Esho Asvatthah Sanatanah (एषोऽश्वत्थः सनातनः)
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Sanatanah
ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥ (क0 उ0 2।6।1)
यह श्लोक कठोपनिषद् (या मुण्डकोपनिषद्) और भगवद्गीता (अध्याय 15) में वर्णित “अश्वत्थ वृक्ष” के प्रतीकात्मक वर्णन से जुड़ा है। यह शाश्वत संसार, ब्रह्म और जीव के संबंध को दर्शाने वाला गूढ़ आध्यात्मिक श्लोक है।
अश्व + त्थ > Sanatan {अशू व्याप्तौ} विष्णोरश्वस्य वाजिनम्” ता० ब्रा०
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शब्दार्थ और व्याख्या:
- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः।
- ऊर्ध्वमूल: इसका मूल ऊपर (ब्रह्म, परमात्मा) है।
- अवाक्शाख: इसकी शाखाएँ नीचे की ओर (भौतिक जगत की ओर) फैली हुई हैं।
- अश्वत्थ: इस संसार को “अश्वत्थ” कहा गया है, जिसका अर्थ है “क्षणभंगुर” (जो स्थिर नहीं है और क्षण-क्षण बदलता रहता है)।
- सनातनः: यह संसार अनादि (आदि से रहित) और शाश्वत प्रतीत होता है, लेकिन यह सत्य में ऐसा नहीं है।
- तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
- शुक्रं: शुद्ध (अर्थात् परमात्मा)।
- ब्रह्म: यह ब्रह्म ही है।
- अमृतम्: यही अमृत (अविनाशी) है।
- तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन।
- तस्मिन्: उस ब्रह्म में।
- लोकाः श्रिताः सर्वे: सभी लोक (संसार) उसी ब्रह्म पर आधारित हैं।
- तदु नात्येति कश्चन: उसे कोई पार नहीं कर सकता (ब्रह्म से परे कुछ नहीं है)।
- एतद्वै तत्।
- इसका अर्थ है, “यह वही (तत्व) है।”
- यह महावाक्य की पुष्टि है कि यही ब्रह्म, यही सत्य, और यही सभी प्रश्नों का उत्तर है।
सारांश:
- यह संसार अश्वत्थ वृक्ष के रूप में समझाया गया है, जो क्षणभंगुर है।
- इसका मूल ब्रह्म में है, जो शाश्वत, शुद्ध, और अमृत है।
- समस्त जीव-जगत और लोक ब्रह्म पर आश्रित हैं।
- ब्रह्म को कोई पार नहीं कर सकता, क्योंकि यह परम सत्य है।
यह श्लोक अद्वैत वेदांत की मूल भावना को व्यक्त करता है, जिसमें कहा गया है कि संसार का आधार ब्रह्म है और उसी का साक्षात्कार मोक्ष की ओर ले जाता है।
श्लोकस्य व्याख्या (संस्कृते)
- ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः।
- अर्थः: अस्य अश्वत्थवृक्षस्य मूलं परमार्थतत्त्वे ब्रह्मणि अधिष्ठितं, यद् ऊर्ध्वगं च शाश्वतं च। अस्य शाखाः संसाररूपेण अधः प्रसृताः, यत्र कर्माणां संस्काराणां च विविधविकासाः दृश्यन्ते। अयं वृक्षः क्षणिकत्वात् “अश्वत्थः” इति कथ्यते, किन्तु परमार्थतः ब्रह्माश्रयः शाश्वतत्वेन चोपलभ्यते।
- तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते।
- अर्थः: यद् ब्रह्म तस्मात् एव संसारः उत्पादितः, तत् एव नित्यम्, शुद्धं च। तदेव परं ब्रह्म, यद् अमृतस्वरूपं, न विकारस्पर्शं प्राप्नोति।
- तस्मिंल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन।
- अर्थः: ब्रह्मणि एव समस्ते लोकाः स्थिताः, यतः सर्वं ब्रह्माश्रयं। न च कश्चन तत्त्वतः ब्रह्मं पारं गन्तुं समर्थः, यतः ब्रह्मा एव परमं तत्त्वम्।
- एतद्वै तत्।
- अर्थः: एषः एव सः परं तत्वम्, यं मुमुक्षवः ज्ञानमार्गेण खोजन्ति। एषः एव सत्यं ब्रह्म, परमार्थस्वरूपं च।
सारः:
एषः श्लोकः संसारस्य मायात्मकं स्वरूपं ब्रह्माश्रयं च वर्णयति। अश्वत्थवृक्षः ब्रह्मणः प्रतीकः, यः कर्मफलं, माया, चित्तवृत्तयः च दर्शयति। किन्तु, यः ब्रह्मज्ञानं प्राप्नोति, सः अस्य वृक्षस्य जालं अतिक्रान्त्वा परं तत्त्वं प्राप्नोति। अतः एतद् ज्ञानं मोक्षस्य हेतुर्भवति।
Date: 27/11/2024