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Christianity The Deadliest Poison-Osho

After one week of intense study and practice, Pope the Polack is ready to blast off into the sky on his solo maiden voyage. He straps on his rocket-shaped hat, and then stands on his balcony rail high above Saint Peter’s Square, with his arms stretched out. He leaps into the air and starts flapping his arms wildly. Suddenly, he finds himself flying. Happy as a cuckoo, Pope the Polack aims towards Lulu’s apartment to see if he can surprise her

The World of Tantra-Osho

The preachers have convinced the whole world that “You are sinners.” This is good for them, because unless you are convinced, their profession cannot continue. You must be sinners: only then can churches, temples and mosques continue to prosper. Your being in sin is their success. Your guilt is the base of all the highest churches. The more guilty you are, the more churches will go on rising higher and higher. They are built on your guilt, on your sin, on your inferiority complex. Thus, they have created an inferior humanity.

संगठनों का ईश्वर मर गया है, उसे मर जाना चाहिए-ओशो

लेकिन हम सभी कुछ न कुछ जानने के खयाल में हैं, अगर हमने गीता स्मरण कर ली है या कुरान या बाइबिल या कोई और शास्त्र और अगर हमें वे शब्द पूरी तरह कंठस्थ हो गये हैं और जीवन जब भी कोई समस्यायें खड़ी करता है तो हम उन सूत्रों को दोहराने में सक्षम हो गये हैं और अगर हमें इस भांति ज्ञान पैदा हो गया है तो हम बहुत दुर्दिन की स्थिति में हैं, बहुत दुर्भाग्य है। यह ज्ञान खतरनाक है। यह ज्ञान कभी सत्य को नहीं जानने देगा और कभी ईश्वर को भी नहीं जानने देगा।

I have called the people like Mother Teresa ‘deceivers’- OSHO

I would like to destroy poverty, I don’t want to serve poor people. Enough is enough! For ten thousand years fools have been serving poor people; it has not changed anything. But now we have enough technology to destroy poverty completely.
So if anybody has to be forgiven it is these people. It is the Pope, Mother Teresa, etcetera, who have to be forgiven. They are criminals, but their crime is such that you will need great intelligence to understand it.

क्या ईश्वर मर गया है-जो मर जाए वह ईश्वर ही नहीं

चर्चाओं में वह यह कि जो ईश्वर मर चुका है, वह जिंदा ही नहीं था। कुछ लोगों ने उसे एक झूठा जीवन दे रखा था। और अच्छा ही हुआ कि वह मर गया। और अच्छा ही होता कि वह कभी पैदा ही न होता। और अच्छा हुआ होता कि वह बहुत पहले मर गया होता। तो यह खबर सुखद है, दु:दुखद नहीं। लोगों ने आपसे बहुत रूपों में कहा होगा कि धर्म की मृत्यु हो गयी है। यह बहुत अच्छा हुआ है, क्योंकि जो धर्म मर सकता है, वह मर ही जाना चाहिए। उसे जिंदा रखने की कोई जरूरत नहीं है। जब तक झूठा धर्म जिंदा रहेगा और झूठा ईश्वर जीवित मालूम पड़ेगा, तब तक सच्चे ईश्वर को खोजना अत्यंत कठिन है। सच्चे ईश्वर और हमारे बीच में, झूठे ईश्वर के अतिरिक्त और कोई भी नहीं खड़ा हुआ है। मनुष्य और परमात्मा के बीच में एक झूठा परमात्मा खड़ा हुआ है। मनुष्य और धर्म के बीच में अनेक झूठे धर्म खड़े हुए हैं। वे गिर जाएं, वे जल जाएं और नष्ट हो जाएं तो मनुष्य की आंखें, उसकी तरफ उठ सकती हैं, जो कि सत्य है और परमात्मा है।

सत्‍य का शुद्धतम वक्‍तव्‍य-अष्‍टावक्र महागीता(1)

‘साक्षी’ सूत्र है। इससे महत्वपूर्ण सूत्र और कोई भी नहीं। देखने वाले बनो! जो हो रहा है उसे होने दो; उसमें बाधा डालने की जरूरत नहीं। यह देह तो जल है, मिट्टी है, अग्नि है, आकाश है। तुम इसके भीतर तो वह दीये हो जिसमें ये सब जल, अग्नि, मिट्टी, आकाश, वायु प्रकाशित हो रहे हैं। तुम द्रष्टा हो। इस बात को गहन करो।

ईश्वरप्रणिधानाद्वा( 23) Iswar Pranidhanad Ba-पंतजलि: योगसूत्र- Explanation by OSHO

 तुम बीज हो, और परमात्मा प्रस्‍फुटित अभिव्यक्ति है। तुम बीज हो और परमात्मा वास्तविकता है। तुम हो संभावना; वह वास्तविक है। परमात्मा तुम्हारी नियति है, और तुम कई जन्मों से अपनी नियति पास रखे हुए हो बिना उसकी ओर देखे। क्योंकि तुम्हारी आंखें कहीं भविष्य में लगी होती हैं; वे वर्तमान को नहीं देखतीं। यदि तुम देखने को राजी हो तो यहीं, अभी, हर चीज वैसी है जैसी होनी चाहिए। किसी चीज की जरूरत नहीं। अस्तित्व संपूर्ण है हर क्षण। यह कभी अपूर्ण हुआ ही नहीं; यह हो सकता नहीं। यदि यह अपूर्ण होता, तो यह संपूर्ण कैसे हो सकेगा? फिर कौन इसे संपूर्ण बनायेगा?

सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:-धर्म है परम भोग-OSHO Upanisad

जीसस ने दो वचन कहे हैं। अलग—अलग कहे हैं! मैं कभी—कभी हैरान होता हूं क्यों अलग—अलग कहे हैं! एक वचन तो कहा है : ‘अपने शत्रु को भी उतना ही प्रेम करो, जितना अपने को।’ और दूसरा वचन कहा है. ‘अपने पड़ोसी को भी उतना ही प्रेम करो, जितना अपने को!’ मैं कभी—कभी सोचता हूं कि जीसस से कभी मिलना होगा कहीं, तो उनसे कहूंगा कि दो बार कहने की क्या जरूरत थी! क्योंकि पड़ोसी और दुश्मन कोई अलग—अलग थीड़े ही होते हैं। एक ही से बात पूरी हो जाती है कि अपने को जितना प्रेम करते हो, उतना ही पड़ोसी को करो। पड़ोसी के अलावा और कौन दुश्मन होता है? दुश्मन होने के लिए भी पास होना जरूरी है ना! जो दूर है, वह तो दुश्मन नहीं होता।

रसो वै सः- Raso vi sha- OSHO Upanisad

सूत्र है- ‘रसो वै सः।’सीधा साधा अर्थ है : ‘वह रसरूप है।’ लेकिन अनुवाद में तुम देखते हो फर्क हो गया: ‘भगवान रसरूप है।’ ‘वह’ तत्काल भगवान हो गया! वह! का मजा और भगवान में बात बिगड़ गयी; वह न रही। क्योंकि भगवान का अर्थ हो गया व्यक्ति।’वह’ तो निवैंयक्तिक सम्बोधन था। भगवान का अर्थ हो गया राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर-व्यक्ति। व्यक्ति ही भगवान हो सकता है। जब भी हम ‘ भगवान’ शब्द का उपयोग करते हैं, तो वह व्यक्तिवाची हो जाता है।

मेरी प्रिय पुस्तकें- My Favourite Books – OSHO

मौन अपने ही ढंग से बोलता है, आनंद का, शांति का, सौंदर्य का और आशीषों का अपना ही गीत गाता है; अन्यथा न तो कभी कोई ‘ताओ तेह किंग’ घटित होती और न ही कोई ‘सरमन ऑन दि माउंट।’ इन्हें मैं वास्तविक काव्य मानता हूं जब कि इन्हें किसी काव्यात्मक ढंग से संकलित नहीं किया गया है। ये अजनबी हैं। इन्हें बाहर रखा गया है। एक तरह से यह सच भी है: इनका किसी रीति, किसी नियम, किसी मापदंड से कुछ लेना-देना नहीं है; ये उन सबके पार हैं, इसलिए इन्हें एक किनारे कर दिया गया है।