी और अज्ञानी भी बन सकता है?

(पूर्वपक्षीऐसा कभी नहीं बन सकता।

(उत्तरपक्षीइसलिये परमेश्वर अपने और दूसरों के गुण, कर्म, स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता। जैसे संसार में किसी वस्तु के बनने बनाने में तीन पदार्थ प्रथम अवश्य होते हैं-एक बनानेवाला जैसे कुम्हार, दूसरी घड़ा बनने वाली मिट्टी और तीसरा उस का साधन जिस से घड़ा बनाया जाता है। जैसे कुम्हार, मिट्टी और साधन से घड़ा बनता है और बनने वाले घड़े के पूर्व कुम्हार, मिट्टी और साधन होते हैं वैसे ही जगत् के बनने से पूर्व परमेश्वर जगत् का कारण प्रकृति और उन के गुण, कर्म, स्वभाव अनादि हैं। इसलिये यह कुरान की बात सर्वथा असम्भव है ।।२८।।

२९-जब हमने लोगों के लिये काबे को पवित्र स्थान सुख देने वाला बनाया तुम नमा के लिये इबराहीम के स्थान को पकड़ो।।

-मं० १। सि० १। सू० २। आ० १२५।।

(समीक्षकक्या काबे के पहले पवित्र स्थान खुदा ने कोई भी न बनाया था? जो बनाया था तो काबे के बनाने की कुछ आवश्यकता न थी जो नहीं बनाया था तो विचारे पूर्वोत्पन्नों को पवित्र स्थान के विना ही रक्खा था? पहले ईश्वर को पवित्र स्थान बनाने का स्मरण न हुआ होगा।।२९।।

३०-वो कौन मनुष्य हैं जो इबराहीम के दीन से फिर जावें परन्तु जिस ने अपनी जान को मूर्ख बनाया और निश्चय हम ने दुनिया में उसी को पसन्द किया और निश्चय आखरत में वो ही नेक हैं।। -मं० १। सि० १। सू० २। आ० १३०।।

(समीक्षकयह कैसे सम्भव है कि जो इबराहीम के दीन को नहीं मानते वे सब मूर्ख हैं। इबराहीम को ही खुदा ने पसन्द किया इस का क्या कारण है? यदि धर्मात्मा होने के कारण से किया तो धर्मात्मा और भी बहुत हो सकते हैं। यदि विना धर्मात्मा होने के ही पसन्द किया तो अन्याय हुआ। हाँ! यह तो ठीक है कि जो धर्मात्मा है वही ईश्वर को प्रिय होता है; अधर्मी नहीं।।३०।।

३१-निश्चय हम तेरे मुख को आसमान में फिरता देखते हैं अवश्य हम तुझे उस किबले को फेरेंगे कि पसन्द करे उस को बस अपना मुख मस्जिदुल्हराम की ओर फेर, जहाँ कहीं तुम हो अपना मुख उस की ओर फेर लो।।

-मं० १। सि० २। सू० २। आ० १४४।।

(समीक्षकक्या यह छोटी बुत्परस्ती है? नहीं बड़ी।

(पूर्वपक्षीहम मुसलमान लोग बुत्परस्त नहीं हैं किन्तु बुत्शिकन अर्थात् मूर्त्तों को तोड़नेहारे हैं क्योंकि हम किबले को खुदा नहीं समझते।

(उत्तरपक्षीजिन को तुम बुत्परस्त समझते हो वे भी उन-उन मूर्त्तों को ईश्वर नहीं समझते किन्तु उन के सामने परमेश्वर की भक्ति करते हैं। यदि बुतों के तोड़नेहारे हो तो उस मस्जिद किबले बड़े बुत् को क्यों न तोड़ा?

(पूर्वपक्षीवाह जी! हमारे तो किबले की ओर मुख फेरने का कुरान में हुक्म है और इन को वेद में नहीं है फिर वे बुत्परस्त क्यों नहीं? और हम क्यों? क्योंकि हम को खुदा का हुक्म बजा लाना अवश्य है।

(उत्तरपक्षीजैसे तुम्हारे लिये कुरान में हुक्म है वैसे उन के लिये पुराण में आज्ञा है। जैसे तुम कुरान को खुदा का कलाम समझते हो वैसे पुराणी भी पुराणों को खुदा के अवतार व्यास जी का वचन समझते हैं। तुम में और इन में बुत्परस्ती का कुछ भिन्नभाव नहीं है प्रत्युत तुम बड़े बुत्परस्त और ये छोटे हैं। क्योंकि जब तक कोई मनुष्य अपने घर में से प्रविष्ट हुई बिल्ली को निकालने लगे तब तक उस के घर में ऊंट प्रविष्ट हो जाय वैसे ही मुहम्मद साहेब ने छोटे बुत् को मुसलमानों के मत से निकाला परन्तु बड़ा बुत् जो कि पहाड़ सदृश मक्के की मस्जिद है वह सब मुसलमानों के मत में प्रविष्ट करा दी; क्या यह छोटी बुत्परस्ती है? हां! जो हम वैदिक हैं वैसे ही तुम लोग भी वैदिक हो जाओ तो बुत्परस्ती आदि बुराइयों से बच सको; अन्यथा नहीं। तुम को जब तक अपनी बड़ी बुत्परस्ती को न निकाल दो तब तक दूसरे छोटे बुत्परस्तों के खण्डन से लज्जित होके निवृत्त रहना चाहिये और अपने को बुत्परस्ती से पृथक् करके पवित्र करना चाहिये।।३१।।

३२-जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते हैं उन के लिये यह मत कहो कि ये मृतक हैं किन्तु वे जीवित हैं।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० १५४।।

(समीक्षकभला ईश्वर के मार्ग में मरने मारने की क्या आवश्यकता है? यह क्यों नहीं कहते हो कि यह बात अपने मतलब सिद्ध करने के लिये है कि यह लोभ देंगे तो लोग खूब लड़ेंगे, अपना विजय होगा, मारने से न डरेंगे, लूट मार कराने से ऐश्वर्य प्राप्त होगा; पश्चात् विषयानन्द करेंगे इत्यादि स्वप्रयोजन के लिये यह विपरीत व्यवहार किया है।।३२।।

३३-और यह कि अल्लाह कठोर दुःख देने वाला है।। शैतान के पीछे मत चलो निश्चय वो तुम्हारा प्रत्यक्ष शत्रु है।। उसके विना और कुछ नहीं कि बुराई और निर्लज्जता की आज्ञा दे और यह कि तुम कहो अल्लाह पर जो नहीं जानते।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० १६८। १६९। १७०।।

(समीक्षकक्या कठोर दुःख देने वाला दयालु खुदा पापियों पुण्यात्माओं पर है अथवा मुसलमानों पर दयालु और अन्य पर दयाहीन है? जो ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। और पक्षपाती नहीं है तो जो मनुष्य कहीं धर्म करेगा उस पर ईश्वर दयालु और जो अधर्म करेगा उस पर दण्डदाता होगा तो फिर बीच में मुहम्मद साहेब और कुरान को मानना आवश्यक न रहा। और जो सब को बुराई कराने वाला मनुष्यमात्र का शत्रु शैतान है उस को खुदा ने उत्पन्न ही क्यों किया? क्या वह भविष्यत् की बात नहीं जानता था? जो कहो कि जानता था परन्तु परीक्षा के लिये बनाया तो भी नहीं बन सकता क्योंकि परीक्षा करना अल्पज्ञ का काम है; सर्वज्ञ तो सब जीवों के अच्छे बुरे कर्मों को सदा से ठीक-ठीक जानता है। और शैतान सब को बहकाता है तो शैतान को किसने बहकाया? जो कहो कि शैतान आप से आप बहकता है तो अन्य भी आप से आप बहक सकते हैं; बीच में शैतान का क्या काम? और जो खुदा ही ने शैतान को बहकाया तो खुदा शैतान का भी शैतान ठहरेगा। ऐसी बात ईश्वर की नहीं हो सकती। और जो कोई बहकाता है वह कुसंग तथा अविद्या से भ्रान्त होता है।।३३।।

३४-तुम पर मुर्दार, लोहू और गोश्त सूअर का हराम है और अल्लाह के विना जिस पर कुछ पुकारा जावे।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० १७३।।

(समीक्षकयहां विचारना चाहिये कि मुर्दा चाहे आप से आप मरे वा किसी के मारने से दोनों बराबर हैं। हां! इन में कुछ भेद भी है तथापि मृतकपन में कुछ भेद नहीं। और जब एक सूअर का निषेध किया तो क्या मनुष्य का मांस खाना उचित है? क्या यह बात अच्छी हो सकती है कि परमेश्वर के नाम पर शत्रु आदि को अत्यन्त दुःख देके प्राणहत्या करनी? इस से ईश्वर का नाम कलंकित हो जाता है। हां! ईश्वर ने विना पूर्वजन्म के अपराध के मुसलमानों के हाथ से दारुण दुःख क्यों दिलाया? क्या उन पर दयालु नहीं है? उन को पुत्रवत् नहीं मानता? जिस वस्तु से अधिक उपकार होवे उन गाय आदि के मारने का निषेध न करना जानो हत्या करा कर खुदा जगत् का हानिकारक है । हिंसारूप पाप से कलंकित भी हो जाता है। ऐसी बातें खुदा और खुदा के पुस्तक की कभी नहीं हो सकतीं।।३४।।

३५-रोजे की रात तुम्हारे लिये हलाल की गई कि मदनोत्सव करना अपनी बीबियों से। वे तुम्हारे वास्ते पर्दा हैं और तुम उन के लिये पर्दा हो। अल्लाह ने जाना कि तुम चोरी करते हो अर्थात् व्यभिचार, बस फिर अल्लाह ने क्षमा किया तुम को बस उन से मिलो और ढूंढो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये लिख दिया है अर्थात् सन्तान, खाओ पीयो यहां तक कि प्रकट हो तुम्हारे लिये काले तागे से सुपेद तागा वा रात से जब दिन निकले।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० १८७।।

(समीक्षकयहां यह निश्चित होता है कि जब मुसलमानों का मत चला वा उसके पहले किसी ने किसी पौराणिक को पूछा होगा कि चान्द्रायण व्रत जो एक महीने भर का होता है उस की विधि क्या है? वह शास्त्रविधि जो कि मध्याह्न में-चंद्र की कला घटने बढ़ने के अनुसार ग्रासों को घटाना बढ़ाना और मध्याह्न दिन में खाना लिखा है उस को न जानकर कहा होगा कि चन्द्रमा का दर्शन करके खाना, उस को इन मुसलमान लोगों ने इस प्रकार का कर लिया। परन्तु व्रत में स्त्री समागम का त्याग है वह एक बात खुदा ने बढ़कर कह दी कि तुम स्त्रियों का भी समागम भले ही किया करो और रात में चाहे अनेक बार खाओ। भला यह व्रत क्या हुआ? दिन को न खाया रात को खाते रहे। यह सृष्टिक्रम से विपरीत है कि दिन में न खाना रात में खाना।।३५।।

३६-अल्लाह के मार्ग में लड़ो उन से जो तुम से लड़ते हैं।। मार डालो तुम उन को जहाँ पाओ, कतल से कुफ्र बुरा है।। यहां तक उन से लड़ो कि कुफ्र न रहे और होवे दीन अल्लाह का।। उन्होंने जितनी जियादती करी तुम पर उतनी ही तुम उन के साथ करो।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० १९०। १९१। १९२। १९३।।

(समीक्षकजो कुरान में ऐसी बातें न होतीं तो मुसलमान लोग इतना बड़ा अपराध जो कि अन्य मत वालों पर किया है; न करते। और विना अपराधियों को मारना उन पर बड़ा पाप है। जो मुसलमान के मत का ग्रहण न करना है उस को कुफ्र कहते हैं अर्थात् कुफ्र से कतल को मुसलमान लोग अच्छा मानते हैं। अर्थात् जो हमारे दीन को न मानेगा उस को हम कतल करेंगे सो करते ही आये। महब पर लड़ते-लड़ते आप ही राज्य आदि से नष्ट हो गये। और उन का मन अन्य मत वालों पर अति कठोर रहता है। क्या चोरी का बदला चोरी है? कि जितना अपराध हमारा चोर आदि चोरी करें क्या हम भी चोरी करें? यह सर्वथा अन्याय की बात है। क्या कोई अज्ञानी हम को गालियां दे क्या हम भी उस को गाली देवें? यह बात न ईश्वर की और न ईश्वर के भक्त विद्वान् की और न ईश्वरोक्त पुस्तक की हो सकती है। यह तो केवल स्वार्थी ज्ञानरहित मनुष्य की है।।३६।।

३७-अल्लाह झगड़ा करने वाले को मित्र नहीं रखता।। ऐ लोगो जो ईमान लाये हो इस्लाम में प्रवेश करो।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० २०५। २०८।।

(समीक्षकजो झगड़ा करने वाले को खुदा मित्र नहीं समझता तो क्यों आप ही मुसलमानों को झगड़ा करने में प्रेरणा करता? और झगड़ालू मुसलमानों से मित्रता क्यों करता है? क्या मुसलमानों के मत में मिलने ही से खुदा राजी है तो वह मुसलमानों ही का पक्षपाती है; सब संसार का ईश्वर नहीं। इस से यहां यह विदित होता है कि न कुरान ईश्वरकृत और न इस में कहा हुआ ईश्वर हो सकता है।।३७।।

३८-खुदा जिसको चाहे अनन्त रिक देवे।।

-मं० १। सि० २। सू० २। आ० २१२।।

(समीक्षकक्या विना पाप पुण्य के खुदा ऐसे ही रिक देता है? फिर भलाई बुराई का करना एक सा ही हुआ। क्योंकि सुख दुःख प्राप्त होना उस की इच्छा पर है। इस से धर्म से विमुख होकर मुसलमान लोग यथेष्टाचार करते हैं और कोई कोई इस कुरानोक्त पर विश्वास न करके धर्मात्मा भी होते हैं।।३८।।

३९-प्रश्न करते हैं तुझ से रजस्वला को कह वो अपवित्र हैं। पृथक् रहो ऋतु समय में उन के समीप मत जाओ जब तक कि वे पवित्र न हों। जब नहा लेवें उन के पास उस स्थान से जाओ खुदा ने आज्ञा दी।। तुम्हारी बीवियां तुम्हारे लिये खेतियां हैं बस जाओ जिस तरह चाहो अपने खेत में।। तुम को अल्लाह लगब (बेकार, व्यर्थ) शपथ में नहीं पकड़ता।।

-मं० १। सि० २। सू० २। आ० २२२। २२३। २२४।।

(समीक्षकजो यह रजस्वला का स्पर्श संग न करना लिखा है वह अच्छी बात है। परन्तु जो यह स्त्रियों को खेती के तुल्य लिखा और जैसा जिस तरह से चाहो जाओ यह मनुष्यों को विषयी करने का कारण है। जो खुदा बेकार शपथ पर नहीं पकड़ता तो सब झूठ बोलेंगे शपथ तोडें़गे। इस से खुदा झूठ का प्रवर्त्तक होगा।।३९।।

४०-वो कौन मनुष्य है जो अल्लाह को उधार देवे। अच्छा बस अल्लाह द्विगुण करे उस को उस के वास्ते।। -मं० १। सि० २। सू० २। आ० २४५।।

(समीक्षकभला खुदा को कर्ज उधार१ लेने से क्या प्रयोजन? जिस ने सारे संसार को बनाया वह मनुष्य से कर्ज लेता है? कदापि नहीं। ऐसा तो विना समझे कहा जा सकता है। क्या उस का खजाना खाली हो गया था? क्या वह हुण्डी पुड़िया व्यापारादि में मग्न होने से टोटे में फंस गया था जो उधार लेने लगा? और एक का दो-दो देना स्वीकार करता है, क्या यह साहूकारों का काम है? किन्तु ऐसा काम तो दिवालियों वा खर्च अधिक करने वाले और आय न्यून होने वालों को करना पड़ता है; ईश्वर को नहीं।।४०।।

४१-उनमें से कोई ईमान न लाया और कोई काफिर हुआ, जो अल्लाह चाहता न लड़ते, जो चाहता है अल्लाह करता है।।

-मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २४९।।

(समीक्षकक्या जितनी लड़ाई होती है वह ईश्वर ही की इच्छा से। क्या वह अधर्म करना चाहे तो कर सकता है? जो ऐसी बात है तो वह खुदा ही नहीं, क्योंकि भले मनुष्यों का यह कर्म नहीं कि शान्तिभंग करके लड़ाई करावें। इस से विदित होता है कि यह कुरान न ईश्वर का बनाया और न किसी धार्मिक विद्वान् का रचित है।।४१।।

४२-जो कुछ आसमान और पृथिवी पर है सब उसी के लिये है? चाहे उस की कुरसी ने आसमान और पृथिवी को समा लिया है।।

-मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २५५।।

(समीक्षकजो आकाश भूमि में पदार्थ हैं वे सब जीवों के लिये परमात्मा ने उत्पन्न किये हैं, अपने लिये नहीं क्योंकि वह पूर्णकाम है, उस को किसी पदार्थ की अपेक्षा नहीं। जब उस की कुर्सी है तो वह एकदेशी है। जो एकदेशी होता है वह ईश्वर नहीं कहाता क्योंकि ईश्वर तो व्यापक है।।४२।।

४३-अल्लाह सूर्य को पूर्व से लाता है बस तू पश्चिम से ले आ, बस जो काफिर था हैरान हुआ था, निश्चय अल्लाह पापियों को मार्ग नहीं दिखलाता।। -मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २५८।।

(समीक्षकदेखिये यह अविद्या की बात! सूर्य्य न पूर्व से पश्चिम और न पश्चिम से पूर्व कभी आता जाता है, वह तो अपनी परिधि में घूमता रहता है। इस से निश्चित जाना जाता है कि कुरान के कर्ता को खगोल और न भूगोल विद्या आती थी। जो पापियों को मार्ग नहीं बतलाता तो पुण्यात्माओं के लिये भी मुसलमानों के खुदा की आवश्यकता नहीं। क्योंकि धर्मात्मा तो धर्ममार्ग में ही होते हैं। मार्ग तो धर्म से भूले हुए मनुष्यों को बतलाना होता है। सो कर्त्तव्य के न करने से कुरान

– इसी आयत के भाष्य में तफसीरहुसैनी में लिखा है कि एक मनुष्य मुहम्मद साहब के पास आया । उसने कहा कि ऐ रसूलल्लाह खुदा कर्ज क्यों मांगता है उन्होंने उत्तर दिया कि तुम को बहिश्त में ले जाने के लिये । उस ने कहा जो आप जमानत लें तो मैं दूं । मुहम्मद साहब ने उसकी जमानत ले ली । खुदा का भरोसा न हुआउस के दूत का हुआ ।

के कर्त्ता की बड़ी भूल है।।४३।।

४४-कहा चार जानवरों से ले उन की सूरत पहिचान रख। फिर हर पहाड़ पर उन में से एक-एक टुकड़ा रख दे। फिर उन को बुला, दौड़ते तेरे पास चले आवेंगे।। -मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २६०।।

(समीक्षकवाह-वाह देखो जी! मुसलमानों का खुदा भानमती के समान खेल कर रहा है! क्या ऐसी ही बातों से खुदा की खुदाई है। बुद्धिमान् लोग ऐसे खुदा को तिलाञ्जलि देकर दूर रहेंगे और मूर्ख लोग फसेंगे? इस से खुदा की बड़ाई के बदले बुराई उस के पल्ले पड़ेगी।।४४।।

४५-जिस को चाहे नीति देता है।। -मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २६१।।

(समीक्षकजब जिस को चाहता है उस को नीति देता है तो जिस को नहीं चाहता है उस को अनीति देता होगा। यह बात ईश्वरता की नहीं किन्तु जो पक्षपात छोड़ सब को नीति का उपदेश करता है वही ईश्वर और आप्त हो सकता है; अन्य नहीं।।४५।।

४६-जो लोग ब्याज खाते हैं वे कबरों से नहीं खड़े होंगे।। -मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २७५।।

(समीक्षकक्या वे कबरों में ही पड़े रहेंगे और जो पड़े रहेंगे तो कब तक ? ऐसी असम्भव बात ईश्वर के पुस्तक की तो नहीं हो सकती किन्तु बालबुद्धियों की तो हो सकती है ।।४६।।

४७-वह कि जिस को चाहेगा क्षमा करेगा जिस को चाहे दण्ड देगा क्योंकि वह सब वस्तु पर बलवान् है।। -मं० १। सि० ३। सू० २। आ० २६९।।

(समीक्षकक्या क्षमा के योग्य पर क्षमा न करना, अयोग्य पर क्षमा करना गवरगण्ड राजा के तुल्य यह कर्म नहीं है? यदि ईश्वर जिस को चाहता पापी वा पुण्यात्मा बनाता है तो जीव को पाप-पुण्य न लगना चाहिये और जब ईश्वर ने उस को वैसा ही किया तो जीव को दुःख-सुख भी होना न चाहिये। जैसे सेनापति की आज्ञा से किसी भृत्य ने किसी को मारा वा रक्षा की उस का फलभागी वह नहीं होता वैसे वे भी नहीं।।४७।।

४८-कह इस से अच्छी और क्या परहेजगारों को खबर दूं कि अल्लाह की ओर से बहिश्तें हैं जिन में नहरें चलती हैं उन्हीं में सदैव रहने वाली शुद्ध बीबियां हैं अल्लाह की प्रसन्नता से। अल्लाह उन को देखने वाला है साथ बन्दों के।।

-मं० १। सि० ३। सू० ३। आ० १५।।

(समीक्षकभला यह स्वर्ग है किवा वेश्यावन? इस को ईश्वर कहना वा स्त्रैण? कोई भी बुद्धिमान् ऐसी बातें जिस में हों उस को परमेश्वर का किया पुस्तक मान सकता है? यह पक्षपात क्यों करता है। जो बीबियां बहिश्त में सदा रहती हैं वे यहां जन्म पाके वहाँ गई हैं वा वहीं उत्पन्न हुई हैं। यदि यहां जन्म पाकर वहाँ गई हैं और जो कयामत की रात से पहले ही वहाँ बीबियों को बुला लिया तो उन के खाविन्दों को क्यों न बुला लिया। और कयामत की रात में सब का न्याय होगा इस नियम को क्यों तोड़ा । यदि वहीं जन्मी हैं तो कयामत तक वे क्योंकर निर्वाह करती हैं। जो उन के लिये पुरुष भी हैं तो यहां से बहिश्त में जाने वाले मुसलमानों को खुदा बीबियां कहां से देगा? और जैसे बीबियां बहिश्त में सदा रहने वाली बनाईं वैसे पुरुषों को वहाँ सदा रहने वाले क्यों नहीं बनाया। इसलिये मुसलमानों का खुदा अन्यायकारी, बे समझ है।।४८।।

४९-निश्चय अल्लाह की ओर से दीन इसलाम है।।

-मं० १। सि० ३। सू० ३। आ० १९।।

(समीक्षकक्या अल्लाह मुसलमानों ही का है औरों का नहीं? क्या तेरह सौ वर्षों के पूर्व ईश्वरीय मत था ही नहीं? इसी से यह कुरान ईश्वर का बनाया तो नहीं किन्तु किसी पक्षपाती का बनाया है।।४९।।

५०-प्रत्येक जीव को पूरा दिया जावेगा जो कुछ उस ने कमाया और वे न अन्याय किये जावेंगे।। कह या अल्लाह तू ही मुल्क का मालिक है जिस को चाहे देता है, जिस से चाहे छीनता है, जिस को चाहे प्रतिष्ठा देता है, जिस को चाहे अप्रतिष्ठा देता है, सब कुछ तेरे ही हाथ में है, प्रत्येक वस्तु पर तू ही बलवान् है।। रात को दिन में और दिन को रात में पैठाता है और मृतक को जीवित से जीवित को मृतक से निकालता है और जिस को चाहे अनन्त अन्न देता है।। मुसलमानों को उचित है कि काफिरों को मित्र न बनावें सिवाय मुसलमानों के जो कोई यह करे बस वह अल्लाह की ओर से नहीं।। कह जो तुम चाहते हो अल्लाह को तो पक्ष करो मेरा। अल्लाह चाहेगा तुम को और तुम्हारे पाप क्षमा करेगा; निश्चय ही करुणामय है।। -मं० १। सि० ३। सू० ३। आ० २५। २६। २७। २८। २९।।

(समीक्षकजब प्रत्येक जीव को कर्मों का पूरा-पूरा फल दिया जावेगा तो क्षमा नहीं किया जायगा। और जो क्षमा किया जायगा तो पूरा फल नहीं दिया जायगा और अन्याय होगा जब विना उत्तम कर्मों के राज्य प्रतिष्ठा देगा तो भी अन्यायी हो जायगा और विना पाप के राज्य और प्रतिष्ठा छीन लेगा तो भी अन्यायकारी हो जायगा। भला! जीवित से मृतक और मृतक से जीवित कभी हो सकता है? क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था अछेद्य-अभेद्य है। कभी अदल-बदल नहीं हो सकती। अब देखिये पक्षपात की बातें कि जो मुसलमान के मजहब में नहीं हैं उन को काफिर ठहराना। उन में श्रेष्ठों से भी मित्रता न रखने और मुसलमानों में दुष्टों से भी मित्रता रखने के लिये उपदेश करना ईश्वर को ईश्वरता से बहिः कर देता है। इस से यह कुरान, कुरान का खुदा और मुसलमान लोग केवल पक्षपात अविद्या के भरे हुए हैं। इसीलिये मुसलमान लोग अन्धेरे में हैं। और देखिये मुहम्मद साहेब की लीला कि जो तुम मेरा पक्ष करोगे तो खुदा तुम्हारा पक्ष करेगा और जो तुम पक्षपातरूप पाप करोगे उस की क्षमा भी करेगा। इस से सिद्ध होता है कि मुहम्मद साहेब का अन्तःकरण शुद्ध नहीं था। इसीलिये अपने मतलब सिद्ध करने के लिये मुहम्मद साहेब ने कुरान बनाया वा बनवाया ऐसा विदित होता है।।५०।।

५१-जिस समय कहा फरिश्तों ने कि ऐ मर्य्यम तुझ को अल्लाह ने पसन्द किया और पवित्र किया ऊपर जगत् की स्त्रियों के।।

-मं० १। सि० ३। सू० ३। आ० ४५।।

(समीक्षकभला जब आज कल खुदा के फरिश्ते और खुदा किसी से बातें करने को नहीं आते तो प्रथम कैसे आये होंगे? जो कहो कि पहले के मनुष्य पुण्यात्मा थे अब के नहीं तो यह बात मिथ्या है। किन्तु जिस समय ईसाई और मुसलमानों का मत चला था उस समय उन देशों में जंगली और विद्याहीन मनुष्य अधिक थे इसी लिये ऐसे विद्या-विरुद्ध मत चल गये। अब विद्वान् अधिक हैं इसलिये नहीं चल सकता। किन्तु जो-जो ऐसे पोकल मजहब हैं वे भी अस्त होते जाते हैं; वृद्धि की तो कथा ही क्या है।।५१।।

५२-उस को कहता है कि हो बस हो जाता है।। काफिरों ने धोखा दिया, ईश्वर ने धोखा दिया, ईश्वर बहुत मकर करने वाला है।।

-मं० १। सि० ३। सू० ३। आ० ५३। ५४।।

(समीक्षकजब मुसलमान लोग खुदा के सिवाय दूसरी चीज नहीं मानते तो खुदा ने किस से कहा? और उस के कहने से कौन हो गया? इस का उत्तर मुसलमान सात जन्म में भी नहीं दे सकेंगे। क्योंकि विना उपादान कारण के कार्य कभी नहीं हो सकता। विना कारण के कार्य कहना जानो अपने माँ बाप के विना मेरा शरीर हो गया ऐसी बात है। जो धोखा देता और मकर अर्थात् छल और दम्भ करता है वह ईश्वर तो कभी नहीं हो सकता किन्तु उत्तम मनुष्य भी ऐसा काम नहीं करता।।५२।।

५३-क्या तुम को यह बहुत न होगा कि अल्लाह तुम को तीन हजार फरिश्तों के साथ सहाय देवे।। -मं० १। सि० ४। सू० ३। आ० १२४।।

(समीक्षकजो मुसलमानों को तीन हजार फरिश्तों के साथ सहाय देता था तो अब मुसलमानों की बादशाही बहुत सी नष्ट हो गई और होती जाती है क्यों सहाय नहीं देता? इसलिये यह बात केवल लोभ देके मूर्खों को फंसाने के लिये महा अन्याय की है।।५३।।

५४-और काफिरों पर हम को सहाय कर।। अल्लाह तुम्हारा उत्तम सहायक और कारसाज है।। जो तुम अल्लाह के मार्ग में मारे जाओ वा मर जाओ, अल्लाह की दया बहुत अच्छी है।। -मं० १। सि० ४। सू० ३। आ० १४७। १५०। १५८।।

(समीक्षकअब देखिये मुसलमानों की भूल कि जो अपने मत से भिन्न हैं उन के मारने के लिये खुदा की प्रार्थना करते हैं। क्या परमेश्वर भोला है जो इन की बात मान लेवे? यदि मुसलमानों का कारसाज अल्लाह ही है तो फिर मुसलमानों के कार्य नष्ट क्यों होते हैं? और खुदा भी मुसलमानों के साथ मोह से फंसा हुआ दीख पड़ता है, जो ऐसा पक्षपाती खुदा है तो धर्मात्मा पुरुषों का उपासनीय कभी नहीं हो सकता।।५४।।

५५-और अल्लाह तुम को परोक्षज्ञ नहीं करता परन्तु अपने पैगम्बरों से जिस को चाहे पसन्द करे। बस अल्लाह और उस के रसूल के साथ ईमान लाओ।।

-मं० १। सि० ४। सू० ३। आ० १७९।।

(समीक्षकजब मुसलमान लोग सिवाय खुदा के किसी के साथ ईमान नहीं लाते और न किसी को खुदा का साझी मानते हैं तो पैगम्बर साहेब को क्यों ईमान में खुदा के साथ शरीक किया? अल्लाह ने पैगम्बर के साथ ईमान लाना लिखा, इसी से पैगम्बर भी शरीक हो गया, पुनः लाशरीक का कहना ठीक न हुआ । यदि इस का अर्थ यह समझा जाय कि मुहम्मद साहेब के पैगम्बर होने पर विश्वास लाना चाहिये तो यह प्रश्न होता है कि मुहम्मद साहब के होने की क्या आवश्यकता है? यदि खुदा उन को पैगम्बर किये विना अपना अभीष्ट कार्य नहीं कर सकता तो अवश्य असमर्थ हुआ।।५५।।

५६-ऐ ईमानवालो! सन्तोष करो परस्पर थामे रक्खो और लड़ाई में लगे रहो। अल्लाह से डरो कि तुम छुटकारा पाओ।।

-मं० १। सि० ४। सू० ३। आ० १८६।।

(समीक्षकयह कुरान का खुदा और पैगम्बर दोनों लड़ाईबाज थे। जो लड़ाई की आज्ञा देता है वह शान्तिभंग करने वाला होता है। क्या नाम मात्र खुदा से डरने से छुटकारा पाया जाता है? वा अधर्मयुक्त लड़ाई आदि से डरने से? जो प्रथम पक्ष है तो डरना न डरना बराबर और जो द्वितीय पक्ष है तो ठीक है।।५६।।

५७-ये अल्लाह की हदें हैं जो अल्लाह और उनके रसूल का कहा मानेगा वह बहिश्त में पहुँचेगा जिन में नहरें चलती हैं और यही बड़ा प्रयोजन है।। जो अल्लाह की और उस के रसूल की आज्ञा भंग करेगा और उस की हदों से बाहर हो जायगा वो सदैव रहने वाली आग में जलाया जावेगा और उस के लिये खराब करने वाला दुःख है।। -मं० १। सि० ४। सू० ४। आ० १३। १४।।

(समीक्षकखुदा ही ने मुहम्मद साहेब पैगम्बर को अपना शरीक कर लिया है और खुद कुरान ही मेंं लिखा है। और देखो! खुदा पैगम्बर साहेब के साथ कैसा फंसा है कि जिस ने बहिश्त में रसूल का साझा कर दिया है। किसी एक बात में भी मुसलमानों का खुदा स्वतन्त्र नहीं तो लाशरीक कहना व्यर्थ है। ऐसी-ऐसी बातें ईश्वरोक्त पुस्तक में नहीं हो सकतीं।।५७।।

५८-और एक त्रसरेणु की बराबर भी अल्लाह अन्याय नहीं करता । और जो भलाई होवे उस का दुगुण करेगा उस को।।

-मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० ४०।।

(समीक्षकजो एक त्रसरेणु के बराबर भी खुदा अन्याय नहीं करता तो पुण्य को द्विगुण क्यों देता? और मुसलमानों का पक्षपात क्यों करता है? वास्तव में द्विगुण वा न्यून फल कर्मों का देवे तो खुदा अन्यायी हो जावे।।५८।।

५९-जब तेरे पास से बाहर निकलते हैं तो तेरे कहने के सिवाय (विपरीत) शोचते हैं। अल्लाह उन की सलाह को लिखता है।। अल्लाह ने उन की कमाई वस्तु के कारण से उन को उलटा किया। क्या तुम चाहते हो कि अल्लाह के गुमराह किये हुए को मार्ग पर लाओ? बस जिस को अल्लाह गुमराह करे उसको कदापि मार्ग न पावेगा।। -मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० ८१-८८।।

(समीक्षकजो अल्लाह बातों को लिख बहीखाता बनाता जाता है तो सर्वज्ञ नहीं। जो सर्वज्ञ है तो लिखने का क्या काम? और जो मुसलमान कहते हैं कि शैतान ही सब को बहकाने से दुष्ट हुआ है तो जब खुदा ही जीवों को गुमराह करता है तो खुदा और शैतान में क्या भेद रहा? हां! इतना भेद कह सकते हैं कि खुदा बड़ा शैतान, वह छोटा शैतान। क्योंकि मुसलमानों ही का कौल है कि जो बहकाता है वही शैतान है तो इस प्रतिज्ञा से खुदा को भी शैतान बना दिया।।५९।।

६०-और अपने हाथों को न रोकें तो उन को पकड़ लो और जहाँ पाओ मार डालो।। मुसलमान को मुसलमान का मारना योग्य नहीं। जो कोई अनजाने से मार डाले बस एक गर्दन मुसलमान का छोड़ना है और खून बहा उन लोगों की ओर सौंपी हुई जो उस कौम से होवें, और तुम्हारे लिये दान कर देवें, जो दुश्मन की कौम से।। और जो कोई मुसलमान को जान कर मार डाले वह सदैव काल दोजख में रहेगा, उस पर अल्लाह का क्रोध और लानत है।। -मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० ९१। ९२। ९३।।

(समीक्षकअब देखिये महा पक्षपात की बात कि जो मुसलमान न हो उस को जहाँ पाओ मार डालो और मुसलमानों को न मारना। भूल से मुसलमानों के मारने में प्रायश्चित्त और अन्य को मारने से बहिश्त मिलेगा ऐसे उपदेश को कुए में डालना चाहिये। ऐसे-ऐसे पुस्तक ऐसे-ऐसे पैगम्बर ऐसे-ऐसे खुदा और ऐसे-ऐसे मत से सिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं। ऐसों का न होना अच्छा और ऐसे प्रामादिक मतों से बुद्धिमानों को अलग रह कर वेदोक्त सब बातों को मानना चाहिये क्योंकि उस में असत्य किञ्चिन्मात्र भी नहीं है। और जो मुसलमान को मारे उस को दोजख मिले और दूसरे मत वाले कहते हैं कि मुसलमान को मारे तो स्वर्ग मिले। अब कहो इन दोनों मतों में से किस को मानें किस को छोड़ें? किन्तु ऐसे मूढ़ प्रकल्पित मतों को छोड़ कर वेदोक्त मत स्वीकार करने योग्य सब मनुष्यों के लिये है कि जिस में आर्य्य मार्ग अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग में चलना और दस्यु अर्थात् दुष्टों के मार्ग से अलग रहना लिखा है; सर्वोत्तम है।।६०।।

६१-और शिक्षा प्रकट होने के पीछे जिस ने रसूल से विरोध किया और मुसलमानों से विरुद्ध पक्ष किया; अवश्य हम उनको दोजख में भेजेंगे।।

-मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० ११५।।

(समीक्षकअब देखिये खुदा और रसूल की पक्षपात की बातें! मुहम्मद साहेब आदि समझते थे कि जो खुदा के नाम से ऐसी हम न लिखेंगे तो अपना मजहब न बढ़ेगा और पदार्थ न मिलेंगे, आनन्द भोग न होगा। इसी से विदित होता है कि वे अपने मतलब करने में पूरे थे और अन्य के प्रयोजन बिगाड़ने में। इस से ये अनाप्त थे। इन की बात का प्रमाण आप्त विद्वानों के सामने कभी नहीं हो सकता।।६१।।

६२-जो अल्लाह फरिश्तों किताबों रसूलों और कयामत के साथ कुफ्र करे निश्चय वह गुमराह है।। निश्चय जो लोग ईमान लाये फिर काफिर हुए फिर-फिर ईमान लाये पुनः फिर गये और कुफ्र में अधिक बढ़े। अल्लाह उन को कभी क्षमा न करेगा और न मार्ग दिखलावेगा।। -मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० १३६। १३७।।

(समीक्षकक्या अब भी खुदा लाशरीक रह सकता है? क्या लाशरीक कहते जाना और उस के साथ बहुत से शरीक भी मानते जाना यह परस्पर विरुद्ध बात नहीं है? क्या तीन बार क्षमा के पश्चात् खुदा क्षमा नहीं करता? और तीन वार कुफ्र करने पर रास्ता दिखलाता है? वा चौथी बार से आगे नहीं दिखलाता? यदि चार-चार बार भी कुफ्र सब लोग करें तो कुफ्र बहुत ही बढ़ जाये।।६२।।

६३-निश्चय अल्लाह बुरे लोगों और काफिरों को जमा करेगा दोजख में।। निश्चय बुरे लोग धोखा देते हैं अल्लाह को और उन को वह धोखा देता है।। ऐ ईमान वालो! मुसलमानों को छोड़ काफिरों को मित्र मत बनाओ।।

-मं० १। सि० ५। सू० ४। आ० १४०। १४२। १४४।।

(समीक्षकमुसलमानों के बहिश्त और अन्य लोगों के दोज़ख में जाने का क्या प्रमाण? वाह जी वाह! जो बुरे लोगों के धोखे में आता और अन्य को धोखा देता है ऐसा खुदा हम से अलग रहे किन्तु जो धोखेबाज हैं उन से जाकर मेल करे और वे उस से मेल करें । क्योंकि-

दृशी शीतलादेवी तादृश खरवाहन 

जैसे को तैसा मिले तभी निर्वाह होता है। जिस का खुदा धोखेबाज है उस के उपासक लोग धोखेबाज क्यों न हों? क्या दुष्ट मुसलमान हो उस से मित्रता और अन्य श्रेष्ठ मुसलमान भिन्न से शत्रुता करना किसी को उचित हो सकती है? ।।६३।।

६४-ऐ लोगो! निश्चय तुम्हारे पास सत्य के साथ खुदा की ओर से पैगम्बर आया। बस तुम उन पर ईमान लाओ।। अल्लाह माबूद अकेला है।।

-मं० १। सि० ६। सू० ४। आ० १७०। १७१।।

(समीक्षकक्या जब पैगम्बरों पर ईमान लाना लिखा तो ईमान में पैगम्बर खुदा का शरीक अर्थात् साझी हुआ वा नहीं। जब अल्लाह एकदेशी है, व्यापक नहीं, तभी तो उस के पास से पैगम्बर आते जाते हैं तो वह ईश्वर भी नहीं हो सकता। कहीं सर्वदेशी लिखते हैं, कहीं एकदेशी। इस से विदित होता है कि कुरान एक का बनाया नहीं किन्तु बहुतों ने बनाया है।।६४।।

६५-तुम पर हराम किया गया मुर्दार, लोहू, सूअर का मांस जिस पर अल्लाह के विना कुछ और पढ़ा जावे, गला घोटे, लाठी मारे, ऊपर से गिर पड़े, सींग मारे और दरन्दे का खाया हुआ।। -मं० २। सि० ६। सू० ५। आ० ३।।

(समीक्षकक्या इतने ही पदार्थ हराम हैं? अन्य बहुत से पशु तथा तिर्य्यक् जीव कीड़ी आदि मुसलमानों को हलाल होंगे? इस वास्ते यह मनुष्यों की कल्पना है; ईश्वर की नहीं। इस से इस का प्रमाण भी नहीं।।६५।।

६६-और अल्लाह को अच्छा उधार दो अवश्य मैं तुम्हारी बुराई दूर करूंगा और तुम्हें बहिश्तों में भेजूंगा।। -मं० २। सि० ६। सू० ५। आ० १२।।

(समीक्षकवाह जी! मुसलमानों के खुदा के घर में कुछ भी धन विशेष नहीं रहा होगा। जो विशेष होता तो उधार क्यों मांगता? और उन को क्यों बहकाता कि तुम्हारी बुराई छुड़ा के तुम को स्वर्ग में भेजूंगा? यहां विदित होता है कि खुदा के नाम से मुहम्मद साहेब ने अपना मतलब साधा है।।६६।।

६७-जिस को चाहता है क्षमा करता है जिस को चाहे दुःख देता है।। जो कुछ किसी को भी न दिया वह तुम्हें दिया।।

-मं० २। सि० ६। सू० ५। आ० १८। २०।।

(समीक्षकजैसे शैतान जिस को चाहता पापी बनाता वैसे ही मुसलमानों का खुदा भी शैतान का काम करता है ! जो ऐसा है तो फिर बहिश्त और दोजख में खुदा जावे क्योंकि वह पाप पुण्य करने वाला हुआ, जीव पराधीन है। जैसी सेना सेनापति के आवमीन रक्षा करती और किसी को मारती है, उस की भलाई बुराई

सेनापति को होती है; सेना पर नहीं।।६७।।

६८-आज्ञा मानो अल्लाह की और आज्ञा मानो रसूल की।।

-मं० २। सि० ७। सू० ५। आ० ९२।।

(समीक्षकदेखिये! यह बात खुदा के शरीक होने की है। फिर खुदा को ‘लाशरीक’ मानना व्यर्थ है।।६८।।

६९-अल्लाह ने माफ किया जो हो चुका और जो कोई फिर करेगा अल्लाह उस से बदला लेगा।। -मं० २। सि० ७। सू० ५। आ० ९५।।

(समीक्षककिये हुए पापों का क्षमा करना जानो पापों को करने की आज्ञा देके बढ़ाना है। पाप क्षमा करने की बात जिस पुस्तक में हो वह न ईश्वर और न किसी विद्वान् का बनाया है किन्तु पापवर्द्धक है। हां ! आगामी पाप छुड़वाने के लिये किसी से प्रार्थना और स्वयं छोड़ने के लिये पुरुषार्थ पश्चात्ताप करना उचित है परन्तु केवल पश्चात्ताप करता रहे, छोड़े नहीं, तो भी कुछ नहीं हो सकता।।६९।।

७०-और उस मनुष्य से अधिक पापी कौन है जो अल्लाह पर झूठ बांध लेता है और कहता है कि मेरी ओर वही की गई परन्तु वही उस की ओर नहीं की गई और जो कहता है कि मैं भी उतारूँगा कि जैसे अल्लाह उतारता है।।

-मं० २। सि० ७। सू० ६। आ० ९३।।

(समीक्षकइस बात से सिद्ध होता है कि जब मुहम्मद साहेब कहते थे कि मेरे पास खुदा की ओर से आयतें आती हैं तब किसी दूसरे ने भी मुहम्मद साहेब के तुल्य लीला रची होगी कि मेरे पास भी आयतें उतरती हैं, मुझ को भी पैगम्बर मानो। इस को हटाने और अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये मुहम्मद साहेब ने यह उपाय किया होगा।।७०।।

७१-अवश्य हम ने तुम को उत्पन्न किया, फिर तुम्हारी सूरतें बनाईं। फिर हम ने फरिश्तों से कहा कि आदम को सिजदा करो, बस उन्होंने सिजदा किया परन्तु शैतान सिजदा करने वालों में से न हुआ।। कहा जब मैंने तुझे आज्ञा दी फिर किस ने रोका कि तूने सिजदा न किया, कहा मैं उस से अच्छा हूँ, तूने मुझ को आग से और उस को मिट्टी से उत्पन्न किया।। कहा बस उस में से उतर, यह तेरे योग्य नहीं है कि तू उस में अभिमान करे।। कहा उस दिन तक ढील दे कि कबरों में से उठाये जावें।। कहा निश्चय तू ढील दिये गयों से है।। कहा बस इस की कसम है कि तूने मुझ को गुमराह किया, अवश्य मैं उन के लिये तेरे सीधे मार्ग पर बैठूंगा।। और प्रायः तू उन को धन्यवाद करने वाला न पावेगा।। कहा उस से दुर्दशा के साथ निकल, अवश्य जो कोई उन में से तेरा पक्ष करेगा तुम सब से दोजख को भरूंगा।।

-मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ११। १२। १३। १४। १५। १६। १७।।

(समीक्षकअब ध्यान देकर सुनो खुदा और शैतान के झगड़े को। एक फरिश्ता, जैसा कि चपरासी हो, था। वह भी खुदा से न दबा और खुदा उस के आत्मा को पवित्र भी न कर सका। फिर ऐसे बागी को जो पापी बना कर गदर करने वाला था उस को खुदा ने छोड़ दिया। खुदा की यह बड़ी भूल है। शैतान तो सब को बहकाने वाला और खुदा शैतान को बहकाने वाला होने से यह सिद्ध होता है कि शैतान का भी शैतान खुदा है। क्योंकि शैतान प्रत्यक्ष कहता है कि तूने मुझे गुमराह किया। इस से खुदा में पवित्रता भी नहीं पाई जाती और सब बुराइयों का चलाने वाला मूल कारण खुदा हुआ। ऐसा खुदा मुसलमानों ही का हो सकता है, अन्य श्रेष्ठ विद्वानों का नहीं। और फरिश्तों से मनुष्यवत् वार्तालाप करने से देहधारी, अल्पज्ञ, न्यायरहित मुसलमानों का खुदा है। इसी से विद्वान् लोग इसलाम के मज़हब को पसन्द नहीं करते।।७१।।

७२-निश्चय तुम्हारा मालिक अल्लाह है जिस ने आसमानों और पृथिवी को छः दिन में उत्पन्न किया। फिर करार पकड़ा अर्श पर।। दीनता से अपने मालिक को पुकारो।। -मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ५४। ५६।।

(समीक्षकभला! जो छः दिन में जगत् को बनावे, (अर्श) अर्थात् ऊपर के आकाश में सिहासन पर आराम करे वह ईश्वर सर्वशक्तिमान् और व्यापक कभी हो सकता है? इस के न होने से वह खुदा भी नहीं कहा सकता। क्या तुम्हारा खुदा बधिर है जो पुकारने से सुनता है? ये सब बातें अनीश्वरकृत हैं। इस से कुरान ईश्वरकृत नहीं हो सकता। यदि छः दिनों में जगत् बनाया, सातवें दिन अर्श पर आराम किया तो थक भी गया होगा और अब तक सोता है वा जागा है? यदि जागता है तो अब कुछ काम करता है वा निकम्मा सैल सपट्टा और ऐश करता फिरता है।।७२।।

७३-मत फिरो पृथिवी पर झगड़ा करते।। -मं० २। सि० ८। सू० ७। आ० ७४।।

(समीक्षकयह बात तो अच्छी है परन्तु इस से विपरीत दूसरे स्थानों में जिहाद करना काफिरों को मारना भी लिखा है। अब कहो यह पूर्वापर विरुद्ध नहीं है? इस से यह विदित होता है कि जब मुहम्मद साहेब निर्बल हुए होंगे तब उन्होंने यह उपाय रचा होगा और जब सबल हुए होंगे तब झगड़ा मचाया होगा। इसी से ये बातें परस्पर विरुद्ध होने से दोनों सत्य नहीं हैं।।७३।।

७४-बस एक ही बार अपना असा डाल दिया और वह अजगर था प्रत्यक्ष।।

-मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १०७।।

(समीक्षकअब इस के लिखने से विदित होता है कि ऐसी झूठी बातों को खुदा और मुहम्मद साहेब भी मानते थे। जो ऐसा है तो ये दोनों विद्वान् नहीं थे क्योंकि जैसे आंख से देखने को और कान से सुनने को अन्यथा कोई नहीं कर सकता। इसी से ये इन्द्रजाल की बातें हैं।।७४।।

७५-बस हम ने उन पर मेह का तूफान भेजा! टीढ़ी, चिचड़ी और मैंढक और लोहू।। बस उन से हम ने बदला लिया और उन को डुबो दिया दरियाव में।। और हम ने बनी इसराईल को दरियाव से पार उतार दिया।। निश्चय वह दीन झूठा है कि जिस में वे हैं और उन का कार्य्य भी झूठा है।।

-मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १३३। १३६। १३७। १३९।।

(समीक्षकअब देखिये! जैसा कोई पाखण्डी किसी को डरावे कि हम तुझ पर सर्पों को काटने के लिये भेजेंगे। ऐसी ही यह भी बात है। भला! जो ऐसा पक्षपाती कि एक जाति को डुबा दे और दूसरी को पार उतारे वह अधर्मी खुदा क्यों नहीं। जो दूसरे मतों को कि जिन में हजारों क्रोड़ों मनुष्य हों झूठा बतलावे और अपने को सच्चा, उस से परे झूठा दूसरा मत कौन हो सकता है? क्योंकि किसी मत में सब मनुष्य बुरे और भले नहीं हो सकते। यह इकतर्फी डिगरी करना महामूर्खों का मत है। क्या तौरेत जबूर का दीन, जो कि उन का था; झूठा हो गया? वा उन का कोई अन्य मजहब था कि जिस को झूठा कहा और जो वह अन्य मजहब था तो कौन सा था कहो कि जिस का नाम कुरान में हो।।७५।।

७६-बस तू मुझ को अलबत्ता देख सकेगा, जब प्रकाश किया उस के मालिक ने पहाड़ की ओर उस को परमाणु-परमाणु किया। गिर पड़ा मूसा बेहोश।।

-मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० १४३।।

(समीक्षकजो देखने में आता है वह व्यापक नहीं हो सकता। और ऐसे चमत्कार करता फिरता था तो खुदा इस समय ऐसा चमत्कार किसी को क्यों नहीं दिखलाता? सर्वथा विद्या विरुद्ध होने से यह बात मानने योग्य नहीं।।७६।।

७७-और अपने मालिक को दीनता डर से मन में याद कर, धीमी आवाज से सुबह को और शाम को।। -मं० २। सि० ९। सू० ७। आ० २०५।।

(समीक्षककहीं-कहीं कुरान में लिखा है कि बड़ी आवाज से अपने मालिक को पुकार और कहीं-कहीं धीरे-धीरे मन में ईश्वर का स्मरण कर। अब कहिये! कौन सी बात सच्ची? और कौन सी झूठी? जो एक दूसरी बात से विरोध करती है वह बात प्रमत्त गीत के समान होती है। यदि कोई बात भ्रम से विरुद्ध निकल जाय उस को मान ले तो कुछ चिन्ता नहीं।।७७।।

७८-प्रश्न करते हैं तुझ को लूटों से कह लूटें वास्ते अल्लाह के और रसूल के और डरो अल्लाह से।। -मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० १।।

(समीक्षकजो लूट मचावें, डाकू के कर्म करें करावें और खुदा तथा पैगम्बर और ईमानदार भी बनें, यह बड़े आश्चर्य की बात है और अल्लाह का डर बतलाते और डाकादि बुरे काम भी करते जायें और ‘उत्तम मत हमारा है’ कहते लज्जा भी नहीं। हठ छोड़ के सत्य वेदमत का ग्रहण न करें इस से अधिक कोई बुराई दूसरी होगी? ।।७८।।

७९-और काटे जड़ काफिरों की।। मैं तुम को सहाय दूंगा। साथ सहस्र फरिश्तों के पीछे पीछे आने वाले।। अवश्य मैं काफिरों के दिलों में भय डालूंगा। बस मारो ऊपर गर्दनों के मारो उन में से प्रत्येक पोरी (सन्धि) पर।। -मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ७। ९। १२।।

(समीक्षकवाह जी वाह! कैसा खुदा और कैसे पैगम्बर दयाहीन। जो मुसलमानी मत से भिन्न काफिरों की जड़ कटवावे। और खुदा आज्ञा देवे उन की गर्दन पर मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्मति देवे ऐसा खुदा लंकेश से क्या कुछ कम है? यह सब प्रपञ्च कुरान के कर्त्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हम से दूर और हम उस से दूर रहें।।७९।।

८०-अल्लाह मुसलमानों के साथ है।। ऐ लोगो जो ईमान लाये हो पुकारना स्वीकार करो वास्ते अल्लाह के और वास्ते रसूल के ।। ऐ लोगो जो ईमान लाये हो मत चोरी करो अल्लाह की रसूल की और मत चोरी करो अमानत अपनी की।। और मकर करता था अल्लाह और अल्लाह भला मकर करने वालों का है।। -मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० १९। २०। २९। ३०।।

(समीक्षकक्या अल्लाह मुसलमानों का पक्षपाती है, जो ऐसा है तो अधर्म करता है। नहीं तो ईश्वर सब सृष्टि भर का है। क्या खुदा बिना पुकारे नहीं सुन सकता। बधिर है? और उस के साथ रसूल को शरीक करना बहुत बुरी बात नहीं है? अल्लाह का कौन सा ख़जाना भरा है जो चोरी करेगा? क्या रसूल और अपने अमानत की चोरी छोड़कर अन्य सब की चोरी किया करे? ऐसा उपदेश अविद्वान् और अधर्मियों का हो सकता है? भला! जो मकर करता और जो मकर करने वालों का संगी है वह खुदा कपटी, छली और अधर्मी क्यों नहीं ? इसलिये यह कुरान खुदा का बनाया हुआ नहीं है। किसी कपटी छली का बनाया होगा। नहीं तो ऐसी अन्यथा बातें लिखित क्यों होतीं? ।।८०।।

८१-और लड़ो उन से यहां तक कि न रहे फितना अर्थात् बल काफिरों का और होवे दीन तमाम वास्ते अल्लाह के।। और जानो तुम यह कि जो कुछ तुम लूटो किसी वस्तु से निश्चय वास्ते अल्लाह के है पाँचवाँ हिस्सा उस का और वास्ते रसूल के।। -मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ३९। ४१।।

(समीक्षकऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शान्तिभंगकर्ता दूसरा कौन होगा? अब देखिये यह मजहब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत् को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है? और लूट के माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैगम्बर संसार में ऐसी उपाधि और शान्तिभंग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिये कहां से आया? जो ऐसे-ऐसे मत जगत् में प्रचलित न होते तो सब जगत् आनन्द में बना रहता।।८१।।

८२-और कभी देखे तू जब काफिरों को फरिश्ते कब्ज करते हैं, मारते हैं, मुख उन के और पीठें उन की और कहते चखो अजाब जलने का।। हम ने उन के पाप से उन को मारा और हम ने फिराओन की कौम को डुबा दिया ।। और तैयारी करो वास्ते उन के जो कुछ तुम कर सको।।

-मं० २। सि० ९। सू० ८। आ० ५०। ५४। ६०।।

(समीक्षकक्यों जी! आजकल रूस ने रूम आदि और इंग्लैण्ड ने मिश्र की दुर्दशा कर डाली; फरिश्ते कहां सो गये? और अपने सेवकों के शत्रुओं को खुदा पूर्व मारता डुबाता था यह बात सच्ची हो तो आजकल भी ऐसा करे जिस से ऐसा नहीं होता इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं? अब देखिये ! यह कैसी बुरी आज्ञा है कि जो कुछ तुम कर सको वह भिन्न मत वालों के लिये दुःखदायक कर्म करो। ऐसी आज्ञा विद्वान् और धार्मिक दयालु की नहीं हो सकती। फिर लिखते हैं कि खुदा दयालु और न्यायकारी है। ऐसी बातों से मुसलमानों के खुदा से न्याय और दयादि सद्गुण दूर बसते हैं।।८२।।

८३-ऐ नबी किफायत है तुझ को अल्लाह और उन को जिन्होंने मुसलमानों से तेरा पक्ष किया।। ऐ नबी रगबत अर्थात् चाह चस्का दे मुसलमानों को ऊपर लड़ाई के, जो हों तुम में से २० आदमी सन्तोष करने वाले तो पराजय करें दो सौ का।। बस खाओ उस वस्तु से कि लूटा है तुमने हलाल पवित्र और डरो अल्लाह से वह क्षमा करने वाला दयालु है।। -मं० २। सि० १०। सू० ८। आ० ६४। ६५। ६९।।

(समीक्षकभला यह कौन सी न्याय, विद्वत्ता और धर्म की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहें अन्याय भी करे उसी का पक्ष और लाभ पहुँचावे? और जो प्रजा में शान्तिभंग करके लड़ाई करे करावे और लूट मार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी का नाम क्षमावान् दयालु लिखे यह बात खुदा की तो क्या किन्तु किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी-ऐसी बातों से कुरान ईश्वरवाक्य कभी नहीं हो सकता।।८३।।

८४-सदा रहेंगे बीच उस के, अल्लाह समीप है उस के पुण्य बड़ा।। ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो मत पकड़ो बापों अपने को और भाइयों अपने को मित्र जो दोस्त रखें कुफ्र को ऊपर ईमान के।। फिर उतारी अल्लाह ने तसल्ली अपनी ऊपर रसूल अपने के और ऊपर मुसलमानों के और उतारे लश्कर नहीं देखा तुम ने उन को और अजाब किया उन लोगों को और यही सजा है काफिरों को।। फिर-फिर आवेगा अल्लाह पीछे उस के ऊपर।। और लड़ाई करो उन लोगों से जो ईमान नहीं लाते।। -मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० २२। २३। २६। २७।।

(समीक्षकभला जो बहिश्तवालों के समीप अल्लाह रहता है तो सर्वव्यापक क्योंकर हो सकता है? जो सर्वव्यापक नहीं तो सृष्टिकर्त्ता और न्यायाधीश नहीं हो सकता। और अपने माँ, बाप, भाई और मित्र को छुड़वाना केवल अन्याय की बात है। हां! जो वे बुरा उपदेश करें; न मानना परन्तु उन की सेवा सदा करनी चाहिये। जो पहले खुदा मुसलमानों पर बड़ा सन्तोषी था; और उनके सहाय के लिए लश्कर उतारता था सच हो तो अब ऐसा क्यों नहीं करता? और जो प्रथम काफिरों को दण्ड देता और पुनः उसके ऊपर आता था तो अब कहाँ गया? क्या विना लड़ाई के ईमान खुदा नहीं बना सकता? ऐसे खुदा को हमारी ओर से सदा तिलाञ्जलि है, खुदा क्या है एक खिलाड़ी है? ।।८४।।

८५-और हम बाट देखने वाले हैं वास्ते तुम्हारे यह कि पहुँचावें तुम को अल्लाह अजाब अपने पास से वा हमारे हाथों से।।

-मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० ५२।।

(समीक्षकक्या मुसलमान ही ईश्वर की पुलिस बन गये हैं कि अपने हाथ वा मुसलमानों के हाथ से अन्य किसी मत वालों को पकड़ा देता है? क्या दूसरे क्रोड़ों मनुष्य ईश्वर को अप्रिय हैं? मुसलमानों में पापी भी प्रिय हैं? यदि ऐसा है तो अन्धेर नगरी गवरगण्ड राजा की सी व्यवस्था दीखती है। आश्चर्य है कि जो बुद्धिमान् मुसलमान हैं वे भी इस निर्मूल अयुक्त मत को मानते हैं।।८५।।

८६-प्रतिज्ञा की है अल्लाह ने ईमान वालों से और ईमानवालियों से बहिश्तें चलती हैं नीचे उन के से नहरें सदैव रहने वाली बीच उस के और घर पवित्र बीच बहिश्तों अदन के और प्रसन्नता अल्लाह की ओर बड़ी है और यह कि वह है मुराद पाना बड़ा।। बस ठट्ठा करते हैं उन से, ठट्ठा किया अल्लाह ने उन से।। -मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० ७३। ८०।।

(समीक्षकयह खुदा के नाम से स्त्री पुरुषों को अपने मतलब के लिये लोभ देना है। क्योंकि जो ऐसा प्रलोभन न देते तो कोई मुहम्मद साहेब के जाल में न फंसता। ऐसे ही अन्य मत वाले भी किया करते हैं। मनुष्य लोग तो आपस में ठट्ठा किया ही करते हैं परन्तु खुदा को किसी से ठट्ठा करना उचित नहीं है। यह कुरान क्या है बड़ा खेल है।।८६।।

८७-परन्तु रसूल और जो लोग कि साथ उसके ईमान लाये जिहाद किया उन्होंने साथ धन अपने के तथा जानों अपनी के और इन्हीं लोगों के लिये भलाई है ।। और मोहर रक्खी अल्लाह ने ऊपर दिलों उन के, बस वे नहीं जानते।।

-मं० २। सि० १०। सू० ९। आ० ८८। ९३।।

(समीक्षकअब देखिये मतलबसिन्धु की बात! कि वे ही भले हैं जो मुहम्मद साहेब के साथ ईमान लाये और जो नहीं लाये वे बुरे हैं! क्या यह बात पक्षपात और अविद्या से भरी हुई नहीं है? जब खुदा ने मोहर ही लगा दी तो उन का अपराध पाप करने में कोई भी नहीं किन्तु खुदा ही का अपराध है क्योंकि उन बिचारों को भलाई से दिलों पर मोहर लगा के रोक दिये; यह कितना बड़ा अन्याय है!!! ।।८७।।

८८-ले माल उनके से खैरात कि पवित्र करे तू उन को अर्थात् बाहरी और शुद्ध करे तू उन को साथ उन के अर्थात् गुप्त में।। निश्चय अल्लाह ने मोल ली हैं मुसलमानों से जानें उन की और माल उन के बदले, कि वास्ते उन के बहिश्त है। लडे़गें बीच मार्ग अल्लाह के बस मारेंगे और मर जावेंगे।। -मं० २। सि० ११। सू० ९। आ० १०३। १११।।

(समीक्षकवाह जी वाह मुहम्मद साहेब! आपने तो गोकुलिये गुसांइयों की बराबरी कर ली क्योंकि उन का माल लेना और उन को पवित्र करना यही बात तो गुसांइयों की है। वाह खुदा जी! आपने अच्छी सौदागरी लगाई कि मुसलमानों के हाथ से अन्य गरीबों के प्राण लेना ही लाभ समझा और उन अनाथों को मरवा कर उन निर्दयी मनुष्यों को स्वर्ग देने से दया और न्याय से मुसलमानों का खुदा हाथ धो बैठा और अपनी खुदाई में बट्टा लगा के बुद्धिमान् धार्मिकों में घृणित हो गया।।८८।।

८९-ऐ लोगो जो ईमान लाये हो लड़ो उन लोगों से कि पास तुम्हारे हैं काफिरों से और चाहिये कि पावें बीच तुम्हारे दृढ़ता।। क्या नहीं देखते यह कि वे बलाओं में डाले जाते हैं बीच हर वर्ष के एक बार वा दो बार। फिर वे नहीं तोबा करते और न वे शिक्षा पकड़ते हैं।। -मं० २। सि० ११। सू० ९। आ० १२३। १२६।।

(समीक्षकदेखिये! ये भी एक विश्वासघात की बातें खुदा मुसलमानों को सिखलाता है कि चाहें पड़ोसी हो वा किसी के नौकर हों जब अवसर पावें तभी लड़ाई वा घात करें। ऐसी बातें मुसलमानों से बहुत बन गई हैं इसी कुरान के लेख से। अब तो मुसलमान समझ के इन कुरानोक्त बुराइयों को छोड़ दें तो बहुत अच्छा है।।८९।।

९०-निश्चय परवरदिगार तुम्हारा अल्लाह है जिस ने पैदा किया आसमानों और पृथिवी को बीच छः दिन के। फिर करार पकड़ा ऊपर अर्श के, तदबीर करता है काम की।। -मं० ३। सि० ११। सू० १०। आ० ३।।

(समीक्षकआसमान आकाश एक और बिना बना अनादि है। उस का बनाना लिखने से निश्चय हुआ कि वह कुरानकर्त्ता पदार्थविद्या को नहीं जानता था? क्या परमेश्वर के सामने छः दिन तक बनाना पड़ता है? तो जो ‘हो मेरे हुक्म से और हो गया’ जब कुरान में ऐसा लिखा है फिर छः दिन कभी नहीं लग सकते।। इससे छः दिन लगना झूठ है। जो वह व्यापक होता तो ऊपर अर्श के क्यों ठहरता? और जब काम की तदबीर करता है तो ठीक तुम्हारा खुदा मनुष्य के समान है क्योंकि जो सर्वज्ञ है वह बैठा-बैठा क्या तदबीर करेगा? इस से विदित होता है कि ईश्वर को न जानने वाले जंगली लोगों ने यह पुस्तक बनाया होगा।।९०।।

९१-शिक्षा और दया वास्ते मुसलमानों के।। -मं० ३। सि० ११। सू० १०। आ० ५७।।

(समीक्षकक्या यह खुदा मुसलमानों ही का है? दूसरों का नहीं? और पक्षपाती है जो मुसलमानों ही पर दया करे अन्य मनुष्यों पर नहीं। यदि मुसलमान ईमानदारों को कहते हैं तो उन के लिये शिक्षा की आवश्यकता ही नहीं और मुसलमानों से भिन्नों को उपदेश नहीं करता तो खुदा की विद्या ही व्यर्थ है।।९१।।

९२-परीक्षा लेवे तुम को, कौन तुम में से अच्छा है कर्मों में। जो कहे तू! अवश्य उठाये जाओगे तुम पीछे मृत्यु के।। -मं० ३। सि० १२। सू० ११। आ० ७।।

(समीक्षकजब कर्मों की परीक्षा करता है तो सर्वज्ञ ही नहीं। और जो मृत्यु पीछे उठाता है तो दौड़ा सुपुर्द रखता है और अपने नियम जो कि मरे हुए न जीवें उस को तोड़ता है। यह खुदा को बट्टा लगता है।।९२।।

९३-और कहा गया ऐ पृथिवी अपना पानी निगल जा और ऐ आसमान बस कर और पानी सूख गया।। और ऐ कौम यह है कि निशानी ऊंटनी अल्लाह की वास्ते तुम्हारे, बस छोड़ दो उस को बीच पृथिवी अल्लाह के खाती फिरे।। -मं० ३। सि० १२। सू० ११। आ० ४४। ६४।।

(समीक्षकक्या लड़केपन की बात है! पृथिवी और आकाश कभी बात सुन सकते हैं? वाह जी वाह! खुदा के ऊंटनी भी है तो ऊंट भी होगा? तो हाथी घोडे़, गवमे आदि भी होंगे? और खुदा का ऊंटनी से खेत खिलाना क्या अच्छी बात है? क्या ऊंटनी पर चढ़ता भी है? जो ऐसी बातें हैं तो नवाबी की सी घसड़पसड़ खुदा के घर में भी हुई।।९३।।

९४-और सदैव रहने वाले बीच उस के जब तक कि रहें आसमान और पृथिवी।। और जो लोग सुभागी हुए बस बहिश्त के सदा रहने वाले हैं; जब तक रहें आसमान और पृथिवी।। -मं० ३। सि० १२। सू० ११। आ० १०७। १०८।।

(समीक्षकजब दोजख और बहिश्त में कयामत के पश्चात् सब लोग जायेंगे फिर आसमान और पृथिवी किस लिए रहेगी? और जब दोज़ख और बहिश्त के रहने की आसमान पृथिवी के रहने तक अवधि हुई तो सदा रहेंगे बहिश्त वा दोजख में, यह बात झूठी हुई। ऐसा कथन अविद्वानों का होता है; ईश्वर वा विद्वानों का नहीं।।९४।।

९५-जब यूसुफ ने अपने बाप से कहा कि ऐ बाप मेरे मैंने एक स्वप्न में देखा।। -मं० ३। सि० १२। सू० १२। आ० ४ से ५९ तक।।

(समीक्षकइस प्रकरण में पिता पुत्र का संवादरूप किस्सा कहानी भरी है इसलिये कुरान ईश्वर का बनाया नहीं। किसी मनुष्य ने मनुष्यों का इतिहास लिख दिया है।।९५।।

९६-अल्लाह वह है कि जिस ने खड़ा किया आसमानों को विना खम्भे के देखते हो तुम उस को। फिर ठहरा ऊपर अर्श के। आज्ञा वर्तने वाला किया सूरज और चांद को।। और वही है जिस ने बिछाया पृथिवी को।। उतारा आसमान से पानी बस बहे नाले साथ अन्दाजे अपने के।। अल्लाह खोलता है भोजन को वास्ते जिस को चाहे और तंग करता है।।

-मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० २। ३। १७। २६।।

(समीक्षकमुसलमानों का खुदा पदार्थविद्या कुछ भी नहीं जानता था। जो जानता तो गुरुत्व न होने से आसमान को खम्भे लगाने की कथा कहानी कुछ भी न लिखता। यदि खुदा अर्शरूप एक स्थान में रहता है तो वह सर्वशक्तिमान् और सर्वव्यापक नहीं हो सकता । और जो खुदा मेघविद्या जानता तो आकाश से पानी उतारा लिखा पुनः यह क्यों न लिखा कि पृथिवी से पानी ऊपर चढ़ाया। इससे निश्चय हुआ कि कुरान का बनाने वाला मेघ की विद्या को भी नहीं जानता था। और जो विना अच्छे बुरे कामों के सुख दुःख देता है तो पक्षपाती अन्यायकारी निरक्षर भट्ट है।।९६।।

९७-कह निश्चय अल्लाह गुमराह करता है जिस को चाहता है और मार्ग दिखलाता है तर्फ अपनी उस मनुष्य को रुजू करता है।।

-मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० २७।।

(समीक्षकजब अल्लाह गुमराह करता है तो खुदा और शैतान में क्या भेद हुआ? जब कि शैतान दूसरों को गुमराह अर्थात् बहकाने से बुरा कहाता है तो खुदा भी वैसा ही काम करने से बुरा शैतान क्यों नहीं? और बहकाने के पाप से दोजखी क्यों नहीं होना चाहिये? ।।९७।।

९८-इसी प्रकार उतारा हम ने इस कुरान को अर्बी में, जो पक्ष करेगा तू उन की इच्छा का पीछे इस के आई तेरे पास विद्या से।। बस सिवाय इस के नहीं कि ऊपर तेरे पैगाम पहुँचाना है और ऊपर हमारे है हिसाब लेना।। -मं० ३। सि० १३। सू० १३। आ० ३७। ४०।।

(समीक्षककुरान किधर की ओर से उतारा? क्या खुदा ऊपर रहता है? जो यह बात सच्च है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैगाम पहुँचाना हल्कारे का काम है और हल्कारे की आवश्यकता उसी को होती है जो मनुष्यवत् एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है; ईश्वर का नहीं क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया कुरान है।।९८।।

९९-और किया सूर्य चन्द्र को सदैव फिरने वाला।। निश्चय आदमी अवश्य अन्याय और पाप करने वाला है।। -मं० ३। सि० १३। सू० १४। आ० ३३। ३४।।

(समीक्षकक्या चन्द्र, सूर्य सदा फिरते और पृथिवी नहीं फिरती? जो पृथिवी नहीं फिरे तो कई वर्षों का दिन रात होवे। और जो मनुष्य निश्चय अन्याय और पाप करने वाला है तो कुरान से शिक्षा करना व्यर्थ है। क्योंकि जिन का स्वभाव पाप ही करने का है तो उन में पुण्यात्मता कभी न होगी और संसार में पुण्यात्मा और पापात्मा सदा दीखते हैं। इसलिये ऐसी बात ईश्वरकृत पुस्तक की नहीं हो सकती।।९९।।

१००-बस जब ठीक करूँ मैं उस को और फूंक दूं बीच उसके रूह अपनी से। बस गिर पड़ो वास्ते उस के सिजदा करते हुए।। कहा ऐ रब मेरे, इस कारण कि गुमराह किया तू ने मुझ को अवश्य जीनत दूंगा मैं वास्ते उन के बीच पृथिवी के और गुमराह करूंगा।। -मं० ३। सि० १४। सू० १५। आ० २९। से ३९। तक।।

(समीक्षकजो खुदा ने अपनी रूह आदम साहेब में डाली तो वह भी खुदा हुआ और जो वह खुदा न था तो सिजदा अर्थात् नमस्कारादि भक्ति करने में अपना शरीक क्यों किया? जब शैतान को गुमराह करने वाला खुदा ही है तो वह शैतान का भी शैतान बड़ा भाई गुरु क्यों नहीं? क्योंकि तुम लोग बहकाने वाले को शैतान मानते हो तो खुदा ने भी शैतान को बहकाया और प्रत्यक्ष शैतान ने कहा कि मैं बहकाऊंगा। फिर भी उस को दण्ड देकर कैद क्यों न किया? और मार क्यों न डाला? ।।१००।।

१०१-और निश्चय भेजे हम ने बीच हर उम्मत के पैगम्बर।। जब चाहते हैं हम उस को, यह कहते हैं हम उस को हो! बस हो जाती है।।

-मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० ३५।४०।।

(समीक्षकजो सब कौमों पर पैगम्बर भेजे हैं तो सब लोग जो कि पैगम्बर की राय पर चलते हैं वे काफिर क्यों? क्या दूसरे पैगम्बर का मान्य नहीं सिवाय तुम्हारे पैगम्बर के? यह सर्वथा पक्षपात की बात है। जो सब देश में पैगम्बर भेजे तो आर्य्यावर्त में कौन सा भेजा? इसलिये यह बात मानने योग्य नहीं। जब खुदा चाहता है और कहता है कि पृथिवी हो जा, वह जड़ कभी नहीं सुन सकती। खुदा का हुक्म क्योंकर बजा सकेगा? और सिवाय खुदा के दूसरी चीज नहीं मानते तो सुना किस ने? और हो कौन गया? ये सब अविद्या की बातें हैं। ऐसी बातों को अनजान लोग मानते हैं।।१०१।।

१०न-और नियत करते हैं वास्ते अल्लाह के बेटियां-पवित्रता है उस को- और वास्ते उनके हैं जो कुछ चाहें।। कसम अल्लाह की अवश्य भेजे हम ने पैगम्बर।।

-मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० ५७। ६३।।

(समीक्षकअल्लाह बेटियों से क्या करेगा? बेटियां तो किसी मनुष्य को चाहिये, क्यों बेटे नियत नहीं किये जाते और बेटियां नियत की जाती हैं? इस का क्या कारण है? बताइये? कसम खाना झूठों का काम है, खुदा की बात नहीं। क्योंकि बहुधा संसार में ऐसा देखने में आता है कि जो झूठा होता है वही कसम खाता है। सच्चा सौगन्ध क्यों खावे? ।।१०२।।

१०३-ये लोग वे हैं कि मोहर रक्खी अल्लाह ने ऊपर दिलों उन के और कानों उन के और आंखों उन की के और ये लोग वे हैं बेखबर।। और पूरा दिया जावेगा हर जीव को जो कुछ किया है और वे अन्याय न किये जावेंगे।। -मं० ३। सि० १४। सू० १६। आ० १०८-१११।।

(समीक्षक)-जब खुदा ही ने मोहर लगा दी तो वे बिचारे विना अपराध मारे गये क्योंकि उन को पराधीन कर दिया। यह कितना बड़ा अपराध है? और फिर कहते हैं कि जिस ने जितना किया है उतना ही उस को दिया जायगा; न्यूनाधिक नहीं। भला! उन्होंने स्वतन्त्रता से पाप किये ही नहीं किन्तु खुदा के कराने से किये। पुनः उन का अपराध ही न हुआ। उन को फल न मिलना चाहिये। इस का फल खुदा को मिलना उचित है। और जो पूरा दिया जाता है तो क्षमा किस बात की जाती है? जो क्षमा की जाती है तो न्याय उड़ जाता है। ऐसा गड़बड़ाध्याय ईश्वर का कभी नहीं हो सकता किन्तु निर्बुद्धि छोकरों का होता है।।१०३।।

१०४-और किया हमने दोजख को वास्ते काफिरों के घेरने वाला स्थान।। और हर आदमी को लगा दिया हम ने उस को अमलनामा उस का बीच गर्दन उस की के और निकालेंगे हम वास्ते उस के दिन कयामत के एक किताब कि देखेगा उस को खुला हुआ।। और बहुत मारे हम ने कुरनून से पीछे नूह के।। -मं० ४। सि० १५। सू० १७। आ० ८-१३। १७।।

(समीक्षकयदि काफिर वे ही हैं कि जो कुरान, पैगम्बर और कुरान के कहे खुदा, सातवें आसमान और नमाज आदि को न मानें और उन्हीं के लिये दोजख होवे तो यह बात केवल पक्षपात की ठहरे क्योंकि कुरान ही के मानने वाले सब अच्छे और अन्य के मानने वाले सब बुरे कभी हो सकते हैं? यह बड़ी लड़कपन की बात है कि प्रत्येक की गर्दन में कर्मपुस्तक! हम तो किसी एक की भी गर्दन में नहीं देखते। यदि इस का प्रयोजन कर्मों का फल देना है तो फिर मनुष्यों के दिलों, नेत्रें आदि पर मोहर रखना और पापों का क्षमा करना क्या खेल मचाया है? कयामत की रात को किताब निकालेगा खुदा तो आज कल वह किताब कहां है? क्या साहूकार की बही समान लिखता रहता है? यहां यह विचारना चाहिये कि जो पूर्वजन्म नहीं तो जीवों के कर्म ही नहीं हो सकते फिर कर्म की रेखा क्या लिखी? जो विना कर्म के लिखा तो उन पर अन्याय किया क्योंकि विना अच्छे बुरे कर्म्मों के उन को दुःख-सुख क्यों दिया? जो कहो कि खुदा की मरजी, तो भी उसने अन्याय किया। अन्याय उस को कहते हैं कि विना बुरे भले कर्म किये दुःख सुखरूप फल न्यूनाधिक देना और उस समय खुदा ही किताब बांचेगा वा कोई सरिश्तेदार सुनावेगा? जो खुदा ही ने दीर्घकाल सम्बन्धी जीवों को विना अपराध मारा तो वह अन्यायकारी हो गया। जो अन्यायकारी होता है वह खुदा ही नहीं हो सकता।।१०४।।

१०५-और दिया हमने समूद को ऊंटनी प्रमाण।। और बहका जिस को बहका सके।। जिस दिन बुलावेंगे हम सब लोगों को साथ पेशवाओं उन के बस जो कोई दिया गया अमलनामा उस का बीच दहिने हाथ उस के।।

-मं० ४। सि० १५। सू० १७। आ० ५९। ६४। ७१।।

(समीक्षकवाह जी! जितनी खुदा की साश्चर्य निशानी हैं उन में से एक ऊंटनी भी खुदा के होने में प्रमाण अथवा परीक्षा में साधक है। यदि खुदा ने शैतान को बहकाने का हुक्म दिया तो खुदा ही शैतान का सरदार और सब पाप कराने वाला ठहरा। ऐसे को खुदा कहना केवल कम समझ की बात है। जब कयामत की रात अर्थात् प्रलय ही में न्याय करने कराने के लिये पैगम्बर और उन के उपदेश मानने वालों को खुदा बुलावेगा तो जब तक प्रलय न होगा तब तक सब दौरा सुपुर्द रहे और दौरा सुपुर्द सब को दुःखदायक है जब तक न्याय न किया जाय। इसलिये शीघ्र न्याय करना न्यायाधीश का उत्तम काम है। यह तो पोपांबाई का न्याय ठहरा। जैसे कोई न्यायाधीश कहे कि जब तक पचास वर्ष तक के चोर और साहूकार इकट्ठे न हों तब तक उन को दण्ड वा प्रतिष्ठा न करनी चाहिये। वैसा ही यह हुआ कि एक तो पचास वर्ष तक दौरा सुपुर्द रहा और एक आज ही पकड़ा गया। ऐसा न्याय का काम नहीं हो सकता। न्याय तो वेद और मनुस्मृति का देखो जिस में क्षण मात्र विलम्ब नहीं होता और अपने-अपने कर्मानुसार दण्ड वा प्रतिष्ठा सदा पाते रहते हैं। दूसरा पैगम्बरों को गवाही के तुल्य रखने से ईश्वर की सर्वज्ञता की हानि है। भला ! ऐसा पुस्तक ईश्वरकृत और ऐसे पुस्तक का उपदेश करने वाला ईश्वर कभी हो सकता है? कभी नहीं।।१०५।।

१०६-ये लोग वास्ते उन के हैं बाग हमेशह रहने के, चलती हैं नीचे उन के से नहरें, गहना पहिराये जावेंगे बीच उस के कंगन सोने के से और पोशाक पहिनेंगे वस्त्र हरित लाहि की से और ताफते की से तकिये किये हुए बीच उस के ऊपर तख़तों के। अच्छा है पुण्य और अच्छी है बहिश्त लाभ उठाने की।।

-मं० ४। सि० १५। सू० १८। आ० ३१।।

(समीक्षकवाह जी वाह! क्या कुरान का स्वर्ग है जिस में बाग, गहने, कपड़े, गद्दी, तकिये आनन्द के लिये हैं। भला! कोई बुद्धिमान् यहां विचार करे तो यहां से वहाँ मुसलमानों के बहिश्त में अधिक कुछ भी नहीं है सिवा अन्याय के, वह यह कि कर्म उन के अन्त वाले और फल उन का अनन्त। और जो मीठा नित्य खावे तो थोड़े दिन में विष के समान प्रतीत होता है। जब सदा वे सुख भोगेंगे तो उन को सुख ही दुःखरूप हो जायगा। इसलिये महाकल्प पर्यन्त मुक्तिसुख भोग के पुनर्जन्म पाना ही सत्य सिद्धान्त है।।१०६।।

१०७-और यह बस्तियां हैं कि मारा हम ने उन को जब अन्याय किया उन्होंने और हम ने उन के मारने की प्रतिज्ञा स्थापन की।।

-मं० ४। सि० १५। सू० १८। आ० ५९।।

(समीक्षकभला! सब बस्ती भर पापी कभी हो सकती है? और पीछे से प्रतिज्ञा करने से ईश्वर सर्वज्ञ नहीं रहा क्योंकि जब उन का अन्याय देखा तो प्रतिज्ञा की, पहिले नहीं जानता था। इस से दयाहीन भी ठहरा।।१०७।।

१०८-और वह जो लड़का, बस थे माँ बाप उस के ईमान वाले, बस डरे हम यह कि पकड़े उन को सरकशी में और कुफ्र में।। यहां तक कि पहुँचा जगह डूबने सूर्य्य की, पाया उसको डूबता था बीच चश्मे कीचड़ के ।। कहा उन ने ऐजुलकरनैन! निश्चय याजूज माजूज फिसाद करने वाले हैं बीच पृथिवी के।। -मं० ४। सि० १६। सू० १८। आ० ८०। ८६। ९४।।

(समीक्षकभला! यह खुदा की कितनी बेसमझ है! शंका से डरा कि लड़के के माँ बाप कहीं मेरे मार्ग से बहका कर उलटे न कर दिये जावें। यह कभी ईश्वर की बात नहीं हो सकती। अब आगे की अविद्या की बात देखिये कि इस किताब का बनाने वाला सूर्य्य को एक झील में रात्रि को डूबा जानता है, फिर प्रातःकाल निकलता है। भला! सूर्य्य तो पृथिवी से बहुत बड़ा है। वह नदी वा झील वा समुद्र में कैसे डूब सकेगा? इस से यह विदित हुआ कि कुरान के बनाने वाले को भूगोल खगोल की विद्या नहीं थी। जो होती तो ऐसी विद्याविरुद्ध बात क्यों लिख देता । और इस पुस्तक को मानने वालों को भी विद्या नहीं है। जो होती तो ऐसी मिथ्या बातों से युक्त पुस्तक को क्यों मानते? अब देखिये खुदा का अन्याय! आप ही पृथिवी को बनाने वाला राजा न्यायाधीश है औार याजूज माजूज को पृथिवी में फसाद भी करने देता है। यह ईश्वरता की बात से विरुद्ध है। इस से ऐसी पुस्तक को जंगली लोग माना करते हैं; विद्वान् नहीं।।१०८।।

१०९-और याद करो बीच किताब के मर्यम को, जब जा पड़ी लोगों अपने से मकान पूर्वी में।। बस पड़ा उन से इधर पर्दा, बस भेजा हम ने रूह अपनी को अर्थात् फरिश्ता, बस सूरत पकड़ी वास्ते उस के आदमी पुष्ट की।। कहने लगी निश्चय मैं शरण पकड़ती हूँ रहमान की तुझ से, जो है तू परहेजगार।। कहने लगा सिवाय इस के नहीं कि मैं भेजा हुआ हूं मालिक तेरे के से, ताकि दे जाऊं मैं तुझ को लड़का पवित्र।। कहा कैसे होगा वास्ते मेरे लड़का नहीं हाथ लगाया मुझ को आदमी ने, नहीं मैं बुरा काम करने वाली।। बस गिर्भत हो गई साथ उस के और जा पड़ी साथ उस के मकान दूर अर्थात् जंगल में।।

-मं० ४। सि० १६। सू० १९। आ० १६। १७। १८। १९। २०-२३।।

(समीक्षकअब बुद्धिमान् विचार लें कि फरिश्ते सब खुदा की रूह हैं तो खुदा से अलग पदार्थ नहीं हो सकते। दूसरा यह अन्याय कि वह मर्यम कुमारी के लड़का होना। किसी का संग करना नहीं चाहती थी परन्तु खुदा के हुक्म से फरिश्ते ने उस को गर्भवती किया। यह न्याय से विरुद्ध बात है। यहां अन्य भी असभ्यता की बातें बहुत लिखी हैं उन को लिखना उचित नहीं समझा।।१०९।।

११०-क्या नहीं देखा तू ने यह कि भेजा हम ने शैतानों को ऊपर काफिरों के बहकाते हैं उन को बहकाने कर।। -मं० ४। सि० १६। सू० १९। आ० ८३।।

(समीक्षकजब खुदा ही शैतानों को बहकाने के लिये भेजता है तो बहकने वालों का कुछ दोष नहीं हो सकता और न उन को दण्ड हो सकता और न शैतानों को। क्योंकि यह खुदा के हुक्म से सब होता है। इस का फल खुदा को होना चाहिये। जो सच्चा न्यायकारी है तो उस का फल दोजख आप ही भोगे और जो न्याय को छोड़ के अन्याय को करे तो अन्यायकारी हुआ। अन्यायकारी ही पापी कहाता है।।११०।।

१११-और निश्चय क्षमा करने वाला हूँ वास्ते उस मनुष्य के तोबाः की और ईमान लाया और कर्म किये अच्छे, फिर मार्ग पाया।।

-मं० ४। सि० १६। सू० २०। आ० ८२।।

(समीक्षकजो तोबाः से पाप क्षमा करने की बात कुरान में है यह सब को पापी कराने वाली है क्योंकि पापियों को इस से पाप करने का साहस बहुत बढ़ जाता है। इस से यह पुस्तक और इस का बनाने वाला पापियों को पाप करने में हौसला बढ़ाने वाले हैं। इस से यह पुस्तक परमेश्वरकृत और इस में कहा हुआ परमेश्वर भी नहीं हो सकता।।१११।।

११२-और किये हम ने बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे।। -मं० ४। सि० १७। सू० २१। आ० ३०।।

(समीक्षकयदि कुरान का बनाने वाला पृथिवी का घूमना आदि जानता तो यह बात कभी नहीं कहता कि पहाड़ों के धरने से पृथिवी नहीं हिलती। शंका हुई कि जो पहाड़ नहीं धरता तो हिल जाती! इतने कहने पर भी भूकम्प में क्यों डिग जाती है? ।।११२।।

११३-और शिक्षा दी हम ने उस औरत को और रक्षा की उस ने अपने गुह्य अंगों की। बस फूंक दिया हम ने बीच उस के रूह अपनी को।।

-मं० ४। सि० १७। सू० २१। आ० ९१।।

(समीक्षकऐसी अश्लील बातें खुदा की पुस्तक में खुदा की क्या और सभ्य मनुष्य की भी नहीं होतीं। जब कि मनुष्यों में ऐसी बातों का लिखना अच्छा नहीं तो परमेश्वर के सामने क्योंकर अच्छा हो सकता है? ऐसी-ऐसी बातों से कुरान दूषित होता है। यदि अच्छी बात होती तो अति प्रशंसा होती; जैसे वेदों की।।११३।।

११४-क्या नहीं देखा तूने कि अल्लाह को सिजदा करते हैं जो कोई बीच आसमानों और पृथिवी के हैं, सूर्य और चन्द्र तारे और पहाड़, वृक्ष और जानवर।। पहिनाये जावेंगे बीच उस के कंगन सोने और मोती के और पहिनावा उन का बीच उसके रेशमी है।। और पवित्र रख घर मेरे को वास्ते गिर्द फिरने वालों के और खड़े रहने वालों के।। फिर चाहिये कि दूर करें मैल अपने और पूरी करें भेंटें अपनी और चारों ओर फिरें घर कदीम के।। ताकि नाम अल्लाह का याद करें।। -मं० ४। सि० १७। सू० २२। आ० १८। २३। २६। २८। ३३।।

(समीक्षकभला! जो जड़ वस्तु हैं, परमेश्वर को जान ही नहीं सकते, फिर वे उस की भक्ति क्योंकर कर सकते हैं? इस से यह पुस्तक ईश्वरकृत तो कभी नहीं हो सकता किन्तु किसी भ्रान्त का बनाया हुआ दीखता है। वाह! बड़ा अच्छा स्वर्ग है जहाँ सोने मोती के गहने और रेशमी कपड़े पहिरने को मिलें। यह बहिश्त यहां के राजाओं के घर से अधिक नहीं दीख पड़ता। और जब परमेश्वर का घर है तो वह उसी घर में रहता भी होगा फिर बुत्परस्ती क्यों न हुई? और दूसरे बुत्परस्तों का खण्डन क्यों करते हैं? जब खुदा भेंट लेता, अपने घर की परिक्रमा करने की आज्ञा देता है और पशुओं को मरवा के खिलाता है तो यह खुदा मन्दिर वाले और भैरव, दुर्गा के सदृश हुआ और महाबुत्परस्ती का चलाने वाला हुआ क्योंकि मूर्तियों से मस्जिद बड़ा बुत् है। इस से खुदा और मुसलमान बड़े बुत्परस्त और पुराणी तथा जैनी छोटे बुत्परस्त हैं।।११४।।

११५-फिर निश्चय तुम दिन कयामत के उठाये जाओगे।। -मं० ४। सि० १८। सू० २३। आ० १६।।

(समीक्षककयामत तक मुर्दे कबरों में रहेंगे वा किसी अन्य जगह? जो उन्हीं में रहेंगे तो सड़े हुए दुर्गन्धरूप शरीर में रहकर पुण्यात्मा भी दुःख भोग करेंगे? यह न्याय अन्याय है। और दुर्गन्ध अधिक होकर रोगोत्पत्ति करने से खुदा और मुसलमान पापभागी होंगे।।११५।।

११६-उस दिन की गवाही देवेंगे ऊपर उन के जबानें उन की और हाथ उन के और पांव उन के साथ उस वस्तु के कि थे करते।। अल्लाह नूर है आसमानों का और पृथिवी का, नूर उस के कि मानिन्द ताक की है बीच उस के दीप हो और दीप बीच कंदील शीशों के हैं, वह कंदील मानो कि तारा है चमकता, रोशन किया जाता है दीपक वृक्ष मुबारिक जैतून के से, न पूर्व की ओर है न पश्चिम की, समीप है तेल उस का रोशन हो जावे जो न लगे ऊपर रोशनी के मार्ग दिखाता है अल्लाह नूर अपने के जिस को चाहता है।।

-मं० ४। सि० १८। सू० २४। आ० २४। ३५।।

(समीक्षकहाथ पग आदि जड़ होने से गवाही कभी नहीं दे सकते यह बात सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से मिथ्या है। क्या खुदा आगी बिजुली है? जैसा कि दृष्टान्त देते हैं ऐसा दृष्टान्त ईश्वर में नहीं घट सकता। हां! किसी साकार वस्तु में घट सकता है।।११६।।

११७-और अल्लाह ने उत्पन्न किया हर जानवर को पानी से बस कोई उन में से वह है कि जो चलता है पेट अपने के।। और जो कोई आज्ञा पालन करे अल्लाह की रसूल उस के की।। कह आज्ञा पालन करे खुदा की रसूल उस के की और आज्ञा पालन करो रसूल की ताकि दया किये जाओ।।

-मं० ४। सि० १८। सू० २४। आ० ४५। ५२। ५६।।

(समीक्षकयह कौन सी फिलासफी है कि जिन जानवरों के शरीर में सब तत्त्व दीखते हैं और कहना कि केवल पानी से उत्पन्न किये। यह केवल अविद्या की बात है। जब अल्लाह के साथ पैगम्बर की आज्ञा पालन करना होता है तो खुदा का शरीक हो गया वा नहीं? यदि ऐसा है तो क्यों खुदा को लाशरीक कुरान में लिखा और कहते हो? ।।११७।।

११८-और जिस दिन कि फट जावेगा आसमान साथ बदली के और उतारे जावेंगे फरिश्ते।। बस मत कहा मान काफिरों का और झगड़ा कर उन से साथ झगड़ा बढ़ा ।। और बदल डालता है अल्लाह बुराइयों उन की को भलाइयों से।। और जो कोई तोबाः करे और कर्म करे अच्छे बस निश्चय आता है तरफ अल्लाह

की।। -मं० ४। सि० १९। सू० २५। आ० २५-५२। ७०। ७१।।

(समीक्षकयह बात कभी सच नहीं हो सकती है कि आकाश बद्दलों के साथ फट जावे। यदि आकाश कोई र्मूर्त्तिमान् पदार्थ हो तो फट सकता है। यह मुसलमानों का कुरान शान्ति भंग कर गदर झगड़ा मचाने वाला है। इसीलिये धार्मिक विद्वान् लोग इस को नहीं मानते। यह भी अच्छा न्याय है कि जो पाप और पुण्य का अदला बदला हो जाय। क्या यह तिल और उड़द की सी बात है जो पलटा हो जावे? जो तोबा करने से पाप छूटे और ईश्वर मिले तो कोई भी पाप करने से न डरे। इसलिये ये सब बातें विद्या से विरुद्ध हैं।।११८।।

११९-वही की हम ने तरफ मूसा की यह कि ले चल रात को बन्दों मेरे को, निश्चय तुम पीछा किये जाओगे।। बस भेजे लोग फिरोन ने बीच नगरों के जमा करने वाले।। और वह पुरुष कि जिसने पैदा किया मुझ को है, बस वही मार्ग दिखलाता है।। और वह जो खिलाता है मुझ को पिलाता है मुझ को।। और उस पुरुष की आशा रखता हूँ मैं यह कि क्षमा करे वास्ते मेरे अपराध मेरा दिन कयामत के।। -मं० ५। सि० १९। सू० २६। आ० ५२। ५३। ७८। ७९। ८२।।

(समीक्षकजब खुदा ने मूसा की ओर बही भेजी पुनः दाऊद, ईसा और मुहम्मद साहेब की ओर किताब क्यों भेजी? क्योंकि परमेश्वर की बात सदा एक सी और बेभूल होती है और उस के पीछे कुरान तक पुस्तकों का भेजना पहली पुस्तक को अपूर्ण भूलयुक्त माना जायगा। यदि ये तीन पुस्तक सच्चे हैं तो यह कुरान झूठा होगा। चारों का जो कि परस्पर प्रायः विरोध रखते हैं उन का सर्वथा सत्य होना नहीं हो सकता। यदि खुदा ने रूह अर्थात् जीव पैदा किये हैं तो वे मर भी जायेंगे अर्थात् उन का कभी नाश कभी अभाव भी होगा? जो परमेश्वर ही मनुष्यादि प्राणियों को खिलाता पिलाता है तो किसी को रोग होना न चाहिये और सब को तुल्य भोजन देना चाहिये । पक्षपात से एक को उत्तम और दूसरे को निकृष्ट जैसा कि राजा और कंगले को श्रेष्ठ निकृष्ट भोजन मिलता है; न होना चाहिये। जब परमेश्वर ही खिलाने पिलाने और पथ्य कराने वाला है तो रोग ही न होने चाहिये परन्तु मुसलमान आदि को भी रोग होते हैं। यदि खुदा ही रोग छुड़ा कर आराम करने वाला है तो मुसलमानों के शरीरों में रोग न रहना चाहिये। यदि रहता है तो खुदा पूरा वैद्य नहीं है यदि पूरा वैद्य है तो मुसलमानों के शरीरों में रोग क्यों रहते हैं? यदि वही मारता और जिलाता है तो उसी खुदा को पाप पुण्य लगता होगा। यदि जन्म जन्मान्तर के कर्मानुसार व्यवस्था करता है तो उस को कुछ भी अपराध नहीं। यदि वह पाप क्षमा और न्याय कयामत की रात में करता है तो खुदा पाप बढ़ाने वाला होकर पापयुक्त होगा। यदि क्षमा नहीं करता तो यह कुरान की बात झूठी होने से बच नहीं सकती है।।११९।।

१२०-नहीं तू परन्तु आदमी मानिन्द हमारी बस ले आ कुछ निशानी जो है तू सच्चों से।। कहा यह ऊंटनी है वास्ते उस के पानी पीना है एक बार।। -मं० ५। सि० १९। सू० २६। आ० १५४। १५५।।

(समीक्षकभला! इस बात को कोई मान सकता है कि पत्थर से ऊंटनी निकले! वे लोग जंगली थे कि जिन्होंने इस बात को मान लिया। और ऊंटनी की निशानी देनी केवल जंगली व्यवहार है; ईश्वरकृत नहीं। यदि यह किताब ईश्वरकृत होती तो ऐसी व्यर्थ बातें इस में न होतीं।।१२०।।

१२१-ऐ मूसा बात यह है कि निश्चय मैं अल्लाह हूँ गालिब।। और डाल दे असा अपना, बस जब कि देखा उस को हिलता था मानो कि वह सांप है—ऐ मूसा मत डर, निश्चय नहीं डरते समीप मेरे पैगम्बर।। अल्लाह नहीं कोई माबूद परन्तु वह मालिक अर्श बड़े का।। यह कि मत सरकशी करो ऊपर मेरे और चले आओ मेरे पास मुसलमान होकर।।

-मं० ५। सि० १९। सू० २७। आ० ९। १०। २६। ३१।।

(समीक्षकऔर भी देखिये अपने मुख आप अल्लाह बड़ा जबरदस्त बनता है। अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना श्रेष्ठ पुरुष का भी काम नहीं; खुदा का क्योंकर हो सकता है? तभी तो इन्द्रजाल का लटका दिखला जंगली मनुष्यों को वश कर आप जंगलस्थ खुदा बन बैठा। ऐसी बात ईश्वर के पुस्तक में कभी नहीं हो सकती। यदि वह बड़े अर्श अर्थात् सातवें आसमान का मालिक है तो वह एकदेशी होने से ईश्वर ही नहीं हो सकता है। यदि सरकशी करना बुरा है तो खुदा और मुहम्मद साहेब ने अपनी स्तुति से पुस्तक क्यों भर दिये? मुहम्मद साहेब ने अनेकों को मारे इस से सरकशी हुई वा नहीं? यह कुरान पुनरुक्त और पूर्वापर विरुद्ध बातों से भरा हुआ है।।१२१।।

१२२-और देखेगा तू पहाड़ों को अनुमान करता है तू उन को जमे हुए और वे चले जाते हैं मानिन्द चलने बादलों की, कारीगरी अल्लाह की जिसने दृढ़ किया हर वस्तु को, निश्चय वह खबरदार है उस वस्तु के कि करते हो।। -मं० ५। सि० २०। सू० २७। आ० ८७। ८८।।

(समीक्षकबद्दलों के समान पहाड़ का चलना कुरान बनाने वालों के देश में होता होगा; अन्यत्र नहीं। और खुदा की खबरदारी तो शैतान बाजी को न पकड़ने और न दण्ड देने से ही विदित होती है कि जिस ने एक बाजी को भी अब तक न पकड़ पाया; न दण्ड दिया। इस से अधिक असावधानी क्या होगी।।१२२।।

१२३-बस मुष्ट मारा उस को मूसा ने, बस पूरी की आयु उस की।। कहा ऐ रब मेरे, निश्चय मैंने अन्याय किया जान अपनी को, बस क्षमा कर मुझ को, बस क्षमा कर दिया उस को, निश्चय वह क्षमा करने वाला दयालु है।। और मालिक तेरा उत्पन्न करता है, जो कुछ चाहता है और पसन्द करता है।।

-मं० ५। सि० २०। सू० २८। आ० १५। १६। ६८।।

(समीक्षकअब अन्य भी देखिये मुसलमान और ईसाइयों के पैगम्बर और खुदा कि मूसा पैगम्बर मनुष्य की हत्या किया करे और खुदा क्षमा किया करे। ये दोनों अन्यायकारी हैं वा नहीं? क्या अपनी इच्छा ही से जैसा चाहता है वैसी उत्पत्ति करता है? क्या उस ने अपनी इच्छा ही से एक को राजा दूसरे को कंगाल और एक को विद्वान् दूसरे को मूर्खादि किया है? यदि ऐसा है तो न कुरान सत्य और न अन्यायकारी होने से यह खुदा ही हो सकता है।।१२३।।

१२४-और आज्ञा दी हम ने मनुष्य को साथ मा बाप के भलाई करना और जो झगड़ा करें तुझ से दोनों यह कि शरीक लावे तू साथ मेरे उस वस्तु को, कि नहीं वास्ते तेरे साथ उस के ज्ञान, बस मत कहा मान उन दोनों का, तर्फ मेरी है।। और अवश्य भेजा हम ने नूह को तर्फ कौम उस के कि बस रहा बीच उन के हजार वर्ष परन्तु पचास वर्ष कम।। -मं० ५। सि० २०। सू० २९। आ० ८। १४।।

(समीक्षकमाता-पिता की सेवा करना अच्छा ही है जो खुदा के साथ शरीक करने के लिये कहे तो उन का कहना न मानना यह भी ठीक है परन्तु यदि माता पिता मिथ्याभाषणादि करने की आज्ञा देवें तो क्या मान लेना चाहिये? इसलिये यह बात आवमी अच्छी और आधी बुरी है। क्या नूह आदि पैगम्बरों ही को खुदा संसार में भेजता है तो अन्य जीवों को कौन भेजता है? यदि सब को वही भेजता है तो सभी पैगम्बर क्यों नहीं? और जो प्रथम मनुष्यों की हजार वर्ष की आयु होती थी तो अब क्यों नहीं होती? इसलिये यह बात ठीक नहीं।।१२४।।

१२५-अल्लाह पहिली बार करता है उत्पत्ति, फिर दूसरी बार करेगा उस को, फिर उसी की ओर फेरे जाओगे।। और जिस दिन वर्षा अर्थात् खड़ी होगी कयामत निराश होंगे पापी।। बस जो लोग कि ईमान लाये और काम किये अच्छे बस वे बीच बाग के सिंगार किये जावेंगे।। और जो भेज दें हम एक बाव, बस देखें उसी खेती को पीली हुई।। इसी प्रकार मोहर रखता है अल्लाह ऊपर दिलों उन लोगों के कि नहीं जानते।। -मं० ५। सि० २१। सू० ३०। आ० ११। १२। १५। ५१। ५९।।

(समीक्षकयदि अल्लाह दो बार उत्पत्ति करता है तीसरी बार नहीं तो उत्पत्ति की आदि और दूसरी बार के अन्त में निकम्मा बैठा रहता होगा? और एक तथा दो बार उत्पत्ति के पश्चात् उस का सामर्थ्य निकम्मा और व्यर्थ हो जायगा। यदि न्याय करने के दिन पापी लोग निराश हों तो अच्छी बात है परन्तु इस का प्रयोजन यह तो कहीं नहीं है कि मुसलमानों के सिवाय सब पापी समझ कर निराश किये जायें? क्योंकि कुरान में कई स्थानों में पापियों से औरों का ही प्रयोजन है। यदि बगीचे में रखना और शृंगार पहिराना ही मुसलमानों का स्वर्ग है तो इस संसार के तुल्य हुआ और वहाँ माली और सुनार भी होंगे अथवा खुदा ही माली और सुनार आदि का काम करता होगा। यदि किसी को कम गहना मिलता होगा तो चोरी भी होती होगी और बहिश्त से चोरी करने वालों को दोजख में भी डालता होगा। यदि ऐसा होता होगा तो सदा बहिश्त में रहेंगे यह बात झूठ हो जायगी। जो किसानों की खेती पर भी खुदा की दृष्टि है सो यह विद्या खेती करने के अनुभव ही से होती है। और यदि माना जाय कि खुदा ने अपनी विद्या से सब बात जान ली है तो ऐसा भय देना अपना घमण्ड प्रसिद्ध करना है। यदि अल्लाह ने जीवों के दिलों पर मोहर लगा पाप कराया तो उस पाप का भागी वही होवे जीव नहीं हो सकते। जैसे जय पराजय सेनाधीश का होता है वैसे यह सब पाप खुदा ही को प्राप्त होवे।।१२५।।

१२६-ये आयतें हैं किताब हिक्मत वाले की।। उत्पन्न किया आसमानों को बिना सुतून अर्थात् खम्भे के देखते हो तुम उस को और डाले बीच पृथिवी के पहाड़ ऐसा न हो कि हिल जावे।। क्या नहीं देखा तूने यह कि अल्लाह प्रवेश कराता है दिन को बीच रात के।। क्या नहीं देखा कि किश्तियां चलती हैं बीच दर्य्या के साथ निआमतों अल्लाह के, ताकि दिखलावे तुम को निशानियां अपनी।।

-मं० ५। सि० २१। सू० ३१। आ० २। १०। २९। ३१।।

(समीक्षकवाह जी वाह! हिक्मतवाली किताब ! कि जिस में सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उस में खम्भे लगाने की शंका और पृथिवी को स्थिर रखने के लिये पहाड़ रखना। थोड़ी सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता और हिक्मत देखो कि जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं और जहाँ रात है वहाँ दिन नहीं। उस को एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है यह बड़े अविद्वानों की बात है। इसलिये यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्याविरुद्ध बात नहीं है कि नौका मनुष्य और क्रिया कौशलादि से चलती हैं वा खुदा की कृपा से? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बना कर समुद्र में चलावें तो खुदा की निशानी डूब जाय वा नहीं? इसलिये यह पुस्तक न विद्वान् और न ईश्वर का बनाया हुआ हो सकता है।।१२६।।

१२७-तदबीर करता है काम की आसमान से तर्फ पृथिवी की फिर चढ़ जाता है तर्फ उस की बीच एक दिन के कि है अवधि उसकी सहस्र वर्ष उन वर्षों से कि गिनते हो तुम।। यह है जानने वाला गैब का और प्रत्यक्ष का गालिब दयालु।। फिर पुष्ट किया उस को और फूंका बीच रूह अपनी से।। कह कब्ज करेगा तुम को फरिश्ता मौत का वह जो नियत किया गया है साथ तुम्हारे।। और जो चाहते हम अवश्य देते हम हर एक जीव को शिक्षा उस की, परन्तु सिद्ध हुई बात मेरी ओर से कि अवश्य भरूँगा मैं दोजख को जिनों से और आदमियों से इकट्ठे।। -मं० ५। सि० २१। सू० ३२। आ० ५। ६। ९। ११। १३।।

(समीक्षकअब ठीक सिद्ध हो गया कि मुसलमानों का खुदा मनुष्यवत् एकदेशी है। क्योंकि जो व्यापक होता तो एकदेश से प्रबन्ध करना और उतरना चढ़ना नहीं हो सकता। यदि खुदा फरिश्ते को भेजता है तो भी आप एकदेशी हो गया। आप आसमान पर टंगा बैठा है और फरिश्तों को दौड़ाता है। यदि फरिश्ते रिश्वत लेकर कोई मामला बिगाड़ दें वा किसी मुर्दे को छोड़ जायें तो खुदा को क्या मालूम हो सकता है? मालूम तो उस को हो कि जो सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापक हो, सो तो है ही नहीं; होता तो फरिश्तों के भेजने तथा कई लोगों की कई प्रकार से परीक्षा लेने का क्या काम था? और एक हजार वर्षों में तथा आने जाने प्रबन्ध करने से सर्वशक्तिमान् भी नहीं। यदि मौत का फरिश्ता है तो उस फरिश्ते का मारने वाला कौन सा मृत्यु है? यदि वह नित्य है तो अमरपन में खुदा के बराबर शरीक हुआ। एक फरिश्ता एक समय में दोजख भरने के लिये जीवों को शिक्षा नहीं कर सकता और उन को विना पाप किये अपनी मर्जी से दोजख भर के उन को दुःख देकर तमाशा देखता है तो वह खुदा पापी अन्यायकारी और दयाहीन है! ऐसी बातें जिस पुस्तक में हों न वह विद्वान् और ईश्वरकृत और जो दया न्यायहीन है वह ईश्वर भी कभी नहीं हो सकता।।१२७।।

१२८-कह कि कभी न लाभ देगा भागना तुम को जो भागो तुम मृत्यु वा कत्ल से।। ऐ बीबियो नबी की! जो कोई आवे तुम में से निर्लज्जता प्रत्यक्ष के, दुगुणा किया जायेगा वास्ते उसके अजाब और है यह ऊपर अल्लाह के सहल।।

-मं० ५। सि० २१। सू० ३३। आ० १५। ३०।।

(समीक्षकयह मुहम्मद साहेब ने इसलिये लिखा लिखवाया होगा कि लड़ाई में कोई न भागे, हमारा विजय होवे, मरने से भी न डरे, ऐश्वर्य बढ़े, मजहब बढ़ा लेवें? और यदि बीबी निर्लज्जता से न आवे तो क्या पैगम्बर साहेब निर्लज्ज हो कर आवें? बीबियों पर अजाब हो और पैगम्बर साहेब पर अजाब न होवे। यह किस घर का न्याय है? ।।१२८।।

१२९-और अटकी रहो बीच घरों अपने के, आज्ञा पालन करो अल्लाह और रसूल की; सिवाय इसके नहीं।। बस जब अदा कर ली जैद ने हाजित उस से, ब्याह दिया हम ने तुझ से उस को ताकि न होवे ऊपर ईमान वालों के तंगी बीच बीबियों से ले पालकों उन के के, जब अदा कर लें उन से हाजित और है आज्ञा खुदा की की गई।। नहीं है ऊपर नबी के कुछ तंगी बीच उस वस्तु के।। नहीं है मुहम्मद बाप किसी मर्द का।। और हलाल की स्त्री ईमानवाली जो देवे बिना महर के जान अपनी वास्ते नबी के।। ढील देवे तू जिस को चाहे उन में से और जगह देवे तर्फ अपनी जिस को चाहे, नहीं पाप ऊपर तेरे।। ऐ लोगो! जो ईमान लाये हो मत प्रवेश करो घरों में पैगम्बर के।।

-मं० ५। सि० २२। सू० ३३। आ० ३३। ३६। ३७। ४०। ५०। ५१। ५२।।

(समीक्षकयह बड़े अन्याय की बात है कि स्त्री घर में कैद के समान रहे और पुरुष खुल्ले रहें। क्या स्त्रियों का चित्त शुद्ध वायु, शुद्ध देश में भ्रमण करना, सृष्टि के अनेक पदार्थ देखना नहीं चाहता होगा? इसी अपराध से मुसलमानों के लड़के विशेषकर सयलानी और विषयी होते हैं। अल्लाह और रसूल की एक अविरुद्ध आज्ञा है वा भिन्न-भिन्न विरुद्ध? यदि एक है तो दोनों की आज्ञा पालन करो कहना व्यर्थ है और जो भिन्न-भिन्न विरुद्ध है तो एक सच्ची और दूसरी झूठी? एक खुदा दूसरा शैतान हो जायगा? और शरीक भी होगा? वाह कुरान का खुदा और पैगम्बर तथा कुरान को! जिस को दूसरे का मतलब नष्ट कर अपना मतलब सिद्ध करना इष्ट हो ऐसी लीला अवश्य रचता है। इस से यह भी सिद्ध हुआ कि मुहम्मद साहेब बड़े विषयी थे। यदि न होते तो (लेपालक) बेटे की स्त्री को जो पुत्र की स्त्री थी; अपनी स्त्री क्यों कर लेते? और फिर ऐसी बातें करने वाले का खुदा भी पक्षपाती बना और अन्याय को न्याय ठहराया। मनुष्यों में जो जंगली भी होगा वह भी बेटे की स्त्री को छोड़ता है और यह कितनी बड़ी अन्याय की बात है कि नबी को विषयासक्ति की लीला करने में कुछ भी अटकाव नहीं होना! यदि नबी किसी का बाप न था तो जैद (लेपालक) बेटा किस का था? और क्यों लिखा? यह उसी मतलब की बात है कि जिस से बेटे की स्त्री को भी घर में डालने से पैगम्बर साहेब न बचे, अन्य से क्योंकर बचे होंगे? ऐसी चतुराई से भी बुरी बात में निन्दा होना कभी नहीं छूट सकता। क्या जो कोई पराई स्त्री भी नबी से प्रसन्न होकर निकाह करना चाहे तो भी हलाल है? और यह महा अधर्म की बात है कि नबी तो जिस स्त्री को चाहे छोड़ देवे और मुहम्मद साहेब की स्त्री लोग यदि पैगम्बर अपराधी भी हो तो कभी न छोड़ सकें! जैसे पैगम्बर के घरों में अन्य कोई व्यभिचार दृष्टि से प्रवेश न करें तो वैसे पैगम्बर साहेब भी किसी के घर में प्रवेश न करें। क्या नबी जिस किसी के घर में चाहें निशंक प्रवेश करें और माननीय भी रहें? भला! कौन ऐसा हृदय का अन्धा है कि जो इस कुरान को ईश्वरकृत और मुहम्मद साहेब को पैगम्बर और कुरानोक्त ईश्वर को परमेश्वर मान सके। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे युक्तिशून्य धर्मविरुद्ध बातों से युक्त इस मत को अर्ब देशनिवासी आदि मनुष्यों ने मान लिया!।।१२९।।

१३०-नहीं योग्य वास्ते तुम्हारे यह कि दुःख दो रसूल को, यह कि निकाह करो बीबियों उस की को पीछे उस के कभी, निश्चय यह है समीप अल्लाह के बड़ा पाप।। निश्चय जो लोग कि दुःख देते हैं अल्लाह को और रसूल उस के को, लानत की है उन को अल्लाह ने।। और वे लोग कि दुःख देते हैं मुसलमानों को और मुसलमान औरतों को विना इस के, बुरा किया है उन्होंने बस निश्चय उठाया उन्होंने बोहतान अर्थात् झूठ और प्रत्यक्ष पाप।। लानत मारे, जहाँ पाये जावें पकड़े जावें कतल किये जावें खूब मारा जाना।। ऐ रब हमारे, दे उन को द्विगुणा अजाब से और लानत से बड़ी लानत कर।।

-मं० ५। सि० २२। सू० ३३। आ० ५३। ५४। ५५। ६१। ६८।।

(समीक्षकवाह! क्या खुदा अपनी खुदाई को धर्म के साथ दिखला रहा है? जैसे रसूल को दुःख देने का निषेध करना तो ठीक है परन्तु दूसरे को दुःख देने में रसूल को भी रोकना योग्य था सों क्यों न रोका? क्या किसी के दुःख देने से अल्लाह भी दुःखी हो जाता है? यदि ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। क्या अल्लाह और रसूल को दुःख देने का निषेध करने से यह नहीं सिद्ध होता कि अल्लाह और रसूल जिस को चाहें दुःख देवें? अन्य सब को दुःख देना चाहिये? जैसे मुसलमानों और मुसलमानों की स्त्रियों को दुःख देना बुरा है तो इन से अन्य मनुष्यों को दुःख देना भी अवश्य बुरा है।। जो ऐसा न माने तो उस की यह बात भी पक्षपात की है। वाह गदर मचाने वाले खुदा और नबी! जैसे ये निर्दयी संसार में हैं वैसे और बहुत थोड़े होंगे। जैसा यह कि अन्य लोग जहाँ पाये जावें, मारे जावें पकड़े जावें, लिखा है वैसी ही मुसलमानों पर कोई आज्ञा देवे तो मुसलमानों को यह बात बुरी लगेगी वा नहीं? वाह क्या हिंसक पैगम्बर आदि हैं कि जो परमेश्वर से प्रार्थना करके अपने से दूसरों को दुगुण दुःख देने के लिये प्रार्थना करना लिखा है। यह भी पक्षपात मतलबसिन्धुपन और महा अधर्म की बात है। इसी से अब तक भी मुसलमान लोगों में से बहुत से शठ लोग ऐसा ही कर्म करने में नहीं डरते। यह ठीक है कि सुशिक्षा के विना मनुष्य पशु के समान रहता है।।१३०।।

१३१-और अल्लाह वह पुरुष है कि भेजता है हवाओं को बस उठाती हैं बादलों को, बस हांक लेते हैं तर्फ शहर मुर्दे की, बस जीवित किया हम ने साथ उस के पृथिवी को पीछे मृत्यु उस की के, इसी प्रकार कबरों में से निकालना है।। जिस ने उतारा बीच घर सदा रहने के दया अपनी से, नहीं लगती हम को बीच उस के मेहनत और नहीं लगती बीच उस के माँदगी।।

-मं० ५। सि० २२। सू० ३५। आ० ९। ३५।।

(समीक्षकवाह क्या फिलासफी खुदा की है। भेजता है वायु को, वह उठाता फिरता है बद्दलों को! और खुदा उस से मुर्दों को जिलाता फिरता है! यह बात ईश्वर सम्बन्धी कभी नहीं हो सकती, क्योंकि ईश्वर का काम निरन्तर एक सा होता रहता है। जो घर होंगे वे विना बनावट के नहीं हो सकते और जो बनावट का है वह सदा नहीं रह सकता। जिस के शरीर है वह परिश्रम के विना दुःखी होता और शरीर वाला रोगी हुए विना कभी नहीं बचता। जो एक स्त्री से समागम करता है वह विना रोग के नहीं बचता तो जो बहुत स्त्रियों से विषयभोग करता है उस की क्या ही दुर्दशा होती होगी? इसलिये मुसलमानों का रहना बहिश्त में भी सुखदायक सदा नहीं हो सकता।।१३१।।

१३२-कसम है कुरान दृढ़ की।। निश्चय तू भेजे हुओं से है।। ऊपर मार्ग सीधे के।। उतारा है गालिब दयावान् ने।।

-मं० ५। सि० २३। सू० ३६। आ० २। ३। ४। ५।।

(समीक्षकअब देखिये! यह कुरान खुदा का बनाया होता तो वह इस की सौगन्द क्यों खाता? यदि नबी खुदा का भेजा होता तो (लेपालक) बेटे की स्त्री पर मोहित क्यों होता? यह कथनमात्र है कि कुरान के मानने वाले सीधे मार्ग पर हैं। क्योंकि सीधा मार्ग वही होता है जिस में सत्य मानना, सत्य बोलना, सत्य करना, पक्षपात रहित न्याय धर्म्म का आचरण करना आदि हैं और इन से विपरीत का त्याग करना। सो न कुरान में न मुसलमानों में और न इन के खुदा में ऐसा स्वभाव है। यदि सब पर प्रबल पैगम्बर मुहम्मद साहेब होते तो सब से अधिक विद्यावान् और शुभगुणयुक्त क्यों न होते? इसलिये जैसे कूंजड़ी अपने बेरों को खट्टा नहीं बतलाती वैसी यह बात भी है।।१३२।।

१३३-और फूंका जावेगा बीच सूर के बस नागहां व कबरों में से तर्फ मालिक अपने की दौडे़गें ।। और गवाही देंगे पांव उन के साथ उस वस्तु के थे कमाते।। सिवाय इसके नहीं कि आज्ञा उस की जब चाहे उत्पन्न करना किसी वस्तु को यह कि कहता वास्ते उस के कि ‘हो जा’, बस हो जाता है।।

-मं० ५। सि० २३। सू० ३६। आ० ५१। ६६। ८२।।

(समीक्षकअब सुनिये ऊटपटांग बातें! पग कभी गवाही दे सकते हैं? खुदा के सिवाय उस समय कौन था जिस को आज्ञा दी? किस ने सुनी? और कौन बन गया? यदि न थी तो यह बात झूठी और जो थी तो वह बात-जो सिवाय खुदा के कुछ चीज नहीं थी और खुदा ने सब कुछ बना दिया-वह झूठी।।१३३।।

१३४-फिराया जावेगा उनके ऊपर पियाला शराब शुद्ध का।। सफेद मजा देने वाली वास्ते पीने वालों के।। समीप उन के बैठी होंगी नीचे आंख रखने वालियाँ, सुन्दर आंखों वालियां।। मानो कि वे अण्डे हैं छिपाये हुए।। क्या बस हम नहीं मरेंगे।। और अवश्य लूत निश्चय पैगम्बरों से था।। जब कि मुक्ति दी हम ने उस को और लोगों उस के को सब को।। परन्तु एक बुढ़िया पीछे रहने वालों में है।। फिर मारा हम ने औरों को।।

-मं० ६। सि० २३। सू० ३७। आ० ४५। ४६। ४८। ४९। ५६। १२७। १२८। १२९।।

(समीक्षकक्यों जी! यहां तो मुसलमान लोग शराब को बुरा बतलाते हैं परन्तु इन के स्वर्ग में तो नदियां की नदियां बहती हैं। इतना अच्छा है कि यहां तो किसी प्रकार मद्य पीना छुड़ाया परन्तु यहां के बदले वहाँ उन के स्वर्ग में बड़ी खराबी है! मारे स्त्रियों के वहाँ किसी का चित्त स्थिर नहीं रहता होगा! और बड़े-बड़े रोग भी होते होंगे! यदि शरीर वाले होंगे तो अवश्य मरेंगे और जो शरीर वाले न होंगे तो भोग विलास ही न कर सकेंगे। फिर उन के स्वर्ग में जाना व्यर्थ है। यदि लूत को पैगम्बर मानते हो तो जो बाइबल में लिखा है कि उस से उस की लड़कियों ने समागम करके दो लड़के पैदा किये इस बात को भी मानते हो वा नहीं? जो मानते हो तो ऐसे को पैगम्बर मानना व्यर्थ है। और जो ऐसे और ऐसे के सिंगयों को खुदा मुक्ति देता है तो वह खुदा भी वैसा ही है। क्योंकि बुढ़िया की कहानी कहने वाला और पक्षपात से दूसरों को मारने वाला खुदा कभी नहीं हो सकता। ऐसा खुदा मुसलमानों ही के घर में रह सकता है; अन्यत्र नहीं।।१३४।।

१३५-बहिश्तें हैं सदा रहने की खुले हुए हैं दर उन के वास्ते उन के।। तकिये किये हुए बीच उन के मंगावेंगे बीच इस के मेवे और पीने की वस्तु।। और समीप होंगी उनके, नीचे रखने वालियां दृष्टि और दूसरों से समायु।। बस सिजदा किया फरिश्तों ने सब ने।। परन्तु शैतान ने न माना अभिमान किया और था काफिरों से।। ऐ शैतान किस वस्तु ने रोका तुझ को यह कि सिजदा करे वास्ते उस वस्तु के कि बनाया मैंने साथ दोनों हाथ अपने के, क्या अभिमान किया तूने वा था तू बड़े अधिकार वालों से ।। कहा कि मैं अच्छा हूँ उस वस्तु से, उत्पन्न किया तूने मुझ को आग से, उस को मट्टी से।। कहा बस निकल इन आसमानों में से, बस निश्चय तू चलाया गया है।। निश्चय ऊपर तेरे लानत है मेरी दिन जजा तक।। कहा ऐ मालिक मेरे, ढील दे उस दिन तक कि उठाये जावेंगे मुर्दे।। कहा कि बस निश्चय तू ढील दिये गयों से है ।। उस दिन समय ज्ञात तक।। कहा कि बस कसम है प्रतिष्ठा तेरी की, अवश्य गुमराह करूंगा उन को मैं इकट्ठे।।

-मं० ६। सि० २३। सू० ३८। आ० ४९। ५०। ५१। ५२। ७०। ७१। ७३। ७५। ७६। ७८। ८०। ८१।।

(समीक्षकयदि वहाँ जैसे कि कुरान में बाग बगीचे नहरें मकानादि लिखे हैं वैसे हैं तो वे न सदा से थे न सदा रह सकते हैं। क्योंकि जो संयोग से पदार्थ होता है वह संयोग के पूर्व न था, अवश्यभावी वियोग के अन्त में न रहेगा। जब वह बहिश्त ही न रहेगा तो उस में रहने वाले सदा क्योंकर रह सकते हैं ? क्योंकि लिखा है कि गद्दी, तकिये, मेवे और पीने के पदार्थ वहाँ मिलेंगे। इससे यह सिद्ध होता है कि जिस समय मुसलमानों का मजहब चला उस समय अर्ब देश विशेष धनाढ्य न था। इसीलिये मुहम्मद साहेब ने तकिये आदि की कथा सुना कर गरीबों को अपने मत में फंसा लिया। और जहाँ स्त्रियां हैं। वहाँ निरन्तर सुख कहां? वे स्त्रियां वहाँ कहां से आई हैं? अथवा बहिश्त की रहने वाली हैं? यदि आई हैं तो जावेंगी और जो वहीं की रहने वाली हैं तो कयामत के पूर्व क्या करती थीं? क्या निकम्मी अपनी उमर को बहा रही थीं? अब देखिये खुदा का तेज कि जिस का हुक्म अन्य सब फरिश्तों ने माना और आदम साहेब को नमस्कार किया और शैतान ने न माना! खुदा ने शैतान से पूछा कहा कि मैंने उस को अपने दोनों हाथों से बनाया, तू अभिमान मत कर। इस से सिद्ध होता है कि कुरान का खुदा दो हाथ वाला मनुष्य था। इसलिए वह व्यापक वा सर्वशक्तिमान् कभी नहीं हो सकता। और शैतान ने सत्य कहा कि मैं आदम से उत्तम हूँ, इस पर खुदा ने गुस्सा क्यों किया? क्या आसमान ही में खुदा का घर है; पृथिवी में नहीं? तो काबे को खुदा का घर प्रथम क्यों लिखा? भला! परमेश्वर अपने में से वा सृष्टि में से अलग कैसे निकाल सकता है? और वह सृष्टि सब परमेश्वर की है। इस से स्पष्ट विदित हुआ कि कुरान का खुदा बहिश्त का जिम्मेदार था। खुदा ने उस को लानत धिक्कार दिया और कैद कर लिया और शैतान ने कहा कि हे मालिक! मुझ को कयामत तक छोड़ दे। खुदा ने खुशामद से कयामत के दिन तक छोड़ दिया। जब शैतान छूटा तो खुदा से कहता है कि अब मैं खूब बहकाऊंगा और गदर मचाऊंगा। तब खुदा ने कहा कि जितनों को तू बहकावेगा मैं उन को दोजख में डाल दूंगा और तुझ को भी। अब सज्जन लोगो विचारिये! कि शैतान को बहकाने वाला खुदा है वा आप से वह बहका? यदि खुदा ने बहकाया तो वह शैतान का शैतान ठहरा। यदि शैतान स्वयं बहका तो अन्य जीव भी स्वयं बहकेंगे; शैतान की जरूरत नहीं। और जिस से इस शैतान बागी को खुदा ने खुला छोड़ दिया, इस से विदित हुआ कि वह भी शैतान का शरीक अधर्म कराने में हुआ। यदि स्वयं चोरी करा के दण्ड देवे तो उस के अन्याय का कुछ भी पारावार नहीं।।१३५।।

१३६-अल्लाह क्षमा करता है पाप सारे, निश्चय वह है क्षमा करने वाला दयालु।। और पृथिवी सारी मूठी में है उस की दिन कयामत के और आसमान लपेटे हुए हैं बीच दाहिने हाथ उसके के।। और चमक जावेगी पृथिवी साथ प्रकाश मालिक अपने के और रक्खे जावेंगे कर्मपत्र और लाया जावेगा पैगम्बरों को और गवाहों को और फैसला किया जावेगा।। -मं० ६। सि० २४। सू० ३९। आ० ५३। ६७। ६९।।

(समीक्षकयदि समग्र पापों को खुदा क्षमा करता है तो जानो सब संसार

को पापी बनाता है और दयाहीन है क्योंकि एक दुष्ट पर दया और क्षमा करने से वह अधिक दुष्टता करेगा और अन्य बहुत धर्मात्माओं को दुःख पहुँचावेगा। यदि किञ्चित् भी अपराध क्षमा किया जावे तो अपराध ही अपराध जगत् में छा जावे। क्या परमेश्वर अग्निवत् प्रकाश वाला है? और कर्मपत्र कहां जमा रहते हैं? और कौन लिखता है? यदि पैगम्बरों और गवाहों के भरोसे खुदा न्याय करता है तो वह असर्वज्ञ और असमर्थ है । यदि वह अन्याय नहीं करता न्याय ही करता है तो कर्मों के अनुसार करता होगा। वे कर्म पूर्वापर वर्त्तमान जन्मों के हो सकते हैं तो फिर क्षमा करना, दिलों पर ताला लगाना और शिक्षा न करना, शैतान से बहकवाना, दौरा सुपुर्द रखना केवल अन्याय है।।१३६।।

१३७-उतारना किताब का अल्लाह गालिब जानने वाले की ओर से है।। क्षमा करने वाला पापों का और स्वीकार करने वाला तोबाः का।।

-मं० ६। सि० २४। सू० ४०। आ० १। २। ३।।

(समीक्षकयह बात इसलिये है कि भोले लोग अल्लाह के नाम से इस पुस्तक को मान लेवें कि जिस में थोड़ा सा सत्य छोड़ असत्य भरा है और वह सत्य भी असत्य के साथ मिलकर बिगड़ा सा है। इसीलिये कुरान और कुरान का खुदा और इस को मानने वाले पाप बढ़ाने हारे और पाप करने कराने वाले हैं। क्योंकि पाप का क्षमा करना अत्यन्त अधर्म है। किन्तु इसी से मुसलमान लोग पाप और उपद्रव करने में कम डरते हैं।।१३७।।

१३८-बस नियत किया उस को सात आसमान बीच दो दिन के, और डाल दिया बीच हम ने उस के काम उस का।। यहां तक कि जब जावेंगे उस के पास साक्षी देंगे ऊपर उन के कान उन के और आंखें उन की और चमड़े उन के कर्म से।। और कहेंगे वास्ते चमड़े अपने के क्यों साक्षी दी तू ने ऊपर हमारे, कहेंगे कि बुलाया है हम को अल्लाह ने जिस ने बुलाया हर वस्तु को।। अवश्य जिलाने वाला है मुर्दों को।। -मं० ६। सि० २४। सू० ४१। आ० १२। २०। २१। ३९।।

(समीक्षकवाह जी वाह मुसलमानो ! तुम्हारा खुदा जिस को तुम सर्वशक्तिमान् मानते हो वह सात आसमानों को दो दिन में बना सका? और जो सर्वशक्तिमान् है वह क्षणमात्र में सब को बना सकता है। भला कान, आंख और चमड़े को ईश्वर ने जड़ बनाया है वे साक्षी कैसे दे सकेंगे? यदि साक्षी दिलावे तो उस ने प्रथम जड़ क्यों बनाये? और अपना पूर्वापर काम नियमविरुद्ध क्यों किया? एक इस से भी बढ़ कर मिथ्या बात यह कि जब जीवों पर साक्षी दी तब वे जीव अपने-अपने चमड़े से पूछने लगे कि तूने हमारे पर साक्षी क्यों दी? चमड़ा बोलेगा खुदा ने दिलायी मैं क्या करूं! भला यह बात कभी हो सकती है? जैसे कोई कहे कि बन्ध्या के पुत्र का मुख मैंने देखा, यदि पुत्र है तो बन्ध्या क्यों? जो बन्ध्या है तो उस के पुत्र ही होना असम्भव है। इसी प्रकार की यह भी मिथ्या बात है। यदि वह मुर्दों को जिलाता है तो प्रथम मारा ही क्यों? क्या आप भी मुर्दा हो सकता है वा नहीं? यदि नहीं हो सकता तो मुर्देपन को बुरा क्यों समझता है? और कयामत की रात तक मृतक जीव किस मुसलमान के घर में रहेंगे? और दौरासुपुर्द खुदा ने विना अपराध क्यों रक्खा? शीघ्र न्याय क्यों न किया? ऐसी-ऐसी बातों से ईश्वरता में बट्टा लगता है।।१३८।।

१३९-वास्ते उस के कुंजियां हैं आसमानों की और पृथिवी की, खोलता

है भोजन जिस के वास्ते चाहता है और तंग करता है।। उत्पन्न करता है जो कुछ चाहता है और देता है जिस को चाहे बेटियां और देता है जिस को चाहे बेटे।। वा मिला देता है उन को बेटे और बेटियाँ और कर देता है जिस को चाहे बाँझ।। और नहीं है शक्ति किसी आदमी को कि बात करे उस से अल्लाह परन्तु जी में डालने कर वा पीछे परदे१ के से वा भेजे फरिश्ते पैगाम लाने वाला।।

-मं० ६। सि० २५। सू० ४२। आ० १०। १२।४७। ४८। ४९।।

(समीक्षकखुदा के पास कुञ्जियों का भण्डार भरा होगा। क्योंकि सब ठिकाने के ताले खोलने होते होंगे! यह लड़कपन की बात है। क्या जिस को चाहता है उस को विना पुण्य कर्म के ऐश्वर्य देता है? और विना पाप के तंग करता है? यदि ऐसा है तो वह बड़ा अन्यायकारी है। अब देखिये कुरान बनाने वाले की चतुराई! कि जिस से स्त्रीजन भी मोहित हो के फसें। यदि जो कुछ चाहता है उत्पन्न करता है तो दूसरे खुदा को भी उत्पन्न कर सकता है वा नहीं? यदि नहीं कर सकता तो सर्वशक्तिमत्ता यहां पर अटक गई। भला मनुष्यों को तो जिस को चाहे बेटे बेटियां खुदा देता है परन्तु मुरगे, मच्छी, सूअर आदि जिन के बहुत बेटा बेटियां होती हैं कौन देता है? और स्त्री पुरुष के समागम विना क्यों नहीं देता? किसी को अपनी इच्छा से बांझ रख के दुःख क्यों देता है? वाह! क्या खुदा तेजस्वी है कि उस के सामने कोई बात ही नहीं कर सकता! परन्तु उसने पहले कहा है कि पर्दा डाल के बात कर सकता है वा फरिश्ते लोग खुदा से बात करते हैं अथवा पैगम्बर। जो ऐसी बात है तो फरिश्ते और पैगम्बर खूब अपना मतलब करते होंगे! यदि कोई कहे खुदा सर्वज्ञ सर्वव्यापक है तो परदे से बात करना अथवा डाक के तुल्य खबर मंगा के जानना लिखना व्यर्थ है। और जो ऐसा ही है तो वह खुदा ही नहीं किन्तु कोई चालाक मनुष्य होगा। इसलिये यह कुरान ईश्वरकृत कभी नहीं हो सकता।।१३९।।

१४०-और जब आया ईसा साथ प्रमाण प्रत्यक्ष के।। -मं० ६। सि० २५। सू० ४३। आ० ६३।।

(समीक्षकयदि ईसा भी भेजा हुआ खुदा का है तो उस के उपदेश से विरुद्ध कुरान खुदा ने क्यों बनाया? और कुरान से विरुद्ध इञ्जील क्यों की? इसीलिये ये किताबें ईश्वरकृत नहीं हैं।।१४०।।

१४१-पकड़ो उस को बस घसीटो उस को बीचों बीच दोजख के।। इसी प्रकार रहेंगे और व्याह देंगे उन को साथ गोरियों अच्छी आंखों वालियों के।।

-मं० ६। सि० २५। सू० ४४। आ० ४७। ५४।।

(समीक्षकवाह! क्या खुदा न्यायकारी होकर प्राणियों को पकड़ाता और घसीटवाता है? जब मुसलमानों का खुदा ही ऐसा है तो उस के उपासक मुसलमान अनाथ निर्बलों को पकड़ें घसीटें तो इस में क्या आश्चर्य है? और वह संसारी मनुष्यों

– इस आयत के भाष्य तफसीरहुसैनी’ में लिखा है कि मुहम्मद साहेब दो परदों में थे और खुदा की आवाज सुनी। एक पर्दा री का था दूसरा श्वेत मोतियों का और दोनों परदों के बीच में सत्तर वर्ष चलने योग्य मार्ग था बुद्धिमान् लोग इस बात को विचारें कि यह खुदा है वा परदे की ओट बात करने वाली स्त्री इन लोगों ने तो ईश्वर ही की दुर्दशा कर डाली। कहां वेद तथा उपनिषदादि सद्ग्रन्थों में प्रतिपदित शुद्ध परमात्मा और कहां कुरानोक्त परदे की ओट से बात करने वाला खुदासच तो यह है कि अरब के अविद्वान् लोग थेउत्तम बात लाते किस के घर से।

के समान विवाह भी कराता है, जानो कि मुसलमानों का पुरोहित ही है।।१४१।।

१४२-बस जब तुम मिलो उन लोगों से कि काफिर हुए बस मारो गर्दनें उन की यहां तक कि जब चूर कर दो उन को बस दृढ़ करो कैद करना।। और बहुत बस्तियां हैं कि वे बहुत कठिन थीं शक्ति में बस्ती तेरी से, जिस ने निकाल दिया तुझ को मारा हम ने उन को, बस न कोई हुआ सहाय देने वाला उन का।। तारीफ उस बहिश्त की कि प्रतिज्ञा किये गये हैं परहेजगार, बीच उस के नहरें हैं बिन बिगड़े पानी की, और नहरें हैं दूध की कि नहीं बदला मजा उन का, और नहरें हैं शराब की मजा देने वाली वास्ते पीने वालों के और नहरें हैं शहद साफ किये गये की और वास्ते उन के बीच उस के मेवे हैं प्रत्येक प्रकार से दान मालिक उन के से।। -मं० ६। सि० २६। सू० ४७। आ० ४। १३। १५।।

(समीक्षकइसी से यह कुरान खुदा और मुसलमान गदर मचाने, सब को दुःख देने और अपना मतलब साधने वाले दयाहीन हैं। जैसा यहां लिखा है वैसा ही दूसरा कोई दूसरे मत वाला मुसलमानों पर करे तो मुसलमानों को वैसा ही दुःख जैसा कि अन्य को देते हैं हो वा नहीं? और खुदा बड़ा पक्षपाती है कि जिन्होंने मुहम्मद साहेब को निकाल दिया उनको खुदा ने मारा। भला! जिसमें शुद्ध पानी, दूध, मद्य और शहद की नहरें हैं वह संसार से अधिक हो सकता है? और दूध की नहरें कभी हो सकती हैं? क्योंकि वह थोड़े समय में बिगड़ जाता है! इसीलिये बुद्धिमान् लोग कुरान के मत को नहीं मानते।।१४२।।

१४३-जब कि हिलाई जावेगी पृथिवी हिलाये जाने कर।। और उड़ाये जावेंगे पहाड़ उड़ाये जाने कर।। बस हो जावेंगे भुनगे टुकड़े-टुकड़े।। बस साहब दाहनी ओर वाले क्या हैं साहब दाहनी ओर के।। और बाईं ओर वाले क्या हैं बाईं ओर के।। ऊपर पलंग सोने के तारों से बुने हुए हैं।। तकिये किये हुए हैं ऊपर उनके आमने-सामने।। और फिरेंगे ऊपर उनके लड़के सदा रहने वाले।। साथ आबखोरों के और आफताबों के और प्यालों के शराब साफ से ।। नहीं माथा दुखाये जावेंगे उस से और न विरुद्ध बोलेंगे।। और मेवे उस किस्म से कि पसन्द करें।। और गोश्त जानवर पक्षियों के उस किस्म से कि पसन्द करें।। और वास्ते उन के औरतें हैं अच्छी आंखों वाली।। मानिन्द मोतियों छिपाये हुओं की।। और बिछौने बड़े।। निश्चय हम ने उत्पन्न किया है औरतों को एक प्रकार का उत्पन्न करना है।। बस किया है हम ने उन को कुमारी।। सुहागवालियां बराबर अवस्था वालियां।। बस भरने वाले हो उस से पेटों को।। बस कसम खाता हूँ मैं साथ गिरने तारों के।।

-मं० ७। सि० २७। सू० ५६। आ० ४। ५। ६। ८। ९। १५। १६। १७। १८। १९।

२०। २१। २२। २३। ३३। ३४। ३५। ३६। ३७। ३८। ५३।।

(समीक्षकअब देखिये कुरान बनाने वाले की लीला को! भला पृथिवी तो हिलती ही रहती है उस समय भी हिलती रहेगी। इस से यह सिद्ध होता है कि कुरान बनाने वाला पृथिवी को स्थिर जानता था! भला पहाड़ों को क्या पक्षीवत् उड़ा देगा? यदि भुनगे हो जावेंगे तो भी सूक्ष्म शरीरधारी रहेंगे तो फिर उन का दूसरा जन्म क्यों नहीं? वाह जी ! जो खुदा शरीरधारी न होता तो उस के दाहिनी ओर और बाईं ओर कैसे खड़े हो सकते? जब वहाँ पलंग सोने के तारों से बुने हुए हैं तो बढ़ई सुनार भी वहाँ रहते होंगे और खटमल काटते होंगे जो उन को रात्रि में सोने भी नहीं देते होंगे। क्या वे तकिये लगाकर निकम्मे बहिश्त में बैठे ही रहते हैं वा कुछ काम किया करते हैं? यदि बैठे ही रहते होंगे तो उन को अन्न पचन न होने से वे रोगी होकर शीघ्र मर भी जाते होंगे? और जो काम किया करते होंगे तो जैसे मेहनत मजदूरी यहां करते हैं वैसे ही वहाँ परिश्रम करके निर्वाह करते होंगे फिर यहां से वहाँ बहिश्त में विशेष क्या है? कुछ भी नहीं। यदि वहाँ लड़के सदा रहते हैं तो उन के माँ बाप भी रहते होंगे और सासू श्वसुर भी रहते होंगे तब तो बड़ा भारी शहर बसता होगा फिर मल मूत्रदि के बढ़ने से रोग भी बहुत से होते होंगे क्योंकि जब मेवे खावेंगे, गिलासों में पानी पीवेंगे और प्यालों से मद्य पीवेंगे न उन का सिर दूखेगा और न कोई विरुद्ध बोलेगा यथेष्ट मेवा खावेंगे और जानवरों तथा पक्षियों के मांस भी खावेंगे तो अनेक प्रकार के दुःख, पक्षी, जानवर वहाँ होंगे, हत्या होगी और हाड़ जहाँ तहां बिखरे रहेंगे और कसाइयों की दुकानें भी होंगी। वाह क्या कहना इनके बहिश्त की प्रशंसा कि वह अरब देश से भी बढ़ कर दीखती है!!! और जो मद्य मांस पी खा के उन्मत्त होते हैं इसी लिये अच्छी-अच्छी स्त्रियां और लौंडे भी वहाँ अवश्य रहने चाहिये नहीं तो ऐसे नशेबाजों के शिर में गरमी चढ़ के प्रमत्त हो जावें। अवश्य बहुत स्त्री पुरुषों के बैठने सोने के लिये बिछौने बड़े-बड़े चाहिये। जब खुदा कुमारियों को बहिश्त में उत्पन्न करता है तभी तो कुमारे लड़कों को भी उत्पन्न करता है। भला! कुमारियों का तो विवाह जो यहां से उम्मीदवार हो कर गये हैं उन के साथ खुदा ने लिखा पर उन सदा रहने वाले लड़कों का भी किन्हीं कुमारियों के साथ विवाह न लिखा तो क्या वे भी उन्हीं उम्मीदवारों के साथ कुमारीवत् दे दिये जावेंगे? इस की व्यवस्था कुछ भी न लिखी। यह खुदा में बड़ी भूल क्यों हुई? यदि बराबर अवस्था वाली सुहागिन स्त्रियाँ पतियों को पा के बहिश्त में रहती हैं तो ठीक नहीं हुआ क्योंकि स्त्रियों से पुरुष का आयु दूना ढाई गुना चाहिये, यह तो मुसलमानों के बहिश्त की कथा है। और नरक वाले सिहोड़ अर्थात् थोर के वृक्षों को खा के पेट भरेंगे तो कण्टक वृक्ष भी दोजख में होंगे तो कांटे भी लगते होंगे और गर्म पानी पीयेंगे इत्यादि दुःख दोजख में पावेंगे।। कसम का खाना प्रायः झूठों का काम है; सच्चों का नहीं। यदि खुदा ही कसम खाता है तो वह भी झूठ से अलग नहीं हो सकता।।१४३।।

१४४-निश्चय अल्लाह मित्र रखता है उन लोगों को कि लड़ते हैं बीच मार्ग उसके के।। -मं० ७। सि० २८। सू० ६१। आ० ४।।

(समीक्षकवाह ठीक है! ऐसी-ऐसी बातों का उपदेश करके विचारे अर्ब देशवासियों को सब से लड़ा के शत्रु बनाकर परस्पर दुःख दिलाया और मजहब का झण्डा खड़ा करके लड़ाई फैलावे ऐसे को कोई बुद्धिमान् ईश्वर कभी नहीं मान सकते।। जो मनुष्य जाति में विरोध बढ़ावे वही सब को दुःखदाता होता है।।१४४।।

१४५-ऐ नबी क्यों हराम करता है उस वस्तु को कि हलाल किया है खुदा ने तेरे लिये, चाहता है तू प्रसन्नता बीबियों अपनी की, और अल्लाह क्षमा करने वाला दयालु है।। जल्दी है मालिक उस का जो वह तुम को छोड़ दे तो यह है कि उस को तुम से अच्छी मुसलमान और ईमान वालियां बीबियां बदल दे सेवा करने वालियां तोबाः करने वालियां भक्ति करने वालियां रोजा रखने वालियां पुरुष देखी हुईं और बिन देखी हुईं।। -मं० ७। सि० २८। सू० ६६। आ० १। ५।।

(समीक्षकध्यान देकर देखना चाहिये कि खुदा क्या हुआ मुहम्मद साहेब के घर का भीतरी और बाहरी प्रबन्ध करने वाला भृत्य ठहरा !! प्रथम आयत पर दो कहानियां हैं एक तो यह कि मुहम्मद साहेब को शहद का शर्बत प्रिय था। उन की कई बीबियां थीं उन में से एक के घर पीने में देर लगी तो दूसरियों को असह्य प्रतीत हुआ उन के कहने सुनने के पीछे मुहम्मद साहेब सौगन्ध खा गये कि हम न पीवेंगे। दूसरी यह कि उनकी कई बीबियों में से एक की बारी थी। उसके यहां रात्री को गये तो वह न थी; अपने बाप के यहां गई थी। मुहम्मद साहेब ने एक लौंडी अर्थात् दासी को बुला कर पवित्र किया। जब बीबी को इस की खबर मिली तो अप्रसन्न हो गई। तब मुहम्मद साहेब ने सौगन्ध खाई कि मैं ऐसा न करूँगा। और बीबी से भी कह दिया तुम किसी से यह बात मत कहना। बीबी ने स्वीकार किया कि न कहूँगी। फिर उन्होंने दूसरी बीबी से जा कहा। इस पर यह आयत खुदा ने उतारी ‘जिस वस्तु को हम ने तेरे पर हलाल किया उस को तू हराम क्यों करता है? ’ बुद्धिमान् लोग विचारें कि भला कहीं खुदा भी किसी के घर का निमटेरा करता फिरता है? और मुहम्मद साहेब के तो आचरण इन बातों से प्रकट ही हैं क्योंकि जो अनेक स्त्रियों को रक्खे वह ईश्वर का भक्त वा पैगम्बर कैसे हो सके? और जो एक स्त्री का पक्षपात से अपमान करे और दूसरी का मान्य करे वह पक्षपाती होकर अधर्मी क्यों नहीं और जो बहुत सी स्त्रियों से भी सन्तुष्ट न होकर बाँदियों के साथ फंसे उस की लज्जा, भय और धर्म कहां से रहे? किसी ने कहा है कि-

कामातुराणां न भयं न लज्जा।।

जो कामी मनुष्य हैं उन को अधर्म से भय वा लज्जा नहीं होती। और इन का खुदा भी मुहम्मद साहेब की स्त्रियों और पैगम्बर के झगड़े का फैसला करने में जानो सरपंच बना है। अब बुद्धिमान् लोग विचार लें कि यह कुरान विद्वान् वा ईश्वरकृत है वा किसी अविद्वान् मतलबसिन्धु का बनाया? स्पष्ट विदित हो जाएगा और दूसरी आयत से प्रतीत होता है कि मुहम्मद साहेब से उन की कोई बीबी अप्रसन्न हो गई होगी, उस पर खुदा ने यह आयत उतार कर उस को धमकाया होगा कि यदि तू गड़बड़ करेगी और मुहम्मद साहेब तुझे छोड़ देंगे तो उन को उन का खुदा तुझ से अच्छी बीबियां देगा कि जो पुरुष से न मिली हों। जिस मनुष्य को तनिक सी बुद्धि है वह विचार ले सकता है कि ये खुदा वुदा के काम हैं वा अपना प्रयोजन सिद्धि के! ऐसी-ऐसी बातों से ठीक सिद्ध है कि खुदा कोई नहीं कहता था केवल देशकाल देखकर अपने प्रयोजन सिद्ध होने के लिए खुदा की तर्फ से मुहम्मद साहेब कह देते थे। जो लोग खुदा ही की तर्फ लगाते हैं उन को हम सब क्या, सब बुद्धिमान् यही कहेंगे कि खुदा क्या ठहरा मानो मुहम्मद साहेब के लिये बीबियां लाने वाला नाई ठहरा!!! ।।१४५।।

१४६-ऐ नबी झगड़ा कर काफिरों और गुप्त शत्रुओं से और सख्ती कर ऊपर उन के।। -मं० ७। सि० २८। सू० ६६। आ० ९।।

(समीक्षकदेखिये मुसलमानों के खुदा की लीला! अन्य मत वालों से लड़ने के लिये पैगम्बर और मुसलमानों को उचकाता है इसीलिये मुसलमान लोग उपद्रव करने में प्रवृत्त रहते हैं। परमात्मा मुसलमानों पर कृपादृष्टि करे जिस से ये लोग उपद्रव करना छोड़ के सब से मित्रता से वर्त्तें।।१४६।।१४७-फट जावेगा आसमान, बस वह उस दिन सुस्त होगा।। और फरिश्ते होंगे ऊपर किनारों उस के के; और उठावेंगे तख्त मालिक तेरे का ऊपर अपने उस दिन आठ जन।। उस दिन सामने लाये जाओगे तुम, न छिपी रहेगी कोई बात छिपी हुई ।। बस जो कोई दिया गया कर्मपत्र अपना बीच दाहिने हाथ अपने के, बस कहेगा लो पढ़ो कर्मपत्र मेरा।। और जो कोई दिया गया कर्मपत्र बीच बांये हाथ अपने के, बस कहेगा हाथ न दिया गया होता मैं कर्मपत्र अपना।।

-मं० ७। सि० २९। सू० ६९। आ० १६। १७। १८। १९। २५।।

(समीक्षकवाह क्या फिलासफी और न्याय की बात है! भला आकाश भी कभी फट सकता है? क्या वह वस्त्र के समान है जो फट जावे? यदि ऊपर के लोक को आसमान कहते हैं तो यह बात विद्या से विरुद्ध है। अब कुरान का खुदा शरीरधारी होने में कुछ संदिग्ध न रहा । क्योंकि तख्त पर बैठना, आठ कहारों से उठवाना विना मूर्तिमान् के कुछ भी नहीं हो सकता? और सामने वा पीछे भी आना-जाना मूर्तिमान् ही का हो सकता है। जब वह मूर्तिमान् है तो एकदेशी होने से सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् नहीं हो सकता और सब जीवों के सब कर्मों को कभी नहीं जान सकता। यह बडे़ आश्चर्य की बात है कि पुण्यात्माओं के दाहिने हाथ में पत्र देना, बचवाना, बहिश्त में भेजना और पापात्माओं के बायें हाथ में कर्मपत्र का देना, नरक में भेजना, कर्मपत्र बांच के न्याय करना! भला यह व्यवहार सर्वज्ञ का हो सकता है? कदापि नहीं। यह सब लीला लड़केपन की है।।१४७।।

१४८-चढ़ते हैं फरिश्ते और रूह तर्फ उस की वह अजाब होगा बीच उस दिन के कि है परिमाण उस का पचास हजार वर्ष।। जब कि निकलेंगे कबरों में से दौड़ते हुए मानो कि वह बुतों के स्थानों की ओर दौड़ते हैं।

-मं० ७। सि० २९। सू० ७०। आ० ४। ४३।।

(समीक्षकयदि पचास हजार वर्ष दिन का परिमाण है तो पचास हजार वर्ष की रात्रि क्यों नहीं? यदि उतनी बड़ी रात्रि नहीं है तो उतना बड़ा दिन कभी नहीं हो सकता। क्या पचास हजार वर्षों तक खुदा फरिश्ते और कर्मपत्र वाले खड़े वा बैठे अथवा जागते ही रहेंगे? यदि ऐसा है तो सब रोगी हो कर पुनः मर ही जायेंगे। क्या कबरों से निकल कर खुदा की कचहरी की ओर दौड़ेंगे? उन के पास सम्मन कबरों में क्योंकर पहुँचेंगे? और उन बिचारों को जो कि पुण्यात्मा वा पापात्मा हैं। इतने समय तक सभी को कबरों में दौरेसुपुर्द कैद क्यों रक्खा? और आजकल खुदा की कचहरी बन्ध होगी और खुदा तथा फरिश्ते निकम्मे बैठे होंगे? अथवा क्या काम करते होंगे। अपने-अपने स्थानों में बैठे इधर-उधर घूमते, सोते, नाच तमाशा देखते व ऐश आराम करते होंगे । ऐसा अन्धेर किसी के राज्य में न होगा। ऐसी-ऐसी बातों को सिवाय जंगलियों के दूसरा कौन मानेगा? ।।१४८।।

१४९-निश्चय उत्पन्न किया तुम को कई प्रकार से।। क्या नहीं देखा तुम ने कैसे उत्पन्न किया अल्लाह ने सात आसमानों को ऊपर तले।। और किया चांद को बीच उन के प्रकाशक और किया सूर्य को दीपक।।

-मं० ७। सि० २९। सू० ७१। आ० १४। १५। १६।।

(समीक्षकयदि जीवों को खुदा ने उत्पन्न किया है तो वे नित्य अमर कभी नहीं रह सकते? फिर बहिश्त में सदा क्योंकर रह सकेंगे? जो उत्पन्न होता है वह वस्तु अवश्य नष्ट हो जाता है। आसमान को ऊपर तले कैसे बना सकता है? क्योंकि वह निराकार और विभु पदार्थ है। यदि दूसरी चीज का नाम आकाश रखते हो तो भी उस का आकाश नाम रखना व्यर्थ है। यदि ऊपर तले आसमानों को बनाया है तो उन सब के बीच में चांद सूर्य्य कभी नहीं रह सकते। जो बीच

में रक्खा जाय तो एक ऊपर और एक नीचे का पदार्थ प्रकाशित हो दूसरे से लेकर सब में अन्धकार रहना चाहिये। ऐसा नहीं दीखता, इस लिये यह बात सर्वथा मिथ्या है।।१४९।।

१५०-यह कि मसजिदें वास्ते अल्लाह के हैं, बस मत पुकारो साथ अल्लाह के किसी को।। -मं० ७। सि० २९। सू० ७२। आ० १८।।

(समीक्षकयदि यह बात सत्य है तो मुसलमान लोग ‘लाइलाह इल्लिलाः मुहम्मदर्रसूलल्लाः’ इस कलमे में खुदा के साथ मुहम्मद साहेब को क्यों पुकारते हैं? यह बात कुरान से विरुद्ध है और जो विरुद्ध नहीं करते तो इस कुरान की बात को झूठ करते हैं। जब मसजिदें खुदा के घर हैं तो मुसलमान महाबुत्परस्त हुए। क्योंकि जैसे पुराणी, जैनी छोटी सी मूर्त्ति को ईश्वर का घर मानने से बुत्परस्त ठहरते हैं; ये लोग क्यों नहीं? ।।१५०।।

१५१-इकट्ठा किया जावेगा सूर्य और चांद।।

-मं० ७। सि० २९। सू० ७५। आ० ९।।

(समीक्षकभला सूर्य्य चांद कभी इकट्ठे हो सकते हैं ? देखिये! यह कितनी बेसमझ की बात है । और सूर्य्य चन्द्र ही के इकट्ठे करने में क्या प्रयोजन था? अन्य सब लोकों को इकट्ठे न करने में क्या युक्ति है? ऐसी-ऐसी असम्भव बातें परमेश्वरकृत कभी हो सकती हैं? बिना अविद्वानों के अन्य किसी की भी नहीं होतीं।।१४९।।

१५२-और फिरेंगे ऊपर उनके लड़के सदा रहने वाले, जब देखेगा तू उन को, अनुमान करेगा तू उन को मोती बिखरे हुए।। और पहनाये जावेंगे कंगन चाँदी के और पिलावेगा उन को रब उन का शराब पवित्र।।

-मं० ७। सि० २९। सू० ७६। आ० १९। २१।।

(समीक्षकक्यों जी मोती के वर्ण से लड़के किस लिये वहाँ रक्खे जाते हैं? क्या जवान लोग सेवा वा स्त्री जन उनको तृप्त नहीं कर सकतीं? क्या आश्चर्य है कि जो यह महा बुरा कर्म लड़कों के साथ दुष्ट जन करते हैं उस का मूल यही कुरान का वचन हो ! और बहिश्त में स्वामी सेवकभाव होने से स्वामी को आनन्द और सेवक को परिश्रम होने से दुःख तथा पक्षपात क्यों है? और जब खुदा ही उनको मद्य पिलावेगा तो वह भी उन का सेवकवत् ठहरेगा, फिर खुदा की बड़ाई क्योंकर रह सकेगी? और वहाँ बहिश्त में स्त्री पुरुष का समागम और गर्भस्थिति और लड़केबाले भी होते हैं वा नहीं? यदि नहीं होते तो उन का विषयसेवन करना व्यर्थ हुआ और जो होते हैं तो वे जीव कहां से आये? और विना खुदा की सेवा के बहिश्त में क्यों जन्मे? यदि जन्मे तो उन को बिना ईमान लाने और खुदा की भक्ति करने से बहिश्त मुफ्त मिल गया। किन्हीं बिचारों को ईमान लाने और किन्हीं को विना धर्म के सुख मिल जाय इस से दूसरा बड़ा अन्याय कौन सा होगा? ।।१५२।।

१५३-बदला दिये जावेंगे कर्मानुसार।। और प्याले हैं भरे हुए ।। जिस दिन खड़े होंगे रूह और फरिश्ते सफ बांध कर।।

-मं० ७। सि० ३०। सू० ७८। आ० २६। ३४। ३८।।

(समीक्षकयदि कर्मानुसार फल दिया जाता तो सदा बहिश्त में रहने वाले हूरें फरिश्ते और मोती के सदृश लड़कों को कौन कर्म के अनुसार सदा के लिये बहिश्त मिला? जब प्याले भर-भर शराब पीयेंगे तो मस्त हो कर क्यों न लड़ेंगे? रूह नाम यहां एक फरिश्ते का है जो सब फरिश्तों से बड़ा है! क्या खुदा रूह तथा अन्य फरिश्तों को पंक्तिबद्ध खड़े कर के पलटन बांधेगा? क्या पलटन से सब जीवों को सजा दिलावेगा? और खुदा उस समय खड़ा होगा वा बैठा? यदि कयामत तक खुदा अपनी सब पलटन एकत्र करके शैतान को पकड़ ले तो उस का राज्य निष्कण्टक हो जाय। इस का नाम खुदाई है।।१५३।।

१५४-जब कि सूर्य लपेटा जावे।। और जब कि तारे गदले हो जावें।। और जब कि पहाड़ चलाये जावें।। और जब आसमान की खाल उतारी जावे।।

-मं० ७। सि० ३०। सू० ८१। आ० १। २। ३। ११।।

(समीक्षकयह बड़ी बेसमझ की बात है कि गोल सूर्यलोक लपेटा जावेगा? और तारे गदले क्योंकर हो सकेंगे? और पहाड़ जड़ होने से कैसे चलेंगे? और आकाश को क्या पशु समझा कि उस की खाल निकाली जावेगी? यह बड़ी बेसमझ और जंगलीपन की बात है।।१५४।।

१५५-और जब कि आसमान फट जावे।। और जब तारे झड़ जावें।। और जब दर्या चीरे जावें।। और जब कबरें जिला कर उठाई जावें।।

-मं० ७। सि० ३०। सू० ८२। आ० १। २। ३। ४।।

(समीक्षकवाह जी कुरान के बनाने वाले फिलासफर! आकाश को क्योंकर फाड़ सकेगा? और तारों को कैसे झाड़ सकेगा? और दर्या क्या लकड़ी है जो चीर डालेगा? और कबरें क्या मुरदे हैं जो जिला सकेगा? ये सब बातें लड़कों के सदृश हैं।।१५५।।

१५६-कसम है आसमान बुर्जों वाले की।। किन्तु वह कुरान है बड़ा।। बीच लौह महफूज के (अर्थात् सुरक्षित तख्ती पर लिखा हुआ) ।।

-मं० ७। सि० ३०। सू० ८५। आ० १। २१। २२।।

(समीक्षकइस कुरान के बनाने वाले ने भूगोल खगोल कुछ भी नहीं पढ़ा था। नहीं तो आकाश को किले के समान बुर्जों वाला क्यों कहता? यदि मेषादि राशियों को बुर्ज कहता है तो अन्य बुर्ज क्यों नहीं? इसलिये ये बुर्ज नहीं हैं किन्तु सब तारे लोक हैं। क्या वह कुरान खुदा के पास है? यदि यह कुरान उस का किया है तो वह भी विद्या और युक्ति से विरुद्ध अविद्या से अधिक भरा होगा।।१५६।।

१५७-निश्चय वे मकर करते हैं एक मकर।। और मैं भी मकर करता हूँ एक मकर।। -मं० ७। सि० ३०। सू० ८६। आ० १६।१७।।

(समीक्षकमकर कहते हैं ठगपन को, क्या खुदा भी ठग है? और क्या चोरी का जवाब चोरी और झूठ का जवाब झूठ है? क्या कोई चोर भले आदमी के घर में चोरी करे तो क्या भले आदमी को चाहिए कि उस के घर में जा के चोरी करे! वाह! वाह जी!! कुरान के बनाने वाले।।१५७।।

१५८-और जब आवेगा मालिक तेरा और फरिश्ते पंक्ति बांध के ।। और लाया जावेगा उस दिन दोजख को।। -मं० ७। सि० ३०। सू० ८९। आ० २१। २२।।

(समीक्षककहो जी! जैसे कोटवाल वा सेनाध्यक्ष अपनी सेना को लेकर पंक्ति बांध फिरा करे वैसा ही इन का खुदा है? क्या दोजख को घड़ा सा समझा है कि जिस को उठा के जहाँ चाहे वहाँ ले जावे! यदि इतना छोटा सा है तो असंख्य कैदी उस में कैसे समा सकेंगे? ।।१५८।।

१५९-बस कहा था वास्ते उन के पैगम्बर खुदा के ने, रक्षा करो ऊंटनी खुदा की को, और पानी पिलाना उस के को।। बस झुठलाया उस को, बस पांव काटे उस के, बस मरी डाली ऊपर उन के, रब उन के ने।। -मं० ७। सि० ३०। सू० ९१। आ० १३। १४।।

(समीक्षकक्या खुदा भी ऊंटनी पर चढ़ के सैल किया करता है? नहीं तो किस लिये रक्खी? और विना कयामत के अपना नियम तोड़ उन पर मरी रोग क्यों डाला? यदि डाला तो उन को दण्ड किया, फिर कयामत की रात में न्याय और उस रात का होना झूठ समझा जायगा? फिर इस ऊंटनी के लेख से यह अनुमान होता है कि अरब देश में ऊंट, ऊंटनी के सिवाय दूसरी सवारी कम होती है। इस से सिद्ध होता है कि किसी अरब देशी ने कुरान बनाया है।।१५९।।

१६०-यों जो न रुकेगा अवश्य घसीटेंगे उस को हम साथ बालों माथे के।। वह माथा कि झूठा है और अपराधी।। हम बुलावेंगे फरिश्ते दोजख के को।। -मं० ७। सि० ३०। सू० ९६। आ० १५। १६। १८।।

(समीक्षकइस नीच चपरासियों के काम घसीटने से भी खुदा न बचा। भला माथा भी कभी झूठा और अपराधी हो सकता है? सिवाय जीव के, भला यह कभी खुदा हो सकता है कि जैसे जेलखाने के दरोगा को बुलावा भेजे।।१६०।।

१६१-निश्चय उतारा हम ने कुरान को बीच रात -कदर के।। और क्या जाने तू क्या है रात -कदर की? ।। उतरते हैं फरिश्ते और पवित्रत्मा बीच उस के, साथ आज्ञा मालिक अपने के वास्ते हर काम के।।

-मं० ७। सि० ३०। सू० ९७। आ० १। २। ४।।

(समीक्षकयदि एक ही रात में कुरान उतारा तो वह आयत अर्थात् उस समय में उतरी और धीरे-धीरे उतारा यह बात सत्य क्योंकर हो सकेगी? और रात्री अन्धेरी है इस में क्या पूछना है? हम लिख आये हैं ऊपर नीचे कुछ भी नहीं हो सकता और यहां लिखते हैं कि फरिश्ते और पवित्रत्मा खुदा के हुक्म से संसार का प्रबन्ध करने के लिये आते हैं। इस से स्पष्ट हुआ कि खुदा मनुष्यवत् एकदेशी है। अब तक देखा था कि खुदा फरिश्ते और पैगम्बर तीन की कथा है । अब एक पवित्रत्मा चौथा निकल पड़ा! अब न जाने यह चौथा पवित्रत्मा क्या है? यह तो ईसाइयों के मत अर्थात् पिता पुत्र और पवित्रत्मा तीन के मानने से चौथा भी बढ़ गया। यदि कहो कि हम इन तीनों को खुदा नहीं मानते, ऐसा भी हो, परन्तु जब पवित्रत्मा पृथक् है तो खुदा फरिश्ते और पैगम्बर को पवित्रत्मा कहना चाहिये वा नहीं? यदि पवित्रत्मा है तो एक ही का नाम पवित्रत्मा क्यों? और घोड़े आदि जानवर, रात दिन और कुरान आदि की खुदा कसमें खाता है। कसमें खाना भले लोगों का काम नहीं।।१६१।।

अब इस कुरान के विषय को लिख के बुद्धिमानों के सम्मुख स्थापित करता हूँ कि यह पुस्तक कैसा है? मुझ से पूछो तो यह किताब न ईश्वर, न विद्वान् की बनाई और न विद्या की हो सकती है। यह तो बहुत थोड़ा सा दोष प्रकट किया इसलिये कि लोग धोखे में पड़कर अपना जन्म व्यर्थ न गमावें। जो कुछ इस में थोड़ा सा सत्य है वह वेदादि विद्या पुस्तकों के अनुकूल होने से जैसे मुझ को ग्राह्य है वैसे अन्य भी मजहब के हठ और पक्षपातरहित विद्वानों और बुद्धिमानों को ग्राह्य है । इस के विना जो कुछ इस में है सब अविद्या भ्रमजाल और मनुष्य के आत्मा को पशुवत् बनाकर शान्तिभंग करा के उपद्रव मचा मनुष्यों में विद्रोह फैला परस्पर दुःखोन्नति करने वाला विषय है। और पुनरुक्त दोष का तो कुरान जानो भण्डार ही है। परमात्मा सब मनुष्यों पर कृपा करे कि सब से सब प्रीति परस्पर मेल और एक दूसरे के सुख की उन्नति करने में प्रवृत्त हों। जैसे मैं अपना वा दूसरे मतमतान्तरों का दोष पक्षपात रहित होकर प्रकाशित करता हूँ। इसी प्रकार यदि सब विद्वान् लोग करें तो क्या कठिनता है कि परस्पर का विरोध छूट, मेल होकर आनन्द में एकमत होके सत्य की प्राप्ति सिद्ध हो। यह थोड़ा सा कुरान के विषय में लिखा। इस को बुद्धिमान् धार्मिक लोग ग्रन्थकार के अभिप्राय को समझ, लाभ लेवें। यदि कहीं भ्रम से अन्यथा लिखा गया हो तो उस को शुद्ध कर लेवें। अब एक बात यह शेष है कि बहुत से मुसलमान ऐसा कहा करते और लिखा वा छपवाया करते हैं कि हमारे मजहब की बात अथर्ववेद में लिखी है। इस का यह उत्तर है कि अथर्ववेद में इस बात का नाम निशान भी नहीं है।

(प्रश्नक्या तुम ने सब अथर्ववेद देखा है ? यदि देखा है तो अल्लोपनिषद् देखो। यह साक्षात् उसमें लिखी है। फिर क्यों कहते हो कि अथर्ववेद में मुसलमानों का नाम निशान भी नहीं है।

अथाल्लोपनिषदं व्याख्यास्यामः

अस्मांल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्ते।

इल्लल्ले वरुणो राजा पुनर्द्ददु 

ह या मित्रे इल्लां इल्लल्ले इल्लां वरुणो मित्रस्तेजस्काम ।।१।।

होतारमिन्द्रो होतारमिन्द्र महासुरिन्द्रा 

अल्लो ज्येष्ठं श्रेष्ठं परमं पूर्णं ब्रह्माणं अल्लाम्।।२।।

अल्लोरसूलमहामदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्।।३।।

आदल्लाबूकमेककम्।। अल्लाबूक निखातकम्।।४।।

अल्लो यज्ञेन हुतहुत्वा। अल्ला सूर्यचन्द्रसर्वनक्षत्र ।।५।।

अल्ला ऋषीणां सर्वदिव्याँ इन्द्राय पूर्वं माया परममन्तरिक्षा ।।६।।

अल्ल पृथिव्या अन्तरिक्षं विश्वरूपम्।।७।।

इल्लां कबर इल्लां कबर इल्लाँ इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।८।।

ओम् अल्ला इल्लल्ला अनादिस्वरूपाय अथर्वणा श्यामा हुं ह्रीं

जनानपशूनसिद्धान् जलचरान् अदृष्टं कुरु कुरु फट्।।९।।

असुरसंहारिणी हुं ह्रीं अल्लोरसूलमहमदरकबरस्य अल्लो अल्लाम्

इल्लल्लेति इल्लल्ला ।।१०।।

इत्यल्लोपनिषत् समाप्ता।।

जो इस में प्रत्यक्ष मुहम्मद साहब रसूल लिखा है इस से सिद्ध होता है कि मुसलमानों का मत वेदमूलक है।

(उत्तरयदि तुम ने अथर्ववेद न देखा हो तो हमारे पास आओ आदि से पूर्त्ति तक देखो । अथवा जिस किसी अथर्ववेदी के पास बीस काण्डयुक्त मन्त्रसंहिता अथर्ववेद को देख लो। कहीं तुम्हारे पैगम्बर साहब का नाम वा मत का निशान न देखोगे। और जो यह अल्लोपनिषद् है वह न अथर्ववेद में, न उस के गोपथ ब्राह्मण वा किसी शाखा में है। यह तो अकबरशाह के समय में अनुमान है कि किसी ने बनाई है। इस का बनाने वाला कुछ अर्बी और कुछ संस्कृत भी पढ़ा हुआ दीखता है क्योंकि इस में अरबी और संस्कृत के पद लिखे हुए दीखते हैं। देखो! (अस्माल्लां इल्ले मित्रवरुणा दिव्यानि धत्तेइत्यादि में जो कि दश अंक में लिखा है, जैसे-इस में (अस्माल्लां और इल्लेअर्बी और (मित्रवरुणा दिव्यानि धत्तेयह संस्कृत पद लिखे हैं वैसे ही सर्वत्र देखने में आने से किसी संस्कृत और अर्बी के पढ़े हुए ने बनाई है। यदि इस का अर्थ देखा जाता है तो यह कृत्रिम अयुक्त वेद और व्याकरण रीति से विरुद्ध है। जैसी यह उपनिषद् बनाई है, वैसी बहुत सी उपनिषदें मतमतान्तर वाले पक्षपातियों ने बना ली हैं। जैसी कि स्वरोपनिषद्, नृसिहतापनी, रामतापनी, गोपालतापनी बहुत सी बना ली हैं।

(प्रश्नआज तक किसी ने ऐसा नहीं कहा अब तुम कहते हो। हम तुम्हारी बात कैसे मानें?

(उत्तरतुम्हारे मानने वा न मानने से हमारी बात झूठ नहीं हो सकती है। जिस प्रकार से मैंने इस को अयुक्त ठहराई है उसी प्रकार से जब तुम अथर्ववेद, गोपथ वा इस की शाखाओं से प्राचीन लिखित पुस्तकों में जैसे का तैसा लेख दिखलाओ और अर्थसंगति से भी शुद्ध करो तब तो सप्रमाण हो सकता है।

(प्रश्नदेखो! हमारा मत कैसा अच्छा है कि जिस में सब प्रकार का सुख और अन्त में मुक्ति होती है ।

(उत्तर)-ऐसे ही अपने-अपने मत वाले सब कहते हैं कि हमारा ही मत अच्छा है, बाकी सब बुरे। विना हमारे मत के दूसरे मत में मुक्ति नहीं हो सकती।

अब हम तुम्हारी बात को सच्ची मानें वा उन की? हम तो यही मानते हैं कि सत्यभाषण, अहिंसा, दया आदि शुभ गुण सब मतों में अच्छे हैं और बाकी वाद, विवाद, ईर्ष्या, द्वेष, मिथ्याभाषणादि कर्म सब मतों में बुरे हैं। यदि तुम को सत्य मत ग्रहण की इच्छा हो तो वैदिक मत को ग्रहण करो।

इसके आगे स्वमन्तव्यामन्तव्य का प्रकाश संक्षेप से लिखा जायगा।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिकृते सत्यार्थप्रकाशे

सुभाषाविभूषिते यवनमतविषये

चतुर्दशसमुल्लासः सम्पूर्णः।।१४।।

Ashtadhyayi – Panini Sutra [ Hindu]

पाणिनये नमः।

SANSKRIT GRAMMAR BY PANINI MUNI

अष्टाध्यायी – EIGHT CHAPTERS -IS THE NAME OF THE GRAMMAR

Panini explained both Vaidik and Village Languages

4 × 4 = 16 Sub-chapters

माहेश्वर-सूत्राणि -14 [9 and 4]

अ इ उ ण् । ऋ ऌ क् । ए ओ ङ् । ऐ औ च् । ह य व र ट् । लँ ण् । ञ म ङ ण न म् । झ भ ञ् । घ ढ ध ष् । ज ब ग ड द श् । ख फ छ ठ थ च ट त व् । क प य् । श ष स र् । ह ल् ।

Chapter -1

1-1-1 वृद्धिरादैच् ।
1-1-2 अदेङ् गुणः ।
1-1-3 इको गुणवृद्धी ।
1-1-4 न धातुलोप आर्धधातुके ।
1-1-5 ग्क्ङिति च ।
1-1-6 दीधीवेवीटाम् ।
1-1-7 हलोऽनन्तराः संयोगः ।
1-1-8 मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः ।
1-1-9 तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ।
1-1-10 नाज्झलौ ।
1-1-11 ईदूदेद्द्विवचनं प्रगृह्यम् ।
1-1-12 अदसो मात् ।
1-1-13 शे ।
1-1-14 निपात एकाजनाङ् ।
1-1-15 ओत् ।
1-1-16 सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ।
1-1-17 उञः ।
1-1-18 ऊँ ।
1-1-19 ईदूतौ च सप्तम्यर्थे ।
1-1-20 दाधा घ्वदाप् ।
1-1-21 आद्यन्तवदेकस्मिन् ।
1-1-22 तरप्तमपौ घः ।
1-1-23 बहुगणवतुडति संख्या ।
1-1-24 ष्णान्ता {षट्} ।
1-1-25 डति च ।
1-1-26 क्तक्तवतू निष्ठा ।
1-1-27 सर्वादीनि सर्वनामानि ।
1-1-28 विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ।
1-1-29 न बहुव्रीहौ ।
1-1-30 तृतीयासमासे ।
1-1-31 द्वन्द्वे च ।
1-1-32 विभाषा जसि ।
1-1-33 प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च ।
1-1-34 पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि -व्यवस्थायामसंज्ञायाम् ।
1-1-35 स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् ।
1-1-36 अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः ।
1-1-37 स्वरादिनिपातमव्ययम् ।
1-1-38 तद्धितश्चासर्वविभक्तिः ।
1-1-39 कृन्मेजन्तः ।
1-1-40 क्त्वातोसुन्कसुनः ।
1-1-41 अव्ययीभावश्च ।
1-1-42 शि सर्वनामस्थानम् ।
1-1-43 सुडनपुंसकस्य ।
1-1-44 न वेति विभाषा ।
1-1-45 इग्यणः सम्प्रसारणम् ।
1-1-46 आद्यन्तौ टकितौ ।
1-1-47 मिदचोऽन्त्यात्परः ।
1-1-48 एच इग्घ्रस्वादेशे ।
1-1-49 षष्ठी स्थानेयोगा ।
1-1-50 स्थानेऽन्तरतमः ।
1-1-51 उरण् रपरः ।
1-1-52 अलोऽन्त्यस्य ।
1-1-53 ङिच्च ।
1-1-54 आदेः परस्य ।
1-1-55 अनेकाल्शित्सर्वस्य ।
1-1-56 स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ।
1-1-57 अचः परस्मिन् पूर्वविधौ ।
1-1-58 न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घ\- जश्चर्विधिषु ।
1-1-59 द्विर्वचनेऽचि ।
1-1-60 अदर्शनं लोपः ।
1-1-61 प्रत्ययस्य लुक्‌श्लुलुपः ।
1-1-62 प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् ।
1-1-63 न लुमताऽङ्गस्य ।
1-1-64 अचोऽन्त्यादि टि ।
1-1-65 अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा ।
1-1-66 तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ।
1-1-67 तस्मादित्युत्तरस्य ।
1-1-68 स्वं रूपं शब्दस्याशब्दसंज्ञा ।
1-1-69 अणुदित् सवर्णस्य चाप्रत्ययः ।
1-1-70 तपरस्तत्कालस्य ।
1-1-71 आदिरन्त्येन सहेता ।
1-1-72 येन विधिस्तदन्तस्य ।
1-1-73 वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् ।
1-1-74 त्यदादीनि च ।
1-1-75 एङ् प्राचां देशे ।
1-2-1 गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्ङ् इत् ।
1-2-2 विज इट् ।
1-2-3 विभाषोर्णोः ।
1-2-4 सार्वधातुकमपित् ।
1-2-5 असंयोगाल्लिट् कित् ।
1-2-6 ईन्धिभवतिभ्यां च ।
1-2-7 मृडमृदगुधकुषक्लिशवदवसः क्त्वा ।
1-2-8 रुदविदमुषग्रहिस्वपिप्रच्छः सँश्च ।
1-2-9 इको झल् ।
1-2-10 हलन्ताच्च ।
1-2-11 लिङ्सिचावात्मनेपदेषु ।
1-2-12 उश्च ।
1-2-13 वा गमः ।
1-2-14 हनः सिच् ।
1-2-15 यमो गन्धने ।
1-2-16 विभाषोपयमने ।
1-2-17 स्था घ्वोरिच्च ।
1-2-18 न क्त्वा सेट् ।
1-2-19 निष्ठा शीङ्स्विदिमिदिक्ष्विदिधृषः ।
1-2-20 मृषस्तितिक्षायाम् ।
1-2-21 उदुपधाद्भावादिकर्मणोरन्यतरस्याम् ।
1-2-22 पूङः क्त्वा च ।
1-2-23 नोपधात्थफान्ताद्वा ।
1-2-24 वञ्चिलुञ्च्यृतश्च ।
1-2-25 तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य ।
1-2-26 रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च ।
1-2-27 ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः ।
1-2-28 अचश्च ।
1-2-29 उच्चैरुदात्तः ।
1-2-30 नीचैरनुदात्तः ।
1-2-31 समाहारः स्वरितः ।
1-2-32 तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम् ।
1-2-33 एकश्रुति दूरात् सम्बुद्धौ ।
1-2-34 यज्ञकर्मण्यजपन्यूङ्खसामसु ।
1-2-35 उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ।
1-2-36 विभाषा छन्दसि ।
1-2-37 न सुब्रह्मण्यायां स्वरितस्य तूदात्तः ।
1-2-38 देवब्रह्मणोरनुदात्तः ।
1-2-39 स्वरितात् संहितायामनुदात्तानाम् ।
1-2-40 उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः ।
1-2-41 अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ।
1-2-42 तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः ।
1-2-43 प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् ।
1-2-44 एकविभक्ति चापूर्वनिपाते ।
1-2-45 अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ।
1-2-46 कृत्तद्धितसमासाश्च ।
1-2-47 ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ।
1-2-48 गोस्त्रियोरुपसर्ज्जनस्य ।
1-2-49 लुक् तद्धितलुकि ।
1-2-50 इद्गोण्याः ।
1-2-51 लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने ।
1-2-52 विशेषणानां चाजातेः ।
1-2-53 तदशिष्यं संज्ञाप्रमाणत्वात् ।
1-2-54 लुब्योगाप्रख्यानात् ।
1-2-55 योगप्रमाणे च तदभावेऽदर्शनं स्यात् ।
1-2-56 प्रधानप्रत्ययार्थवचनमर्थस्यान्यप्रमाणत्वात् ।
1-2-57 कालोपसर्जने च तुल्यम् ।
1-2-58 जात्याख्यायामेकस्मिन् बहुवचनमन्यतरस्याम् ।
1-2-59 अस्मदो द्वायोश्च ।
1-2-60 फल्गुनीप्रोष्ठपदानां च नक्षत्रे ।
1-2-61 छन्दसि पुनर्वस्वोरेकवचनम् ।
1-2-62 विशाखयोश्च ।
1-2-63 तिष्यपुनर्वस्वोर्नक्षत्रद्वंद्वे बहुवचनस्य द्विवचनं नित्यम् ।
1-2-64 सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ ।
1-2-65 वृद्धो यूना तल्लक्षणश्चेदेव विशेषः ।
1-2-66 स्त्री पुंवच्च ।
1-2-67 पुमान् स्त्रिया ।
1-2-68 भ्रातृपुत्रौ स्वसृदुहितृभ्याम् ।
1-2-69 नपुंसकमनपुंसकेनैकवच्चास्यान्यतरस्याम् ।
1-2-70 पिता मात्रा ।
1-2-71 श्वशुरः श्वश्र्वा ।
1-2-72 त्यदादीनि सर्वैर्नित्यम् ।
1-2-73 ग्राम्यपशुसंघेषु अतरुणेषु स्त्री ।
1-3-1 भूवादयो धातवः ।
1-3-2 उपदेशेऽजनुनासिक इत् ।
1-3-3 हलन्त्यम् ।
1-3-4 न विभक्तौ तुस्माः ।
1-3-5 आदिर्ञिटुडवः ।
1-3-6 षः प्रत्ययस्य ।
1-3-7 चुटू ।
1-3-8 लशक्वतद्धिते ।
1-3-9 तस्य लोपः ।
1-3-10 यथासंख्यमनुदेशः समानाम् ।
1-3-11 स्वरितेनाधिकारः ।
1-3-12 अनुदात्तङित आत्मनेपदम् ।
1-3-13 भावकर्मणोः ।
1-3-14 कर्त्तरि कर्म्मव्यतिहारे ।
1-3-15 न गतिहिंसार्थेभ्यः ।
1-3-16 इतरेतरान्योन्योपपदाच्च ।
1-3-17 नेर्विशः ।
1-3-18 परिव्यवेभ्यः क्रियः ।
1-3-19 विपराभ्यां जेः ।
1-3-20 आङो दोऽनास्यविहरणे ।
1-3-21 क्रीडोऽनुसम्परिभ्यश्च ।
1-3-22 समवप्रविभ्यः स्थः ।
1-3-23 प्रकाशनस्थेयाख्ययोश्च ।
1-3-24 उदोऽनूर्द्ध्वकर्मणि ।
1-3-25 उपान्मन्त्रकरणे ।
1-3-26 अकर्मकाच्च ।
1-3-27 उद्विभ्यां तपः ।
1-3-28 आङो यमहनः ।
1-3-29 समो गम्यृच्छिप्रच्छिस्वरत्यर्तिश्रुविदिभ्यः ।
1-3-30 निसमुपविभ्यो ह्वः ।
1-3-31 स्पर्द्धायामाङः ।
1-3-32 गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्य\-
प्रतियत्नप्रकथनोपयोगेषु कृञः ।
1-3-33 अधेः प्रसहने ।
1-3-34 वेः शब्दकर्म्मणः ।
1-3-35 अकर्मकाच्च ।
1-3-36 सम्माननोत्सञ्जनाचार्यकरणज्ञानभ्ऋतिविगणनव्ययेषु
नियः ।
1-3-37 कर्तृस्थे चाशरीरे कर्मणि ।
1-3-38 वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः ।
1-3-39 उपपराभ्याम् ।
1-3-40 आङ उद्गमने ।
1-3-41 वेः पादविहरणे ।
1-3-42 प्रोपाभ्यां समर्थाभ्याम् ।
1-3-43 अनुपसर्गाद्वा ।
1-3-44 अपह्नवे ज्ञः ।
1-3-45 अकर्मकाच्च ।
1-3-46 सम्प्रतिभ्यामनाध्याने ।
1-3-47 भासनोपसम्भाषाज्ञानयत्नविमत्युपमन्त्रणेषु वदः ।
1-3-48 व्यक्तवाचां समुच्चारणे ।
1-3-49 अनोरकर्मकात् ।
1-3-50 विभाषा विप्रलापे ।
1-3-51 अवाद्ग्रः ।
1-3-52 समः प्रतिज्ञाने ।
1-3-53 उदश्चरः सकर्मकात् ।
1-3-54 समस्तृतीयायुक्तात् ।
1-3-55 दाणश्च सा चेच्चतुर्थ्यर्थे ।
1-3-56 उपाद्यमः स्वकरणे ।
1-3-57 ज्ञाश्रुस्मृदृशां सनः ।
1-3-58 नानोर्ज्ञः ।
1-3-59 प्रत्याङ्भ्यां श्रुवः ।
1-3-60 शदेः शितः ।
1-3-61 म्रियतेर्लुङ्‌लिङोश्च ।
1-3-62 पूर्ववत् सनः ।
1-3-63 आम्प्रत्ययवत् कृञोऽनुप्रयोगस्य ।
1-3-64 प्रोपाभ्यां युजेरयज्ञपात्रेषु ।
1-3-65 समः क्ष्णुवः ।
1-3-66 भुजोऽनवने ।
1-3-67 णेरणौ यत् कर्म णौ चेत् स कर्ताऽनाध्याने ।
1-3-68 भीस्म्योर्हेतुभये ।
1-3-69 गृधिवञ्च्योः प्रलम्भने ।
1-3-70 लियः सम्माननशालिनीकरणयोश्च ।
1-3-71 मिथ्योपपदात् कृञोऽभ्यासे ।
1-3-72 स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ।
1-3-73 अपाद्वदः ।
1-3-74 णिचश्च ।
1-3-75 समुदाङ्भ्यो यमोऽग्रन्थे ।
1-3-76 अनुपसर्गाज्ज्ञः ।
1-3-77 विभाषोपपदेन प्रतीयमाने ।
1-3-78 शेषात् कर्तरि परस्मैपदम् ।
1-3-79 अनुपराभ्यां कृञः ।
1-3-80 अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः ।
1-3-81 प्राद्वहः ।
1-3-82 परेर्मृषः ।
1-3-83 व्याङ्परिभ्यो रमः ।
1-3-84 उपाच्च ।
1-3-85 विभाषाऽकर्मकात् ।
1-3-86 बुधयुधनशजनेङ्प्रुद्रुस्रुभ्यो णेः ।
1-3-87 निगरणचलनार्थेभ्यः ।
1-3-88 अणावकर्मकाच्चित्तवत्कर्तृकात् ।
1-3-89 न पादम्याङ्यमाङ्यसपरिमुहरुचिनृतिवदवसः ।
1-3-90 वा क्यषः ।
1-3-91 द्युद्भ्यो लुङि ।
1-3-92 वृद्भ्यः स्यसनोः ।
1-3-93 लुटि च कपः ।
1-4-1 आ कडारादेका संज्ञा ।
1-4-2 विप्रतिषेधे परं कार्यम् ।
1-4-3 यू स्त्र्याख्यौ नदी ।
1-4-4 नेयङुवङ्स्थानावस्त्री ।
1-4-5 वाऽऽमि ।
1-4-6 ङिति ह्रस्वश्च ।
1-4-7 शेषो घ्यसखि ।
1-4-8 पतिः समास एव ।
1-4-9 षष्ठीयुक्तश्छन्दसि वा ।
1-4-10 ह्रस्वं लघु ।
1-4-11 संयोगे गुरु ।
1-4-12 दीर्घं च ।
1-4-13 यस्मात् प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम् ।
1-4-14 सुप्तिङन्तं पदम् ।
1-4-15 नः क्ये ।
1-4-16 सिति च ।
1-4-17 स्वादिष्वसर्वनामस्थाने ।
1-4-18 यचि भम् ।
1-4-19 तसौ मत्वर्थे ।
1-4-20 अयस्मयादीनि च्छन्दसि ।
1-4-21 बहुषु बहुवचनम् ।
1-4-22 द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने ।
1-4-23 कारके ।
1-4-24 ध्रुवमपायेऽपादानम् ।
1-4-25 भीत्रार्थानां भयहेतुः ।
1-4-26 पराजेरसोढः ।
1-4-27 वारणार्थानां ईप्सितः ।
1-4-28 अन्तर्द्धौ येनादर्शनमिच्छति ।
1-4-29 आख्यातोपयोगे ।
1-4-30 जनिकर्तुः प्रकृतिः ।
1-4-31 भुवः प्रभवः ।
1-4-32 कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् ।
1-4-33 रुच्यर्थानां प्रीयमाणः ।
1-4-34 श्लाघह्नुङ्स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः ।
1-4-35 धारेरुत्तमर्णः ।
1-4-36 स्पृहेरीप्सितः ।
1-4-37 क्रुधद्रुहेर्ष्यऽसूयार्थानां यं प्रति कोपः ।
1-4-38 क्रुधद्रुहोरुपसृष्टयोः कर्म ।
1-4-39 राधीक्ष्योर्यस्य विप्रश्नः ।
1-4-40 प्रत्याङ्भ्यां श्रुवः पूर्वस्य कर्ता ।
1-4-41 अनुप्रतिगृणश्च ।
1-4-42 साधकतमं करणम् ।
1-4-43 दिवः कर्म च ।
1-4-44 परिक्रयणे सम्प्रदानमन्यतरस्याम् ।
1-4-45 आधारोऽधिकरणम् ।
1-4-46 अधिशीङ्स्थाऽऽसां कर्म ।
1-4-47 अभिनिविशश्च ।
1-4-48 उपान्वध्याङ्वसः ।
1-4-49 कर्तुरीप्सिततमं कर्म ।
1-4-50 तथायुक्तं चानिप्सीतम् ।
1-4-51 अकथितं च ।
1-4-52 गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणामणि कर्ता स णौ ।
1-4-53 हृक्रोरन्यतरस्याम् ।
1-4-54 स्वतन्त्रः कर्ता ।
1-4-55 तत्प्रयोजको हेतुश्च ।
1-4-56 प्राग्रीश्वरान्निपाताः ।
1-4-57 चादयोऽसत्त्वे ।
1-4-58 प्रादयः ।
1-4-59 उपसर्गाः क्रियायोगे ।
1-4-60 गतिश्च ।
1-4-61 ऊर्यादिच्विडाचश्च ।
1-4-62 अनुकरणं चानितिपरम् ।
1-4-63 आदरानादरयोः सदसती ।
1-4-64 भूषणेऽलम् ।
1-4-65 अन्तरपरिग्रहे ।
1-4-66 कणेमनसी श्रद्धाप्रतीघाते ।
1-4-67 पुरोऽव्ययम् ।
1-4-68 अस्तं च ।
1-4-69 अच्छ गत्यर्थवदेषु ।
1-4-70 अदोऽनुपदेशे ।
1-4-71 तिरोऽन्तर्द्धौ ।
1-4-72 विभाषा कृञि ।
1-4-73 उपाजेऽन्वाजे ।
1-4-74 साक्षात्प्रभृतीनि च ।
1-4-75 अनत्याधान उरसिमनसी ।
1-4-76 मध्येपदेनिवचने च ।
1-4-77 नित्यं हस्ते पाणावुपयमने ।
1-4-78 प्राध्वं बन्धने ।
1-4-79 जीविकोपनिषदावौपम्ये ।
1-4-80 ते प्राग्धातोः ।
1-4-81 छन्दसि परेऽपि ।
1-4-82 व्यवहिताश्च ।
1-4-83 कर्मप्रवचनीयाः ।
1-4-84 अनुर्लक्षणे ।
1-4-85 तृतीया.अर्थे ।
1-4-86 हीने ।
1-4-87 उपोऽधिके च ।
1-4-88 अपपरी वर्जने ।
1-4-89 आङ् मर्यादावचने ।
1-4-90 लक्षणेत्थम्भूताख्यानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः ।
1-4-91 अभिरभागे ।
1-4-92 प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः ।
1-4-93 अधिपरी अनर्थकौ ।
1-4-94 सुः पूजायाम् ।
1-4-95 अतिरतिक्रमणे च ।
1-4-96 अपिः पदार्थसम्भावनान्ववसर्गगर्हासमुच्चयेषु ।
1-4-97 अधिरीश्वरे ।
1-4-98 विभाषा कृञि ।
1-4-99 लः परस्मैपदम् ।
1-4-100 तङानावात्मनेपदम् ।
1-4-101 तिङस्त्रीणि त्रीणि प्रथममध्यमोत्तमाः ।
1-4-102 तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः ।
1-4-103 सुपः ।
1-4-104 विभक्तिश्च ।
1-4-105 युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः ।
1-4-106 प्रहासे च मन्योपपदे मन्यतेरुत्तम एकवच्च ।
1-4-107 अस्मद्युत्तमः ।
1-4-108 शेषे प्रथमः ।
1-4-109 परः संनिकर्षः संहिता ।
1-4-110 विरामोऽवसानम् ।
Devider

Chapter -2

2-1-1 समर्थः पदविधिः ।
2-1-2 सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्‌ स्वरे ।
2-1-3 प्राक् कडारात्‌ समासः ।
2-1-4 सह सुपा ।
2-1-5 अव्ययीभावः ।
2-1-6 अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धि\-
व्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रति\-
शब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथाऽऽनुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्य\-
सम्पत्तिसाकल्यान्तवचनेषु ।
2-1-7 यथाऽसादृये ।
2-1-8 यावदवधारणे ।
2-1-9 सुप्प्रतिना मात्राऽर्थे ।
2-1-10 अक्षशलाकासंख्याः परिणा ।
2-1-11 विभाषा ।
2-1-12 अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्या ।
2-1-13 आङ् मर्यादाऽभिविध्योः ।
2-1-14 लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये ।
2-1-15 अनुर्यत्समया ।
2-1-16 यस्य चायामः ।
2-1-17 तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च ।
2-1-18 पारे मध्ये षष्ठ्या वा ।
2-1-19 संख्या वंश्येन ।
2-1-20 नदीभिश्च ।
2-1-21 अन्यपदार्थे च संज्ञायाम्‌ ।
2-1-22 तत्पुरुषः ।
2-1-23 द्विगुश्च ।
2-1-24 द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः ।
2-1-25 स्वयं क्तेन ।
2-1-26 खट्वा क्षेपे ।
2-1-27 सामि ।
2-1-28 कालाः ।
2-1-29 अत्यन्तसंयोगे च ।
2-1-30 तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन ।
2-1-31 पूर्वसदृशसमोनार्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः ।
2-1-32 कर्तृकरणे कृता बहुलम्‌ ।
2-1-33 कृत्यैरधिकार्थवचने ।
2-1-34 अन्नेन व्यञ्जनम्‌ ।
2-1-35 भक्ष्येण मिश्रीकरणम्‌ ।
2-1-36 चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः ।
2-1-37 पञ्चमी भयेन ।
2-1-38 अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः ।
2-1-39 स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन ।
2-1-40 सप्तमी शौण्डैः ।
2-1-41 सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च ।
2-1-42 ध्वाङ्क्षेण क्षेपे ।
2-1-43 कृत्यैरृणे ।
2-1-44 संज्ञायाम्‌ ।
2-1-45 क्तेनाहोरात्रावयवाः ।
2-1-46 तत्र ।
2-1-47 क्षेपे ।
2-1-48 पात्रेसमितादयश्च ।
2-1-49 पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधिकरणेन ।
2-1-50 दिक्संख्ये संज्ञायाम्‌ ।
2-1-51 तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च ।
2-1-52 संख्यापूर्वो द्विगुः ।
2-1-53 कुत्सितानि कुत्सनैः ।
2-1-54 पापाणके कुत्सितैः ।
2-1-55 उपमानानि सामान्यवचनैः ।
2-1-56 उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ।
2-1-57 विशेषणं विशेष्येण बहुलम्‌ ।
2-1-58 पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमान\-
मध्यमध्यमवीराश्च ।
2-1-59 श्रेण्यादयः कृतादिभिः ।
2-1-60 क्तेन नञ्विशिष्टेनानञ् ।
2-1-61 सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्यमानैः ।
2-1-62 वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम्‌ ।
2-1-63 कतरकतमौ जातिपरिप्रश्ने ।
2-1-64 किं क्षेपे ।
2-1-65 पोटायुवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशा\-
वेहत्बष्कयणीप्रवक्तॄ\- श्रोत्रियाध्यापकधूर्तैर्जातिः ।
2-1-66 प्रशंसावचनैश्च ।
2-1-67 युवा खलतिपलितवलिनजरतीभिः ।
2-1-68 कृत्यतुल्याख्या अजात्या ।
2-1-69 वर्णो वर्णेन ।
2-1-70 कुमारः श्रमणाऽऽदिभिः ।
2-1-71 चतुष्पादो गर्भिण्या ।
2-1-72 मयूरव्यंसकादयश्च ।
2-2-1 पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे ।
2-2-2 अर्धं नपुंसकम्‌ ।
2-2-3 द्वितीयतृतीयचतुर्थतुर्याण्यन्यतरस्याम्‌ ।
2-2-4 प्राप्तापन्ने च द्वितीयया ।
2-2-5 कालाः परिमाणिना ।
2-2-6 नञ्‌ ।
2-2-7 ईषदकृता ।
2-2-8 षष्ठी ।
2-2-9 याजकादिभिश्च ।
2-2-10 न निर्धारणे ।
2-2-11 पूरणगुणसुहितार्थसदव्ययतव्यसमानाधिकरणेन ।
2-2-12 क्तेन च पूजायाम्‌ ।
2-2-13 अधिकरणवाचिना च ।
2-2-14 कर्म्मणि च ।
2-2-15 तृजकाभ्यां कर्तरि ।
2-2-16 कर्त्तरि च ।
2-2-17 नित्यं क्रीडाजीविकयोः ।
2-2-18 कुगतिप्रादयः ।
2-2-19 उपपदमतिङ् ।
2-2-20 अमैवाव्ययेन ।
2-2-21 तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतरस्याम्‌ ।
2-2-22 क्त्वा च ।
2-2-23 शेषो बहुव्रीहिः ।
2-2-24 अनेकमन्यपदार्थे ।
2-2-25 संख्ययाऽव्ययासन्नादूराधिकसंख्याः संख्येये ।
2-2-26 दिङ्नामान्यन्तराले ।
2-2-27 तत्र तेनेदमिति सरूपे ।
2-2-28 तेन सहेति तुल्ययोगे ।
2-2-29 चार्थे द्वंद्वः ।
2-2-30 उपसर्जनं पूर्वम्‌ ।
2-2-31 राजदन्तादिषु परम्‌ ।
2-2-32 द्वंद्वे घि ।
2-2-33 अजाद्यदन्तम्‌ ।
2-2-34 अल्पाच्तरम्‌ ।
2-2-35 सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ ।
2-2-36 निष्ठा ।
2-2-37 वाऽऽहिताग्न्यादिषु ।
2-2-38 कडाराः कर्मधराये ।
2-3-1 अनभिहिते ।
2-3-2 कर्मणि द्वितीया ।
2-3-3 तृतीया च होश्छन्दसि ।
2-3-4 अन्तराऽन्तरेण युक्ते ।
2-3-5 कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ।
2-3-6 अपवर्गे तृतीया ।
2-3-7 सप्तमीपञ्चम्यौ कारकमध्ये ।
2-3-8 कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया ।
2-3-9 यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी ।
2-3-10 पञ्चमी अपाङ्परिभिः ।
2-3-11 प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात्‌ ।
2-3-12 गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ चेष्टायामनध्वनि ।
2-3-13 चतुर्थी सम्प्रदाने ।
2-3-14 क्रियार्थोपपदस्य च कर्मणि स्थानिनः ।
2-3-15 तुमर्थाच्च भाववचनात्‌ ।
2-3-16 नमःस्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च ।
2-3-17 मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाऽप्राणिषु ।
2-3-18 कर्तृकरणयोस्तृतीया ।
2-3-19 सहयुक्तेऽप्रधाने ।
2-3-20 येनाङ्गविकारः ।
2-3-21 इत्थंभूतलक्षणे ।
2-3-22 संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि ।
2-3-23 हेतौ ।
2-3-24 अकर्तर्यृणे पञ्चमी ।
2-3-25 विभाषा गुणेऽस्त्रियाम्‌ ।
2-3-26 षष्ठी हेतुप्रयोगे ।
2-3-27 सर्वनाम्नस्तृतीया च ।
2-3-28 अपादाने पञ्चमी ।
2-3-29 अन्यारादितरर्त्तेदिक्‌शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते ।
2-3-30 षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन ।
2-3-31 एनपा द्वितीया ।
2-3-32 पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम्‌ ।
2-3-33 करणे च स्तोकाल्पकृच्छ्रकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य ।
2-3-34 दूरान्तिकार्थैः षष्ठ्यन्यतरस्याम्‌ ।
2-3-35 दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च ।
2-3-36 सप्तम्यधिकरणे च ।
2-3-37 यस्य च भावेन भावलक्षणम्‌ ।
2-3-38 षष्ठी चानादरे ।
2-3-39 स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च ।
2-3-40 आयुक्तकुशलाभ्यां चासेवायाम्‌ ।
2-3-41 यतश्च निर्धारणम्‌ ।
2-3-42 पञ्चमी विभक्ते ।
2-3-43 साधुनिपुणाभ्याम् अर्चायां सप्तम्यप्रतेः ।
2-3-44 प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च ।
2-3-45 नक्षत्रे च लुपि ।
2-3-46 प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा ।
2-3-47 सम्बोधने च ।
2-3-48 साऽऽमन्त्रितम्‌ ।
2-3-49 एकवचनं संबुद्धिः ।
2-3-50 षष्ठी शेषे ।
2-3-51 ज्ञोऽविदर्थस्य करणे ।
2-3-52 अधीगर्थदयेशां कर्मणि ।
2-3-53 कृञः प्रतियत्ने ।
2-3-54 रुजार्थानां भाववचनानामज्वरेः ।
2-3-55 आशिषि नाथः ।
2-3-56 जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम्‌ ।
2-3-57 व्यवहृपणोः समर्थयोः ।
2-3-58 दिवस्तदर्थस्य ।
2-3-59 विभाषोपसर्गे ।
2-3-60 द्वितीया ब्राह्मणे ।
2-3-61 प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासम्प्रदाने ।
2-3-62 चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ।
2-3-63 यजेश्च करणे ।
2-3-64 कृत्वोऽर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे ।
2-3-65 कर्तृकर्मणोः कृति ।
2-3-66 उभयप्राप्तौ कर्मणि ।
2-3-67 क्तस्य च वर्तमाने ।
2-3-68 अधिकरणवाचिनश्च ।
2-3-69 न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम्‌ ।
2-3-70 अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः ।
2-3-71 कृत्यानां कर्तरि वा ।
2-3-72 तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम्‌ ।
2-3-73 चतुर्थी चाशिष्यायुष्यमद्रभद्र\-
कुशलसुखार्थहितैः ।
2-4-1 द्विगुरेकवचनम्‌ ।
2-4-2 द्वंद्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्‌ ।
2-4-3 अनुवादे चरणानाम्‌ ।
2-4-4 अध्वर्युक्रतुरनपुंसकम्. ।
2-4-5 अध्ययनतोऽविप्रकृष्टाख्यानाम्‌ ।
2-4-6 जातिरप्राणिनाम्‌ ।
2-4-7 विशिष्टलिङ्गो नदी देशोऽग्रामाः ।
2-4-8 क्षुद्रजन्तवः ।
2-4-9 येषां च विरोधः शाश्वतिकः ।
2-4-10 शूद्राणामनिरवसितानाम्‌ ।
2-4-11 गवाश्वप्रभृतीनि च ।
2-4-12 विभाषा वृक्षमृगतृणधान्यव्यञ्जन\-
पशुशकुन्यश्ववडवपूर्वापराधरोत्तराणाम्‌ ।
2-4-13 विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि ।
2-4-14 न दधिपयआदीनि ।
2-4-15 अधिकरणैतावत्त्वे च ।
2-4-16 विभाषा समीपे ।
2-4-17 स नपुंसकम्‌ ।
2-4-18 अव्ययीभावश्च ।
2-4-19 तत्पुरुषोऽनञ्‌ कर्मधारयः ।
2-4-20 संज्ञायां कन्थोशीनरेषु ।
2-4-21 उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम्‌ ।
2-4-22 छाया बाहुल्ये ।
2-4-23 सभा राजाऽमनुष्यपूर्वा ।
2-4-24 अशाला च ।
2-4-25 विभाषा सेनासुराछायाशालानिशानाम्‌ ।
2-4-26 परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ।
2-4-27 पूर्ववदश्ववडवौ ।
2-4-28 हेमन्तशिशिरावहोरात्रे च च्छन्दसि ।
2-4-29 रात्राह्नाहाः पुंसि ।
2-4-30 अपथं नपुंसकम्‌ ।
2-4-31 अर्धर्चाः पुंसि च ।
2-4-32 इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयाऽऽदौ ।
2-4-33 एतदस्त्रतसोस्त्रतसौ चानुदात्तौ ।
2-4-34 द्वितीयाटौस्स्वेनः ।
2-4-35 आर्द्धधातुके ।
2-4-36 अदो जग्धिर्ल्यप्ति किति ।
2-4-37 लुङ्सनोर्घस ।
2-4-38 घञपोश्च ।
2-4-39 बहुलं छन्दसि ।
2-4-40 लिट्यन्यतरस्याम्‌ ।
2-4-41 वेञो वयिः ।
2-4-42 हनो वध लिङि ।
2-4-43 लुङि च ।
2-4-44 आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्‌ ।
2-4-45 इणो गा लुङि ।
2-4-46 णौ गमिरबोधने ।
2-4-47 सनि च ।
2-4-48 इङश्च ।
2-4-49 गाङ्‌ लिटि ।
2-4-50 विभाषा लुङ्लृङोः ।
2-4-51 णौ च सँश्चङोः ।
2-4-52 अस्तेर्भूः ।
2-4-53 ब्रुवो वचिः ।
2-4-54 चक्षिङः ख्याञ्‌ ।
2-4-55 वा लिटि ।
2-4-56 अजेर्व्यघञपोः ।
2-4-57 वा यौ ।
2-4-58 ण्यक्षत्रियार्षञितो यूनि लुगणिञोः ।
2-4-59 पैलादिभ्यश्च ।
2-4-60 इञः प्राचाम्‌ ।
2-4-61 न तौल्वलिभ्यः ।
2-4-62 तद्राजस्य बहुषु तेनैवास्त्रियाम्‌ ।
2-4-63 यस्कादिभ्यो गोत्रे ।
2-4-64 यञञोश्च ।
2-4-65 अत्रिभृगुकुत्सवसिष्ठगोतमाङ्गिरोभ्यश्च ।
2-4-66 बह्वचः इञः प्राच्यभरतेषु ।
2-4-67 न गोपवनादिभ्यः ।
2-4-68 तिककितवादिभ्यो द्वंद्वे ।
2-4-69 उपकादिभ्योऽन्यतरस्यामद्वंद्वे ।
2-4-70 आगस्त्यकौण्डिन्ययोरगस्तिकुण्डिनच्‌ ।
2-4-71 सुपो धातुप्रातिपदिकयोः ।
2-4-72 अदिप्रभृतिभ्यः शपः ।
2-4-73 बहुलं छन्दसि ।
2-4-74 यङोऽचि च ।
2-4-75 जुहोत्यादिभ्यः श्लुः ।
2-4-76 बहुलं छन्दसि ।
2-4-77 गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु ।
2-4-78 विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः ।
2-4-79 तनादिभ्यस्तथासोः ।
2-4-80 मन्त्रे घसह्वरणशवृदहाद्वृच्कृगमिजनिभ्यो लेः ।
2-4-81 आमः ।
2-4-82 अव्ययादाप्सुपः ।
2-4-83 नाव्ययीभावादतोऽम्त्वपञ्चम्याः ।
2-4-84 तृतीयासप्तम्योर्बहुलम्‌ ।
2-4-85 लुटः प्रथमस्य डारौरसः ।

Chapter -3

3-1-1 प्रत्ययः ।
3-1-2 परश्च ।
3-1-3 आद्युदात्तश्च ।
3-1-4 अनुदत्तौ सुप्पितौ ।
3-1-5 गुप्तिज्किद्भ्यः सन् ।
3-1-6 मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य ।
3-1-7 धातोः कर्मणः समानकर्तृकादिच्छायां वा ।
3-1-8 सुप आत्मनः क्यच् ।
3-1-9 काम्यच्च ।
3-1-10 उपमानादाचारे ।
3-1-11 कर्तुः क्यङ् सलोपश्च ।
3-1-12 भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च हलः ।
3-1-13 लोहितादिडाज्भ्यः क्यष्।
3-1-14 कष्टाय क्रमणे ।
3-1-15 कर्मणः रोमन्थतपोभ्यां वर्तिचरोः ।
3-1-16 बाष्पोष्माभ्यां उद्वमने ।
3-1-17 शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे ।
3-1-18 सुखादिभ्यः कर्तृवेदनायाम् ।
3-1-19 नमोवरिवश्चित्रङः क्यच् ।
3-1-20 पुच्छभाण्डचीवराण्णिङ् ।
3-1-21 मुण्डमिश्रश्लक्ष्णलवणव्रतवस्त्रहलकलकृततूस्तेभ्यो
णिच् ।
3-1-22 धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् ।
3-1-23 नित्यं कौटिल्ये गतौ ।
3-1-24 लुपसदचरजपजभदहदशगॄभ्यो भावगर्हायाम् ।
3-1-25 सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वचवर्मवर्ण\-
चूर्णचुरादिभ्यो णिच् ।
3-1-26 हेतुमति च ।
3-1-27 कण्ड्वादिभ्यो यक् ।
3-1-28 गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः ।
3-1-29 ऋतेरीयङ् ।
3-1-30 कमेर्णिङ् ।
3-1-31 आयादय आर्धद्धातुके वा ।
3-1-32 सनाद्यन्ता धातवः ।
3-1-33 स्यतासी लृलुटोः ।
3-1-34 सिब्बहुलं लेटि ।
3-1-35 कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि ।
3-1-36 इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः ।
3-1-37 दयायासश्च ।
3-1-38 उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम् ।
3-1-39 भीह्रीभृहुवां श्लुवच्च ।
3-1-40 कृञ् चानुप्रयुज्यते लिटि ।
3-1-41 विदाङ्कुर्वन्त्वित्यन्यतरस्याम् ।
3-1-42 अभ्युत्सादयांप्रजनयांचिकयांरमयामकः
पावयांक्रियाद्विदामक्रन्निति च्छन्दसि ।
3-1-43 च्लि लुङि ।
3-1-44 च्लेः सिच् ।
3-1-45 शल इगुपधादनिटः क्सः ।
3-1-46 श्लिष आलिङ्गने ।
3-1-47 न दृशः ।
3-1-48 णिश्रिद्रुस्रुभ्यः कर्तरि चङ् ।
3-1-49 विभाषा धेट्श्व्योः ।
3-1-50 गुपेश्छन्दसि ।
3-1-51 नोनयतिध्वनयत्येलयत्यर्दयतिभ्यः ।
3-1-52 अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ् ।
3-1-53 लिपिसिचिह्वश्च ।
3-1-54 आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् ।
3-1-55 पुषादिद्युताद्यॢदितः परस्मैपदेषु ।
3-1-56 सर्त्तिशास्त्यर्तिभ्यश्च ।
3-1-57 इरितो वा ।
3-1-58 जृस्तम्भुम्रुचुम्लुचुग्रुचुग्लुचुग्लुञ्चुश्विभ्यश्च ।
3-1-59 कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि ।
3-1-60 चिण् ते पदः ।
3-1-61 दीपजनबुधपूरितायिप्यायिभ्योऽन्यतरस्याम् ।
3-1-62 अचः कर्मकर्तरि ।
3-1-63 दुहश्च ।
3-1-64 न रुधः ।
3-1-65 तपोऽनुतापे च ।
3-1-66 चिण् भावकर्मणोः ।
3-1-67 सार्वधातुके यक् ।
3-1-68 कर्तरि शप्‌ ।
3-1-69 दिवादिभ्यः श्यन् ।
3-1-70 वा भ्राशभ्लाशभ्रमुक्रमुक्लमुत्रसित्रुटिलषः ।
3-1-71 यसोऽनुपसर्गात्‌ ।
3-1-72 संयसश्च ।
3-1-73 स्वादिभ्यः श्नुः ।
3-1-74 श्रुवः शृ च ।
3-1-75 अक्षोऽन्यतरस्याम् ।
3-1-76 तनूकरणे तक्षः ।
3-1-77 तुदादिभ्यः शः ।
3-1-78 रुधादिभ्यः श्नम् ।
3-1-79 तनादिकृञ्भ्य उः ।
3-1-80 धिन्विकृण्व्योर च ।
3-1-81 क्र्यादिभ्यः श्ना ।
3-1-82 स्तम्भुस्तुम्भुस्कम्भुस्कुम्भुस्कुञ्भ्यः श्नुश्च ।
3-1-83 हलः श्नः शानज्झौ ।
3-1-84 छन्दसि शायजपि ।
3-1-85 व्यत्ययो बहुलम् ।
3-1-86 लिङ्याशिष्यङ् ।
3-1-87 कर्मवत्‌ कर्मणा तुल्यक्रियः ।
3-1-88 तपस्तपःकर्मकस्यैव ।
3-1-89 न दुहस्नुनमां यक्चिणौ ।
3-1-90 कुषिरजोः प्राचां श्यन् परस्मैपदं च ।
3-1-91 धातोः ।
3-1-92 तत्रोपपदं सप्तमीस्थम्‌ ।
3-1-93 कृदतिङ् ।
3-1-94 वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् ।
3-1-95 कृत्याः प्राङ् ण्वुलः ।
3-1-96 तव्यत्तव्यानीयरः ।
3-1-97 अचो यत्‌ ।
3-1-98 पोरदुपधात्‌ ।
3-1-99 शकिसहोश्च ।
3-1-100 गदमदचरयमश्चानुपसर्गे ।
3-1-101 अवद्यपण्यवर्या गर्ह्यपणितव्यानिरोधेषु ।
3-1-102 वह्यं करणम्‌ ।
3-1-103 अर्यः स्वामिवैश्ययोः ।
3-1-104 उपसर्या काल्या प्रजने ।
3-1-105 अजर्यं संगतम्‌ ।
3-1-106 वदः सुपि क्यप् च ।
3-1-107 भुवो भावे ।
3-1-108 हनस्त च ।
3-1-109 एतिस्तुशस्वृदृजुषः क्यप्‌ ।
3-1-110 ऋदुपधाच्चाकपिचृतेः ।
3-1-111 ई च खनः ।
3-1-112 भृञोऽसंज्ञायाम् ।
3-1-113 मृजेर्विभाषा ।
3-1-114 राजसूयसूर्यमृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्याव्यथ्याः

3-1-115 भिद्योद्ध्यौ नदे ।
3-1-116 पुष्यसिद्ध्यौ नक्षत्रे ।
3-1-117 विपूयविनीयजित्या मुञ्जकल्कहलिषु ।
3-1-118 प्रत्यपिभ्यां ग्रहेश्छन्दसि ।
3-1-119 पदास्वैरिबाह्यापक्ष्येषु च ।
3-1-120 विभाषा कृवृषोः ।
3-1-121 युग्यं च पत्त्रे ।
3-1-122 अमावस्यदन्यतरस्याम् ।
3-1-123 छन्दसि निष्टर्क्यदेवहूयप्रणीयोन्नीयोच्छिष्य
मर्यस्तर्याध्वर्यखन्यखान्यदेवयज्याऽऽपृच्छ्य
प्रतिषीव्यब्रह्मवाद्यभाव्यस्ताव्योपचाय्यपृडानि ।
3-1-124 ऋहलोर्ण्यत्‌ ।
3-1-125 ओरावश्यके ।
3-1-126 आसुयुवपिरपिलपित्रपिचमश्च ।
3-1-127 आनाय्योऽनित्ये ।
3-1-128 प्रणाय्योऽसंमतौ ।
3-1-129 पाय्यसान्नाय्यनिकाय्यधाय्या मानहविर्निवाससामिधेनीषु ।
3-1-130 क्रतौ कुण्डपाय्यसंचाय्यौ ।
3-1-131 अग्नौ परिचाय्योपचाय्यसमूह्याः ।
3-1-132 चित्याग्निचित्ये च ।
3-1-133 ण्वुल्तृचौ ।
3-1-134 नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः ।
3-1-135 इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः ।
3-1-136 आतश्चोपसर्गे ।
3-1-137 पाघ्राध्माधेट्दृशः शः ।
3-1-138 अनुपसर्गाल्लिम्पविन्दधारिपारिवेद्युदेजिचेति\-
सातिसाहिभ्यश्च ।
3-1-139 ददातिदधात्योर्विभाषा ।
3-1-140 ज्वलितिकसन्तेभ्यो णः ।
3-1-141 श्याऽऽद्व्यधास्रुसंस्र्वतीणवसाऽवहृलिह\-
श्लिषश्वसश्च ।
3-1-142 दुन्योरनुपसर्गे ।
3-1-143 विभाषा ग्रहेः ।
3-1-144 गेहे कः ।
3-1-145 शिल्पिनि ष्वुन् ।
3-1-146 गस्थकन् ।
3-1-147 ण्युट् च ।
3-1-148 हश्च व्रीहिकालयोः ।
3-1-149 प्रुसृल्वः समभिहारे वुन् ।
3-1-150 आशिषि च ।
3-2-1 कर्मण्यण् ।
3-2-2 ह्वावामश्च ।
3-2-3 आतोऽनुपसर्गे कः ।
3-2-4 सुपि स्थः ।
3-2-5 तुन्दशोकयोः परिमृजापनुदोः ।
3-2-6 प्रे दाज्ञः ।
3-2-7 समि ख्यः ।
3-2-8 गापोष्टक् ।
3-2-9 हरतेरनुद्यमनेऽच् ।
3-2-10 वयसि च ।
3-2-11 आङि ताच्छील्ये ।
3-2-12 अर्हः ।
3-2-13 स्तम्बकर्णयोः रमिजपोः ।
3-2-14 शमि धातोः संज्ञायाम् ।
3-2-15 अधिकरणे शेतेः ।
3-2-16 चरेष्टः ।
3-2-17 भिक्षासेनाऽऽदायेषु च ।
3-2-18 पुरोऽग्रतोऽग्रेषु सर्तेः ।
3-2-19 पूर्वे कर्तरि ।
3-2-20 कृञो हेतुताच्छील्यानुलोम्येषु ।
3-2-21 दिवाविभानिशाप्रभाभास्करान्तानन्तादिबहुनान्दी\- किम्लिपि
लिबिबलिभक्तिकर्तृचित्रक्षेत्र\-
संख्याजङ्घाबाह्वहर्यत्तत्धनुररुष्षु ।
3-2-22 कर्मणि भृतौ ।
3-2-23 न शब्दश्लोककलहगाथावैरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु ।
3-2-24 स्तम्बशकृतोरिन् ।
3-2-25 हरतेर्दृतिनाथयोः पशौ ।
3-2-26 फलेग्रहिरात्मम्भरिश्च ।
3-2-27 छन्दसि वनसनरक्षिमथाम् ।
3-2-28 एजेः खश् ।
3-2-29 नासिकास्तनयोर्ध्माधेटोः ।
3-2-30 नाडीमुष्ट्योश्च ।
3-2-31 उदि कूले रुजिवहोः ।
3-2-32 वहाभ्रे लिहः ।
3-2-33 परिमाणे पचः ।
3-2-34 मितनखे च ।
3-2-35 विध्वरुषोः तुदः ।
3-2-36 असूर्यललाटयोर्दृशितपोः ।
3-2-37 उग्रम्पश्येरम्मदपाणिन्धमाश्च ।
3-2-38 प्रियवशे वदः खच् ।
3-2-39 द्विषत्परयोस्तापेः ।
3-2-40 वाचि यमो व्रते ।
3-2-41 पूःसर्वयोर्दारिसहोः ।
3-2-42 सर्वकूलाभ्रकरीषेषु कषः ।
3-2-43 मेघर्तिभयेषु कृञः ।
3-2-44 क्षेमप्रियमद्रेऽण् च ।
3-2-45 आशिते भुवः करणभावयोः ।
3-2-46 संज्ञायां भृतॄवृजिधारिसहितपिदमः ।
3-2-47 गमश्च ।
3-2-48 अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः ।
3-2-49 आशिषि हनः ।
3-2-50 अपे क्लेशतमसोः ।
3-2-51 कुमारशीर्षयोर्णिनिः ।
3-2-52 लक्षणे जायापत्योष्टक् ।
3-2-53 अमनुष्यकर्तृके च ।
3-2-54 शक्तौ हस्तिकपाटयोः ।
3-2-55 पाणिघताडघौ शिल्पिनि ।
3-2-56 आढ्यसुभगस्थूलपलितनग्नान्धप्रियेषु
च्व्य्र्थेष्वच्वौ कृञः करणे ख्युन् ।
3-2-57 कर्तरि भुवः खिष्णुच्खुकञौ ।
3-2-58 स्पृशोऽनुदके क्विन् ।
3-2-59 ऋत्विग्दधृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च ।
3-2-60 त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ् च ।
3-2-61
सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविदभिदच्छिद-जिनीराजामुपसर्गेऽपि
क्विप्‌ ।
3-2-62 भजो ण्विः ।
3-2-63 छन्दसि सहः ।
3-2-64 वहश्च ।
3-2-65 कव्यपुरीषपुरीष्येषु ञ्युट् ।
3-2-66 हव्येऽनन्तः पादम् ।
3-2-67 जनसनखनक्रमगमो विट् ।
3-2-68 अदोऽनन्ने ।
3-2-69 क्रव्ये च ।
3-2-70 दुहः कब् घश्च ।
3-2-71 मन्त्रे श्वेतवहौक्थशस्पुरोडाशो ण्विन् ।
3-2-72 अवे यजः ।
3-2-73 विजुपे छन्दसि ।
3-2-74 आतो मनिन्क्वनिप्वनिपश्च ।
3-2-75 अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ।
3-2-76 क्विप् च ।
3-2-77 स्थः क च ।
3-2-78 सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छिल्ये ।
3-2-79 कर्तर्युपमाने ।
3-2-80 व्रते ।
3-2-81 बहुलमाभीक्ष्ण्ये ।
3-2-82 मनः ।
3-2-83 आत्ममाने खश्च ।
3-2-84 भूते ।
3-2-85 करणे यजः ।
3-2-86 कर्मणि हनः ।
3-2-87 ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप्‌ ।
3-2-88 बहुलं छन्दसि ।
3-2-89 सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः ।
3-2-90 सोमे सुञः ।
3-2-91 अग्नौ चेः ।
3-2-92 कर्मण्यग्न्याख्यायाम् ।
3-2-93 कर्मणीनिर्विक्रियः ।
3-2-94 दृशेः क्वनिप्‌ ।
3-2-95 राजनि युधिकृञः ।
3-2-96 सहे च ।
3-2-97 सप्तम्यां जनेर्डः ।
3-2-98 पञ्चम्यामजातौ ।
3-2-99 उपसर्गे च संज्ञायाम् ।
3-2-100 अनौ कर्मणि ।
3-2-101 अन्येष्वपि दृश्यते ।
3-2-102 निष्ठा ।
3-2-103 सुयजोर्ङ्वनिप्‌ ।
3-2-104 जीर्यतेरतृन् ।
3-2-105 छन्दसि लिट् ।
3-2-106 लिटः कानज्वा ।
3-2-107 क्वसुश्च ।
3-2-108 भाषायां सदवसश्रुवः ।
3-2-109 उपेयिवाननाश्वाननूचानश्च ।
3-2-110 लुङ् ।
3-2-111 अनद्यतने लङ् ।
3-2-112 अभिज्ञावचने लृट् ।
3-2-113 न यदि ।
3-2-114 विभाषा साकाङ्क्षे ।
3-2-115 परोक्षे लिट् ।
3-2-116 हशश्वतोर्लङ् च ।
3-2-117 प्रश्ने चासन्नकाले ।
3-2-118 लट् स्मे ।
3-2-119 अपरोक्षे च ।
3-2-120 ननौ पृष्टप्रतिवचने ।
3-2-121 नन्वोर्विभाषा ।
3-2-122 पुरि लुङ् चास्मे ।
3-2-123 वर्तमाने लट् ।
3-2-124 लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे ।
3-2-125 सम्बोधने च ।
3-2-126 लक्षणहेत्वोः क्रियायाः ।
3-2-127 तौ सत्‌ ।
3-2-128 पूङ्यजोः शानन् ।
3-2-129 ताच्छील्यवयोवचनशक्तिषु चानश् ।
3-2-130 इङ्धार्योः शत्रकृच्छ्रिणि ।
3-2-131 द्विषोऽमित्रे ।
3-2-132 सुञो यज्ञसंयोगे ।
3-2-133 अर्हः पूजायाम् ।
3-2-134 आक्वेस्तच्छीलतद्धर्मतत्साधुकारिषु ।
3-2-135 तृन् ।
3-2-136 अलंकृञ्निराकृञ्प्रजनोत्पचोत्पतोन्मद\-
रुच्यपत्रपवृतुवृधुसहचर इष्णुच् ।
3-2-137 णेश्छन्दसि ।
3-2-138 भुवश्च ।
3-2-139 ग्लाजिस्थश्च क्स्नुः ।
3-2-140 त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः ।
3-2-141 शमित्यष्टाभ्यो घिनुण् ।
3-2-142 संपृचानुरुधाङ्यमाङ्यसपरिसृसंसृज\-
परिदेविसंज्वरपरिक्षिपपरिरटपरिवदपरिदहपरिमुह\-
दुषद्विषद्रुहदुहयुजाक्रीडविविचत्यजरज\-
भजातिचरापचरामुषाभ्याहनश्च ।
3-2-143 वौ कषलसकत्थस्रम्भः ।
3-2-144 अपे च लषः ।
3-2-145 प्रे लपसृद्रुमथवदवसः ।
3-2-146 निन्दहिंसक्लिशखादविनाशपरिक्षिपपरिरटपरिवादि##-##
व्याभाषासूयो वुञ् ।
3-2-147 देविक्रुशोश्चोपसर्गे ।
3-2-148 चलनशब्दार्थादकर्मकाद्युच् ।
3-2-149 अनुदात्तेतश्च हलादेः ।
3-2-150 जुचङ्क्रम्यदन्द्रम्यसृगृधिज्वलशुचलषपतपदः

3-2-151 क्रुधमण्डार्थेभ्यश्च ।
3-2-152 न यः ।
3-2-153 सूददीपदीक्षश्च ।
3-2-154 लषपतपदस्थाभूवृषहनकमगमशॄभ्य उकञ् ।
3-2-155 जल्पभिक्षकुट्टलुण्टवृङः षाकन् ।
3-2-156 प्रजोरिनिः ।
3-2-157 जिदृक्षिविश्रीण्वमाव्यथाभ्यमपर्इभूप्रसूभ्यश्च ।
3-2-158 स्पृहिगृहिपतिदयिनिद्रातन्द्राश्रद्धाभ्य आलुच् ।
3-2-159 दाधेट्सिशदसदो रुः ।
3-2-160 सृघस्यदः क्मरच् ।
3-2-161 भञ्जभासमिदो घुरच् ।
3-2-162 विदिभिदिच्छिदेः कुरच् ।
3-2-163 इण्नश्जिसर्त्तिभ्यः क्वरप्‌ ।
3-2-164 गत्वरश्च ।
3-2-165 जागुरूकः ।
3-2-166 यजजपदशां यङः ।
3-2-167 नमिकम्पिस्म्यजसकमहिंसदीपो रः ।
3-2-168 सनाशंसभिक्ष उः ।
3-2-169 विन्दुरिच्छुः ।
3-2-170 क्याच्छन्दसि ।
3-2-171 आदृगमहनजनः किकिनौ लिट् च ।
3-2-172 स्वपितृषोर्नजिङ् ।
3-2-173 शॄवन्द्योरारुः ।
3-2-174 भियः क्रुक्लुकनौ ।
3-2-175 स्थेशभासपिसकसो वरच् ।
3-2-176 यश्च यङः ।
3-2-177 भ्राजभासधुर्विद्युतोर्जिपॄजुग्रावस्तुवः क्विप्‌ ।
3-2-178 अन्येभ्योऽपि दृश्यते ।
3-2-179 भुवः संज्ञाऽन्तरयोः ।
3-2-180 विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् ।
3-2-181 धः कर्मणि ष्ट्रन् ।
3-2-182 दाम्नीशसयुयुजस्तुतुदसिसिचमिहपतदशनहः करणे ।
3-2-183 हलसूकरयोः पुवः ।
3-2-184 अर्तिलूधूसूखनसहचर इत्रः ।
3-2-185 पुवः संज्ञायाम् ।
3-2-186 कर्तरि चर्षिदेवतयोः ।
3-2-187 ञीतः क्तः ।
3-2-188 मतिबुद्धिपूजार्थेभ्यश्च ।
3-3-1 उणादयो बहुलम् ।
3-3-2 भूतेऽपि दृश्यन्ते ।
3-3-3 भविष्यति गम्यादयः ।
3-3-4 यावत्पुरानिपातयोर्लट् ।
3-3-5 विभाषा कदाकर्ह्योः ।
3-3-6 किंवृत्ते लिप्सायाम् ।
3-3-7 लिप्स्यमानसिद्धौ च ।
3-3-8 लोडर्थलक्षणे च ।
3-3-9 लिङ् चोर्ध्वमौहूर्तिके ।
3-3-10 तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्‌ ।
3-3-11 भाववचनाश्च ।
3-3-12 अण् कर्मणि च ।
3-3-13 लृट् शेषे च ।
3-3-14 लृटः सद् वा ।
3-3-15 अनद्यतने लुट् ।
3-3-16 पदरुजविशस्पृशो घञ् ।
3-3-17 सृ स्थिरे ।
3-3-18 भावे ।
3-3-19 अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ।
3-3-20 परिमणाख्यायां सर्वेभ्यः ।
3-3-21 इङश्च ।
3-3-22 उपसर्गे रुवः ।
3-3-23 समि युद्रुदुवः ।
3-3-24 श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे ।
3-3-25 वौ क्षुश्रुवः ।
3-3-26 अवोदोर्नियः ।
3-3-27 प्रे द्रुस्तुस्रुवः ।
3-3-28 निरभ्योः पूल्वोः ।
3-3-29 उन्न्योर्ग्रः ।
3-3-30 कॄ धान्ये ।
3-3-31 यज्ञे समि स्तुवः ।
3-3-32 प्रे स्त्रोऽयज्ञे ।
3-3-33 प्रथने वावशब्दे ।
3-3-34 छन्दोनाम्नि च ।
3-3-35 उदि ग्रहः ।
3-3-36 समि मुष्टौ ।
3-3-37 परिन्योर्नीणोर्द्यूताभ्रेषयोः ।
3-3-38 परावनुपात्यय इणः ।
3-3-39 व्युपयोः शेतेः पर्याये ।
3-3-40 हस्तादाने चेरस्तेये ।
3-3-41 निवासचितिशरीरोपसमाधानेष्वादेश्च कः ।
3-3-42 संघे चानौत्तराधर्ये ।
3-3-43 कर्मव्यतिहारे णच् स्त्रियाम् ।
3-3-44 अभिविधौ भाव इनुण् ।
3-3-45 आक्रोशेऽवन्योर्ग्रहः ।
3-3-46 प्रे लिप्सायाम् ।
3-3-47 परौ यज्ञे ।
3-3-48 नौ वृ धान्ये ।
3-3-49 उदि श्रयतियौतिपूद्रुवः ।
3-3-50 विभाषाऽऽङि रुप्लुवोः ।
3-3-51 अवे ग्रहो वर्षप्रतिबन्धे ।
3-3-52 प्रे वणिजाम् ।
3-3-53 रश्मौ च ।
3-3-54 वृणोतेराच्छादने ।
3-3-55 परौ भुवोऽवज्ञाने ।
3-3-56 एरच् ।
3-3-57 ऋदोरप्‌ ।
3-3-58 ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च ।
3-3-59 उपसर्गेऽदः ।
3-3-60 नौ ण च ।
3-3-61 व्यधजपोरनुपसर्गे ।
3-3-62 स्वनहसोर्वा ।
3-3-63 यमः समुपनिविषु ।
3-3-64 नौ गदनदपठस्वनः ।
3-3-65 क्वणो वीणायां च ।
3-3-66 नित्यं पणः परिमाणे ।
3-3-67 मदोऽनुपसर्गे ।
3-3-68 प्रमदसम्मदौ हर्षे ।
3-3-69 समुदोरजः पशुषु ।
3-3-70 अक्षेषु ग्लहः ।
3-3-71 प्रजने सर्तेः ।
3-3-72 ह्वः सम्प्रसारणं च न्यभ्युपविषु ।
3-3-73 आङि युद्धे ।
3-3-74 निपानमाहावः ।
3-3-75 भावेऽनुपसर्गस्य ।
3-3-76 हनश्च वधः ।
3-3-77 मूर्तौ घनः ।
3-3-78 अन्तर्घनो देशे ।
3-3-79 अगारैकदेशे प्रघणः प्रघाणश्च ।
3-3-80 उद्घनोऽत्याधानम् ।
3-3-81 अपघनोऽङ्गम् ।
3-3-82 करणेऽयोविद्रुषु ।
3-3-83 स्तम्बे क च ।
3-3-84 परौ घः ।
3-3-85 उपघ्न आश्रये ।
3-3-86 संघोद्घौ गणप्रशंसयोः ।
3-3-87 निघो निमितम् ।
3-3-88 ड्वितः क्त्रिः ।
3-3-89 ट्वितोऽथुच् ।
3-3-90 यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् ।
3-3-91 स्वपो नन् ।
3-3-92 उपसर्गे घोः किः ।
3-3-93 कर्मण्यधिकरणे च ।
3-3-94 स्त्रियां क्तिन् ।
3-3-95 स्थागापापचां भावे ।
3-3-96 मन्त्रे वृषेषपचमनविदभूवीरा उदात्तः ।
3-3-97 ऊतियूतिज्ऊतिसातिहेतिकीर्तयश्च ।
3-3-98 व्रजयजोर्भावे क्यप्‌ ।
3-3-99 संज्ञायां समजनिषदनिपतमनविदषुञ्शीङ्भृञिणः

3-3-100 कृञः श च ।
3-3-101 इच्छा ।
3-3-102 अ प्रत्ययात्‌ ।
3-3-103 गुरोश्च हलः ।
3-3-104 षिद्भिदादिभ्योऽङ् ।
3-3-105 चिन्तिपूजिकथिकुम्बिचर्चश्च ।
3-3-106 आतश्चोपसर्गे ।
3-3-107 ण्यासश्रन्थो युच् ।
3-3-108 रोगाख्यायां ण्वुल् बहुलम् ।
3-3-109 संज्ञायाम् ।
3-3-110 विभाषाऽऽख्यानपरिप्रश्नयोरिञ् च ।
3-3-111 पर्यायार्हर्णोत्पत्तिषु ण्वुच् ।
3-3-112 आक्रोशे नञ्यनिः ।
3-3-113 कृत्यल्युटो बहुलम् ।
3-3-114 नपुंसके भावे क्तः ।
3-3-115 ल्युट् च ।
3-3-116 कर्मणि च येन संस्पर्शात्‌ कर्तुः शरीरसुखम् ।
3-3-117 करणाधिकरणयोश्च ।
3-3-118 पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण ।
3-3-119 गोचरसंचरवहव्रजव्यजापणनिगमाश्च ।
3-3-120 अवे तॄस्त्रोर्घञ् ।
3-3-121 हलश्च ।
3-3-122 अध्यायन्यायोद्यावसंहाराधारावयाश्च ।
3-3-123 उदङ्कोऽनुदके ।
3-3-124 जालमानायः ।
3-3-125 खनो घ च ।
3-3-126 ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् ।
3-3-127 कर्तृकर्मणोश्च भूकृञोः ।
3-3-128 आतो युच् ।
3-3-129 छन्दसि गत्यर्थेभ्यः ।
3-3-130 अन्येभ्योऽपि दृश्यते ।
3-3-131 वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ।
3-3-132 आशंसायां भूतवच्च ।
3-3-133 क्षिप्रवचने लृट् ।
3-3-134 आशंसावचने लिङ् ।
3-3-135 नानद्यतनवत्‌ क्रियाप्रबन्धसामीप्ययोः ।
3-3-136 भविष्यति मर्यादावचनेऽवरस्मिन् ।
3-3-137 कालविभागे चानहोरात्राणाम् ।
3-3-138 परस्मिन् विभाषा ।
3-3-139 लिङ्‌निमित्ते लृङ् क्रियाऽतिपत्तौ ।
3-3-140 भूते च ।
3-3-141 वोताप्योः ।
3-3-142 गर्हायां लडपिजात्वोः ।
3-3-143 विभाषा कथमि लिङ् च ।
3-3-144 किंवृत्ते लिङ्लृटौ ।
3-3-145 अनवकप्त्यमर्षयोरकिंवृत्ते अपि ।
3-3-146 किंकिलास्त्यर्थेषु लृट् ।
3-3-147 जातुयदोर्लिङ् ।
3-3-148 यच्चयत्रयोः ।
3-3-149 गर्हायां च ।
3-3-150 चित्रीकरणे च ।
3-3-151 शेषे लृडयदौ ।
3-3-152 उताप्योः समर्थयोर्लिङ् ।
3-3-153 कामप्रवेदनेऽकच्चिति ।
3-3-154 सम्भवानेऽलमिति चेत्‌ सिद्धाप्रयोगे ।
3-3-155 विभाषा धातौ सम्भावनवचनेऽयदि ।
3-3-156 हेतुहेतुमतोर्लिङ् ।
3-3-157 इच्छार्थेषु लिङ्लोटौ ।
3-3-158 समानकर्तृकेषु तुमुन् ।
3-3-159 लिङ् च ।
3-3-160 इच्छार्थेभ्यो विभाषा वर्तमाने ।
3-3-161 विधिनिमन्‍त्रणामन्‍त्रणाधीष्‍टसंप्रश्‍नप्रार्थनेषु लिङ्।
3-3-162 लोट् च ।
3-3-163 प्रैषातिसर्गप्राप्तकालेषु कृत्याश्च ।
3-3-164 लिङ् चोर्ध्वमौहूर्तिके ।
3-3-165 स्मे लोट् ।
3-3-166 अधीष्टे च ।
3-3-167 कालसमयवेलासु तुमुन् ।
3-3-168 लिङ् यदि ।
3-3-169 अर्हे कृत्यतृचश्च ।
3-3-170 आवश्यकाधमर्ण्ययोर्णिनिः ।
3-3-171 कृत्याश्च ।
3-3-172 शकि लिङ् च ।
3-3-173 आशिषि लिङ्लोटौ ।
3-3-174 क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम् ।
3-3-175 माङि लुङ् ।
3-3-176 स्मोत्तरे लङ् च ।
3-4-1 धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः ।
3-4-2 क्रियासमभिहारे लोट्##,## लोटो हिस्वौ##,## वा च तध्वमोः ।
3-4-3 समुच्चयेऽन्यतरस्याम् ।
3-4-4 यथाविध्यनुप्रयोगः पूर्वस्मिन् ।
3-4-5 समुच्चये सामान्यवचनस्य ।
3-4-6 छन्दसि लुङ्लङ्{}लिटः ।
3-4-7 लिङर्थे लेट् ।
3-4-8 उपसंवादाशङ्कयोश्च ।
3-4-9 तुमर्थे सेसेनसेअसेन्क्सेकसेनध्यैअध्यैन्कध्यैकध्यैन्\-
शध्यैशध्यैन्तवैतवेङ्तवेनः ।
3-4-10 प्रयै रोहिष्यै अव्यथिष्यै ।
3-4-11 दृशे विख्ये च ।
3-4-12 शकि णमुल्कमुलौ ।
3-4-13 ईश्वरे तोसुन्कसुनौ ।
3-4-14 कृत्यार्थे तवैकेन्केन्यत्वनः ।
3-4-15 अवचक्षे च ।
3-4-16 भावलक्षणे स्थेण्कृञ्वदिचरिहुतमिजनिभ्यस्तोसुन् ।
3-4-17 सृपितृदोः कसुन् ।
3-4-18 अलङ्खल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा ।
3-4-19 उदीचां माङो व्यतीहारे ।
3-4-20 परावरयोगे च ।
3-4-21 समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ।
3-4-22 आभीक्ष्ण्ये णमुल् च ।
3-4-23 न यद्यनाकाङ्क्षे ।
3-4-24 विभाषाऽग्रेप्रथमपूर्वेषु ।
3-4-25 कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुञ् ।
3-4-26 स्वादुमि णमुल् ।
3-4-27 अन्यथैवंकथमित्थंसु सिद्धाप्रयोगश्चेत्‌ ।
3-4-28 यथातथयोरसूयाप्रतिवचने ।
3-4-29 कर्मणि दृशिविदोः साकल्ये ।
3-4-30 यावति विन्दजीवोः ।
3-4-31 चर्मोदरयोः पूरेः ।
3-4-32 व्अर्षप्रमाण ऊलोपश्चास्यान्यतरास्यम् ।
3-4-33 चेले क्नोपेः ।
3-4-34 निमूलसमूलयोः कषः ।
3-4-35 शुष्कचूर्णरूक्षेषु पिषः ।
3-4-36 समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः ।
3-4-37 करणे हनः ।
3-4-38 स्नेहने पिषः ।
3-4-39 हस्ते वर्त्तिग्रहोः ।
3-4-40 स्वे पुषः ।
3-4-41 अधिकरणे बन्धः ।
3-4-42 संज्ञायाम् ।
3-4-43 कर्त्रोर्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः ।
3-4-44 ऊर्ध्वे शुषिपूरोः ।
3-4-45 उपमाने कर्मणि च ।
3-4-46 कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः ।
3-4-47 उपदंशस्तृतीयायाम् ।
3-4-48 हिंसार्थानां च समानकर्मकाणाम् ।
3-4-49 सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः ।
3-4-50 समासत्तौ ।
3-4-51 प्रमाणे च ।
3-4-52 अपादाने परीप्सायाम् ।
3-4-53 द्वितीयायां च ।
3-4-54 स्वाङ्गेऽध्रुवे ।
3-4-55 परिक्लिश्यमाने च ।
3-4-56 विशिपतिपदिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः ।
3-4-57 अस्यतितृषोः क्रियाऽन्तरे कालेषु ।
3-4-58 नाम्न्यादिशिग्रहोः ।
3-4-59 अव्ययेऽयथाभिप्रेताख्याने कृञः क्त्वाणमुलौ ।
3-4-60 तिर्यच्यपवर्गे ।
3-4-61 स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः ।
3-4-62 नाधाऽर्थप्रत्यये च्व्यर्थे ।
3-4-63 तूष्णीमि भुवः ।
3-4-64 अन्वच्यानुलोम्ये ।
3-4-65
शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहार्हास्त्यर्थेषु तुमुन् ।
3-4-66 पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु ।
3-4-67 कर्तरि कृत्‌ ।
3-4-68 भव्यगेयप्रवचनीयोपस्थानीयजन्याप्लाव्यापात्या वा ।
3-4-69 लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः. ।
3-4-70 तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः ।
3-4-71 अदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ।
3-4-72गत्यर्थाकर्मकश्लिषशीङ्स्थाऽऽसवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च ।
3-4-73 दाशगोघ्नौ सम्प्रदाने ।
3-4-74 भीमादयोऽपादाने ।
3-4-75 ताभ्यामन्यत्रोणादयः ।
3-4-76 क्तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः ।
3-4-77 लस्य ।
3-4-78 तिप्तस्झिसिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ।
3-4-79 टित आत्मनेपदानां टेरे ।
3-4-80 थासस्से ।
3-4-81 लिटस्तझयोरेशिरेच् ।
3-4-82 परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः ।
3-4-83 विदो लटो वा ।
3-4-84 ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः ।
3-4-85 लोटो लङ्वत्‌ ।
3-4-86 एरुः ।
3-4-87 सेर्ह्यपिच्च ।
3-4-88 वा छन्दसि ।
3-4-89 मेर्निः ।
3-4-90 आमेतः ।
3-4-91 सवाभ्यां वामौ ।
3-4-92 आडुत्तमस्य पिच्च ।
3-4-93 एत ऐ ।
3-4-94 लेटोऽडाटौ ।
3-4-95 आत ऐ ।
3-4-96 वैतोऽन्यत्र ।
3-4-97 इतश्च लोपः परस्मैपदेषु ।
3-4-98 स उत्तमस्य ।
3-4-99 नित्यं ङितः ।
3-4-100 इतश्च ।
3-4-101 तस्थस्थमिपां तांतंतामः ।
3-4-102 लिङस्सीयुट् ।
3-4-103 यासुट् परस्मैपदेषूदात्तो ङिच्च ।
3-4-104 किदाशिषि ।
3-4-105 झस्य रन् ।
3-4-106 इटोऽत्‌ ।
3-4-107 सुट् तिथोः ।
3-4-108 झेर्जुस् ।
3-4-109 सिजभ्यस्तविदिभ्यः च ।
3-4-110 आतः ।
3-4-111 लङः शाकटायनस्यैव ।
3-4-112 द्विषश्च ।
3-4-113 तिङ्शित्सार्वधातुकम् ।
3-4-114 आर्धधातुकं शेषः ।
3-4-115 लिट् च ।
3-4-116 लिङाशिषि ।
3-4-117 छन्दस्युभयथा ।

Chapter-4

4-1-1 ङ्याप्प्रातिपदिकात्‌ ।
4-1-2 स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप्‌ ।
4-1-3 स्त्रियाम् ।
4-1-4 अजाद्यतष्टाप्‌ ।
4-1-5 ऋन्नेभ्यो ङीप्‌ ।
4-1-6 उगितश्च ।
4-1-7 वनो र च ।
4-1-8 पादोऽन्यतरस्याम् ।
4-1-9 टाबृचि ।
4-1-10 न षट्स्वस्रादिभ्यः ।
4-1-11 मनः ।
4-1-12 अनो बहुव्रीहेः ।
4-1-13 डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम्‌ ।
4-1-14 अनुपसर्जनात्‌ ।
4-1-15 टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्वरपः ।
4-1-16 यञश्च ।
4-1-17 प्राचां ष्फ तद्धितः ।
4-1-18 सर्वत्र लोहितादिकतान्तेभ्यः ।
4-1-19 कौरव्यमाण्डूकाभ्यां च ।
4-1-20 वयसि प्रथमे ।
4-1-21 द्विगोः ।
4-1-22 अपरिमाणबिस्ताचितकम्बल्येभ्यो न तद्धितलुकि ।
4-1-23 काण्डान्तात्‌ क्षेत्रे ।
4-1-24 पुरुषात्‌ प्रमाणेऽन्यतरस्याम् ।
4-1-25 बहुव्रीहेरूधसो ङीष्।
4-1-26 संख्याऽव्ययादेर्ङीप्‌ ।
4-1-27 दामहायनान्ताच्च ।
4-1-28 अन उपधालोपिनोन्यतरस्याम् ।
4-1-29 नित्यं संज्ञाछन्दसोः ।
4-1-30 केवलमामकभागधेयपापापरसमानार्यकृत-सुमङ्गलभेषजाच्च ।
4-1-31 रात्रेश्चाजसौ ।
4-1-32 अन्तर्वत्पतिवतोर्नुक् ।
4-1-33 पत्युर्नो यज्ञसंयोगे ।
4-1-34 विभाषा सपूर्वस्य ।
4-1-35 नित्यं सपत्न्य्आदिषु ।
4-1-36 पूतक्रतोरै च ।
4-1-37 वृषाकप्यग्निकुसितकुसीदानामुदात्तः ।
4-1-38 मनोरौ वा ।
4-1-39 वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः ।
4-1-40 अन्यतो ङीष्।
4-1-41 षिद्गौरादिभ्यश्च ।
4-1-42 जानपदकुण्डगोणस्थलभाजनागकालनीलकुशकामुक\-
कबराद्वृत्त्यमत्रावपनाकृत्रिमाश्राणास्थौल्य\-
वर्णानाच्छादनायोविकारमैथुनेच्छाकेशवेशेषु ।
4-1-43 शोणात्‌ प्राचाम् ।
4-1-44 वोतो गुणवचनात्‌ ।
4-1-45 बह्वादिभ्यश्च ।
4-1-46 नित्यं छन्दसि ।
4-1-47 भुवश्च ।
4-1-48 पुंयोगादाख्यायाम् ।
4-1-49 इन्द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्ययवयवन\-
मातुलाचार्याणामानुक् ।
4-1-50 क्रीतात्‌ करणपूर्वात्‌ ।
4-1-51 क्तादल्पाख्यायाम् ।
4-1-52 बहुव्रीहेश्चान्तोदात्तात्‌ ।
4-1-53 अस्वाङ्गपूर्वपदाद्वा ।
4-1-54 स्वाङ्गाच्चोपसर्जनादसंयोगोपधात्‌ ।
4-1-55 नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च ।
4-1-56 न क्रोडादिबह्वचः ।
4-1-57 सहनञ्विद्यमानपूर्वाच्च ।
4-1-58 नखमुखात्‌ संज्ञायाम् ।
4-1-59 दीर्घजिह्वी च च्छन्दसि ।
4-1-60 दिक्पूर्वपदान्ङीप्‌ ।
4-1-61 वाहः ।
4-1-62 सख्यशिश्वीति भाषायाम् ।
4-1-63 जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्‌ ।
4-1-64 पाककर्णपर्णपुष्पफलमूलबालोत्तरपदाच्च ।
4-1-65 इतो मनुष्यजातेः ।
4-1-66 ऊङुतः ।
4-1-67 बाह्वन्तात्‌ संज्ञायाम् ।
4-1-68 पङ्गोश्च ।
4-1-69 ऊरूत्तरपदादौपम्ये ।
4-1-70 संहितशफलक्षणवामादेश्च ।
4-1-71 कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ।
4-1-72 संज्ञायाम् ।
4-1-73 शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् ।
4-1-74 यङश्चाप्‌ ।
4-1-75 आवट्याच्च ।
4-1-76 तद्धिताः ।
4-1-77 यूनस्तिः ।
4-1-78 अणिञोरनार्षयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे ।
4-1-79 गोत्रावयवात्‌ ।
4-1-80 क्रौड्यादिभ्यश्च ।
4-1-81 दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रि\-
काण्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम् ।
4-1-82 समर्थानां प्रथमाद्वा ।
4-1-83 प्राग्दीव्यतोऽण् ।
4-1-84 अश्वपत्यादिभ्यश्च ।
4-1-85 दित्यदित्यादित्यपत्युत्तरपदाण्ण्यः ।
4-1-86 उत्सादिभ्योऽञ् ।
4-1-87 स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात्‌ ।
4-1-88 द्विगोर्लुगनपत्ये ।
4-1-89 गोत्रेऽलुगचि ।
4-1-90 यूनि लुक् ।
4-1-91 फक्फिञोरन्यतरस्याम् ।
4-1-92 तस्यापत्यम् ।
4-1-93 एको गोत्रे ।
4-1-94 गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् ।
4-1-95 अत इञ् ।
4-1-96 बाह्वादिभ्यश्च ।
4-1-97 सुधातुरकङ् च ।
4-1-98 गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्च्फञ् ।
4-1-99 नडादिभ्यः फक् ।
4-1-100 हरितादिभ्योऽञः ।
4-1-101 यञिञोश्च ।
4-1-102 शरद्वच्छुनकदर्भाद्भृगुवत्साग्रायणेषु ।
4-1-103 द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरयाम् ।
4-1-104 अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् ।
4-1-105 गर्गादिभ्यो यञ् ।
4-1-106 मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः ।
4-1-107 कपिबोधादाङ्गिरसे ।
4-1-108 वतण्डाच्च ।
4-1-109 लुक् स्त्रियाम् ।
4-1-110 अश्वादिभ्यः फञ् ।
4-1-111 भर्गात्‌ त्रैगर्ते ।
4-1-112 शिवादिभ्योऽण् ।
4-1-113 अवृद्धाभ्यो नदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः ।
4-1-114 ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ।
4-1-115 मातुरुत्‌ संख्यासम्भद्रपूर्वायाः ।
4-1-116 कन्यायाः कनीन च ।
4-1-117 विकर्णशुङ्गच्छगलाद्वत्सभरद्वाजात्रिषु ।
4-1-118 पीलाया वा ।
4-1-119 ढक् च मण्डूकात्‌ ।
4-1-120 स्त्रीभ्यो ढक् ।
4-1-121 द्व्यचः ।
4-1-122 इतश्चानिञः ।
4-1-123 शुभ्रादिभ्यश्च ।
4-1-124 विकर्णकुषीतकात्‌ काश्यपे ।
4-1-125 भ्रुवो वुक् च ।
4-1-126 कल्याण्यादीनामिनङ् ।
4-1-127 कुलटाया वा ।
4-1-128 चटकाया ऐरक् ।
4-1-129 गोधाया ढ्रक् ।
4-1-130 आरगुदीचाम् ।
4-1-131 क्षुद्राभ्यो वा ।
4-1-132 पितृष्वसुश्छण् ।
4-1-133 ढकि लोपः ।
4-1-134 मातृष्वसुश्च ।
4-1-135 चतुष्पाद्भ्यो ढञ् ।
4-1-136 गृष्ट्यादिभ्यश्च ।
4-1-137 राजश्वशुराद्यत्‌ ।
4-1-138 क्षत्राद्घः ।
4-1-139 कुलात्‌ खः ।
4-1-140 अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढकञौ ।
4-1-141 महाकुलादञ्खञौ ।
4-1-142 दुष्कुलाड्ढक् ।
4-1-143 स्वसुश्छः ।
4-1-144 भ्रातुर्व्यच्च ।
4-1-145 व्यन् सपत्ने ।
4-1-146 रेवत्यादिभ्यष्ठक् ।
4-1-147 गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च ।
4-1-148 वृद्धाट्ठक् सौवीरेषु बहुलम् ।
4-1-149 फेश्छ च ।
4-1-150 फाण्टाहृतिमिमताभ्यां णफिञौ ।
4-1-151 कुर्वादिभ्यो ण्यः ।
4-1-152 सेनान्तलक्षणकारिभ्यश्च ।
4-1-153 उदीचामिञ् ।
4-1-154 तिकादिभ्यः फिञ् ।
4-1-155 कौसल्यकार्मार्याभ्यां च ।
4-1-156 अणो द्व्यचः ।
4-1-157 उदीचां वृद्धादगोत्रात्‌ ।
4-1-158 वाकिनादीनां कुक् च ।
4-1-159 पुत्रान्तादन्यतरस्याम् ।
4-1-160 प्राचामवृद्धात्‌ फिन् बहुलम्‌ ।
4-1-161 मनोर्जातावञ्यतौ षुक् च ।
4-1-162 अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्‌ ।
4-1-163 जीवति तु वंश्ये युवा ।
4-1-164 भ्रातरि च ज्यायसि ।
4-1-165 वाऽन्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति ।
4-1-166 वृद्धस्य च पूजायाम् ।
4-1-167 यूनश्च कुत्सायाम् ।
4-1-168 जनपदशब्दात्‌ क्षत्रियादञ् ।
4-1-169 साल्वेयगान्धारिभ्यां च ।
4-1-170 द्व्यञ्मगधकलिङ्गसूरमसादण् ।
4-1-171 वृद्धेत्कोसलाजादाञ्ञ्यङ् ।
4-1-172 कुरुणादिभ्यो ण्यः ।
4-1-173 साल्वावयवप्रत्यग्रथकलकूटाश्मकादिञ् ।
4-1-174 ते तद्राजाः ।
4-1-175 कम्बोजाल्लुक् ।
4-1-176 स्त्रियामवन्तिकुन्तिकुरुभ्यश्च ।
4-1-177 अतश्च ।
4-1-178 न प्राच्यभर्गादियौधेयादिभ्यः ।
4-2-1 तेन रक्तं रागात्‌ ।
4-2-2 लाक्षारोचना##(##शकलकर्दमा##)##ट्ठक् ।
4-2-3 नक्षत्रेण युक्तः कालः ।
4-2-4 लुबविशेषे ।
4-2-5 संज्ञायां श्रवणाश्वत्थाभ्याम्‌ ।
4-2-6 द्वंद्वाच्छः ।
4-2-7 दृष्ट्अं साम ।
4-2-8 कलेर्ढक् ।
4-2-9 वामदेवाड्ड्यड्ड्यौ ।
4-2-10 परिवृतो रथः ।
4-2-11 पाण्डुकम्बलादिनिः ।
4-2-12 द्वैपवैयाघ्रादञ् ।
4-2-13 कौमारापूर्ववचने ।
4-2-14 तत्रोद्धृतममत्रेभ्यः ।
4-2-15 स्थण्डिलाच्छयितरि व्रते ।
4-2-16 संस्कृतं भक्षाः ।
4-2-17 शूलोखाद्यत्‌ ।
4-2-18 दध्नष्ठक् ।
4-2-19 उदश्वितोऽन्यतरस्याम् ।
4-2-20 क्षीराड्ढञ् ।
4-2-21 साऽस्मिन् पौर्णमासीति ##(##संज्ञायाम्##)## ।
4-2-22 आग्रहायण्यश्वत्थाट्ठक् ।
4-2-23 विभाषा फाल्गुनीश्रवणाकार्त्तिकीचैत्रीभ्यः ।
4-2-24 साऽस्य देवता ।
4-2-25 कस्येत्‌ ।
4-2-26 शुक्राद्घन् ।
4-2-27 अपोनप्त्रपान्नप्तृभ्यां घः ।
4-2-28 छ च ।
4-2-29 महेन्द्राद्घाणौ च ।
4-2-30 सोमाट्ट्यण् ।
4-2-31 वाय्वृतुपित्रुषसो यत्‌ ।
4-2-32 द्यावापृथिवीशुनासीरमरुत्वदग्नीषोमवास्तोष्पति\-
गृहमेधाच्छ च ।
4-2-33 अग्नेर्ढक् ।
4-2-34 कालेभ्यो भववत्‌ ।
4-2-35 महाराजप्रोष्ठपदाट्ठञ् ।
4-2-36 पितृव्यमातुलमातामहपितामहाः ।
4-2-37 तस्य समूहः ।
4-2-38 भिक्षाऽऽदिभ्योऽण् ।
4-2-39 गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्रराजराजन्यराजपुत्रवत्स\-
मनुष्याजाद्वुञ् ।
4-2-40 केदाराद्यञ् च ।
4-2-41 ठञ् कवचिनश्च ।
4-2-42 ब्राह्मणमाणववाडवाद्यन् ।
4-2-43 ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यः तल् ।
4-2-44 अनुदात्तादेरञ् ।
4-2-45 खण्डिकादिभ्यश्च ।
4-2-46 चरणेभ्यो धर्मवत्‌ ।
4-2-47 अचित्तहस्तिधेनोष्ठक् ।
4-2-48 केशाश्वाभ्यां यञ्छावन्यतरस्याम् ।
4-2-49 पाशादिभ्यो यः ।
4-2-50 खलगोरथात्‌ ।
4-2-51 इनित्रकट्यचश्च ।
4-2-52 विषयो देशे ।
4-2-53 राजन्यादिभ्यो वुञ् ।
4-2-54 भौरिक्याद्यैषुकार्यादिभ्यो विधल्भक्तलौ ।
4-2-55 सोऽस्यादिरिति च्छन्दसः प्रगाथेषु ।
4-2-56 संग्रामे प्रयोजनयोद्धृभ्यः ।
4-2-57 तदस्यां प्रहरणमिति क्रीडायाम् णः ।
4-2-58 घञः साऽस्यां क्रियेति ञः ।
4-2-59 तदधीते तद्वेद ।
4-2-60 क्रतूक्थादिसूत्रान्ताट्ठक् ।
4-2-61 क्रमादिभ्यो वुन् ।
4-2-62 अनुब्राह्मणादिनिः ।
4-2-63 वसन्तादिभ्यष्ठक् ।
4-2-64 प्रोक्ताल्लुक् ।
4-2-65 सूत्राच्च कोपधात्‌ ।
4-2-66 छन्दोब्राह्मणानि च तद्विषयाणि ।
4-2-67 तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि ।
4-2-68 तेन निर्वृत्तम् ।
4-2-69 तस्य निवासः ।
4-2-70 अदूरभवश्च ।
4-2-71 ओरञ् ।
4-2-72 मतोश्च बह्वजङ्गात्‌ ।
4-2-73 बह्वचः कूपेषु ।
4-2-74 उदक् च विपाशः ।
4-2-75 संकलादिभ्यश्च ।
4-2-76 स्त्रीषु सौवीरसाल्वप्राक्षु ।
4-2-77 सुवास्त्वादिभ्योऽण् ।
4-2-78 रोणी ।
4-2-79 कोपधाच्च ।
4-2-80 वुञ्छण्कठजिलशेनिरढञ्ण्ययफक्फिञिञ्ञ्य\-
कक्ठकोऽरीहणकृशाश्वर्श्यकुमुदकाशतृणप्रेक्षाऽश्मसखि\-
संकाशबलपक्षकर्णसुतंगमप्रगदिन्वराहकुमुदादिभ्यः ।
4-2-81 जनपदे लुप्‌ ।
4-2-82 वरणादिभ्यश्च ।
4-2-83 शर्कराया वा ।
4-2-84 ठक्छौ च ।
4-2-85 नद्यां मतुप्‌ ।
4-2-86 मध्वादिभ्यश्च ।
4-2-87 कुमुदनडवेतसेभ्यो ड्मतुप्‌ ।
4-2-88 नडशादाड्ड्वलच् ।
4-2-89 शिखाया वलच् ।
4-2-90 उत्करादिभ्यश्छः ।
4-2-91 नडादीनां कुक् च ।
4-2-92 शेषे ।
4-2-93 राष्ट्रावारपाराद्घखौ ।
4-2-94 ग्रामाद्यखञौ ।
4-2-95 कत्त्र्यादिभ्यो ढकञ् ।
4-2-96 कुलकुक्षिग्रीवाभ्यः श्वास्यलंकारेषु ।
4-2-97 नद्यादिभ्यो ढक् ।
4-2-98 दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक् ।
4-2-99 कापिश्याः ष्फक् ।
4-2-100 रंकोरमनुष्येऽण् च ।
4-2-101 द्युप्रागपागुदक्प्रतीचो यत्‌ ।
4-2-102 कन्थायाष्ठक् ।
4-2-103 वर्णौ वुक् ।
4-2-104 अव्ययात्त्यप्‌ ।
4-2-105 ऐषमोह्यःश्वसोऽन्यतरस्याम् ।
4-2-106 तीररूप्योत्तरपदादञ्ञौ ।
4-2-107 दिक्पूर्वपदादसंज्ञायां ञः ।
4-2-108 मद्रेभ्योऽञ् ।
4-2-109 उदीच्यग्रामाच्च बह्वचोऽन्तोदात्तात्‌ ।
4-2-110 प्रस्थोत्तरपदपलद्यादिकोपधादण् ।
4-2-111 कण्वादिभ्यो गोत्रे ।
4-2-112 इञश्च ।
4-2-113 न द्व्यचः प्राच्यभरतेषु ।
4-2-114 वृद्धाच्छः ।
4-2-115 भवतष्ठक्छसौ ।
4-2-116 काश्यादिभ्यष्ठञ्ञिठौ ।
4-2-117 वाहीकग्रामेभ्यश्च ।
4-2-118 विभाषोशीनरेषु ।
4-2-119 ओर्देशे ठञ् ।
4-2-120 वृद्धात्‌ प्राचाम् ।
4-2-121 धन्वयोपधाद्वुञ् ।
4-2-122 प्रस्थपुरवहान्ताच्च ।
4-2-123 रोपधेतोः प्राचाम् ।
4-2-124 जनपदतदवध्योश्च ।
4-2-125 अवृद्धादपि बहुवचनविषयात्‌ ।
4-2-126 क्अच्छाग्निवक्त्रगर्त्तोत्तरपदात्‌ ।
4-2-127 धूमादिभ्यश्च ।
4-2-128 नगरात्‌ कुत्सनप्रावीण्ययोः ।
4-2-129 अरण्यान्मनुष्ये ।
4-2-130 विभाषा कुरुयुगन्धराभ्याम् ।
4-2-131 मद्रवृज्योः कन् ।
4-2-132 कोपधादण् ।
4-2-133 कच्छादिभ्यश्च ।
4-2-134 मनुष्यतत्स्थयोर्वुञ् ।
4-2-135 अपदातौ साल्वात्‌ ।
4-2-136 गोयवाग्वोश्च ।
4-2-137 गर्तोत्तरपदाच्छः ।
4-2-138 गहादिभ्यश्च ।
4-2-139 प्राचां कटादेः ।
4-2-140 राज्ञः क च ।
4-2-141 वृद्धादकेकान्तखोपधात्‌ ।
4-2-142 कन्थापलदनगरग्रामह्रदोत्तरपदात्‌ ।
4-2-143 पर्वताच्च ।
4-2-144 विभाषाऽमनुष्ये ।
4-2-145 कृकणपर्णाद्भारद्वाजे ।
4-3-1 युष्मदस्मदोरन्यतरस्यां खञ् च ।
4-3-2 तस्मिन् नणि च युष्माकास्माकौ ।
4-3-3 तवकममकावेकवचने ।
4-3-4 अर्धाद्यत्‌ ।
4-3-5 परावराधमोत्तमपूर्वाच्च ।
4-3-6 दिक्पूर्वपदाट्ठञ् च ।
4-3-7 ग्रामजनपदैकदेशादञ्ठञौ ।
4-3-8 मध्यान्मः ।
4-3-9 अ साम्प्रतिके ।
4-3-10 द्वीपादनुसमुद्रं यञ् ।
4-3-11 कालाट्ठञ् ।
4-3-12 श्राद्धे शरदः ।
4-3-13 विभाषा रोगातपयोः ।
4-3-14 निशाप्रदोषाभ्यां च ।
4-3-15 श्वसस्तुट् च ।
4-3-16 संधिवेलाऽऽद्यृतुनक्षत्रेभ्योऽण् ।
4-3-17 प्रावृष एण्यः ।
4-3-18 वर्षाभ्यष्ठक् ।
4-3-19 छन्दसि ठञ् ।
4-3-20 वसन्ताच्च ।
4-3-21 हेमन्ताच्च ।
4-3-22 सर्वत्राण् च तलोपश्च ।
4-3-23 सायंचिरम्प्राह्णेप्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलौ तुट् च ।
4-3-24 विभाषा पूर्वाह्णापराह्णाभ्याम् ।
4-3-25 तत्र जातः ।
4-3-26 प्रावृषष्ठप्‌ ।
4-3-27 संज्ञायां शरदो वुञ् ।
4-3-28 पूर्वाह्णापराह्णार्द्रामूलप्रदोषावस्कराद्वुन् ।
4-3-29 पथः पन्थ च ।
4-3-30 अमावास्याया वा ।
4-3-31 अ च ।
4-3-32 सिन्ध्वपकराभ्यां कन् ।
4-3-33 अणञौ च ।
4-3-34 श्रविष्ठाफल्गुन्यनुराधास्वातितिष्यपुनर्वसुहस्त\-
विशाखाऽषाढाबहुलाल्लुक् ।
4-3-35 स्थानान्तगोशालखरशालाच्च ।
4-3-36 वत्सशालाऽभिजिदश्वयुक्छतभिषजो वा ।
4-3-37 नक्षत्रेभ्यो बहुलम् ।
4-3-38 कृतलब्धक्रीतकुशलाः ।
4-3-39 प्रायभवः ।
4-3-40 उपजानूपकर्णोपनीवेष्ठक् ।
4-3-41 संभूते ।
4-3-42 कोशाड्ढञ् ।
4-3-43 कालात्‌ साधुपुष्प्यत्पच्यमानेषु ।
4-3-44 उप्ते च ।
4-3-45 आश्वयुज्या वुञ् ।
4-3-46 ग्रीष्मवसन्तादन्यतरस्याम् ।
4-3-47 देयमृणे ।
4-3-48 कलाप्यश्वत्थयवबुसाद्वुन् ।
4-3-49 ग्रीष्मावरसमाद्वुञ् ।
4-3-50 संवत्सराग्रहायणीभ्यां ठञ् च ।
4-3-51 व्याहरति मृगः ।
4-3-52 तदस्य सोढम् ।
4-3-53 तत्र भवः ।
4-3-54 दिगादिभ्यो यत्‌ ।
4-3-55 शरीरावयवाच्च ।
4-3-56 दृतिकुक्षिकलशिवस्त्यस्त्यहेर्ढञ् ।
4-3-57 ग्रीवाभ्योऽण् च ।
4-3-58 गम्भीराञ्ञ्यः ।
4-3-59 अव्ययीभावाच्च ।
4-3-60 अन्तःपूर्वपदाट्ठञ् ।
4-3-61 ग्रामात्‌ पर्यनुपूर्वात्‌ ।
4-3-62 जिह्वामूलाङ्गुलेश्छः ।
4-3-63 वर्गान्ताच्च ।
4-3-64 अशब्दे यत्खावन्यतरस्याम् ।
4-3-65 कर्णललाटात्‌ कनलंकारे ।
4-3-66 तस्य व्याख्यान इति च व्याख्यातव्यनाम्नः ।
4-3-67 बह्वचोऽन्तोदात्ताट्ठञ् ।
4-3-68 क्रतुयज्ञेभ्यश्च ।
4-3-69 अध्यायेष्वेवर्षेः ।
4-3-70 पौरोडाशपुरोडाशात् ष्ठन् ।
4-3-71 छन्दसो यदणौ ।
4-3-72 द्व्यजृद्ब्राह्मणर्क्प्रथमाध्वरपुरश्चरण\-
नामाख्याताट्ठक् ।
4-3-73 अणृगयनादिभ्यः ।
4-3-74 तत आगतः ।
4-3-75 ठगायस्थानेभ्यः ।
4-3-76 शुण्डिकादिभ्योऽण् ।
4-3-77 विद्यायोनिसंबन्धेभ्यो वुञ् ।
4-3-78 ऋतष्ठञ् ।
4-3-79 पितुर्यच्च ।
4-3-80 गोत्रादङ्कवत्‌ ।
4-3-81 हेतुमनुष्येभ्योऽन्यतरस्यां रूप्यः ।
4-3-82 मयट् च ।
4-3-83 प्रभवति ।
4-3-84 विदूराञ्ञ्यः ।
4-3-85 तद्गच्छति पथिदूतयोः ।
4-3-86 अभिनिष्क्रामति द्वारम् ।
4-3-87 अधिकृत्य कृते ग्रन्थे ।
4-3-88 शिशुक्रन्दयमसभद्वंद्वेन्द्रजननादिभ्यश्छः ।
4-3-89 सोऽस्य निवासः ।
4-3-90 अभिजनश्च ।
4-3-91 आयुधजीविभ्यश्छः पर्वते ।
4-3-92 शण्डिकादिभ्यो ञ्यः ।
4-3-93 सिन्धुतक्षशिलाऽऽदिभ्योऽणञौ ।
4-3-94 तूदीशलातुरवर्मतीकूचवाराड्ढक्छण्ढञ्यकः ।
4-3-95 भक्तिः ।
4-3-96 अचित्ताददेशकालाट्ठक् ।
4-3-97 महाराजाट्ठञ् ।
4-3-98 वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् ।
4-3-99 गोत्रक्षत्रियाख्येभ्यो बहुलं वुञ् ।
4-3-100 जनपदिनां जनपदवत्‌ सर्वं जनपदेन समानशब्दानां
बहुवचने ।
4-3-101 तेन प्रोक्तम् ।
4-3-102 तित्तिरिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् ।
4-3-103 काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः ।
4-3-104 कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च ।
4-3-105 पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ।
4-3-106 शौनकादिभ्यश्छन्दसि ।
4-3-107 कठचरकाल्लुक् ।
4-3-108 कलापिनोऽण् ।
4-3-109 छगलिनो ढिनुक् ।
4-3-110 पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ।
4-3-111 कर्मन्दकृशाश्वादिनिः ।
4-3-112 तेनैकदिक् ।
4-3-113 तसिश्च ।
4-3-114 उरसो यच्च ।
4-3-115 उपज्ञाते ।
4-3-116 कृते ग्रन्थे ।
4-3-117 संज्ञायाम् ।
4-3-118 कुलालादिभ्यो वुञ् ।
4-3-119 क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ् ।
4-3-120 तस्येदम् ।
4-3-121 रथाद्यत्‌ ।
4-3-122 पत्त्रपूर्वादञ् ।
4-3-123 पत्त्राध्वर्युपरिषदश्च ।
4-3-124 हलसीराट्ठक् ।
4-3-125 द्वंद्वाद्वुन् वैरमैथुनिकयोः ।
4-3-126 गोत्रचरणाद्वुञ् ।
4-3-127 संघाङ्कलक्षणेष्वञ्यञिञामण् ।
4-3-128 शाकलाद्वा ।
4-3-129 छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह्वृचनटाञ्ञ्यः ।
4-3-130 न दण्डमाणवान्तेवासिषु ।
4-3-131 रैवतिकादिभ्यश्छः ।
4-3-132 कौपिञ्जलहास्तिपदादण् ।
4-3-133 आथर्वणिकस्येकलोपश्च ।
4-3-134 तस्य विकारः ।
4-3-135 अवयवे च प्राण्योषधिवृक्षेभ्यः ।
4-3-136 बिल्वादिभ्योऽण् ।
4-3-137 कोपधाच्च ।
4-3-138 त्रपुजतुनोः षुक् ।
4-3-139 ओरञ् ।
4-3-140 अनुदात्तादेश्च ।
4-3-141 पलाशादिभ्यो वा ।
4-3-142 शम्याष्ट्लञ् ।
4-3-143 मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः ।
4-3-144 नित्यं वृद्धशरादिभ्यः ।
4-3-145 गोश्च पुरीषे ।
4-3-146 पिष्टाच्च ।
4-3-147 संज्ञायां कन् ।
4-3-148 व्रीहेः पुरोडाशे ।
4-3-149 असंज्ञायां तिलयवाभ्याम्‌ ।
4-3-150 द्व्यचश्छन्दसि ।
4-3-151 नोत्वद्वर्ध्रबिल्वात्‌ ।
4-3-152 तालादिभ्योऽण् ।
4-3-153 जातरूपेभ्यः परिमाणे ।
4-3-154 प्राणिरजतादिभ्योऽञ् ।
4-3-155 ञितश्च तत्प्रत्ययात्‌ ।
4-3-156 क्रीतवत्‌ परिमाणात्‌ ।
4-3-157 उष्ट्राद्वुञ् ।
4-3-158 उमोर्णयोर्वा ।
4-3-159 एण्या ढञ् ।
4-3-160 गोपयसोर्यत्‌ ।
4-3-161 द्रोश्च ।
4-3-162 माने वयः ।
4-3-163 फले लुक् ।
4-3-164 प्लक्षादिभ्योऽण् ।
4-3-165 जम्ब्वा वा ।
4-3-166 लुप् च ।
4-3-167 हरीतक्यादिभ्यश्च ।
4-3-168 कंसीयपरशव्ययोर्यञञौ लुक् च ।
4-4-1 प्राग्वहतेष्ठक् ।
4-4-2 तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ।
4-4-3 संस्कृतम् ।
4-4-4 कुलत्थकोपधादण् ।
4-4-5 तरति ।
4-4-6 गोपुच्छाट्ठञ् ।
4-4-7 नौद्व्यचष्ठन् ।
4-4-8 चरति ।
4-4-9 आकर्षात् ष्ठल् ।
4-4-10 पर्पादिभ्यः ष्ठन् ।
4-4-11 श्वगणाट्ठञ्च ।
4-4-12 वेतनादिभ्यो जीवति ।
4-4-13 वस्नक्रयविक्रयाट्ठन् ।
4-4-14 आयुधाच्छ च ।
4-4-15 हरत्युत्सङ्गादिभ्यः ।
4-4-16 भस्त्राऽऽदिभ्यः ष्ठन् ।
4-4-17 विभाषा विवधवीवधात्‌ ।
4-4-18 अण् कुटिलिकायाः ।
4-4-19 निर्वृत्तेऽक्षद्यूतादिभ्यः ।
4-4-20 क्त्रेर्मम् नित्यं ।
4-4-21 अपमित्ययाचिताभ्यां कक्कनौ ।
4-4-22 संसृष्टे ।
4-4-23 चूर्णादिनिः ।
4-4-24 लवणाल्लुक् ।
4-4-25 मुद्गादण् ।
4-4-26 व्यञ्जनैरुपसिक्ते ।
4-4-27 ओजस्सहोऽम्भसा वर्तते ।
4-4-28 तत् प्रत्यनुपूर्वमीपलोमकूलम् ।
4-4-29 परिमुखं च ।
4-4-30 प्रयच्छति गर्ह्यम् ।
4-4-31 कुसीददशैकादशात्‌ ष्ठन्ष्ठचौ ।
4-4-32 उञ्छति ।
4-4-33 रक्षति ।
4-4-34 शब्ददर्दुरं करोति ।
4-4-35 पक्षिमत्स्यमृगान् हन्ति ।
4-4-36 परिपन्थं च तिष्ठति ।
4-4-37 माथोत्तरपदपदव्यनुपदं धावति ।
4-4-38 आक्रन्दाट्ठञ्च ।
4-4-39 पदोत्तरपदं गृह्णाति ।
4-4-40 प्रतिकण्ठार्थललामं च ।
4-4-41 धर्मं चरति ।
4-4-42 प्रतिपथमेति ठंश्च ।
4-4-43 समवायान् समवैति ।
4-4-44 परिषदो ण्यः ।
4-4-45 सेनाया वा ।
4-4-46 संज्ञायां ललाटकुक्कुट्यौ पश्यति ।
4-4-47 तस्य धर्म्यम् ।
4-4-48 अण् महिष्यादिभ्यः ।
4-4-49 ऋतोऽञ् ।
4-4-50 अवक्रयः ।
4-4-51 तदस्य पण्यम् ।
4-4-52 लवणाट्ठञ् ।
4-4-53 किशरादिभ्यः ष्ठन् ।
4-4-54 शलालुनोऽन्यतरस्याम् ।
4-4-55 शिल्पम्‌ ।
4-4-56 मड्डुकझर्झरादणन्यतरस्याम् ।
4-4-57 प्रहरणम् ।
4-4-58 परश्वधाट्ठञ्च ।
4-4-59 शक्तियष्ट्योरीकक् ।
4-4-60 अस्तिनास्तिदिष्टं मतिः ।
4-4-61 शीलम् ।
4-4-62 छत्रादिभ्यो णः ।
4-4-63 कर्माध्ययने वृत्तम् ।
4-4-64 बह्वच्पूर्वपदाट्ठच् ।
4-4-65 हितं भक्षाः ।
4-4-66 तदस्मै दीयते नियुक्तम् ।
4-4-67 श्राणामांसौदनाट्टिठन् ।
4-4-68 भक्तादणन्यतरस्याम् ।
4-4-69 तत्र नियुक्तः ।
4-4-70 अगारान्ताट्ठन् ।
4-4-71 अध्यायिन्यदेशकालात्‌ ।
4-4-72 कठिनान्तप्रस्तारसंस्थानेषु व्यवहरति ।
4-4-73 निकटे वसति ।
4-4-74 आवसथात् ष्ठल् ।
4-4-75 प्राग्घिताद्यत्‌ ।
4-4-76 तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् ।
4-4-77 धुरो यड्ढकौ ।
4-4-78 खः सर्वधुरात्‌ ।
4-4-79 एकधुराल्लुक् च ।
4-4-80 शकटादण् ।
4-4-81 हलसीराट्ठक् ।
4-4-82 संज्ञायां जन्याः ।
4-4-83 विध्यत्यधनुषा ।
4-4-84 धनगणं लब्धा ।
4-4-85 अन्नाण्णः ।
4-4-86 वशं गतः ।
4-4-87 पदमस्मिन् दृश्यम्‌ ।
4-4-88 मूलमस्याबर्हि ।
4-4-89 संज्ञायां धेनुष्या ।
4-4-90 गृहपतिना संयुक्ते ञ्यः ।
4-4-91 नौवयोधर्मविषमूलमूलसीतातुलाभ्यस्तार्यतुल्यप्राप्य\-
वध्यानाम्यसमसमितसम्मितेषु ।
4-4-92 धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते ।
4-4-93 छन्दसो निर्मिते ।
4-4-94 उरसोऽण् च ।
4-4-95 हृदयस्य प्रियः ।
4-4-96 बन्धने चर्षौ ।
4-4-97 मतजनहलात्‌ करणजल्पकर्षेषु ।
4-4-98 तत्र साधुः ।
4-4-99 प्रतिजनादिभ्यः खञ् ।
4-4-100 भक्ताण्णः ।
4-4-101 परिषदो ण्यः ।
4-4-102 कथाऽऽदिभ्यष्ठक् ।
4-4-103 गुडादिभ्यष्ठञ् ।
4-4-104 पथ्यतिथिवसतिस्वपतेर्ढञ् ।
4-4-105 सभाया यः ।
4-4-106 ढश्छन्दसि ।
4-4-107 समानतीर्थे वासी ।
4-4-108 समानोदरे शयित ओ चोदात्तः ।
4-4-109 सोदराद्यः ।
4-4-110 भवे छन्दसि ।
4-4-111 पाथोनदीभ्यां ड्यण् ।
4-4-112 वेशन्तहिमवद्भ्यामण् ।
4-4-113 स्रोतसो विभाषा ड्यड्ड्यौ ।
4-4-114 सगर्भसयूथसनुताद्यन् ।
4-4-115 तुग्राद्घन् ।
4-4-116 अग्राद्यत्‌ ।
4-4-117 घच्छौ च ।
4-4-118 समुद्राभ्राद्घः ।
4-4-119 बर्हिषि दत्तम् ।
4-4-120 दूतस्य भागकर्मणी ।
4-4-121 रक्षोयातूनां हननी ।
4-4-122 रेवतीजगतीहविष्याभ्यः प्रशस्ये ।
4-4-123 असुरस्य स्वम् ।
4-4-124 मायायामण् ।
4-4-125 तद्वानासामुपधानो मन्त्र इतीष्टकासु लुक् च मतोः ।
4-4-126 अश्विमानण् ।
4-4-127 वयस्यासु मूर्ध्नो मतुप्‌ ।
4-4-128 मत्वर्थे मासतन्वोः ।
4 4-129 मधोर्ञ च ।
4-4-130 ओजसोऽहनि यत्खौ ।
4-4-131 वेशोयशआदेर्भगाद्यल् ।
4-4-132 ख च ।
4-4-133 पूर्वैः कृतमिनियौ च ।
4-4-134 अद्भिः संस्कृतम् ।
4-4-135 सहस्रेण संमितौ घः ।
4-4-136 मतौ च ।
4-4-137 सोममर्हति यः ।
4-4-138 मये च ।
4-4-139 मधोः ।
4-4-140 वसोः समूहे च ।
4-4-141 नक्षत्राद्घः ।
4-4-142 सर्वदेवात्‌ तातिल् ।
4-4-143 शिवशमरिष्टस्य करे ।
4-4-144 भावे च ।

Chapter -5

5-1-1 प्राक् क्रीताच्छः ।
5-1-2 उगवादिभ्योऽत्‌ ।
5-1-3 कम्बलाच्च संज्ञायाम् ।
5-1-4 विभाषा हविरपूपादिभ्यः ।
5-1-5 तस्मै हितम् ।
5-1-6 शरीरावयवाद्यत्‌ ।
5-1-7 खलयवमाषतिलवृषब्रह्मणश्च ।
5-1-8 अजाविभ्यां थ्यन् ।
5-1-9 आत्मन्विश्वजनभोगोत्तरपदात्‌ खः ।
5-1-10 सर्वपुरुषाभ्यां णढञौ ।
5-1-11 माणवचरकाभ्यां खञ् ।
5-1-12 तदर्थं विकृतेः प्रकृतौ ।
5-1-13 छदिरुपधिबलेः ढञ् ।
5-1-14 ऋषभोपानहोर्ञ्यः ।
5-1-15 चर्म्मणोऽञ् ।
5-1-16 तदस्य तदस्मिन् स्यादिति ।
5-1-17 परिखाया ढञ् ।
5-1-18 प्राग्वतेष्ठञ् ।
5-1-19 आर्हादगोपुच्छसंख्यापरिमाणाट्ठक् ।
5-1-20 असमासे निष्कादिभ्यः ।
5-1-21 शताच्च ठन्यतावशते ।
5-1-22 संख्याया अतिशदन्तायाः कन् ।
5-1-23 वतोरिड्वा ।
5-1-24 विंशतित्रिंशद्भ्यां ड्वुन्नसंज्ञायाम्‌ ।
5-1-25 कंसाट्टिठन् ।
5-1-26 शूर्पादञन्यतरस्याम् ।
5-1-27 शतमानविंशतिकसहस्रवसनादण् ।
5-1-28 अध्यर्धपूर्वद्विगोर्लुगसंज्ञायाम् ।
5-1-29 विभाषा कार्षापणसहस्राभ्याम् ।
5-1-30 द्वित्रिपूर्वान्निष्कात्‌ ।
5-1-31 बिस्ताच्च ।
5-1-32 विंशतिकात्‌ खः ।
5-1-33 खार्या ईकन् ।
5-1-34 पणपादमाषशतादत्‌ ।
5-1-35 शाणाद्वा ।
5-1-36 द्वित्रिपूर्वादण् च ।
5-1-37 तेन क्रीतम् ।
5-1-38 तस्य निमित्तं संयोगोत्पातौ ।
5-1-39 गोद्व्यचोरसंख्यापरिमाणाश्वादेर्यत्‌ ।
5-1-40 पुत्राच्छ च ।
5-1-41 सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ ।
5-1-42 तस्येश्वरः ।
5-1-43 तत्र विदित इति च ।
5-1-44 लोकसर्वलोकाट्ठञ् ।
5-1-45 तस्य वापः ।
5-1-46 पात्रात् ष्ठन् ।
5-1-47 तदस्मिन् वृद्ध्यायलाभशुल्कोपदा दीयते ।
5-1-48 पूरणार्धाट्ठन् ।
5-1-49 भागाद्यच्च ।
5-1-50 तद्धरति वहत्यावहति भाराद्वंशादिभ्यः ।
5-1-51 वस्नद्रव्याभ्यां ठन्कनौ ।
5-1-52 सम्भवत्यवहरति पचति ।
5-1-53 आढकाचितपात्रात्‌ खोऽन्यतरयाम् ।
5-1-54 द्विगोष्ठंश्च ।
5-1-55 कुलिजाल्लुक्खौ च ।
5-1-56 सोऽस्यांशवस्नभृतयः ।
5-1-57 तदस्य परिमाणम् ।
5-1-58 संख्यायाः संज्ञासंघसूत्राध्ययनेषु ।
5-1-59 पङ्क्तिविंशतित्रिंशत्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टि\-
सप्तत्यशीतिनवतिशतम् ।
5-1-60 पञ्चद्दशतौ वर्गे वा ।
5-1-61 सप्तनोऽञ् छन्दसि ।
5-1-62 त्रिंशच्चत्वारिंशतोर्ब्राह्मणे संज्ञायां डण् ।
5-1-63 तद् अर्हति ।
5-1-64 छेदादिभ्यो नित्यम् ।
5-1-65 शीर्षच्छेदाद्यच्च ।
5-1-66 दण्डादिभ्यः ।
5-1-67 छन्दसि च ।
5-1-68 पात्राद्घंश्च ।
5-1-69 कडङ्गरदक्षिणाच्छ च ।
5-1-70 स्थालीबिलात्‌ ।
5-1-71 यज्ञर्त्विग्भ्यां घखञौ ।
5-1-72 पारायणतुरायणचान्द्रायणं वर्तयति ।
5-1-73 संशयमापन्नः ।
5-1-74 योजनं गच्छति ।
5-1-75 पथः ष्कन् ।
5-1-76 पन्थो ण नित्यम् ।
5-1-77 उत्तरपथेनाहृतं च ।
5-1-78 कालात्‌ ।
5-1-79 तेन निर्वृत्तम् ।
5-1-80 तमधीष्टो भृतो भूतो भावी ।
5-1-81 मासाद्वयसि यत्खञौ ।
5-1-82 द्विगोर्यप्‌ ।
5-1-83 षण्मासाण्ण्यच्च ।
5-1-84 अवयसि ठंश्च ।
5-1-85 समायाः खः ।
5-1-86 द्विगोर्वा ।
5-1-87 रात्र्यहस्संवत्सराच्च ।
5-1-88 वर्षाल्लुक् च ।
5-1-89 चित्तवति नित्यम् ।
5-1-90 षष्टिकाः षष्टिरात्रेण पच्यन्ते ।
5-1-91 वत्सरान्ताच्छश्छन्दसि ।
5-1-92 सम्परिपूर्वात्‌ ख च ।
5-1-93 तेन परिजय्यलभ्यकार्यसुकरम् ।
5-1-94 तदस्य ब्रह्मचर्यम् ।
5-1-95 तस्य च दक्षिणा यज्ञाख्येभ्यः ।
5-1-96 तत्र च दीयते कार्यं भववत्‌ ।
5-1-97 व्युष्टादिभ्योऽण् ।
5-1-98 तेन यथाकथाचहस्ताभ्यां णयतौ ।
5-1-99 सम्पादिनि ।
5-1-100 कर्मवेषाद्यत् ।
5-1-101 तस्मै प्रभवति संतापादिभ्यः ।
5-1-102 योगाद्यच्च ।
5-1-103 कर्मण उकञ् ।
5-1-104 समयस्तदस्य प्राप्तम् ।
5-1-105 ऋतोरण् ।
5-1-106 छन्दसि घस् ।
5-1-107 कालाद्यत्‌ ।
5-1-108 प्रकृष्टे ठञ् ।
5-1-109 प्रयोजनम् ।
5-1-110 विशाखाऽऽषाढादण् मन्थदण्डयोः ।
5-1-111 अनुप्रवचनादिभ्यश्छः ।
5-1-112 समापनात्‌ सपूर्वपदात्‌ ।
5-1-113 ऐकागारिकट् चौरे ।
5-1-114 आकालिकडाद्यन्तवचने ।
5-1-115 तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः ।
5-1-116 तत्र तस्येव ।
5-1-117 तदर्हम् ।
5-1-118 उपसर्गाच्छन्दसि धात्वर्थे ।
5-1-119 तस्य भावस्त्वतलौ ।
5-1-120 आ च त्वात्‌ ।
5-1-121 न – नञ्पूर्वात्तत्पुरुषादचतुरसंगतलवणवटयुधकतर- सलसेभ्यः ।
5-1-122 पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा ।
5-1-123 वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च ।
5-1-124 गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च ।
5-1-125 स्तेनाद्यन्नलोपश्च ।
5-1-126 सख्युर्यः ।
5-1-127 कपिज्ञात्योर्ढक् ।
5-1-128 पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् ।
5-1-129 प्राणभृज्जातिवयोवचनोद्गात्रादिभ्योऽञ् ।
5-1-130 हायनान्तयुवादिभ्योऽण् ।
5-1-131 इगन्ताच्च लघुपूर्वात्‌ ।
5-1-132 योपधाद्गुरूपोत्तमाद्वुञ् ।
5-1-133 द्वंद्वमनोज्ञादिभ्यश्च ।
5-1-134 गोत्रचरणाच्श्लाघाऽत्याकारतदवेतेषु ।
5-1-135 होत्राभ्यश्छः ।
5-1-136 ब्रह्मणस्त्वः ।
5-2-1 धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् ।
5-2-2 व्रीहिशाल्योर्ढक् ।
5-2-3 यवयवकषष्टिकादत्‌ ।
5-2-4 विभाषा तिलमाषोमाभङ्गाऽणुभ्यः ।
5-2-5 सर्वचर्मणः कृतः खखञौ ।
5-2-6 यथामुखसंमुखस्य दर्शनः खः ।
5-2-7 तत्सर्वादेः पथ्यङ्गकर्मपत्रपात्रं व्याप्नोति ।
5-2-8 आप्रपदं प्राप्नोति ।
5-2-9 अनुपदसर्वान्नायानयं बद्धाभक्षयतिनेयेषु ।
5-2-10 परोवरपरम्परपुत्रपौत्रमनुभवति ।
5-2-11 अवारपारात्यन्तानुकामं गामी ।
5-2-12 समांसमां विजायते ।
5-2-13 अद्यश्वीनाऽवष्टब्धे ।
5-2-14 आगवीनः ।
5-2-15 अनुग्वलंगामी ।
5-2-16 अध्वनो यत्खौ ।
5-2-17 अभ्यमित्राच्छ च ।
5-2-18 गोष्ठात्‌ खञ् भूतपूर्वे ।
5-2-19 अश्वस्यैकाहगमः ।
5-2-20 शालीनकौपीने अधृष्टाकार्ययोः ।
5-2-21 व्रातेन जीवति ।
5-2-22 साप्तपदीनं सख्यम् ।
5-2-23 हैयंगवीनं संज्ञायाम् ।
5-2-24 तस्य पाकमूले पील्वदिकर्णादिभ्यः कुणब्जाहचौ ।
5-2-25 पक्षात्तिः ।
5-2-26 तेन वित्तश्चुञ्चुप्चणपौ ।
5-2-27 विनञ्भ्यां नानाञौ नसह ।
5-2-28 वेः शालच्छङ्कटचौ ।
5-2-29 सम्प्रोदश्च कटच् ।
5-2-30 अवात्‌ कुटारच्च ।
5-2-31 नते नासिकायाः संज्ञायां टीटञ्नाटज्भ्राटचः ।
5-2-32 नेर्बिडज्बिरीसचौ ।
5-2-33 इनच्पिटच्चिकचि च ।
5-2-34 उपाधिभ्यां त्यकन्नासन्नारूढयोः ।
5-2-35 कर्मणि घटोऽठच् ।
5-2-36 तदस्य संजातं तारकाऽऽदिभ्य इतच् ।
5-2-37 प्रमाणे द्वयसज्दघ्नञ्मात्रचः ।
5-2-38 पुरुषहस्तिभ्यामण् च ।
5-2-39 यद्तदेतेभ्यः परिमाणे वतुप्‌ ।
5-2-40 किमिदंभ्यां वो घः ।
5-2-41 किमः संख्यापरिमाणे डति च ।
5-2-42 संख्याया अवयवे तयप्‌ ।
5-2-43 द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा ।
5-2-44 उभादुदात्तो नित्यम् ।
5-2-45 तदस्मिन्नधिकमिति दशान्ताड्डः ।
5-2-46 शदन्तविंशतेश्च ।
5-2-47 संख्याया गुणस्य निमाने मयट् ।
5-2-48 तस्य पूरणे डट् ।
5-2-49 नान्तादसंख्याऽऽदेर्मट् ।
5-2-50 थट् च च्छन्दसि ।
5-2-51 षट्कतिकतिपयचतुरां थुक् ।
5-2-52 बहुपूगगणसंघस्य तिथुक् ।
5-2-53 वतोरिथुक् ।
5-2-54 द्वेस्तीयः ।
5-2-55 त्रेः सम्प्रसारणम् च ।
5-2-56 विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् ।
5-2-57 नित्यं शतादिमासार्धमाससंवत्सराच्च ।
5-2-58 षष्ट्यादेश्चासंख्याऽऽदेः ।
5-2-59 मतौ च्छः सूक्तसाम्नोः ।
5-2-60 अध्यायानुवाकयोर्लुक् ।
5-2-61 विमुक्तादिभ्योऽण् ।
5-2-62 गोषदादिभ्यो वुन् ।
5-2-63 तत्र कुशलः पथः ।
5-2-64 आकर्षादिभ्यः कन् ।
5-2-65 धनहिरण्यात्‌ कामे ।
5-2-66 स्वाङ्गेभ्यः प्रसिते ।
5-2-67 उदराट्ठगाद्यूने ।
5-2-68 सस्येन परिजातः ।
5-2-69 अंशं हारी ।
5-2-70 तन्त्रादचिरापहृते ।
5-2-71 ब्राह्मणकोष्णिके संज्ञायाम् ।
5-2-72 शीतोष्णाभ्यां कारिणि ।
5-2-73 अधिकम् ।
5-2-74 अनुकाभिकाभीकः कमिता ।
5-2-75 पार्श्वेनान्विच्छति ।
5-2-76 अयःशूलदण्डाजिनाभ्यां ठक्ठञौ ।
5-2-77 तावतिथं ग्रहणमिति लुग्वा ।
5-2-78 स एषां ग्रामणीः ।
5-2-79 शृङ्खलमस्य बन्धनं करभे ।
5-2-80 उत्क उन्मनाः ।
5-2-81 कालप्रयोजनाद्रोगे ।
5-2-82 तदस्मिन्नन्नं प्राये संज्ञायाम्‌ ।
5-2-83 कुल्माषादञ् ।
5-2-84 श्रोत्रियंश्छन्दोऽधीते ।
5-2-85 श्राद्धमनेन भुक्तमिनिठनौ ।
5-2-86 पूर्वादिनिः ।
5-2-87 सपूर्वाच्च ।
5-2-88 इष्टादिभ्यश्च ।
5-2-89 छन्दसि परिपन्थिपरिपरिणौ पर्यवस्थातरि ।
5-2-90 अनुपद्यन्वेष्टा ।
5-2-91 साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम् ।
5-2-92 क्षेत्रियच् परक्षेत्रे चिकित्स्यः ।
5-2-93
इन्द्रियमिन्द्रलिंगमिन्द्रदृष्टमिन्द्रसृष्टमिन्द्रजुष्टम्\-
इन्द्रदत्तमिति वा ।
5-2-94 तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप्‌ ।
5-2-95 रसादिभ्यश्च ।
5-2-96 प्राणिस्थादातो लजन्यतरस्याम् ।
5-2-97 सिध्मादिभ्यश्च ।
5-2-98 वत्सांसाभ्यां कामबले ।
5-2-99 फेनादिलच् च ।
5-2-100 लोमादिपामादिपिच्छादिभ्यः शनेलचः ।
5-2-101 प्रज्ञाश्रद्धाऽर्चावृत्तिभ्यो णः ।
5-2-102 तपःसहस्राभ्यां विनीनी ।
5-2-103 अण् च ।
5-2-104 सिकताशर्कराभ्यां च ।
5-2-105 देशे लुबिलचौ च ।
5-2-106 दन्त उन्नत उरच् ।
5-2-107 ऊषसुषिमुष्कमधो रः ।
5-2-108 द्युद्रुभ्यां मः ।
5-2-109 केशाद्वोऽन्यतरस्याम् ।
5-2-110 गाण्ड्यजगात्‌ संज्ञायाम् ।
5-2-111 काण्डाण्डादीरन्नीरचौ ।
5-2-112 रजःकृष्यासुतिपरिषदो वलच् ।
5-2-113 दन्तशिखात्‌ संज्ञायाम् ।
5-2-114 ज्योत्स्नातमिस्राशृङ्गिणोजस्विन्नूर्जस्वलगोमिन्\-
मलिनमलीमसाः ।
5-2-115 अत इनिठनौ ।
5-2-116 व्रीह्यादिभ्यश्च ।
5-2-117 तुन्दादिभ्य इलच् च ।
5-2-118 एकगोपूर्वाट्ठञ् नित्यम् ।
5-2-119 शतसहस्रान्ताच्च निष्कात्‌ ।
5-2-120 रूपादाहतप्रशंसयोरप्‌ ।
5-2-121 अस्मायामेधास्रजो विनिः ।
5-2-122 बहुलं छन्दसि ।
5-2-123 ऊर्णाया युस् ।
5-2-124 वाचो ग्मिनिः ।
5-2-125 आलजाटचौ बहुभाषिणि ।
5-2-126 स्वामिन्नैश्वर्ये ।
5-2-127 अर्शआदिभ्योऽच् ।
5-2-128 द्वंद्वोपतापगर्ह्यात्‌ प्राणिस्थादिनिः ।
5-2-129 वातातिसाराभ्यां कुक् च ।
5-2-130 वयसि पूरणात्‌ ।
5-2-131 सुखादिभ्यश्च ।
5-2-132 धर्मशीलवर्णान्ताच्च ।
5-2-133 हस्ताज्जातौ ।
5-2-134 वर्णाद्ब्रह्मचारिणि ।
5-2-135 पुष्करादिभ्यो देशे ।
5-2-136 बलादिभ्यो मतुबन्यतरस्याम् ।
5-2-137 संज्ञायां मन्माभ्याम्.ह् ।
5-2-138 कंशंभ्यां बभयुस्तितुतयसः ।
5-2-139 तुन्दिवलिवटेर्भः ।
5-2-140 अहंशुभमोर्युस् ।
5-3-1 प्राग्दिशो विभक्तिः ।
5-3-2 किंसर्वनामबहुभ्योऽद्व्यादिभ्यः ।
5-3-3 इदम इश् ।
5-3-4 एतेतौ रथोः ।
5-3-5 एतदोऽश् ।
5-3-6 सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि ।
5-3-7 पञ्चम्यास्तसिल् ।
5-3-8 तसेश्च ।
5-3-9 पर्यभिभ्यां च ।
5-3-10 सप्तम्यास्त्रल् ।
5-3-11 इदमो हः ।
5-3-12 किमोऽत्‌ ।
5-3-13 वा ह च च्छन्दसि ।
5-3-14 इतराभ्योऽपि दृश्यन्ते ।
5-3-15 सर्वैकान्यकिंयत्तदः काले दा ।
5-3-16 इदमो र्हिल् ।
5-3-17 अधुना ।
5-3-18 दानीं च ।
5-3-19 तदो दा च ।
5-3-20 तयोर्दार्हिलौ च च्छन्दसि ।
5-3-21 अनद्यतने र्हिलन्यतरस्याम् ।
5-3-22 सद्यःपरुत्परार्यैषमःपरेद्यव्यद्यपूर्वेद्युरन्येद्युर्\-
अन्यतरेद्युरितरेद्युरपरेद्युरधरेद्युरुभयेद्युरुत्तरेद्युः ।
5-3-23 प्रकारवचने थाल् ।
5-3-24 इदमस्थमुः ।
5-3-25 किमश्च ।
5-3-26 था हेतौ च च्छन्दसि ।
5-3-27 दिक्‌शब्देभ्यः सप्तमीपञ्चमीप्रथमाभ्यो
दिग्देशकालेष्वस्तातिः ।
5-3-28 दक्षिणोत्तराभ्यामतसुच् ।
5-3-29 विभाषा परावराभ्याम् ।
5-3-30 अञ्चेर्लुक् ।
5-3-31 उपर्युपरिष्टात्‌ ।
5-3-32 पश्चात्‌ ।
5-3-33 पश्च पश्चा च च्छन्दसि ।
5-3-34 उत्तराधरदक्षिणादातिः ।
5-3-35 एनबन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः ।
5-3-36 दक्षिणादाच् ।
5-3-37 आहि च दूरे ।
5-3-38 उत्तराच्च ।
5-3-39 पूर्वाधरावराणामसि पुरधवश्चैषाम्‌ ।
5-3-40 अस्ताति च ।
5-3-41 विभाषाऽवरस्य ।
5-3-42 संख्याया विधाऽर्थे धा ।
5-3-43 अधिकरणविचाले च ।
5-3-44 एकाद्धो ध्यमुञन्यारयाम् ।
5-3-45 द्वित्र्योश्च धमुञ् ।
5-3-46 एधाच्च ।
5-3-47 याप्ये पाशप्‌ ।
5-3-48 पूरणाद्भागे तीयादन् ।
5-3-49 प्रागेकादशभ्योऽच्छन्दसि ।
5-3-50 षष्ठाष्टमाभ्यां ञ च ।
5-3-51 मानपश्वङ्गयोः कन्लुकौ च ।
5-3-52 एकादाकिनिच्चासहाये ।
5-3-53 भूतपूर्वे चरट् ।
5-3-54 षष्ठ्या रूप्य च ।
5-3-55 अतिशायने तमबिष्ठनौ ।
5-3-56 तिङश्च ।
5-3-57 द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ ।
5-3-58 अजादी गुणवचनादेव ।
5-3-59 तुश्छन्दसि ।
5-3-60 प्रशस्यस्य श्रः ।
5-3-61 ज्य च ।
5-3-62 वृद्धस्य च ।
5-3-63 अन्तिकबाढयोर्नेदसाधौ ।
5-3-64 युवाल्पयोः कनन्यतरस्याम् ।
5-3-65 विन्मतोर्लुक् ।
5-3-66 प्रशंसायां रूपप्‌ ।
5-3-67 ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः ।
5-3-68 विभाषा सुपो बहुच् पुरस्तात्तु ।
5-3-69 प्रकारवचने जातीयर्।
5-3-70 प्रागिवात्कः ।
5-3-71 अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टेः ।
5-3-72 कस्य च दः ।
5-3-73 अज्ञाते ।
5-3-74 कुत्सिते ।
5-3-75 संज्ञायां कन् ।
5-3-76 अनुकम्पायाम् ।
5-3-77 नीतौ च तद्युक्तात्‌ ।
5-3-78 बह्वचो मनुष्यनाम्नष्ठज्वा ।
5-3-79 घनिलचौ च ।
5-3-80 प्राचामुपादेरडज्वुचौ च ।
5-3-81 जातिनाम्नः कन् ।
5-3-82 अजिनान्तस्योत्तरपदलोपश्च ।
5-3-83 ठाजादावूर्ध्वं द्वितीयादचः ।
5-3-84 शेवलसुपरिविशालवरुणार्यमादीनां तृतीयात्‌ ।
5-3-85 अल्पे ।
5-3-86 ह्रस्वे ।
5-3-87 संज्ञायां कन् ।
5-3-88 कुटीशमीशुण्डाभ्यो रः ।
5-3-89 कुत्वा डुपच् ।
5-3-90 कासूगोणीभ्यां ष्टरच् ।
5-3-91 वत्सोक्षाश्वर्षभेभ्यश्च तनुत्वे ।
5-3-92 किंयत्तदो निर्द्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच् ।
5-3-93 वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच् ।
5-3-94 एकाच्च प्राचाम् ।
5-3-95 अवक्षेपणे कन् ।
5-3-96 इवे प्रतिकृतौ ।
5-3-97 संज्ञायां च ।
5-3-98 लुम्मनुष्ये ।
5-3-99 जीविकाऽर्थे चापण्ये ।
5-3-100 देवपथादिभ्यश्च ।
5-3-101 वस्तेर्ढञ् ।
5-3-102 शिलाया ढः ।
5-3-103 शाखाऽऽदिभ्यो यत्‌ ।
5-3-104 द्रव्यं च भव्ये ।
5-3-105 कुशाग्राच्छः ।
5-3-106 समासाच्च तद्विषयात्‌ ।
5-3-107 शर्कराऽऽदिभ्योऽण् ।
5-3-108 अङ्गुल्यादिभ्यष्ठक् ।
5-3-109 एकशालायाष्ठजन्यतरस्याम् ।
5-3-110 कर्कलोहितादीकक् ।
5-3-111 प्रत्नपूर्वविश्वेमात्थाल् छन्दसि ।
5-3-112 पूगाञ्ञ्योऽग्रामणीपूर्वात्‌ ।
5-3-113 व्रातच्फञोरस्त्रियाम् ।
5-3-114 आयुधजीविसंघाञ्ञ्यड्वाहीकेष्वब्राह्मणराजन्यात्‌ ।
5-3-115 वृकाट्टेण्यण् ।
5-3-116 दामन्यादित्रिगर्तषष्ठाच्छः ।
5-3-117 पर्श्वादियौधेयादिभ्यामणञौ ।
5-3-118
अभिजिद्विदभृच्छालावच्छिखावच्छमीवदूर्णावच्छ्रुमदणो
यञ् ।
5-3-119 ञ्य्आदयस्तद्राजाः ।
5-4-1 पादशतस्य संख्याऽऽदेर्वीप्सायां वुन् लोपश्च ।
5-4-2 दण्डव्यवसर्गयोश्च ।
5-4-3 स्थूलादिभ्यः प्रकारवचने कन् ।
5-4-4 अनत्यन्तगतौ क्तात्‌ ।
5-4-5 न सामिवचने ।
5-4-6 बृहत्या आच्छादने ।
5-4-7 अषडक्षाशितङ्ग्वलंकर्मालम्पुरुषाध्युत्तरपदात्‌
खः ।
5-4-8 विभाषा अञ्चेरदिक्स्त्रियाम् ।
5-4-9 जात्यन्ताच्छ बन्धुनि ।
5-4-10 स्थानान्ताद्विभाषा सस्थानेनेति चेत्‌ ।
5-4-11 किमेत्तिङव्ययघादाम्वद्रव्यप्रकर्षे ।
5-4-12 अमु च च्छन्दसि ।
5-4-13 अनुगादिनष्ठक् ।
5-4-14 णचः स्त्रियामञ् ।
5-4-15 अणिनुणः ।
5-4-16 विसारिणो मत्स्ये ।
5-4-17 संख्यायाः क्रियाऽभ्यावृत्तिगणने कृत्वसुच् ।
5-4-18 द्वित्रिचतुर्भ्यः सुच् ।
5-4-19 एकस्य सकृच्च ।
5-4-20 विभाषा बहोर्धाऽविप्रकृष्टकाले ।
5-4-21 तत्प्रकृतवचने मयट् ।
5-4-22 समूहवच्च बहुषु ।
5-4-23 अनन्तावसथेतिहभेषजाञ्ञ्यः ।
5-4-24 देवतान्तात्तादर्थ्ये यत्‌ ।
5-4-25 पादार्घाभ्यां च ।
5-4-26 अतिथेर्ञ्यः ।
5-4-27 देवात्तल् ।
5-4-28 अवेः कः ।
5-4-29 यावादिभ्यः कन् ।
5-4-30 लोहितान्मणौ ।
5-4-31 वर्णे चानित्ये ।
5-4-32 रक्ते ।
5-4-33 कालाच्च ।
5-4-34 विनयादिभ्यष्ठक् ।
5-4-35 वाचो व्याहृतार्थायाम् ।
5-4-36 तद्युक्तात्‌ कर्मणोऽण् ।
5-4-37 ओषधेरजातौ ।
5-4-38 प्रज्ञादिभ्यश्च ।
5-4-39 मृदस्तिकन् ।
5-4-40 सस्नौ प्रशंसायाम् ।
5-4-41 वृकज्येष्ठाभ्यां तिल्तातिलौ च च्छन्दसि ।
5-4-42 बह्वल्पार्थाच्छस् कारकादन्यतरस्याम् ।
5-4-43 संख्यैकवचनाच्च वीप्सायाम् ।
5-4-44 प्रतियोगे पञ्चम्यास्तसिः ।
5-4-45 अपादाने चाहीयरुहोः ।
5-4-46 अतिग्रहाव्यथनक्षेपेष्वकर्तरि तृतीयायाः ।
5-4-47 हीयमानपापयोगाच्च ।
5-4-48 षष्ठ्या व्याश्रये ।
5-4-49 रोगाच्चापनयने ।
5-4-50 अभूततद्भावे कृभ्वस्तियोगे सम्पद्यकर्तरि च्विः ।
5-4-51 अरुर्मनश्चक्षुश्चेतोरहोरजसां लोपश्च ।
5-4-52 विभाषा साति कार्त्स्न्ये ।
5-4-53 अभिविधौ सम्पदा च ।
5-4-54 तदधीनवचने ।
5-4-55 देये त्रा च ।
5-4-56 देवमनुष्यपुरुषमर्त्येभ्यो द्वितीयासप्तम्योर्बहुलम् ।
5-4-57 अव्यक्तानुकरणाद्द्व्यजवरार्धादनितौ डाच् ।
5-4-58 कृञो द्वितीयतृतीयशम्बबीजात्‌ कृषौ ।
5-4-59 संख्यायाश्च गुणान्तायाः ।
5-4-60 समयाच्च यापनायाम् ।
5-4-61 सपत्त्रनिष्पत्रादतिव्यथने ।
5-4-62 निष्कुलान्निष्कोषणे ।
5-4-63 सुखप्रियादानुलोम्ये ।
5-4-64 दुःखात्‌ प्रातिलोम्ये ।
5-4-65 शूलात्‌ पाके ।
5-4-66 सत्यादशपथे ।
5-4-67 मद्रात्‌ परिवापणे ।
5-4-68 समासान्ताः ।
5-4-69 न पूजनात्‌ ।
5-4-70 किमः क्षेपे ।
5-4-71 नञस्तत्पुरुषात्‌ ।
5-4-72 पथो विभाषा ।
5-4-73 बहुव्रीहौ संख्येये डजबहुगणात्‌ ।
5-4-74 ऋक्पूरप्धूःपथामानक्षे ।
5-4-75 अच्‌ प्रत्यन्ववपूर्वात्‌ सामलोम्नः ।
5-4-76 अक्ष्णोऽदर्शनात्‌ ।
5-4-77 अचतुरविचतुरसुचतुरस्त्रीपुंसधेन्वनडुहर्क्साम\-
वाङ्मनसाक्षिभ्रुवदारगवोर्वष्ठीवपदष्ठीवनक्तंदिव\-
रत्रिंदिवाहर्दिवसरजसनिःश्रेयसपुरुषायुषद्व्यायुष\- त्र्यायुषर्ग्यजुषजातोक्षमहोक्षवृद्धोक्षोपशुनगोष्ठश्वाः ।
5-4-78 ब्रह्महस्तिभ्याम् वर्च्चसः ।
5-4-79 अवसमन्धेभ्यस्तमसः ।
5-4-80 श्वसो वसीयःश्रेयसः ।
5-4-81 अन्ववतप्ताद्रहसः ।
5-4-82 प्रतेरुरसः सप्तमीस्थात्‌ ।
5-4-83 अनुगवमायामे ।
5-4-84 द्विस्तावा त्रिस्तावा वेदिः ।
5-4-85 उपसर्गादध्वनः ।
5-4-86 तत्पुरुषस्याङ्गुलेः संख्याऽव्ययादेः ।
5-4-87 अहस्सर्वैकदेशसंख्यातपुण्याच्च रात्रेः ।
5-4-88 अह्नोऽह्न एतेभ्यः ।
5-4-89 न संख्याऽऽदेः समाहारे ।
5-4-90 उत्तमैकाभ्यां च ।
5-4-91 राजाऽहस्सखिभ्यष्टच्‌ ।
5-4-92 गोरतद्धितलुकि ।
5-4-93 अग्राख्यायामुरसः ।
5-4-94 अनोऽश्मायस्सरसाम् जातिसंज्ञयोः ।
5-4-95 ग्रामकौटाभ्यां च तक्ष्णः ।
5-4-96 अतेः शुनः ।
5-4-97 उपमानादप्राणिषु ।
5-4-98 उत्तरमृगपूर्वाच्च सक्थ्नः ।
5-4-99 नावो द्विगोः ।
5-4-100 अर्धाच्च ।
5-4-101 खार्याः प्राचाम् ।
5-4-102 द्वित्रिभ्यामञ्जलेः ।
5-4-103 अनसन्तान्नपुंसकाच्छन्दसि ।
5-4-104 ब्रह्मणो जानपदाख्यायाम् ।
5-4-105 कुमहद्भ्यामन्यतरस्याम्‌ ।
5-4-106 द्वंद्वाच्चुदषहान्तात् समाहारे ।
5-4-107 अव्ययीभावे शरत्प्रभृतिभ्यः ।
5-4-108 अनश्च ।
5-4-109 नपुंसकादन्यतर्अस्याम् ।
5-4-110 नदीपौर्णमास्याग्रहायणीभ्यः ।
5-4-111 झयः ।
5-4-112 गिरेश्च सेनकस्य ।
5-4-113 बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात्‌ षच् ।
5-4-114 अङ्गुलेर्दारुणि ।
5-4-115 द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः ।
5-4-116 अप् पूरणीप्रमाण्योः ।
5-4-117 अन्तर्बहिर्भ्यां च लोम्नः ।
5-4-118 अञ्नासिकायाः संज्ञायां नसं चास्थूलात्‌ ।
5-4-119 उपसर्गाच्च ।
5-4-120 सुप्रातसुश्वसुदिवशारिकुक्षचतुरश्रैणीपदाजपद\-
प्रोष्ठपदाः ।
5-4-121 नञ्दुःसुभ्यो हलिसक्थ्योरन्यतरस्याम् ।
5-4-122 नित्यमसिच् प्रजामेधयोः ।
5-4-123 बहुप्रजाश्छन्दसि ।
5-4-124 धर्मादनिच् केवलात्‌ ।
5-4-125 जम्भा सुहरिततृणसोमेभ्यः ।
5-4-126 दक्षिणेर्मा लुब्धयोगे ।
5-4-127 इच् कर्मव्यतिहारे ।
5-4-128 द्विदण्ड्यादिभ्यश्च ।
5-4-129 प्रसम्भ्यां जानुनोर्ज्ञुः ।
5-4-130 ऊर्ध्वाद्विभाषा ।
5-4-131 ऊधसोऽनङ् ।
5-4-132 धनुषश्च ।
5-4-133 वा संज्ञायाम् ।
5-4-134 जायाया निङ् ।
5-4-135 गन्धस्येदुत्पूतिसुसुरभिभ्यः ।
5-4-136 अल्पाख्यायाम् ।
5-4-137 उपमानाच्च ।
5-4-138 पादस्य लोपोऽहस्त्यादिभ्यः ।
5-4-139 कुम्भपदीषु च ।
5-4-140 संख्यासुपूर्वस्य ।
5-4-141 वयसि दन्तस्य दतृ ।
5-4-142 छन्दसि च ।
5-4-143 स्त्रियां संज्ञायाम् ।
5-4-144 विभाषा श्यावारोकाभ्याम् ।
5-4-145 अग्रान्तशुद्धशुभ्रवृषवराहेभ्यश्च ।
5-4-146 ककुदस्यावस्थायां लोपः ।
5-4-147 त्रिककुत् पर्वते ।
5-4-148 उद्विभ्यां काकुदस्य ।
5-4-149 पूर्णाद्विभाषा ।
5-4-150 सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः ।
5-4-151 उरःप्रभृतिभ्यः कप्‌ ।
5-4-152 इनः स्त्रियाम् ।
5-4-153 नद्यृतश्च ।
5-4-154 शेषाद्विभाषा ।
5-4-155 न संज्ञायाम् ।
5-4-156 ईयसश्च ।
5-4-157 वन्दिते भ्रातुः ।
5-4-158 ऋतश्छन्दसि ।
5-4-159 नाडीतन्त्र्योः स्वाङ्गे ।
5-4-160 निष्प्रवाणिश्च ।

Chapter -6

6-1-1 एकाचो द्वे प्रथमस्य ।
6-1-2 अजादेर्द्वितीयस्य ।
6-1-3 न न्द्राः संयोगादयः ।
6-1-4 पूर्वोऽभ्यासः ।
6-1-5 उभे अभ्यस्तम् ।
6-1-6 जक्षित्यादयः षट् ।
6-1-7 तुजादीनां दीर्घोऽभ्यासस्य ।
6-1-8 लिटि धातोरनभ्यासस्य ।
6-1-9 सन्यङोः ।
6-1-10 श्लौ ।
6-1-11 चङि ।
6-1-12 दाश्वान् साह्वान् मीढ्वांश्च ।
6-1-13 ष्यङः सम्प्रसारणं पुत्रपत्योस्तत्पुरुषे ।
6-1-14 बन्धुनि बहुव्रीहौ ।
6-1-15 वचिस्वपियजादीनां किति ।
6-1-16 ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छति\-
भृज्जतीनां ङिति च ।
6-1-17 लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् ।
6-1-18 स्वापेश्चङि ।
6-1-19 स्वपिस्यमिव्येञां यङि ।
6-1-20 न वशः ।
6-1-21 चायः की ।
6-1-22 स्फायः स्फी निष्ठायाम् ।
6-1-23 स्त्यः प्रपूर्वस्य ।
6-1-24 द्रवमूर्तिस्पर्शयोः श्यः ।
6-1-25 प्रतेश्च ।
6-1-26 विभाषाऽभ्यवपूर्वस्य ।
6-1-27 शृतं पाके ।
6-1-28 प्यायः पी ।
6-1-29 लिड्यङोश्च ।
6-1-30 विभाषा श्वेः ।
6-1-31 णौ च संश्चङोः ।
6-1-32 ह्वः सम्प्रसारणम् ।
6-1-33 अभ्यस्तस्य च ।
6-1-34 बहुलं छन्दसि ।
6-1-35 चायः की ।
6-1-36 अपस्पृधेथामानृचुरानृहुश्चिच्युषेतित्याज\-
श्राताःश्रितमाशीराशीर्त्तः ।
6-1-37 न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् ।
6-1-38 लिटि वयो यः ।
6-1-39 वश्चास्यान्यतरस्याम् किति ।
6-1-40 वेञः ।
6-1-41 ल्यपि च ।
6-1-42 ज्यश्च ।
6-1-43 व्यश्च ।
6-1-44 विभाषा परेः ।
6-1-45 आदेच उपदेशेऽशिति ।
6-1-46 न व्यो लिटि ।
6-1-47 स्फुरतिस्फुलत्योर्घञि ।
6-1-48 क्रीङ्जीनां णौ ।
6-1-49 सिध्यतेरपारलौकिके ।
6-1-50 मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च ।
6-1-51 विभाषा लीयतेः ।
6-1-52 खिदेश्छन्दसि ।
6-1-53 अपगुरो णमुलि ।
6-1-54 चिस्फुरोर्णौ ।
6-1-55 प्रजने वीयतेः ।
6-1-56 बिभेतेर्हेतुभये ।
6-1-57 नित्यं स्मयतेः ।
6-1-58 सृजिदृशोर्झल्यमकिति ।
6-1-59 अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् ।
6-1-60 शीर्षंश्छन्दसि ।
6-1-61 ये च तद्धिते ।
6-1-62 अचि शीर्षः ।
6-1-63 पद्दन्नोमास्हृन्निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्छकन्नुदन्नासञ्छस्प्रभृतिषु ।
6-1-64 धात्वादेः षः सः ।
6-1-65 णो नः ।
6-1-66 लोपो व्योर्वलि ।
6-1-67 वेरपृक्तस्य ।
6-1-68 हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्‌ सुतिस्यपृक्तं हल् ।
6-1-69 एङ्ह्रस्वात्‌ सम्बुद्धेः ।
6-1-70 शेश्छन्दसि बहुलम् ।
6-1-71 ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् ।
6-1-72 संहितायाम् ।
6-1-73 छे च ।
6-1-74 आङ्माङोश्च ।
6-1-75 दीर्घात्‌ ।
6-1-76 पदान्ताद्वा ।
6-1-77 इको यणचि ।
6-1-78 एचोऽयवायावः ।
6-1-79 वान्तो यि प्रत्यये ।
6-1-80 धातोस्तन्निमित्तस्यैव ।
6-1-81 क्षय्यजय्यौ शक्यार्थे ।
6-1-82 क्रय्यस्तदर्थे ।
6-1-83 भय्यप्रवय्ये च च्छन्दसि ।
6-1-84 एकः पूर्वपरयोः ।
6-1-85 अन्तादिवच्च ।
6-1-86 षत्वतुकोरसिद्धः ।
6-1-87 आद्गुणः ।
6-1-88 वृद्धिरेचि ।
6-1-89 एत्येधत्यूठ्सु ।
6-1-90 आटश्च ।
6-1-91 उपसर्गादृति धातौ ।
6-1-92 वा सुप्यापिशलेः ।
6-1-93 औतोऽम्शसोः ।
6-1-94 एङि पररूपम् ।
6-1-95 ओमाङोश्च ।
6-1-96 उस्यपदान्तात्‌ ।
6-1-97 अतो गुणे ।
6-1-98 अव्यक्तानुकरणस्यात इतौ ।
6-1-99 नाम्रेडितस्यान्त्यस्य तु वा ।
6-1-100 नित्यमाम्रेडिते डाचि ।
6-1-101 अकः सवर्णे दीर्घः ।
6-1-102 प्रथमयोः पूर्वसवर्णः ।
6-1-103 तस्माच्छसो नः पुंसि ।
6-1-104 नादिचि ।
6-1-105 दीर्घाज्जसि च ।
6-1-106 वा छन्दसि ।
6-1-107 अमि पूर्वः ।
6-1-108 सम्प्रसारणाच्च ।
6-1-109 एङः पदान्तादति ।
6-1-110 ङसिङसोश्च ।
6-1-111 ऋत उत्‌ ।
6-1-112 ख्यत्यात्‌ परस्य ।
6-1-113 अतो रोरप्लुतादप्लुते ।
6-1-114 हशि च ।
6-1-115 प्रकृत्याऽन्तःपादमव्यपरे ।
6-1-116 अव्यादवद्यादवक्रमुरव्रतायमवन्त्ववस्युषु च ।
6-1-117 यजुष्युरः ।
6-1-118 आपोजुषाणोवृष्णोवर्षिष्ठेऽम्बेऽम्बालेऽम्बिकेपूर्वे ।
6-1-119 अङ्ग इत्यादौ च ।
6-1-120 अनुदात्ते च कुधपरे ।
6-1-121 अवपथासि च ।
6-1-122 सर्वत्र विभाषा गोः ।
6-1-123 अवङ् स्फोटायनस्य ।
6-1-124 इन्द्रे च ##(##नित्यम्##)## ।
6-1-125 प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् ।
6-1-126 आङोऽनुनासिकश्छन्दसि ।
6-1-127 इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च ।
6-1-128 ऋत्यकः ।
6-1-129 अप्लुतवदुपस्थिते ।
6-1-130 ई3 चाक्रवर्मणस्य ।
6-1-131 दिव उत्‌ ।
6-1-132 एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि ।
6-1-133 स्यश्छन्दसि बहुलम् ।
6-1-134 सोऽचि लोपे चेत्‌ पादपूरणम् ।
6-1-135 सुट् कात्‌ पूर्वः ।
6-1-136 अडभ्यासव्यवायेऽपि ।
6-1-137 सम्पर्युपेभ्यः करोतौ भूषणे ।
6-1-138 समवाये च ।
6-1-139 उपात्‌ प्रतियत्नवैकृतवाक्याध्याहारेषु ।
6-1-140 किरतौ लवने ।
6-1-141 हिंसायां प्रतेश्च ।
6-1-142 अपाच्चतुष्पाच्छकुनिष्वालेखने ।
6-1-143 कुस्तुम्बुरूणि जातिः ।
6-1-144 अपरस्पराः क्रियासातत्ये ।
6-1-145 गोष्पदं सेवितासेवितप्रमाणेषु ।
6-1-146 आस्पदं प्रतिष्ठायाम्‌ ।
6-1-147 आश्चर्यमनित्ये ।
6-1-148 वर्चस्केऽवस्करः ।
6-1-149 अपस्करो रथाङ्गम् ।
6-1-150 विष्किरः शकुनिर्विकरो वा ।
6-1-151 ह्रस्वाच्चन्द्रोत्तरपदे मन्त्रे ।
6-1-152 प्रतिष्कशश्च कशेः ।
6-1-153 प्रस्कण्वहरिश्चन्द्रावृषी ।
6-1-154 मस्करमस्करिणौ वेणुपरिव्राजकयोः ।
6-1-155 कास्तीराजस्तुन्दे नगरे ।
6-1-156 कारस्करो वृक्षः ।
6-1-157 पारस्करप्रभृतीनि च संज्ञायाम् ।
6-1-158 अनुदात्तं पदमेकवर्जम्‌ ।
6-1-159 कर्षात्वतो घञोऽन्त उदात्तः ।
6-1-160 उञ्छादीनां च ।
6-1-161 अनुदात्तस्य च यत्रोदात्तलोपः ।
6-1-162 धातोः ।
6-1-163 चितः ।
6-1-164 तद्धितस्य ।
6-1-165 कितः ।
6-1-166 तिसृभ्यो जसः ।
6-1-167 चतुरः शसि ।
6-1-168 सावेकाचस्तृतीयाऽऽदिविभक्तिः ।
6-1-169 अन्तोदत्तादुत्तरपदादन्यतरस्यामनित्यसमासे ।
6-1-170 अञ्चेश्छन्दस्यसर्वनामस्थानम् ।
6-1-171 ऊडिदम्पदाद्यप्पुम्रैद्युभ्यः ।
6-1-172 अष्टनो दीर्घात्‌ ।
6-1-173 शतुरनुमो नद्यजादी ।
6-1-174 उदात्तयणो हल्पूर्वात्‌ ।
6-1-175 नोङ्धात्वोः ।
6-1-176 ह्रस्वनुड्भ्यां मतुप्‌ ।
6-1-177 नामन्यतरस्याम्‌ ।
6-1-178 ङ्याश्छन्दसि बहुलम् ।
6-1-179 षट्त्रिचतुर्भ्यो हलादिः ।
6-1-180 झल्युपोत्तमम् ।
6-1-181 विभाषा भाषायाम् ।
6-1-182 न गोश्वन्त्साववर्णराडङ्क्रुङ्कृद्भ्यः ।
6-1-183 दिवो झल् ।
6-1-184 नृ चान्यतरस्याम् ।
6-1-185 तित्स्वरितम् ।
6-1-186 तास्यनुदात्तेन्ङिददुपदेशाल्लसार्वधातुकम्\-
अनुदात्तमहन्विङोः ।
6-1-187 आदिः सिचोऽन्यतरस्याम् ।
6-1-188 स्वपादिर्हिंसामच्यनिटि ।
6-1-189 अभ्यस्तानामादिः ।
6-1-190 अनुदात्ते च ।
6-1-191 सर्वस्य सुपि ।
6-1-192 भीह्रीभृहुमदजनधनदरिद्राजागरां प्रत्ययात् पूर्वम्
पिति ।
6-1-193 लिति ।
6-1-194 आदिर्णमुल्यन्यतरस्याम् ।
6-1-195 अचः कर्तृयकि ।
6-1-196 थलि च सेटीडन्तो वा ।
6-1-197 ञ्णित्यादिर्नित्यम् ।
6-1-198 आमन्त्रितस्य च ।
6-1-199 पथिमथोः सर्वनामस्थाने ।
6-1-200 अन्तश्च तवै युगपत्‌ ।
6-1-201 क्षयो निवासे ।
6-1-202 जयः करणम् ।
6-1-203 वृषादीनां च ।
6-1-204 संज्ञायामुपमानम्‌ ।
6-1-205 निष्ठा च द्व्यजनात्‌ ।
6-1-206 शुष्कधृष्टौ ।
6-1-207 आशितः कर्ता ।
6-1-208 रिक्ते विभाषा ।
6-1-209 जुष्टार्पिते च छन्दसि ।
6-1-210 नित्यं मन्त्रे ।
6-1-211 युष्मदस्मदोर्ङसि ।
6-1-212 ङयि च ।
6-1-213 यतोऽनावः ।
6-1-214 ईडवन्दवृशंसदुहां ण्यतः ।
6-1-215 विभाषा वेण्विन्धानयोः ।
6-1-216 त्यागरागहासकुहश्वठक्रथानाम् ।
6-1-217 उपोत्तमं रिति ।
6-1-218 चङ्यन्यतरस्याम् ।
6-1-219 मतोः पूर्वमात्‌ संज्ञायां स्त्रियाम्‌ ।
6-1-220 अन्तोऽवत्याः ।
6-1-221 ईवत्याः ।
6-1-222 चौ ।
6-1-223 समासस्य ।
6-2-1 बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम् ।
6-2-2 तत्पुरुषे
तुल्यार्थतृतीयासप्तम्युपमानाव्ययद्वितीयाकृत्याः ।
6-2-3 वर्णः वर्णेष्वनेते ।
6-2-4 गाधलवणयोः प्रमाणे ।
6-2-5 दायाद्यं दायादे ।
6-2-6 प्रतिबन्धि चिरकृच्छ्रयोः ।
6-2-7 पदेऽपदेशे ।
6-2-8 निवाते वातत्राणे ।
6-2-9 शारदेअनार्तवे ।
6-2-10 अध्वर्युकषाययोर्जातौ ।
6-2-11 सदृशप्रतिरूपयोः सादृश्ये ।
6-2-12 द्विगौ प्रमाणे ।
6-2-13 गन्तव्यपण्यं वाणिजे ।
6-2-14 मात्रोपज्ञोपक्रमच्छाये नपुंसके ।
6-2-15 सुखप्रिययोर्हिते ।
6-2-16 प्रीतौ च ।
6-2-17 स्वं स्व्आमिनि ।
6-2-18 पत्यावैश्वर्ये ।
6-2-19 न भूवाक्चिद्दिधिषु ।
6-2-20 वा भुवनम् ।
6-2-21 आशङ्काबाधनेदीयस्सु संभावने ।
6-2-22 पूर्वे भूतपूर्वे ।
6-2-23 सविधसनीडसमर्यादसवेशसदेशेषु सामीप्ये ।
6-2-24 विस्पष्टादीनि गुणवचनेषु ।
6-2-25 श्रज्याऽवमकन्पापवत्सु भावे कर्मधारये ।
6-2-26 कुमारश्च ।
6-2-27 आदिः प्रत्येनसि ।
6-2-28 पूगेष्वन्यतरस्याम् ।
6-2-29 इगन्तकालकपालभगालशरावेषु द्विगौ ।
6-2-30 बह्वन्यतरस्याम् ।
6-2-31 दिष्टिवितस्त्योश्च ।
6-2-32 सप्तमी सिद्धशुष्कपक्वबन्धेष्वकालात्‌ ।
6-2-33 परिप्रत्युपापा वर्ज्यमानाहोरात्रावयवेषु ।
6-2-34 राजन्यबहुवचनद्वंद्वेऽन्धकवृष्णिषु ।
6-2-35 संख्या ।
6-2-36 आचार्योपसर्जनश्चान्तेवासी ।
6-2-37 कार्तकौजपादयश्च ।
6-2-38 महान् व्रीह्यपराह्णगृष्टीष्वासजाबाल\-
भारभारतहैलिहिलरौरवप्रवृद्धेषु ।
6-2-39 क्षुल्लकश्च वैश्वदेवे ।
6-2-40 उष्ट्रः सादिवाम्योः ।
6-2-41 गौः सादसादिसारथिषु ।
6-2-42 कुरुगार्हपतरिक्तगुर्वसूतजरत्यश्लीलदृढरूपा\-
पारेवडवातैतिलकद्रूःपण्यकम्बलो दासीभाराणां च ।
6-2-43 चतुर्थी तदर्थे ।
6-2-44 अर्थे ।
6-2-45 क्ते च ।
6-2-46 कर्मधारयेऽनिष्ठा ।
6-2-47 अहीने द्वितीया ।
6-2-48 तृतीया कर्मणि ।
6-2-49 गतिरनन्तरः ।
6-2-50 तादौ च निति कृत्यतौ ।
6-2-51 तवै चान्तश्च युगपत्‌ ।
6-2-52 अनिगन्तोऽञ्चतौ वप्रत्यये ।
6-2-53 न्यधी च ।
6-2-54 ईषदन्यतरस्याम् ।
6-2-55 हिरण्यपरिमाणं धने ।
6-2-56 प्रथमोऽचिरोपसम्पत्तौ ।
6-2-57 कतरकतमौ कर्मधारये ।
6-2-58 आर्यो ब्राह्मणकुमारयोः ।
6-2-59 राजा च ।
6-2-60 षष्ठी प्रत्येनसि ।
6-2-61 क्ते नित्यार्थे ।
6-2-62 ग्रामः शिल्पिनि ।
6-2-63 राजा च प्रशंसायाम् ।
6-2-64 आदिरुदात्तः ।
6-2-65 सप्तमीहारिणौ धर्म्येऽहरणे ।
6-2-66 युक्ते च ।
6-2-67 विभाषाऽध्यक्षे ।
6-2-68 पापं च शिल्पिनि ।
6-2-69 गोत्रान्तेवासिमाणवब्राह्मणेषु क्षेपे ।
6-2-70 अङ्गानि मैरेये ।
6-2-71 भक्ताख्यास्तदर्थेषु ।
6-2-72 गोबिडालसिंहसैन्धवेषूपमाने ।
6-2-73 अके जीविकाऽर्थे ।
6-2-74 प्राचां क्रीडायाम् ।
6-2-75 अणि नियुक्ते ।
6-2-76 शिल्पिनि चाकृञः ।
6-2-77 संज्ञायां च ।
6-2-78 गोतन्तियवं पाले ।
6-2-79 णिनि ।
6-2-80 उपमानं शब्दार्थप्रकृतावेव ।
6-2-81 युक्तारोह्यादयश्च ।
6-2-82 दीर्घकाशतुषभ्राष्ट्रवटं जे ।
6-2-83 अन्त्यात्‌ पूर्वं बह्वचः ।
6-2-84 ग्रामेऽनिवसन्तः ।
6-2-85 घोषादिषु ।
6-2-86 छात्र्यादयः शालायाम् ।
6-2-87 प्रस्थेऽवृद्धमकर्क्यादीनाम्‌ ।
6-2-88 मालाऽऽदीनां च ।
6-2-89 अमहन्नवं नगरेऽनुदीचाम् ।
6-2-90 अर्मे चावर्णं द्व्यच्त्र्यच् ।
6-2-91 न भूताधिकसंजीवमद्राश्मकज्जलम् ।
6-2-92 अन्तः ।
6-2-93 सर्वं गुणकार्त्स्न्ये ।
6-2-94 संज्ञायां गिरिनिकाययोः ।
6-2-95 कुमार्यां वयसि ।
6-2-96 उदकेऽकेवले ।
6-2-97 द्विगौ क्रतौ ।
6-2-98 सभायां नपुंसके ।
6-2-99 पुरे प्राचाम् ।
6-2-100 अरिष्टगौडपूर्वे च ।
6-2-101 न हास्तिनफलकमार्देयाः ।
6-2-102 कुसूलकूपकुम्भशालं बिले ।
6-2-103 दिक्‌शब्दा ग्रामजनपदाख्यानचानराटेषु ।
6-2-104 आचार्योपसर्जनश्चान्तेवासिनि ।
6-2-105 उत्तरपदवृद्धौ सर्वं च ।
6-2-106 बहुव्रीहौ विश्वं संज्ञयाम् ।
6-2-107 उदराश्वेषुषु ।
6-2-108 क्षेपे ।
6-2-109 नदी बन्धुनि ।
6-2-110 निष्ठोपसर्गपूर्वमन्यतरस्याम्‌ ।
6-2-111 उत्तरपदादिः ।
6-2-112 कर्णो वर्णलक्षणात्‌ ।
6-2-113 संज्ञौपम्ययोश्च ।
6-2-114 कण्ठपृष्ठग्रीवाजंघं च ।
6-2-115 शृङ्गमवस्थायां च ।
6-2-116 नञो जरमरमित्रमृताः ।
6-2-117 सोर्मनसी अलोमोषसी ।
6-2-118 क्रत्वादयश्च ।
6-2-119 आद्युदात्तं द्व्यच् छन्दसि ।
6-2-120 वीरवीर्यौ च ।
6-2-121 कूलतीरतूलमूलशालाऽक्षसममव्ययीभावे ।
6-2-122 कंसमन्थशूर्पपाय्यकाण्डं द्विगौ ।
6-2-123 तत्पुरुषे शालायां नपुंसके ।
6-2-124 कन्था च ।
6-2-125 आदिश्चिहणादीनाम् ।
6-2-126 चेलखेटकटुककाण्डं गर्हायाम् ।
6-2-127 चीरमुपमानम्‌ ।
6-2-128 पललसूपशाकं मिश्रे ।
6-2-129 कूलसूदस्थलकर्षाः संज्ञायाम् ।
6-2-130 अकर्मधारये राज्यम् ।
6-2-131 वर्ग्यादयश्च ।
6-2-132 पुत्रः पुंभ्यः ।
6-2-133 नाचार्यराजर्त्विक्संयुक्तज्ञात्याख्येभ्यः ।
6-2-134 चूर्णादीन्यप्राणिषष्ठ्याः ।
6-2-135 षट् च काण्डादीनि ।
6-2-136 कुण्डं वनम् ।
6-2-137 प्रकृत्या भगालम् ।
6-2-138 शितेर्नित्याबह्वज्बहुव्रीहावभसत्‌ ।
6-2-139 गतिकारकोपपदात्‌ कृत्‌ ।
6-2-140 उभे वनस्पत्यादिषु युगपत्‌ ।
6-2-141 देवताद्वंद्वे च ।
6-2-142 नोत्तरपदेऽनुदात्तादावपृथिवीरुद्रपूषमन्थिषु ।
6-2-143 अन्तः ।
6-2-144 थाथघञ्क्ताजबित्रकाणाम् ।
6-2-145 सूपमानात्‌ क्तः ।
6-2-146 संज्ञायामनाचितादीनाम्‌ ।
6-2-147 प्रवृद्धादीनां च ।
6-2-148 कारकाद्दत्तश्रुतयोरेवाशिषि ।
6-2-149 इत्थम्भूतेन कृतमिति च ।
6-2-150 अनो भावकर्मवचनः ।
6-2-151 मन्क्तिन्व्याख्यानशयनासनस्थानयाजकादिक्रीताः ।
6-2-152 सप्तम्याः पुण्यम् ।
6-2-153 ऊनार्थकलहं तृतीयायाः ।
6-2-154 मिश्रं चानुपसर्गमसंधौ ।
6-2-155 नञो गुणप्रतिषेधे सम्पाद्यर्हहितालमर्थास्तद्धिताः ।
6-2-156 ययतोश्चातदर्थे ।
6-2-157 अच्कावशक्तौ ।
6-2-158 आक्रोशे च ।
6-2-159 संज्ञायाम् ।
6-2-160 कृत्योकेष्णुच्चार्वादयश्च ।
6-2-161 विभाषा तृन्नन्नतीक्ष्णशुचिषु ।
6-2-162 बहुव्रीहाविदमेतत्तद्भ्यः प्रथमपूरणयोः क्रियागणने ।
6-2-163 संख्यायाः स्तनः ।
6-2-164 विभाषा छन्दसि ।
6-2-165 संज्ञायां मित्राजिनयोः ।
6-2-166 व्यवायिनोऽन्तरम् ।
6-2-167 मुखं स्वाङ्गम् ।
6-2-168 नाव्ययदिक्‌शब्दगोमहत्स्थूलमुष्टिपृथुवत्सेभ्यः ।
6-2-169 निष्ठोपमानादन्यतरस्याम् ।
6-2-170 जातिकालसुखादिभ्योऽनाच्छादनात्‌
क्तोऽकृतमितप्रतिपन्नाः ।
6-2-171 वा जाते ।
6-2-172 नञ्सुभ्याम् ।
6-2-173 कपि पूर्वम् ।
6-2-174 ह्रस्वान्तेऽन्त्यात्‌ पूर्वम् ।
6-2-175 बहोर्नञ्वदुत्तरपदभूम्नि ।
6-2-176 न गुणादयोऽवयवाः ।
6-2-177 उपसर्गात्‌ स्वाङ्गं ध्रुवमपर्शु ।
6-2-178 वनं समासे ।
6-2-179 अन्तः ।
6-2-180 अन्तश्च ।
6-2-181 न निविभ्याम् ।
6-2-182 परेरभितोभाविमण्डलम् ।
6-2-183 प्रादस्वाङ्गं संज्ञायाम् ।
6-2-184 निरुदकादीनि च ।
6-2-185 अभेर्मुखम् ।
6-2-186 अपाच्च ।
6-2-187 स्फिगपूतवीणाऽञ्जोऽध्वकुक्षिसीरनामनाम च ।
6-2-188 अधेरुपरिस्थम् ।
6-2-189 अनोरप्रधानकनीयसी ।
6-2-190 पुरुषश्चान्वादिष्टः ।
6-2-191 अतेरकृत्पदे ।
6-2-192 नेरनिधाने ।
6-2-193 प्रतेरंश्वादयस्तत्पुरुषे ।
6-2-194 उपाद् द्व्यजजिनमगौरादयः ।
6-2-195 सोरवक्षेपणे ।
6-2-196 विभाषोत्पुच्छे ।
6-2-197 द्वित्रिभ्यां पाद्दन्मूर्धसु बहुव्रीहौ ।
6-2-198 सक्थं चाक्रान्तात्‌ ।
6-2-199 परादिश्छन्दसि बहुलम् ।
6-3-1 अलुगुत्तरपदे ।
6-3-2 पञ्चम्याः स्तोकादिभ्यः ।
6-3-3 ओजःसहोऽम्भस्तमसः तृतीयायाः ।
6-3-4 मनसः संज्ञायाम् ।
6-3-5 आज्ञायिनि च ।
6-3-6 आत्मनश्च पूरणे ।
6-3-7 वैयाकरणाख्यायां चतुर्थ्याः ।
6-3-8 परस्य च ।
6-3-9 हलदन्तात्‌ सप्तम्याः संज्ञायाम् ।
6-3-10 कारनाम्नि च प्राचां हलादौ ।
6-3-11 मध्याद्गुरौ ।
6-3-12 अमूर्धमस्तकात्‌ स्वाङ्गादकामे ।
6-3-13 बन्धे च विभाषा ।
6-3-14 तत्पुरुषे कृति बहुलम् ।
6-3-15 प्रावृट्शरत्कालदिवां जे ।
6-3-16 विभाषा वर्षक्षरशरवरात्‌ ।
6-3-17 घकालतनेषु कालनाम्नः ।
6-3-18 शयवासवासिषु अकालात्‌ ।
6-3-19 नेन्सिद्धबध्नातिषु ।
6-3-20 स्थे च भाषायाम् ।
6-3-21 षष्ठ्या आक्रोशे ।
6-3-22 पुत्रेऽन्यतरस्याम् ।
6-3-23 ऋतो विद्यायोनिसम्बन्धेभ्यः ।
6-3-24 विभाषा स्वसृपत्योः ।
6-3-25 आनङ् ऋतो द्वंद्वे ।
6-3-26 देवताद्वंद्वे च ।
6-3-27 ईदग्नेः सोमवरुणयोः ।
6-3-28 इद्वृद्धौ ।
6-3-29 दिवो द्यावा ।
6-3-30 दिवसश्च पृथिव्याम् ।
6-3-31 उषासोषसः ।
6-3-32 मातरपितरावुदीचाम् ।
6-3-33 पितरामातरा च च्छन्दसि ।
6-3-34 स्त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे
स्त्रियामपूरणीप्रियाऽऽदिषु ।
6-3-35 तसिलादिषु आकृत्वसुचः ।
6-3-36 क्यङ्मानिनोश्च ।
6-3-37 न कोपधायाः ।
6-3-38 संज्ञापूरण्योश्च ।
6-3-39 वृद्धिनिमित्तस्य च तद्धितस्यारक्तविकारे ।
6-3-40 स्वाङ्गाच्चेतोऽमानिनि ।
6-3-41 जातेश्च ।
6-3-42 पुंवत्‌ कर्मधारयजातीयदेशीयेषु ।
6-3-43 घरूपकल्पचेलड्ब्रुवगोत्रमतहतेषु ङ्योऽनेकाचो ह्रस्वः ।
6-3-44 नद्याः शेषस्यान्यतरस्याम् ।
6-3-45 उगितश्च ।
6-3-46 आन्महतः समानाधिकरणजातीययोः ।
6-3-47 द्व्यष्टनः संख्यायामबहुव्रीह्यशीत्योः ।
6-3-48 त्रेस्त्रयः ।
6-3-49 विभाषा चत्वारिंशत्प्रभृतौ सर्वेषाम् ।
6-3-50 हृदयस्य हृल्लेखयदण्लासेषु ।
6-3-51 वा शोकष्यञ्रोगेषु ।
6-3-52 पादस्य पदाज्यातिगोपहतेषु ।
6-3-53 पद् यत्यतदर्थे ।
6-3-54 हिमकाषिहतिषु च ।
6-3-55 ऋचः शे ।
6-3-56 वा घोषमिश्रशब्देषु ।
6-3-57 उदकस्योदः संज्ञायाम् ।
6-3-58 पेषंवासवाहनधिषु च ।
6-3-59 एकहलादौ पूरयितव्येऽन्यतरस्याम् ।
6-3-60 मन्थौदनसक्तुबिन्दुवज्रभारहारवीवधगाहेषु च ।
6-3-61 इको ह्रस्वोऽङ्यो गालवस्य ।
6-3-62 एक तद्धिते च ।
6-3-63 ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम् ।
6-3-64 त्वे च ।
6-3-65 इष्टकेषीकामालानां चिततूलभारिषु ।
6-3-66 खित्यनव्ययस्य ।
6-3-67 अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम् ।
6-3-68 इच एकाचोऽम्प्रत्ययवच्च ।
6-3-69 वाचंयमपुरंदरौ च ।
6-3-70 कारे सत्यागदस्य ।
6-3-71 श्येनतिलस्य पाते ञे ।
6-3-72 रात्रेः कृति विभाषा ।
6-3-73 नलोपो नञः ।
6-3-74 तस्मान्नुडचि ।
6-3-75 नभ्राण्नपान्नवेदानासत्यानमुचिनकुलनखनपुंसकनक्षत्रनक्रनाकेषु प्रकृत्या ।
6-3-76 एकादिश्चैकस्य चादुक् ।
6-3-77 नगोऽप्राणिष्वन्यतरस्याम् ।
6-3-78 सहस्य सः संज्ञायाम् ।
6-3-79 ग्रन्थान्ताधिके च ।
6-3-80 द्वितीये चानुपाख्ये ।
6-3-81 अव्ययीभावे चाकाले ।
6-3-82 वोपसर्जनस्य ।
6-3-83 प्रकृत्याऽऽशिष्यगोवत्सहलेषु ।
6-3-84 समानस्य छन्दस्यमूर्धप्रभृत्युदर्केषु ।
6-3-85 ज्योतिर्जनपदरात्रिनाभिनामगोत्ररूपस्थानवर्ण\- वयोवचनबन्धुषु ।
6-3-86 चरणे ब्रह्मचारिणि ।
6-3-87 तीर्थे ये ।
6-3-88 विभाषोदरे ।
6-3-89 दृग्दृशवतुषु ।
6-3-90 इदङ्किमोरीश्की ।
6-3-91 आ सर्वनाम्नः ।
6-3-92 विष्वग्देवयोश्च टेरद्र्यञ्चतौ वप्रत्यये ।
6-3-93 समः समि ।
6-3-94 तिरसस्तिर्यलोपे ।
6-3-95 सहस्य सध्रिः ।
6-3-96 सध मादस्थयोश्छन्दसि ।
6-3-97 द्व्यन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत्‌ ।
6-3-98 ऊदनोर्देशे ।
6-3-99 अषष्ठ्यतृतीयास्थस्यान्यस्य -दुगाशिराशाऽऽस्थाऽऽस्थितोत्सुकोतिकारकरागच्छेषु ।
6-3-100 अर्थे विभाषा ।
6-3-101 कोः कत्‌ तत्पुरुषेऽचि ।
6-3-102 रथवदयोश्च ।
6-3-103 तृणे च जातौ ।
6-3-104 का पथ्यक्षयोः ।
6-3-105 ईषदर्थे ।
6-3-106 विभाषा पुरुषे ।
6-3-107 कवं चोष्णे ।
6-3-108 पथि च च्छन्दसि ।
6-3-109 पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम् ।
6-3-110 संख्याविसायपूर्वस्याह्नस्याहन्नन्यतरस्यां ङौ ।
6-3-111 ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः ।
6-3-112 सहिवहोरोदवर्णस्य ।
6-3-113 साढ्यै साढ्वा साढेति निगमे ।
6-3-114 संहितायाम् ।
6-3-115 कर्णे लक्षणस्याविष्टाष्टपञ्चमणिभिन्न\- छिन्नछिद्रस्रुवस्वस्तिकस्य ।
6-3-116 नहिवृतिवृषिव्यधिरुचिसहितनिषु क्वौ ।
6-3-117 वनगिर्योः संज्ञायां कोटरकिंशुलकादीनाम् ।
6-3-118 वले ।
6-3-119 मतौ बह्वचोऽनजिरादीनाम् ।
6-3-120 शरादीनां च ।
6-3-121 इकः वहे अपीलोः ।
6-3-122 उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम् ।
6-3-123 इकः काशे ।
6-3-124 दस्ति ।
6-3-125 अष्टनः संज्ञायाम् ।
6-3-126 छन्दसि च ।
6-3-127 चितेः कपि ।
6-3-128 विश्वस्य वसुराटोः ।
6-3-129 नरे संज्ञायाम् ।
6-3-130 मित्रे चर्षौ ।
6-3-131 मन्त्रे सोमाश्वेन्द्रियविश्वदेव्यस्य मतौ ।
6-3-132 ओषधेश्च विभक्तावप्रथमायाम् ।
6-3-133 ऋचि तुनुघमक्षुतङ्कुत्रोरुष्याणाम् ।
6-3-134 इकः सुञि ।
6-3-135 द्व्यचोऽतस्तिङः ।
6-3-136 निपातस्य च ।
6-3-137 अन्येषामपि दृश्यते ।
6-3-138 चौ ।
6-3-139 सम्प्रसारणस्य ।
6-4-1 अङ्गस्य ।
6-4-2 हलः ।
6-4-3 नामि ।
6-4-4 न तिसृचतसृ ।
6-4-5 छन्दस्युभयथा ।
6-4-6 नृ च ।
6-4-7 नोपधायाः ।
6-4-8 सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ ।
6-4-9 वा षपूर्वस्य निगमे ।
6-4-10 सान्तमहतः संयोगस्य ।
6-4-11 अप्तृन्तृच्स्वसृनप्तृनेष्टृत्वष्टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तॄणाम् ।
6-4-12 इन्हन्पूषार्यम्णां शौ ।
6-4-13 सौ च ।
6-4-14 अत्वसन्तस्य चाधातोः ।
6-4-15 अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति ।
6-4-16 अज्झनगमां सनि ।
6-4-17 तनोतेर्विभाषा ।
6-4-18 क्रमश्च क्त्वि ।
6-4-19 च्छ्वोः शूडनुनासिके च ।
6-4-20 ज्वरत्वरश्रिव्यविमवामुपधायाश्च ।
6-4-21 राल्लोपः ।
6-4-22 असिद्धवदत्राभात्‌ ।
6-4-23 श्नान्नलोपः ।
6-4-24 अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति ।
6-4-25 दन्शसञ्जस्वञ्जां शपि ।
6-4-26 रञ्जेश्च ।
6-4-27 घञि च भावकरणयोः ।
6-4-28 स्यदो जवे ।
6-4-29 अवोदैधौद्मप्रश्रथहिमश्रथाः ।
6-4-30 नाञ्चेः पूजायाम् ।
6-4-31 क्त्वि स्कन्दिस्यन्दोः ।
6-4-32 जान्तनशां विभाषा ।
6-4-33 भञ्जेश्च चिणि ।
6-4-34 शास इदङ्हलोः ।
6-4-35 शा हौ ।
6-4-36 हन्तेर्जः ।
6-4-37 अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि क्ङिति ।
6-4-38 वा ल्यपि ।
6-4-39 न क्तिचि दीर्घश्च ।
6-4-40 गमः क्वौ ।
6-4-41 विड्वनोरनुनासिकस्यात्‌ ।
6-4-42 जनसनखनां सञ्झलोः ।
6-4-43 ये विभाषा ।
6-4-44 तनोतेर्यकि ।
6-4-45 सनः क्तिचि लोपश्चास्यान्यतरस्याम् ।
6-4-46 आर्धधातुके ।
6-4-47 भ्रस्जो रोपधयोः रमन्यतरस्याम्‌ ।
6-4-48 अतो लोपः ।
6-4-49 यस्य हलः ।
6-4-50 क्यस्य विभाषा ।
6-4-51 णेरनिटि ।
6-4-52 निष्ठायां सेटि ।
6-4-53 जनिता मन्त्रे ।
6-4-54 शमिता यज्ञे ।
6-4-55 अयामन्ताल्वाय्येत्न्विष्णुषु ।
6-4-56 ल्यपि लघुपूर्वात्‌ ।
6-4-57 विभाषाऽऽपः ।
6-4-58 युप्लुवोर्दीर्घश्छन्दसि ।
6-4-59 क्षियः ।
6-4-60 निष्ठायां अण्यदर्थे ।
6-4-61 वाऽऽक्रोशदैन्ययोः ।
6-4-62 स्यसिच्सीयुट्तासिषु भावकर्मणोरुपदेशेऽज्झनग्रहदृशां वा चिण्वदिट् च ।
6-4-63 दीङो युडचि क्ङिति ।
6-4-64 आतो लोप इटि च ।
6-4-65 ईद्यति ।
6-4-66 घुमास्थागापाजहातिसां हलि ।
6-4-67 एर्लिङि ।
6-4-68 वाऽन्यस्य संयोगादेः ।
6-4-69 न ल्यपि ।
6-4-70 मयतेरिदन्यतरस्याम् ।
6-4-71 लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः ।
6-4-72 आडजादीनाम् ।
6-4-73 छन्दस्यपि दृश्यते ।
6-4-74 न माङ्योगे ।
6-4-75 बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेऽपि ।
6-4-76 इरयो रे ।
6-4-77 अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ ।
6-4-78 अभ्यासस्यासवर्णे ।
6-4-79 स्त्रियाः ।
6-4-80 वाऽम्शसोः ।
6-4-81 इणो यण् ।
6-4-82 एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ।
6-4-83 ओः सुपि ।
6-4-84 वर्षाभ्वश्च ।
6-4-85 न भूसुधियोः ।
6-4-86 छन्दस्युभयथा ।
6-4-87 हुश्नुवोः सार्वधातुके ।
6-4-88 भुवो वुग्लुङ्लिटोः ।
6-4-89 ऊदुपधाया गोहः ।
6-4-90 दोषो णौ ।
6-4-91 वा चित्तविरागे ।
6-4-92 मितां ह्रस्वः ।
6-4-93 चिण्णमुलोर्दीर्घोऽन्यतरस्याम् ।
6-4-94 खचि ह्रस्वः ।
6-4-95 ह्लादो निष्ठायाम् ।
6-4-96 छादेर्घेऽद्व्युपसर्गस्य ।
6-4-97 इस्मन्त्रन्क्विषु च ।
6-4-98 गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि ।
6-4-99 तनिपत्योश्छन्दसि ।
6-4-100 घसिभसोर्हलि च ।
6-4-101 हुझल्भ्यो हेर्धिः ।
6-4-102 श्रुशृणुपॄकृवृभ्यश्छन्दसि ।
6-4-103 अङितश्च ।
6-4-104 चिणो लुक् ।
6-4-105 अतो हेः ।
6-4-106 उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात्‌ ।
6-4-107 लोपश्चास्यान्यतरस्यां म्वोः ।
6-4-108 नित्यं करोतेः ।
6-4-109 ये च ।
6-4-110 अत उत्‌ सार्वधातुके ।
6-4-111 श्नसोरल्लोपः ।
6-4-112 श्नाऽभ्यस्तयोरातः ।
6-4-113 ई हल्यघोः ।
6-4-114 इद्दरिद्रस्य ।
6-4-115 भियोऽन्यतरस्याम् ।
6-4-116 जहातेश्च ।
6-4-117 आ च हौ ।
6-4-118 लोपो यि ।
6-4-119 घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च ।
6-4-120 अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि ।
6-4-121 थलि च सेटि ।
6-4-122 तॄफलभजत्रपश्च ।
6-4-123 राधो हिंसायाम् ।
6-4-124 वा जॄभ्रमुत्रसाम् ।
6-4-125 फणां च सप्तानाम् ।
6-4-126 न शसददवादिगुणानाम् ।
6-4-127 अर्वणस्त्रसावनञः ।
6-4-128 मघवा बहुलम् ।
6-4-129 भस्य ।
6-4-130 पादः पत् ।
6-4-131 वसोः सम्प्रसारणम् ।
6-4-132 वाह ऊठ् ।
6-4-133 श्वयुवमघोनामतद्धिते ।
6-4-134 अल्लोपोऽनः ।
6-4-135 षपूर्वहन्धृतराज्ञामणि ।
6-4-136 विभाषा ङिश्योः ।
6-4-137 न संयोगाद्वमान्तात्‌ ।
6-4-138 अचः ।
6-4-139 उद ईत्‌ ।
6-4-140 आतो धातोः ।
6-4-141 मन्त्रेष्वाङ्यादेरात्मनः ।
6-4-142 ति विंशतेर्डिति ।
6-4-143 टेः ।
6-4-144 नस्तद्धिते ।
6-4-145 अह्नष्टखोरेव ।
6-4-146 ओर्गुणः ।
6-4-147 ढे लोपोऽकद्र्वाः ।
6-4-148 यस्येति च ।
6-4-149 सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्यानां य उपधायाः ।
6-4-150 हलस्तद्धितस्य ।
6-4-151 आपत्यस्य च तद्धितेऽनाति ।
6-4-152 क्यच्व्योश्च ।
6-4-153 बिल्वकादिभ्यश्छस्य लुक् ।
6-4-154 तुरिष्ठेमेयस्सु ।
6-4-155 टेः ।
6-4-156 स्थूलदूरयुवह्रस्वक्षिप्रक्षुद्राणां यणादिपरं पूर्वस्य
च गुणः ।
6-4-157 प्रियस्थिरस्फिरोरुबहुलगुरुवृद्धतृप्रदीर्घ\-
वृन्दारकाणां प्रस्थस्फवर्बंहिगर्वर्षित्रब्द्राघिवृन्दाः ।
6-4-158 बहोर्लोपो भू च बहोः ।
6-4-159 इष्ठस्य यिट् च ।
6-4-160 ज्यादादीयसः ।
6-4-161 र ऋतो हलादेर्लघोः ।
6-4-162 विभाषर्जोश्छन्दसि ।
6-4-163 प्रकृत्यैकाच् ।
6-4-164 इनण्यनपत्ये ।
6-4-165 गाथिविदथिकेशिगणिपणिनश्च ।
6-4-166 संयोगादिश्च ।
6-4-167 अन् ।
6-4-168 ये चाभावकर्मणोः ।
6-4-169 आत्माध्वानौ खे ।
6-4-170 न मपूर्वोऽपत्येऽवर्मणः ।
6-4-171 ब्राह्मोअजातौ ।
6-4-172 कार्मस्ताच्छील्ये ।
6-4-173 औक्षमनपत्ये ।
6-4-174 दाण्डिनायनहास्तिनायनाथर्वणिकजैह्माशिनेय\- वाशिनायनिभ्रौणहत्यधैवत्यसारवैक्ष्वाकमैत्रेयहिरण्मयानि ।
6-4-175 ऋत्व्यवास्त्व्यवास्त्वमाध्वीहिरण्ययानि च्छन्दसि ।

Chapter-7 

7-1-1 युवोरनाकौ ।
7-1-2 आयनेयीनीयियः फढखच्छघां प्रत्ययादीनाम्‌ ।
7-1-3 झोऽन्तः ।
7-1-4 अदभ्यस्तात्‌ ।
7-1-5 आत्मनेपदेष्वनतः ।
7-1-6 शीङो रुट् ।
7-1-7 वेत्तेर्विभाषा ।
7-1-8 बहुलं छन्दसि ।
7-1-9 अतो भिस ऐस् ।
7-1-10 बहुलं छन्दसि ।
7-1-11 नेदमदसोरकोः ।
7-1-12 टाङसिङसामिनात्स्याः ।
7-1-13 ङेर्यः ।
7-1-14 सर्वनाम्नः स्मै ।
7-1-15 ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ ।
7-1-16 पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा ।
7-1-17 जसः शी ।
7-1-18 औङ आपः ।
7-1-19 नपुंसकाच्च ।
7-1-20 जश्शसोः शिः ।
7-1-21 अष्टाभ्य औश् ।
7-1-22 षड्भ्यो लुक् ।
7-1-23 स्वमोर्नपुंसकात्‌ ।
7-1-24 अतोऽम् ।
7-1-25 अद्ड् डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ।
7-1-26 नेतराच्छन्दसि ।
7-1-27 युष्मदस्मद्भ्यां ङसोऽश् ।
7-1-28 ङे प्रथमयोरम् ।
7-1-29 शसो न ।
7-1-30 भ्यसो भ्यम् ।
7-1-31 पञ्चम्या अत्‌ ।
7-1-32 एकवचनस्य च ।
7-1-33 साम आकम् ।
7-1-34 आत औ णलः ।
7-1-35 तुह्योस्तातङाशिष्यन्यतरस्याम् ।
7-1-36 विदेः शतुर्वसुः ।
7-1-37 समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्‌ ।
7-1-38 क्त्वाऽपि छन्दसि ।
7-1-39 सुपां सुलुक्पूर्वसवर्णाऽऽच्छेयाडाड्यायाजालः ।
7-1-40 अमो मश् ।
7-1-41 लोपस्त आत्मनेपदेषु ।
7-1-42 ध्वमो ध्वात्‌ ।
7-1-43 यजध्वैनमिति च ।
7-1-44 तस्य तात्‌ ।
7-1-45 तप्तनप्तनथनाश्च ।
7-1-46 इदन्तो मसि ।
7-1-47 क्त्वो यक् ।
7-1-48 इष्ट्वीनमिति च ।
7-1-49 स्नात्व्यादयश्च ।
7-1-50 आज्जसेरसुक् ।
7-1-51 अश्वक्षीरवृषलवणानामात्मप्रीतौ क्यचि ।
7-1-52 आमि सर्वनाम्नः सुट् ।
7-1-53 त्रेस्त्रयः ।
7-1-54 ह्रस्वनद्यापो नुट् ।
7-1-55 षट्चतुर्भ्यश्च ।
7-1-56 श्रीग्रामण्योश्छन्दसि ।
7-1-57 गोः पादान्ते ।
7-1-58 इदितो नुम् धातोः ।

7-1-59 शे मुचादीनाम् ।
7-1-60 मस्जिनशोर्झलि ।
7-1-61 रधिजभोरचि ।
7-1-62 नेट्यलिटि रधेः ।
7-1-63 रभेरशब्लिटोः ।
7-1-64 लभेश्च ।
7-1-65 आङो यि ।
7-1-66 उपात्‌ प्रशंसायाम् ।
7-1-67 उपसर्गात्‌ खल्घञोः ।
7-1-68 न सुदुर्भ्यां केवलाभ्याम् ।
7-1-69 विभाषा चिण्णमुलोः ।
7-1-70 उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः ।
7-1-71 युजेरसमासे ।
7-1-72 नपुंसकस्य झलचः ।
7-1-73 इकोऽचि विभक्तौ ।
7-1-74 तृतीयाऽऽदिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य ।
7-1-75 अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनङुदात्तः ।
7-1-76 छन्दस्यपि दृश्यते ।
7-1-77 ई च द्विवचने ।
7-1-78 नाभ्यस्ताच्छतुः ।
7-1-79 वा नपुंसकस्य ।
7-1-80 आच्छीनद्योर्नुम् ।
7-1-81 शप्श्यनोर्नित्यम् ।
7-1-82 सावनडुहः ।
7-1-83 दृक्स्ववस्स्वतवसां छन्दसि ।
7-1-84 दिव औत्‌ ।
7-1-85 पथिमथ्यृभुक्षामात्‌ ।
7-1-86 इतोऽत्‌ सर्वनामस्थाने ।
7-1-87 थो न्थः ।
7-1-88 भस्य टेर्लोपः ।
7-1-89 पुंसोऽसुङ् ।
7-1-90 गोतो णित्‌ ।
7-1-91 णलुत्तमो वा ।
7-1-92 सख्युरसम्बुद्धौ ।
7-1-93 अनङ् सौ ।
7-1-94 ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ।
7-1-95 तृज्वत्‌ क्रोष्टुः ।
7-1-96 स्त्रियां च ।
7-1-97 विभाषा तृतीयाऽऽदिष्वचि ।
7-1-98 चतुरनडुहोरामुदात्तः ।
7-1-99 अम् सम्बुद्धौ ।
7-1-100 ॠत इद्धातोः ।
7-1-101 उपधायाश्च ।
7-1-102 उदोष्ठ्यपूर्वस्य ।
7-1-103 बहुलं छन्दसि ।
7-2-1 सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु ।
7-2-2 अतो र्लान्तस्य ।
7-2-3 वदव्रजहलन्तस्याचः ।
7-2-4 नेटि ।
7-2-5 ह्म्यन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् ।
7-2-6 ऊर्णोतेर्विभाषा ।
7-2-7 अतो हलादेर्लघोः ।
7-2-8 नेड् वशि कृति ।
7-2-9 तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च ।
7-2-10 एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्‌ ।
7-2-11 श्र्युकः किति ।
7-2-12 सनि ग्रहगुहोश्च ।
7-2-13 कृसृभृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि ।
7-2-14 श्वीदितो निष्ठायाम् ।
7-2-15 यस्य विभाषा ।
7-2-16 आदितश्च ।
7-2-17 विभाषा भावादिकर्मणोः ।
7-2-18 क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नम्लिष्टविरिब्धफाण्टबाढानि-मन्थमनस्तमःसक्ताविस्पष्टस्वरानायासभृशेषु ।
7-2-19 धृषिशसी वैयात्ये ।
7-2-20 दृढः स्थूलबलयोः ।
7-2-21 प्रभौ परिवृढः ।
7-2-22 कृच्छ्रगहनयोः कषः ।
7-2-23 घुषिरविशब्दने ।
7-2-24 अर्देः संनिविभ्यः ।
7-2-25 अभेश्चाविदूर्ये ।
7-2-26 णेरध्ययने वृत्तम् ।
7-2-27 वा दान्तशान्तपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञप्ताः ।
7-2-28 रुष्यमत्वरसंघुषास्वनाम् ।
7-2-29 हृषेर्लोमसु ।
7-2-30 अपचितश्च ।
7-2-31 ह्रु ह्वरेश्छन्दसि ।
7-2-32 अपरिह्वृताश्च ।
7-2-33 सोमे ह्वरितः ।
7-2-34 ग्रसितस्कभितस्तभितोत्तभितचत्तविकस्तविशस्तॄ\- शंस्तृशास्तृतरुतृतरूतृवरुतृवरूतृवरुत्रीरुज्ज्वलितिक्षरिति\-
क्षमितिवमित्यमितीति च ।
7-2-35 आर्धधातुकस्येड् वलादेः ।
7-2-36 स्नुक्रमोरनात्मनेपदनिमित्ते ।
7-2-37 ग्रहोऽलिटि दीर्घः ।
7-2-38 वॄतो वा ।
7-2-39 न लिङि ।
7-2-40 सिचि च परस्मैपदेषु ।
7-2-41 इट् सनि वा ।
7-2-42 लिङ्सिचोरात्मनेपदेषु ।
7-2-43 ऋतश्च संयोगादेः ।
7-2-44 स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा ।
7-2-45 रधादिभ्यश्च ।
7-2-46 निरः कुषः ।
7-2-47 इण्निष्ठायाम् ।
7-2-48 तीषसहलुभरुषरिषः ।
7-2-49 सनीवन्तर्धभ्रस्जदम्भुश्रिस्वृयूर्णुभरज्ञपिसनाम् ।
7-2-50 क्लिशः क्त्वानिष्ठयोः ।
7-2-51 पूङश्च ।
7-2-52 वसतिक्षुधोरिट् ।
7-2-53 अञ्चेः पूजायाम् ।
7-2-54 लुभो विमोचने ।
7-2-55 जॄव्रश्च्योः क्त्वि ।
7-2-56 उदितो वा ।
7-2-57 सेऽसिचि कृतचृतच्छृदतृदनृतः ।
7-2-58 गमेरिट् परस्मैपदेषु ।
7-2-59 न वृद्भ्यश्चतुर्भ्यः ।
7-2-60 तासि च कपः ।
7-2-61 अचस्तास्वत्‌ थल्यनिटो नित्यम् ।
7-2-62 उपदेशेऽत्वतः ।
7-2-63 ऋतो भारद्वाजस्य ।
7-2-64 बभूथाततन्थजगृम्भववर्थेति निगमे ।
7-2-65 विभाषा सृजिदृषोः ।
7-2-66 इडत्त्यर्तिव्ययतीनाम् ।
7-2-67 वस्वेकाजाद्घसाम् ।
7-2-68 विभाषा गमहनविदविशाम् ।
7-2-69 सनिंससनिवांसम् ।
7-2-70 ऋद्धनोः स्ये ।
7-2-71 अञ्जेः सिचि ।
7-2-72 स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु ।
7-2-73 यमरमनमातां सक् च ।
7-2-74 स्मिपूङ्रञ्ज्वशां सनि ।
7-2-75 किरश्च पञ्चभ्यः ।
7-2-76 रुदादिभ्यः सार्वधातुके ।
7-2-77 ईशः से ।
7-2-78 ईडजनोर्ध्वे च ।
7-2-79 लिङः सलोपोऽनन्त्यस्य ।
7-2-80 अतो येयः ।
7-2-81 आतो ङितः ।
7-2-82 आने मुक् ।
7-2-83 ईदासः ।
7-2-84 अष्टन आ विभक्तौ ।
7-2-85 रायो हलि ।
7-2-86 युष्मदस्मदोरनादेशे ।
7-2-87 द्वितीयायां च ।
7-2-88 प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम् ।
7-2-89 योऽचि ।
7-2-90 शेषे लोपः ।
7-2-91 मपर्यन्तस्य ।
7-2-92 युवावौ द्विवचने ।
7-2-93 यूयवयौ जसि ।
7-2-94 त्वाहौ सौ ।
7-2-95 तुभ्यमह्यौ ङयि ।
7-2-96 तवममौ ङसि ।
7-2-97 त्वमावेकवचने ।
7-2-98 प्रत्ययोत्तरपदयोश्च ।
7-2-99 त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ ।
7-2-100 अचि र ऋतः ।
7-2-101 जराया जरसन्यतरस्याम् ।
7-2-102 त्यदादीनामः ।
7-2-103 किमः कः ।
7-2-104 कु तिहोः ।
7-2-105 क्वाति ।
7-2-106 तदोः सः सावनन्त्ययोः ।
7-2-107 अदस औ सुलोपश्च ।
7-2-108 इदमो मः ।
7-2-109 दश्च ।
7-2-110 यः सौ ।
7-2-111 इदोऽय् पुंसि ।
7-2-112 अनाप्यकः ।
7-2-113 हलि लोपः ।
7-2-114 मृजेर्वृद्धिः ।
7-2-115 अचो ञ्णिति ।
7-2-116 अत उपधायाः ।
7-2-117 तद्धितेष्वचामादेः ।
7-2-118 किति च ।
7-3-1 देविकाशिंशपादित्यवाड्दीर्घसत्रश्रेयसामात्‌ ।
7-3-2 केकयमित्त्रयुप्रलयानां यादेरियः ।
7-3-3 न य्वाभ्यां पदान्ताभ्याम् पूर्वौ तु ताभ्यामैच् ।
7-3-4 द्वारादीनां च ।
7-3-5 न्यग्रोधस्य च केवलस्य ।
7-3-6 न कर्मव्यतिहारे ।
7-3-7 स्वागतादीनां च ।
7-3-8 श्वादेरिञि ।
7-3-9 पदान्तस्यान्यतरस्याम् ।
7-3-10 उत्तरपदस्य ।
7-3-11 अवयवादृतोः ।
7-3-12 सुसर्वार्धाज्जनपदस्य ।
7-3-13 दिशोऽमद्राणाम् ।
7-3-14 प्राचां ग्रामनगराणाम् ।
7-3-15 संख्यायाः संवत्सरसंख्यस्य च ।
7-3-16 वर्षस्याभविष्यति ।
7-3-17 परिमाणान्तस्यासंज्ञाशाणयोः ।
7-3-18 जे प्रोष्ठपदानाम् ।
7-3-19 हृद्भगसिन्ध्वन्ते पूर्वपदस्य च ।
7-3-20 अनुशतिकादीनां च ।
7-3-21 देवताद्वंद्वे च ।
7-3-22 नेन्द्रस्य परस्य ।
7-3-23 दीर्घाच्च वरुणस्य ।
7-3-24 प्राचां नगरान्ते ।
7-3-25 जङ्गलधेनुवलजान्तस्य विभाषितमुत्तरम्‌ ।
7-3-26 अर्धात्‌ परिमाणस्य पूर्वस्य तु वा ।
7-3-27 नातः परस्य ।
7-3-28 प्रवाहणस्य ढे ।
7-3-29 तत्प्रत्ययस्य च ।
7-3-30 नञः शुचीश्वरक्षेत्रज्ञकुशलनिपुणानाम् ।
7-3-31 यथातथयथापुरयोः पर्यायेण ।
7-3-32 हनस्तोऽचिण्णलोः ।
7-3-33 आतो युक् चिण्कृतोः ।
7-3-34 नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्यानाचमेः ।
7-3-35 जनिवध्योश्च ।
7-3-36 अर्त्तिह्रीव्लीरीक्नूयीक्ष्माय्यातां पुङ्णौ ।
7-3-37 शाच्छासाह्वाव्यावेपां युक् ।
7-3-38 वो विधूनने जुक् ।
7-3-39 लीलोर्नुग्लुकावन्यतरस्यां स्नेहविपातने ।
7-3-40 भियो हेतुभये षुक् ।
7-3-41 स्फायो वः ।
7-3-42 शदेरगतौ तः ।
7-3-43 रुहः पोऽन्यतरस्याम् ।
7-3-44 प्रत्ययस्थात्‌ कात्‌ पूर्वस्यात इदाप्यसुपः ।
7-3-45 न यासयोः ।
7-3-46 उदीचामातः स्थाने यकपूर्वायाः ।
7-3-47 भस्त्रैषाऽजाज्ञाद्वास्वानञ्पूर्वाणामपि ।
7-3-48 अभाषितपुंस्काच्च ।
7-3-49 आदाचार्याणाम् ।
7-3-50 ठस्येकः ।
7-3-51 इसुसुक्तान्तात्‌ कः ।
7-3-52 चजोः कु घिन्ण्यतोः ।
7-3-53 न्यङ्क्वादीनां च ।
7-3-54 हो हन्तेर्ञ्णिन्नेषु ।
7-3-55 अभ्यासाच्च ।
7-3-56 हेरचङि ।
7-3-57 सन्लिटोर्जेः ।
7-3-58 विभाषा चेः ।
7-3-59 न क्वादेः ।
7-3-60 अजिवृज्योश्च ।
7-3-61 भुजन्युब्जौ पाण्युपतापयोः ।
7-3-62 प्रयाजानुयाजौ यज्ञाङ्गे ।
7-3-63 वञ्चेर्गतौ ।
7-3-64 ओक उचः के ।
7-3-65 ण्य आवश्यके ।
7-3-66 यजयाचरुचप्रवचर्चश्च ।
7-3-67 वचोऽशब्दसंज्ञायाम् ।
7-3-68 प्रयोज्यनियोज्यौ शक्यार्थे ।
7-3-69 भोज्यं भक्ष्ये ।
7-3-70 घोर्लोपो लेटि वा ।
7-3-71 ओतः श्यनि ।
7-3-72 क्सस्याचि ।
7-3-73 लुग्वा दुहदिहलिहगुहामात्मनेपदे दन्त्ये ।
7-3-74 शमामष्टानां दीर्घः श्यनि ।
7-3-75 ष्ठिवुक्लम्याचमां शिति ।
7-3-76 क्रमः परस्मैपदेषु ।
7-3-77 इषुगमियमां छः ।
7-3-78 पाघ्राध्मास्थाम्नादाण्दृश्यर्त्तिसर्त्तिशदसदां
पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यर्च्छधौशीयसीदाः ।
7-3-79 ज्ञाजनोर्जा ।
7-3-80 प्वादीनां ह्रस्वः ।
7-3-81 मीनातेर्निगमे ।
7-3-82 मिदेर्गुणः ।
7-3-83 जुसि च ।
7-3-84 सार्वधातुकार्धधातुकयोः ।
7-3-85 जाग्रोऽविचिण्णल्ङित्सु ।
7-3-86 पुगन्तलघूपधस्य च ।
7-3-87 नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके ।
7-3-88 भूसुवोस्तिङि ।
7-3-89 उतो वृद्धिर्लुकि हलि ।
7-3-90 ऊर्णोतेर्विभाषा ।
7-3-91 गुणोऽपृक्ते ।
7-3-92 तृणह इम् ।
7-3-93 ब्रुव ईट् ।
7-3-94 यङो वा ।
7-3-95 तुरुस्तुशम्यमः सार्वधातुके ।
7-3-96 अस्तिसिचोऽपृक्ते ।
7-3-97 बहुलं छन्दसि ।
7-3-98 रुदश्च पञ्चभ्यः ।
7-3-99 अड्गार्ग्यगालवयोः ।
7-3-100 अदः सर्वेषाम् ।
7-3-101 अतो दीर्घो यञि ।
7-3-102 सुपि च ।
7-3-103 बहुवचने झल्येत्‌ ।
7-3-104 ओसि च ।
7-3-105 आङि चापः ।
7-3-106 सम्बुद्धौ च ।
7-3-107 अम्बाऽर्थनद्योर्ह्रस्वः ।
7-3-108 ह्रस्वस्य गुणः ।
7-3-109 जसि च ।
7-3-110 ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः ।
7-3-111 घेर्ङिति ।
7-3-112 आण्नद्याः ।
7-3-113 याडापः ।
7-3-114 सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च ।
7-3-115 विभाषा द्वितीयातृतीयाभ्याम् ।
7-3-116 ङेराम्नद्याम्नीभ्यः ।
7-3-117 इदुद्भ्याम् ।
7-3-118 औत्‌ ।
7-3-119 अच्च घेः ।
7-3-120 आङो नाऽस्त्रियाम् ।
7-4-1 णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः ।
7-4-2 नाग्लोपिशास्वृदिताम् ।
7-4-3 भ्राजभासभाषदीपजीवमीलपीडामन्यतरस्याम्‌ ।
7-4-4 लोपः पिबतेरीच्चाभ्यासस्य ।
7-4-5 तिष्ठतेरित्‌ ।
7-4-6 जिघ्रतेर्वा ।
7-4-7 उरृत्‌ ।
7-4-8 नित्यं छन्दसि ।
7-4-9 दयतेर्दिगि लिटि ।
7-4-10 ऋतश्च संयोगादेर्गुणः ।
7-4-11 ऋच्छत्यॄताम् ।
7-4-12 शृदॄप्रां ह्रस्वो वा ।
7-4-13 केऽणः ।
7-4-14 न कपि ।
7-4-15 आपोऽन्यतरस्याम् ।
7-4-16 ऋदृशोऽङि गुणः ।
7-4-17 अस्यतेस्थुक् ।
7-4-18 श्वयतेरः ।
7-4-19 पतः पुम् ।
7-4-20 वच उम् ।
7-4-21 शीङः सार्वधातुके गुणः ।
7-4-22 अयङ् यि क्ङिति ।
7-4-23 उपसर्गाद्ध्रस्व ऊहतेः ।
7-4-24 एतेर्लिङि ।
7-4-25 अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः ।
7-4-26 च्वौ च ।
7-4-27 रीङ् ऋतः ।
7-4-28 रिङ् शयग्लिङ्क्षु ।
7-4-29 गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः ।
7-4-30 यङि च ।
7-4-31 ई घ्राध्मोः ।
7-4-32 अस्य च्वौ ।
7-4-33 क्यचि च ।
7-4-34 अशनायोदन्यधनाया बुभुक्षापिपासागर्द्धेषु ।
7-4-35 न च्छन्दस्यपुत्रस्य ।
7-4-36 दुरस्युर्द्रविणस्युर्वृषण्यतिरिषण्यति ।
7-4-37 अश्वाघस्यात्‌ ।
7-4-38 देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ।
7-4-39 कव्यध्वरपृतनस्यर्चि लोपः ।
7-4-40 द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति ।
7-4-41 शाछोरन्यतरस्याम् ।
7-4-42 दधातेर्हिः ।
7-4-43 जहातेश्च क्त्वि ।
7-4-44 विभाषा छन्दसि ।
7-4-45 सुधितवसुधितनेमधितधिष्वधिषीय च ।
7-4-46 दो दद् घोः ।
7-4-47 अच उपसर्गात्तः ।
7-4-48 अपो भि ।
7-4-49 सः स्यार्द्धधातुके ।
7-4-50 तासस्त्योर्लोपः ।
7-4-51 रि च ।
7-4-52 ह एति ।
7-4-53 यीवर्णयोर्दीधीवेव्योः ।
7-4-54 सनि मीमाघुरभलभशकपतपदामच इस् ।
7-4-55 आप्ज्ञप्यृधामीत्‌ ।
7-4-56 दम्भ इच्च ।
7-4-57 मुचोऽकर्मकस्य गुणो वा ।
7-4-58 अत्र लोपोऽभ्यासस्य ।
7-4-59 ह्रस्वः ।
7-4-60 हलादिः शेषः ।
7-4-61 शर्पूर्वाः खयः ।
7-4-62 कुहोश्चुः ।
7-4-63 न कवतेर्यङि ।
7-4-64 कृषेश्छन्दसि ।
7-4-65 दाधर्तिदर्धर्तिदर्धर्षिबोभूतुतेतिक्तेऽलर्ष्यापनीफणत्\- संसनिष्यदत्करिक्रत्कनिक्रदद्भरिभ्रद्दविध्वतोदविद्युतत्\-
तरित्रतःसरीसृपतंवरीवृजन्मर्मृज्यागनीगन्तीति च ।
7-4-66 उरत्‌ ।
7-4-67 द्युतिस्वाप्योः सम्प्रसारणम् ।
7-4-68 व्यथो लिटि ।
7-4-69 दीर्घ इणः किति ।
7-4-70 अत आदेः ।
7-4-71 तस्मान्नुड् द्विहलः ।
7-4-72 अश्नोतेश्च ।
7-4-73 भवतेरः ।
7-4-74 ससूवेति निगमे ।
7-4-75 निजां त्रयाणां गुणः श्लौ ।
7-4-76 भृञामित्‌ ।
7-4-77 अर्तिपिपर्त्योश्च ।
7-4-78 बहुलं छन्दसि ।
7-4-79 सन्यतः ।
7-4-80 ओः पुयण्ज्यपरे ।
7-4-81 स्रवतिशृणोतिद्रवतिप्रवतिप्लवतिच्यवतीनां वा ।
7-4-82 गुणो यङ्लुकोः ।
7-4-83 दीर्घोऽकितः ।
7-4-84 नीग्वञ्चुस्रंसुध्वंसुभ्रंसुकसपतपदस्कन्दाम् ।
7-4-85 नुगतोऽनुनासिकान्तस्य ।
7-4-86 जपजभदहदशभञ्जपशां च ।
7-4-87 चरफलोश्च ।
7-4-88 उत्‌ परस्यातः ।
7-4-89 ति च ।
7-4-90 रीगृदुपधस्य च ।
7-4-91 रुग्रिकौ च लुकि ।
7-4-92 ऋतश्च ।
7-4-93 सन्वल्लघुनि चङ्परेऽनग्लोपे ।
7-4-94 दीर्घो लघोः ।
7-4-95 अत्‌ स्मृदृत्वरप्रथम्रदस्तॄस्पशाम् ।
7-4-96 विभाषा वेष्टिचेष्ट्योः ।
7-4-97 ई च गणः ।

Chapter-8

8-1-1 सर्वस्य द्वे ।
8-1-2 तस्य परमाम्रेडितम्‌ ।
8-1-3 अनुदात्तं च ।
8-1-4 नित्यवीप्सयोः ।
8-1-5 परेर्वर्जने ।
8-1-6 प्रसमुपोदः पादपूरणे ।
8-1-7 उपर्यध्यधसः सामीप्ये ।
8-1-8 वाक्यादेरामन्त्रितस्यासूयासम्मतिकोपकुत्सनभर्त्सनेषु ।
8-1-9 एकं बहुव्रीहिवत्‌ ।
8-1-10 आबाधे च ।
8-1-11 कर्मधारयवत्‌ उत्तरेषु ।
8-1-12 प्रकारे गुणवचनस्य ।
8-1-13 अकृच्छ्रे प्रियसुखयोरन्यतरस्याम् ।
8-1-14 यथास्वे यथायथम् ।
8-1-15 द्वन्द्वं रहस्यमर्यादावचनव्युत्क्रमण\- यज्ञपात्रप्रयोगाभिव्यक्तिषु ।
8-1-16 पदस्य ।
8-1-17 पदात्‌ ।
8-1-18 अनुदात्तं सर्वमपादादौ ।
8-1-19 आमन्त्रितस्य च ।
8-1-20 युष्मदस्मदोः षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयोर्वान्नावौ ।
8-1-21 बहुवचने वस्नसौ ।
8-1-22 तेमयावेकवचनस्य ।
8-1-23 त्वामौ द्वितीयायाः ।
8-1-24 न चवाहाहैवयुक्ते ।
8-1-25 पश्यार्थैश्चानालोचने ।
8-1-26 सपूर्वायाः प्रथमाया विभाषा ।
8-1-27 तिङो गोत्रादीनि कुत्सनाभीक्ष्ण्ययोः ।
8-1-28 तिङ्ङतिङः ।
8-1-29 न लुट् ।
8-1-30 निपातैर्यद्यदिहन्तकुविन्नेच्चेच्चण्कच्चिद्यत्रयुक्तम् ।
8-1-31 नह प्रत्यारम्भे ।
8-1-32 सत्यं प्रश्ने ।
8-1-33 अङ्गाप्रातिलोम्ये ।
8-1-34 हि च ।
8-1-35 छन्दस्यनेकमपि साकाङ्क्षम्‌ ।
8-1-36 यावद्यथाभ्याम् ।
8-1-37 पूजायां नानन्तरम् ।
8-1-38 उपसर्गव्यपेतं च ।
8-1-39 तुपश्यपश्यताहैः पूजायाम् ।
8-1-40 अहो च ।
8-1-41 शेषे विभाषा ।
8-1-42 पुरा च परीप्सायाम् ।
8-1-43 नन्वित्यनुज्ञैषणायाम् ।
8-1-44 किं क्रियाप्रश्नेऽनुपसर्गमप्रतिषिद्धम्‌ ।
8-1-45 लोपे विभाषा ।
8-1-46 एहिमन्ये प्रहासे लृट् ।
8-1-47 जात्वपूर्वम् ।
8-1-48 किम्वृत्तं च चिदुत्तरम् ।
8-1-49 आहो उताहो चानन्तरम् ।
8-1-50 शेषे विभाषा ।
8-1-51 गत्यर्थलोटा लृण्न चेत्‌ कारकं सर्वान्यत्‌ ।
8-1-52 लोट् च ।
8-1-53 विभाषितं सोपसर्गमनुत्तमम्‌ ।
8-1-54 हन्त च ।
8-1-55 आम एकान्तरमामन्त्रितमनन्तिके ।
8-1-56 यद्धितुपरं छन्दसि ।
8-1-57 चनचिदिवगोत्रादितद्धिताम्रेडितेष्वगतेः ।
8-1-58 चादिषु च ।
8-1-59 चवायोगे प्रथमा ।
8-1-60 हेति क्षियायाम् ।
8-1-61 अहेति विनियोगे च ।
8-1-62 चाहलोप एवेत्यवधारणम् ।
8-1-63 चादिलोपे विभाषा ।
8-1-64 वैवावेति च च्छन्दसि ।
8-1-65 एकान्याभ्यां समर्थाभ्याम् ।
8-1-66 यद्वृत्तान्नित्यं ।
8-1-67 पूजनात्‌ पूजितमनुदात्तम् ##(##काष्ठादिभ्यः##)## ।
8-1-68 सगतिरपि तिङ् ।
8-1-69 कुत्सने च सुप्यगोत्रादौ ।
8-1-70 गतिर्गतौ ।
8-1-71 तिङि चोदात्तवति ।
8-1-72 आमन्त्रितं पूर्वम् अविद्यमानवत्‌ ।
8-1-73 नामन्त्रिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम् ।
8-1-74 विभाषितं विशेषवचने बहुवचनम् ।
8-2-1 पूर्वत्रासिद्धम् ।
8-2-2 नलोपः सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति ।
8-2-3 न मु ने ।
8-2-4 उदात्तस्वरितयोर्यणः स्वरितोऽनुदात्तस्य ।
8-2-5 एकादेश उदात्तेनोदात्तः ।
8-2-6 स्वरितो वाऽनुदात्ते पदादौ ।
8-2-7 नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य ।
8-2-8 न ङिसम्बुद्ध्योः ।
8-2-9 मादुपधायाश्च मतोर्वोऽयवादिभ्यः ।
8-2-10 झयः ।
8-2-11 संज्ञायाम् ।
8-2-12 आसन्दीवदष्ठीवच्चक्रीवत्कक्षीवद्रुमण्वच्चर्मण्वती ।
8-2-13 उदन्वानुदधौ च ।
8-2-14 राजन्वान् सौराज्ये ।
8-2-15 छन्दसीरः ।
8-2-16 अनो नुट् ।
8-2-17 नाद्घस्य ।
8-2-18 कृपो रो लः ।
8-2-19 उपसर्गस्यायतौ ।
8-2-20 ग्रो यङि ।
8-2-21 अचि विभाषा ।
8-2-22 परेश्च घाङ्कयोः ।
8-2-23 संयोगान्तस्य लोपः ।
8-2-24 रात्‌ सस्य ।
8-2-25 धि च ।
8-2-26 झलो झलि ।
8-2-27 ह्रस्वादङ्गात्‌ ।
8-2-28 इट ईटि ।
8-2-29 स्कोः संयोगाद्योरन्ते च ।
8-2-30 चोः कुः ।
8-2-31 हो ढः ।
8-2-32 दादेर्धातोर्घः ।
8-2-33 वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहाम् ।
8-2-34 नहो धः ।
8-2-35 आहस्थः ।
8-2-36 व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः ।
8-2-37 एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः ।
8-2-38 दधस्तथोश्च ।
8-2-39 झलां जशोऽन्ते ।
8-2-40 झषस्तथोर्धोऽधः ।
8-2-41 षढोः कः सि ।
8-2-42 रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः ।
8-2-43 संयोगादेरातो धातोर्यण्वतः ।
8-2-44 ल्वादिभ्यः ।
8-2-45 ओदितश्च ।
8-2-46 क्षियो दीर्घात्‌ ।
8-2-47 श्योऽस्पर्शे ।
8-2-48 अञ्चोऽनपादाने ।
8-2-49 दिवोऽविजिगीषायाम् ।
8-2-50 निर्वाणोऽवाते ।
8-2-51 शुषः कः ।
8-2-52 पचो वः ।
8-2-53 क्षायो मः ।
8-2-54 प्रस्त्योऽन्यतरस्याम् ।
8-2-55 अनुपसर्गात्‌ फुल्लक्षीबकृशोल्लाघाः ।
8-2-56 नुदविदोन्दत्राघ्राह्रीभ्योऽन्यतरस्याम् ।
8-2-57 न ध्याख्यापॄमूर्छिमदाम् ।
8-2-58 वित्तो भोगप्रत्यययोः ।
8-2-59 भित्तं शकलम् ।
8-2-60 ऋणमाधमर्ण्ये ।
8-2-61 नसत्तनिषत्तानुत्तप्रतूर्तसूर्तगूर्तानि छन्दसि ।
8-2-62 क्विन्प्रत्ययस्य कुः ।
8-2-63 नशेर्वा ।
8-2-64 मो नो धातोः ।
8-2-65 म्वोश्च ।
8-2-66 ससजुषो रुः ।
8-2-67 अवयाःश्वेतवाःपुरोडाश्च ।
8-2-68 अहन् ।
8-2-69 रोऽसुपि ।
8-2-70 अम्नरूधरवरित्युभयथा छन्दसि ।
8-2-71 भुवश्च महाव्याहृतेः ।
8-2-72 वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः ।
8-2-73 तिप्यनस्तेः ।
8-2-74 सिपि धातो रुर्वा ।
8-2-75 दश्च ।
8-2-76 र्वोरुपधाया दीर्घ इकः ।
8-2-77 हलि च ।
8-2-78 उपधायां च ।
8-2-79 न भकुर्छुराम् ।
8-2-80 अदसोऽसेर्दादु दो मः ।
8-2-81 एत ईद्बहुवचने ।
8-2-82 वाक्यस्य टेः प्लुत उदात्तः ।
8-2-83 प्रत्यभिवादेअशूद्रे ।
8-2-84 दूराद्धूते च ।
8-2-85 हैहेप्रयोगे हैहयोः ।
8-2-86 गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्येकैकस्य प्राचाम् ।
8-2-87 ओमभ्यादाने ।
8-2-88 ये यज्ञकर्मणि ।
8-2-89 प्रणवष्टेः ।
8-2-90 याज्याऽन्तः ।
8-2-91 ब्रूहिप्रेस्यश्रौषड्वौषडावहानामादेः ।
8-2-92 अग्नीत्प्रेषणे परस्य च ।
8-2-93 विभाषा पृष्टप्रतिवचने हेः ।
8-2-94 निगृह्यानुयोगे च ।
8-2-95 आम्रेडितं भर्त्सने ।
8-2-96 अङ्गयुक्तं तिङ् आकाङ्क्षम् ।
8-2-97 विचार्यमाणानाम् ।
8-2-98 पूर्वं तु भाषायाम् ।
8-2-99 प्रतिश्रवणे च ।
8-2-100 अनुदात्तं प्रश्नान्ताभिपूजितयोः ।
8-2-101 चिदिति चोपमाऽर्थे प्रयुज्यमाने ।
8-2-102 उपरिस्विदासीदिति च ।
8-2-103 स्वरितमाम्रेडितेऽसूयासम्मतिकोपकुत्सनेषु ।
8-2-104 क्षियाऽऽशीःप्रैषेषु तिङ् आकाङ्क्षम् ।
8-2-105 अनन्त्यस्यापि प्रश्नाख्यानयोः ।
8-2-106 प्लुतावैच इदुतौ ।
8-2-107 एचोऽप्रगृह्यस्यादूराद्धूते
पूर्वस्यार्धस्यादुत्तरस्येदुतौ ।
8-2-108 तयोर्य्वावचि संहितायाम् ।
8-3-1 मतुवसो रु सम्बुद्धौ छन्दसि ।
8-3-2 अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा ।
8-3-3 आतोऽटि नित्यम् ।
8-3-4 अनुनासिकात्‌ परोऽनुस्वारः ।
8-3-5 समः सुटि ।
8-3-6 पुमः खय्यम्परे ।
8-3-7 नश्छव्यप्रशान् ।
8-3-8 उभयथर्क्षु ।
8-3-9 दीर्घादटि समानपदे ।
8-3-10 नॄन् पे ।
8-3-11 स्वतवान् पायौ ।
8-3-12 कानाम्रेडिते ।
8-3-13 ढो ढे लोपः ।
8-3-14 रो रि ।
8-3-15 खरवसानयोर्विसर्जनीयः ।
8-3-16 रोः सुपि ।
8-3-17 भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि ।
8-3-18 व्योर्लघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य ।
8-3-19 लोपः शाकल्यस्य ।
8-3-20 ओतो गार्ग्यस्य ।
8-3-21 उञि च पदे ।
8-3-22 हलि सर्वेषाम् ।
8-3-23 मोऽनुस्वारः ।
8-3-24 नश्चापदान्तस्य झलि ।
8-3-25 मो राजि समः क्वौ ।
8-3-26 हे मपरे वा ।
8-3-27 नपरे नः ।
8-3-28 ङ्णोः कुक्टुक् शरि ।
8-3-29 डः सि धुट् ।
8-3-30 नश्च ।
8-3-31 शि तुक् ।
8-3-32 ङमो ह्रस्वादचि ङमुण्नित्यम् ।
8-3-33 मय उञो वो वा ।
8-3-34 विसर्जनीयस्य सः ।
8-3-35 शर्परे विसर्जनीयः ।
8-3-36 वा शरि ।
8-3-37 कुप्वोः ≍क≍पौ च ।
8-3-38 सोऽपदादौ ।
8-3-39 इणः षः ।
8-3-40 नमस्पुरसोर्गत्योः ।
8-3-41 इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य ।
8-3-42 तिरसोऽन्यतरस्याम् ।
8-3-43 द्विस्त्रिश्चतुरिति कृत्वोऽर्थे ।
8-3-44 इसुसोः सामर्थ्ये ।
8-3-45 नित्यं समासेऽनुत्तरपदस्थस्य ।
8-3-46 अतः कृकमिकंसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य ।
8-3-47 अधःशिरसी पदे ।
8-3-48 कस्कादिषु च ।
8-3-49 छन्दसि वाऽप्राम्रेडितयोः ।
8-3-50 कःकरत्करतिकृधिकृतेष्वनदितेः ।
8-3-51 पञ्चम्याः परावध्यर्थे ।
8-3-52 पातौ च बहुलम् ।
8-3-53 षष्ठ्याः पतिपुत्रपृष्ठपारपदपयस्पोषेषु ।
8-3-54 इडाया वा ।
8-3-55 अपदान्तस्य मूर्धन्यः ।
8-3-56 सहेः साडः सः ।
8-3-57 इण्कोः ।
8-3-58 नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि ।
8-3-59 आदेशप्रत्यययोः ।
8-3-60 शासिवसिघसीनां च ।
8-3-61 स्तौतिण्योरेव षण्यभ्यासात्‌ ।
8-3-62 सः स्विदिस्वदिसहीनां च ।
8-3-63 प्राक्सितादड्व्यवायेऽपि ।
8-3-64 स्थाऽऽदिष्वभ्यासेन चाभ्यासय ।
8-3-65 उपसर्गात्‌ सुनोतिसुवतिस्यतिस्तौतिस्तोभतिस्थासेनय\-
सेधसिचसञ्जस्वञ्जाम् ।
8-3-66 सदिरप्रतेः ।
8-3-67 स्तम्भेः ।
8-3-68 अवाच्चालम्बनाविदूर्ययोः ।
8-3-69 वेश्च स्वनो भोजने ।
8-3-70 परिनिविभ्यः सेवसितसयसिवुसहसुट्स्तुस्वञ्जाम् ।
8-3-71 सिवादीनां वाऽड्व्यवायेऽपि ।
8-3-72 अनुविपर्यभिनिभ्यः स्यन्दतेरप्राणिषु ।
8-3-73 वेः स्कन्देरनिष्ठायाम् ।
8-3-74 परेश्च ।
8-3-75 परिस्कन्दः प्राच्यभरतेषु ।
8-3-76 स्फुरतिस्फुलत्योर्निर्निविभ्यः ।
8-3-77 वेः स्कभ्नातेर्नित्यम् ।
8-3-78 इणः षीध्वंलुङ्‌लिटां धोऽङ्गात्‌ ।
8-3-79 विभाषेटः ।
8-3-80 समासेऽङ्गुलेः सङ्गः ।
8-3-81 भीरोः स्थानम् ।
8-3-82 अग्नेः स्तुत्स्तोमसोमाः ।
8-3-83 ज्योतिरायुषः स्तोमः ।
8-3-84 मातृपितृभ्यां स्वसा ।
8-3-85 मातुःपितुर्भ्यामन्यतरस्याम्‌ ।
8-3-86 अभिनिसः स्तनः शब्दसंज्ञायाम् ।
8-3-87 उपसर्गप्रादुर्भ्यामस्तिर्यच्परः ।
8-3-88 सुविनिर्दुर्भ्यः सुपिसूतिसमाः ।
8-3-89 निनदीभ्यां स्नातेः कौशले ।
8-3-90 सूत्रं प्रतिष्णातम्‌ ।
8-3-91 कपिष्ठलो गोत्रे ।
8-3-92 प्रष्ठोऽग्रगामिनि ।
8-3-93 वृक्षासनयोर्विष्टरः ।
8-3-94 छन्दोनाम्नि च ।
8-3-95 गवियुधिभ्यां स्थिरः ।
8-3-96 विकुशमिपरिभ्यः स्थलम् ।
8-3-97 अम्बाम्बगोभूमिसव्यापद्वित्रिकुशेकुशङ्क्वङ्गुमञ्जि\-
पुञ्जिपरमेबर्हिर्दिव्यग्निभ्यः स्थः ।
8-3-98 सुषामादिषु च ।
8-3-99 ऐति संज्ञायामगात्‌ ।
8-3-100 नक्षत्राद्वा ।
8-3-101 ह्रस्वात्‌ तादौ तद्धिते ।
8-3-102 निसस्तपतावनासेवने ।
8-3-103 युष्मत्तत्ततक्षुःष्वन्तःपादम् ।
8-3-104 यजुष्येकेषाम् ।
8-3-105 स्तुतस्तोमयोश्छन्दसि ।
8-3-106 पूर्वपदात्‌ ।
8-3-107 सुञः ।
8-3-108 सनोतेरनः ।
8-3-109 सहेः पृतनर्ताभ्यां च ।
8-3-110 न रपरसृपिसृजिस्पृशिस्पृहिसवनादीनाम् ।
8-3-111 सात्पदाद्योः ।
8-3-112 सिचो यङि ।
8-3-113 सेधतेर्गतौ ।
8-3-114 प्रतिस्तब्धनिस्तब्धौ च ।
8-3-115 सोढः ।
8-3-116 स्तम्भुसिवुसहां चङि ।
8-3-117 सुनोतेः स्यसनोः ।
8-3-118 सदिष्वञ्जोः परस्य लिटि ।
8-3-119 निव्यभिभ्योऽड्व्यावये वा छन्दसि ।
8-4-1 रषाभ्यां नो णः समानपदे ।
8-4-2 अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि ।
8-4-3 पूर्वपदात्‌ संज्ञायामगः ।
8-4-4 वनं पुरगामिश्रकासिध्रकाशारिकाकोटराऽग्रेभ्यः ।
8-4-5 प्रनिरन्तःशरेक्षुप्लक्षाम्रकार्ष्यखदिर\-
पियूक्षाभ्योऽसंज्ञायामपि ।
8-4-6 विभाषौषधिवनस्पतिभ्यः ।
8-4-7 अह्नोऽदन्तात्‌ ।
8-4-8 वाहनमाहितात्‌ ।
8-4-9 पानं देशे ।
8-4-10 वा भावकरणयोः ।
8-4-11 प्रातिपदिकान्तनुम्विभक्तिषु च ।
8-4-12 एकाजुत्तरपदे णः ।
8-4-13 कुमति च ।
8-4-14 उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्य ।
8-4-15 हिनुमीना ।
8-4-16 आनि लोट् ।
8-4-17 नेर्गदनदपतपदघुमास्यतिहन्तियातिवातिद्रातिप्साति\- वपतिवहतिशाम्यतिचिनोतिदेग्धिषु च ।
8-4-18 शेषे विभाषाऽकखादावषान्त उपदेशे ।
8-4-19 अनितेः ।
8-4-20 अन्तः ।
8-4-21 उभौ साभ्यासस्य ।
8-4-22 हन्तेरत्पूर्वस्य ।
8-4-23 वमोर्वा ।
8-4-24 अन्तरदेशे ।
8-4-25 अयनं च ।
8-4-26 छन्दस्यृदवग्रहात्‌ ।
8-4-27 नश्च धातुस्थोरुषुभ्यः ।
8-4-28 उपसर्गाद् बहुलम् ।
8-4-29 कृत्यचः ।
8-4-30 णेर्विभाषा ।
8-4-31 हलश्च इजुपधात्‌ ।
8-4-32 इजादेः सनुमः ।
8-4-33 वा निंसनिक्षनिन्दाम् ।
8-4-34 न भाभूपूकमिगमिप्यायीवेपाम् ।
8-4-35 षात्‌ पदान्तात्‌ ।
8-4-36 नशेः षान्तस्य ।
8-4-37 पदान्तस्य ।
8-4-38 पदव्यवायेऽपि ।
8-4-39 क्षुभ्नाऽऽदिषु च ।
8-4-40 स्तोः श्चुना श्चुः ।
8-4-41 ष्टुना ष्टुः ।
8-4-42 न पदान्ताट्टोरनाम् ।
8-4-43 तोः षि ।
8-4-44 शात्‌ ।
8-4-45 यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा ।
8-4-46 अचो रहाभ्यां द्वे ।
8-4-47 अनचि च ।
8-4-48 नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य ।
8-4-49 शरोऽचि ।
8-4-50 त्रिप्रभृतिषु शाकटायनस्य ।
8-4-51 सर्वत्र शाकल्यस्य ।
8-4-52 दीर्घादाचार्याणाम् ।
8-4-53 झलां जश् झशि ।
8-4-54 अभ्यासे चर्च्च ।
8-4-55 खरि च ।
8-4-56 वाऽवसाने ।
8-4-57 अणोऽप्रगृह्यस्यानुनासिकः ।
8-4-58 अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः ।
8-4-59 वा पदान्तस्य ।
8-4-60 तोर्लि ।
8-4-61 उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य ।
8-4-62 झयो होऽन्यतरस्याम् ।
8-4-63 शश्छोऽटि ।
8-4-64 हलो यमां यमि लोपः ।
8-4-65 झरो झरि सवर्णे ।
8-4-66 उदात्तादनुदात्तस्य स्वरितः ।
8-4-67 नोदात्तस्वरितोदयमगार्ग्यकाश्यपगालवानाम्‌ ।
8-4-68 अ अ इति ।


 

Kathopanisad [Hindu]

॥ कठोपनिषत् ॥


॥ अथ कठोपनिषद् ॥

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सहवीर्यं करवावहै ।
तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै ॥

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

Part I
Canto I
ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १॥

तँ ह कुमारँ सन्तं दक्षिणासु
नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २॥

पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान् स गच्छति ता ददत् ॥ ३॥

स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति ।
द्वितीयं तृतीयं तँ होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४॥

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः ।
किँ स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाऽद्य करिष्यति ॥ ५॥

अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे ।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६॥

वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् ।
तस्यैताँ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७॥

आशाप्रतीक्षे संगतँ सूनृतां
चेष्टापूर्ते पुत्रपशूँश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो
यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८॥

तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मे-
ऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु
तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९॥

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्
वीतमन्युर्गौतमो माऽभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माऽभिवदेत्प्रतीत
एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १०॥

यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत
औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँ रात्रीः शयिता वीतमन्युः
त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥ ११॥

स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति
न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे तीर्त्वाऽशनायापिपासे
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२॥

स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो
प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त
एतद् द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३॥

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध
स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां
विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥ १४॥

लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै
या इष्टका यावतीर्वा यथा वा ।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तं
अथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५॥

तमब्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा
वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भविताऽयमग्निः
सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६॥

त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं
त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा
निचाय्येमाँ शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७॥

त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा
य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान् पुरतः प्रणोद्य
शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८॥

एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो
यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासः
तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९॥

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये-
ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं
वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥

देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा
न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः ।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व
मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१॥

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल
त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो
नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२॥

शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्वा
बहून्पशून् हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व
स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३॥

एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं
वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि
कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४॥

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके
सर्वान् कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या
न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व
नचिकेतो मरणं माऽनुप्राक्षीः ॥ २५॥

श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्
सर्वेंद्रियाणां जरयंति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव
तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६॥

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं
वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७॥

अजीर्यताममृतानामुपेत्य
जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् ।
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदान्
अतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८॥

यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो
यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो
नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९॥

॥ इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

 

Part I
Canto II
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेय-
स्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः ।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु
भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १॥

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २॥

स त्वं प्रियान्प्रियरूपांश्च कामान्
अभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो
यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३॥

दूरमेते विपरीते विषूची
अविद्या या च विद्येति ज्ञाता ।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये
न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४॥

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः
स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा
अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५॥

न साम्परायः प्रतिभाति बालं
प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी
पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६॥

श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः
शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः ।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा
आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७॥

न नरेणावरेण प्रोक्त एष
सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्ति
अणीयान् ह्यतर्क्यमणुप्रमाणात् ॥ ८॥

नैषा तर्केण मतिरापनेया
प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि
त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९॥

जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं
न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निः
अनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १०॥

कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां
क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा
धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११॥

तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं
गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं
मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२॥

एतच्छ्रुत्वा सम्परिगृह्य मर्त्यः
प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य ।
स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा
विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मा-
दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च
यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४॥

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति
तपाꣳसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति
तत्ते पदꣳ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥

एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं परम् ।
एतद्ध्येवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६॥

एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् ।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्
नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८॥

हन्ता चेन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥ १९॥

अणोरणीयान्महतो महीया-
नात्माऽस्य जन्तोर्निहितो गुहायाम् ।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २०॥

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१॥

अशरीरँ शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२॥

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूꣳ स्वाम् ॥ २३॥

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥

यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः ।
मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५॥

इति काठकोपनिषदि प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

 

Part I
Canto III
ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके
गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।
छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति
पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १॥

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत् परम् ।
अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतँ शकेमहि ॥ २॥

आत्मानँ रथितं विद्धि शरीरँ रथमेव तु ।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ ३॥

इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँ स्तेषु गोचरान् ।
आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४॥

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ ५॥

यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६॥

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७॥

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥ ८॥

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः ।
सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९॥

इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १०॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११॥

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते ।
दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२॥

यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि ।
ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥ १३॥

उत्तिष्ठत जाग्रत
प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया
दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४॥

अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ १५॥

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तँ सनातनम् ।
उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६॥

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते ।
तदानन्त्याय कल्पत इति