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सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:-धर्म है परम भोग-OSHO Upanisad

जीसस ने दो वचन कहे हैं। अलग—अलग कहे हैं! मैं कभी—कभी हैरान होता हूं क्यों अलग—अलग कहे हैं! एक वचन तो कहा है : ‘अपने शत्रु को भी उतना ही प्रेम करो, जितना अपने को।’ और दूसरा वचन कहा है. ‘अपने पड़ोसी को भी उतना ही प्रेम करो, जितना अपने को!’ मैं कभी—कभी सोचता हूं कि जीसस से कभी मिलना होगा कहीं, तो उनसे कहूंगा कि दो बार कहने की क्या जरूरत थी! क्योंकि पड़ोसी और दुश्मन कोई अलग—अलग थीड़े ही होते हैं। एक ही से बात पूरी हो जाती है कि अपने को जितना प्रेम करते हो, उतना ही पड़ोसी को करो। पड़ोसी के अलावा और कौन दुश्मन होता है? दुश्मन होने के लिए भी पास होना जरूरी है ना! जो दूर है, वह तो दुश्मन नहीं होता।

रसो वै सः- Raso vi sha- OSHO Upanisad

सूत्र है- ‘रसो वै सः।’सीधा साधा अर्थ है : ‘वह रसरूप है।’ लेकिन अनुवाद में तुम देखते हो फर्क हो गया: ‘भगवान रसरूप है।’ ‘वह’ तत्काल भगवान हो गया! वह! का मजा और भगवान में बात बिगड़ गयी; वह न रही। क्योंकि भगवान का अर्थ हो गया व्यक्ति।’वह’ तो निवैंयक्तिक सम्बोधन था। भगवान का अर्थ हो गया राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर-व्यक्ति। व्यक्ति ही भगवान हो सकता है। जब भी हम ‘ भगवान’ शब्द का उपयोग करते हैं, तो वह व्यक्तिवाची हो जाता है।

मेरी प्रिय पुस्तकें- My Favourite Books – OSHO

मौन अपने ही ढंग से बोलता है, आनंद का, शांति का, सौंदर्य का और आशीषों का अपना ही गीत गाता है; अन्यथा न तो कभी कोई ‘ताओ तेह किंग’ घटित होती और न ही कोई ‘सरमन ऑन दि माउंट।’ इन्हें मैं वास्तविक काव्य मानता हूं जब कि इन्हें किसी काव्यात्मक ढंग से संकलित नहीं किया गया है। ये अजनबी हैं। इन्हें बाहर रखा गया है। एक तरह से यह सच भी है: इनका किसी रीति, किसी नियम, किसी मापदंड से कुछ लेना-देना नहीं है; ये उन सबके पार हैं, इसलिए इन्हें एक किनारे कर दिया गया है।

अथातोभक्तिजिज्ञासा-Explanation of Sandilya Bhakti Sutram by OSHO

ओम् अथातोभक्तिजिज्ञासा।।1।।
सापरानुरक्तिरीश्वरे।।2।।
तत्संस्थास्यामृतत्वोपदेशात्।।3।।
ज्ञानमितिचेन्नद्विषतोऽपिज्ञानस्यतदसस्थिते:।।4।।
तयोपक्षयाच्च।। 5।।

संतति-नियमन या परिवार नियोजन-OSHO

गरीब की सबसे बड़ी जो दुविधा है, वह है प्राइवेसी का अभाव–भोजन नहीं, कपड़े नहीं। गरीब का सबसे बड़ा दुख है कि उसकी प्राइवेट जिंदगी नहीं हो सकती। वह अगर अपनी पत्नी से भी बात कर रहा हो तो भी पड़ोसी सुनता है। वह अपनी पत्नी से भी प्रेम नहीं कर सकता बिना इसके कि उसके बेटे-बेटी जान लें। गरीब की सबसे बड़ी तकलीफ है कि वह अकेले में नहीं हो सकता। उसकी प्राइवेसी जैसी कोई चीज नहीं है।

देखा तो हर मुकाम तेरी रहगुजर में है-एस धम्‍मो सनंतनो- Esha Dhammo Sanatana-OSHO

खोपड़ी से मुक्त होने का खयाल भी खोपड़ी का ही है। मुक्त होने की जब तक आकांक्षा है, तब तक मुक्ति संभव नहीं। क्योंकि आकांक्षा मात्र ही, आकांक्षा की अभीप्सा मन का ही जाल और खेल है। मन संसार ही नहीं बनाता, मन मोक्ष भी बनाता है। और जिसने यह जान लिया वही मुक्त हो गया।