ईश्वरनामव्याख्या-The Name of Iswara- Dayananda Saraswati

ओंकार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है

ओ३म्सच्चिदानन्देश्वराय नमो नमःअथ सत्यार्थप्रकाशः॥

ओ३म् शन्नो॑ मि॒त्रः शं वरु॑णः॒ शन्नो॑भवत्वर्य्य॒मा । शन्न॒इन्द्रो॒बृह॒स्पति॑ शन्नो॒ विष्णु॑रुरुक्र॒मः ॥ नमो॒ ब्रह्म॑णे नम॒स्ते वायो त्वमे॒व प्र॒त्यक्षं॒ ब्रह्ना॑ति । त्वामे॒व प्र॒त्यक्षं॒ ब्रह्म॑ व॒दिष्यामि॒ ऋ॒तं व॑दिष्यामि स॒त्यं व॒दिष्यामि॒ तन्माम॑वतु तद्वक्तार॑मवतु। अव॑तु॒ मामव॑तु व॑क्तार॑म्।

ओं शान्ति॒श्शान्ति॒श्शान्तिः॑ ॥ १ ॥

अर्थ-(ओ३म्) यह ओंकार शब्द परमेश्वर का सर्वोत्तम नाम है क्योंकि इसमें जो अ, उ और म् तीन अक्षर मिलकर एक (ओ३म्) समुदाय हुआ है इस एक नाम से परमेश्वर के बहुत नाम आजाते हैं, जैसे-अकार से विराट्, अग्नि और विश्वादि । उकार के हिरण्यगर्भ, वायु और तेजसादि । मकार से ईश्वर, आदित्य और प्रज्ञादि नामों का वाचक और ग्राहक है । इसका ऐसा ही वेदादि सत्यशास्त्रों में स्पष्ट व्याख्यान किया है कि प्रकरणानुकूल ये सब नाम परमेश्वर ही के हैं ।

( प्रश्न ) परमेश्वर से भिन्न अर्थों के वाचक विराट् आदि नाम क्यों नहीं ? ब्रह्माण्ड पृथिवी आदि भूत, इन्द्रादि देवता और वैद्यकाल में शुण्ठ्यादि औषधियों के भी ये नाम हैं वा नहीं ? ( उत्तर ) हैं, परन्तु परमात्मा के भी हैं । ( प्रश्न ) केवल देवों का ग्रहण इन नामों से करते हो वा नहीं ? ( उत्तर ) आपके ग्रहण करने में क्या प्रमाण है ? ( प्रश्न ) देव सब प्रसिद्ध और वे उत्तम भी हैं इससे मैं उनका ग्रहण करता हूं । ( उत्तर ) क्या परमेश्वर अप्रसिद्ध और उससे कोई उत्तम भी है ? पुनः नाम परमेश्वर के भी क्यों नहीं मानते ? जब परमेश्वर अप्रसिद्ध और उसके तुल्य भी कोई नहीं तो उससे उत्तम कोई क्योंकर हो सकेगा, इससे आपका यह कहना सत्य नहीं । क्योंकि आपके इस कहने में बहुतसे दोष भी आते हैं जैसे – “उपस्थितं परित्यज्ञानुपस्थितं याचन इति बाधितन्यायः” किसी ने किसी के लिये भोजन का पदार्थ रख के कहा कि आप भोजन कीजिये और वह जो उसको छोड के अप्राप्त भोजन के लिये जहां तहां भ्रमण करे उसको बुद्धिमान् न जानना चाहिये क्योंकि वह उपस्थित नाम समीप प्राप्त हुए पदार्थ को छोड़ के अनुपस्थित अर्थात् अप्राप्त पदार्थ की प्राप्ति के लिये श्रम करता है इसलिये जैसा वह पुरुष बुद्धिमान नहीं वैसा ही आपका कथन हुआ । क्योंकि आप उन विराट् आदि नामों के जो प्रसिद्ध प्रमाणसिद्ध परमेश्वर और ब्रह्माण्डादि उपस्थित अर्थों का परित्याग करके असंभव और अनुपस्थित देवादि के ग्रहण में श्रम करते हैं इसमें कोई भी प्रमाण वा युक्ति नहीं। जो आप ऐसा कहें कि जहां जिसका प्रकरण है वहां उसी का ग्रहण करना योग्य है, जैसे किसी ने किसी कहा कि “हे भृत्य ! त्वं सैन्धवमानय” अर्थात् तू सैन्धव को लेआ, तब उसको समय अर्थात् प्रकरण का विचार करना अवश्य है कि सैन्धव नाम दो पदार्थों का है एक घोड़े और दूसरे लवण का । जो स्वस्वामी का गमनसमय हो तो घोडे और भोजनकाल हो तो लवण को ले आना उचित है । और जो गसनसमय में लवण और भोजनसमय में घोड़े को [ १६ ]ले आवे तो उसका स्वामी उस पर क्रुद्ध होकर कहेगा कि तू निर्बुद्धि पुरुष है, गमनसमय में लवण और भोजनकाल में घोड़े के लाने का क्या प्रयोजन था ? तू प्रकरणवित् नहीं है नहीं तो जिस समय में जिसको लाना चाहिये था उसी को लाता जो तुझ को प्रकरण का विचार करना आवश्यक था वह तूने नहीं किया इससे तू मूर्ख है मेरे पास से चला जा | इससे क्या सिद्ध हुआ कि जहाँ जिसका ग्रहण करना उचित हो वहां उसी अर्थ का ग्रहण करना चाहिये तो ऐसा ही हम और आप सब लोगों को मानना और करना भी चाहिये ॥

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