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परमात्मा से वेदोत्पत्ति में वेद का प्रमाण-दयानन्दसरस्वती

प्रथम ईश्वर को नमस्कार और प्रार्थना करके पश्चात् वेदों की उत्पत्ति का विषय लिखा जाता है, कि वेद किसने उत्पन्न किये हैं। (तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः) सत् जिसका कभी नाश नहीं होता, आनन्द जो सदा सुखस्वरूप और सबको सुख देनेवाला है, इत्यादि लक्षणों से युक्त पुरुष जो सब जगह में परिपूर्ण हो रहा है, जो सब मनुष्यों के उपासना के योग्य इष्टदेव और सब सामर्थ्य से युक्त है, उसी परब्रह्म से (ऋचः) ऋग्वेद, (यजुः) यजुर्वेद (सामानि) सामवेद और (छन्दांसि) इस शब्द से अथर्ववेद भी, ये चारों वेद उत्पन्न हुए हैं।

शाण्डिल्य भक्ति सूत्र-Sandilya Bhakti Sutra-OSHO Explained

भक्ति जीवन का परम स्वीकार है। इसलिए शुभ ही है कि शांडिल्य अपने इस अपूर्व सूत्र—ग्रंथ का उदघाटन ओम से करते हैं। ठीक ही है, क्योंकि भक्ति जीवन में संगीत पैदा करने की विधि है। जिस दिन तुम संगीतपूर्ण हो जाओगे; जिस दिन तुम्हारे भीतर एक भी स्वर ऐसा न रहेगा जो व्याघात उत्पन्न करता है; जिस दिन तुम बेसुरे न रहोगे, उसी दिन प्रभु मिलन हो गया।

Hindi as Official language in UNO

INTERNATIONAL LAW

The United Nations (UN) has a specific procedure for a language to be recognized as an official language of UN. According to that procedure, getting Hindi accepted as an official language of the UN will involve adoption of a Resolution by the UN General Assembly with a minimum two-third majority, as the additional expenditure, according to UN rules have to be contributed by all member states.

अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा-राहुल संकृत्यायन

आधुनिक काल में घुमक्कड़ों के काम की बात कहने की आवश्यकता है, क्योंकि लोगों ने घुमक्कड़ों की कृतियों को चुरा के उन्हें गला फाड़-फाड़कर अपने नाम से प्रकाशित किया, जिससे दुनिया जानने लगी कि वस्तुत: तेली के कोल्हू के बैल ही दुनिया में सब कुछ करते हैं। आधुनिक विज्ञान में चार्ल्स डारविन का स्थान बहुत ऊँचा है। उसने प्राणियों की उत्पत्ति और मानव-वंश के विकास पर ही अद्वितीय खोज नहीं की, बल्कि कहना चाहिए कि सभी विज्ञानों को डारविन के प्रकाश में दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन, क्या डारविन अपने महान आविष्कारों को कर सकता था, यदि उसने घुमक्कड़ी का व्रत न लिया होता?

हिन्दी भाषा की उत्पत्ति-महावीरप्रसाद द्विवेदी-1907

कुछ समय से विचारशील जनों के मन में यह बात आने लगी है कि देश में एक भाषा और एक लिपि होने की बड़ी ज़रूरत है, और हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि ही इस योग्य है। हमारे मुसल्मान भाई इसकी प्रतिकूलता करते हैं। वे विदेशी फ़ारसी लिपि और विदेशी भाषा के शब्दों से लबालब भरी हुई उर्दू, को ही इस योग्य बतलाते हैं। परन्तु वे हमसे प्रतिकूलता करते किस बात में नहीं? सामाजिक, धार्म्मिक, यहाँ तक कि राजनैतिक विषयों में भी उनका हिन्दुओं से ३६ का सम्बन्ध है। भाषा और लिपि के विषय में उनकी दलीलें ऐसी कुतर्कपूर्ण, ऐसी निर्बल, ऐसी सदोष और ऐसी हानिकारिणी हैं कि कोई भी न्यायनिष्ठ और स्वदेशप्रेमी मनुष्य उनसे सहमत नहीं हो सकता। बंगाली, गुजराती, महाराष्ट्र और मदरासी तक जिस देवनागरी लिपि और हिन्दी भाषा को देश-व्यापी होने योग्य समझते हैं वह अकेले मुट्ठी भर मुसल्मानों के कहने से अयोग्य नहीं हो सकती। आबादी के हिसाब से मुसल्मान इस देश में हैं ही कितने? फिर थोड़े होकर भी जब वे निर्जीव दलीलों से फ़ारसी लिपि और उर्दू भाषा की उत्तमता की घोषणा देंगे तब कौन उनकी बात सुनेगा? अतएव इस विषय में और कुछ कहने की ज़रूरत नहीं—पहले ही बहुत कहा जा चुका है। अनेक विद्वानों ने प्रबल प्रमाणों से हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि की योग्यता प्रमाणित कर दी है।

भारत का इतिहास सिर्फ वो नहीं है जो गुलामी की मानसिकता के साथ इतिहास लिखने वालों ने लिखा- PM MODI

Prime Minister

बीते कुछ सालों में देशभर में इतिहास, आस्था, आध्यात्म, संस्कृति से जुड़े जितने भी स्मारकों का निर्माण किया जा रहा है, उनका बहुत बड़ा लक्ष्य पर्यटन को बढ़ावा देने का भी है। उत्तर प्रदेश तो पर्यटन और तीर्थाटन, दोनों के मामले में समृद्ध भी है और इसकी क्षमताएं भी अपार हैं। चाहे वह भगवान राम का जन्म स्थान हो या कृष्ण का वृंदावन, भगवान बुद्ध का सारनाथ हो या फिर काशी विश्वनाथ, संत कबीर का मगहर धाम हो या वाराणसी में संत रविदास की जन्मस्थली का आधुनिकीकरण, पूरे प्रदेश में बड़े पैमाने पर काम चल रहा है। इनके विकास के लिए भगवान राम, श्रीकृष्ण और बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित स्थलों जैसे अयोध्या, चित्रकूट, मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, कुशीनगर, श्रावस्ती आदि तीर्थ स्थलों पर रामायण सर्किट, आध्यात्मिक सर्किट, बौद्ध सर्किटका विकास किया जा रहा हैं।

संगठनों का ईश्वर मर गया है, उसे मर जाना चाहिए-ओशो

लेकिन हम सभी कुछ न कुछ जानने के खयाल में हैं, अगर हमने गीता स्मरण कर ली है या कुरान या बाइबिल या कोई और शास्त्र और अगर हमें वे शब्द पूरी तरह कंठस्थ हो गये हैं और जीवन जब भी कोई समस्यायें खड़ी करता है तो हम उन सूत्रों को दोहराने में सक्षम हो गये हैं और अगर हमें इस भांति ज्ञान पैदा हो गया है तो हम बहुत दुर्दिन की स्थिति में हैं, बहुत दुर्भाग्य है। यह ज्ञान खतरनाक है। यह ज्ञान कभी सत्य को नहीं जानने देगा और कभी ईश्वर को भी नहीं जानने देगा।

क्या ईश्वर मर गया है-जो मर जाए वह ईश्वर ही नहीं

चर्चाओं में वह यह कि जो ईश्वर मर चुका है, वह जिंदा ही नहीं था। कुछ लोगों ने उसे एक झूठा जीवन दे रखा था। और अच्छा ही हुआ कि वह मर गया। और अच्छा ही होता कि वह कभी पैदा ही न होता। और अच्छा हुआ होता कि वह बहुत पहले मर गया होता। तो यह खबर सुखद है, दु:दुखद नहीं। लोगों ने आपसे बहुत रूपों में कहा होगा कि धर्म की मृत्यु हो गयी है। यह बहुत अच्छा हुआ है, क्योंकि जो धर्म मर सकता है, वह मर ही जाना चाहिए। उसे जिंदा रखने की कोई जरूरत नहीं है। जब तक झूठा धर्म जिंदा रहेगा और झूठा ईश्वर जीवित मालूम पड़ेगा, तब तक सच्चे ईश्वर को खोजना अत्यंत कठिन है। सच्चे ईश्वर और हमारे बीच में, झूठे ईश्वर के अतिरिक्त और कोई भी नहीं खड़ा हुआ है। मनुष्य और परमात्मा के बीच में एक झूठा परमात्मा खड़ा हुआ है। मनुष्य और धर्म के बीच में अनेक झूठे धर्म खड़े हुए हैं। वे गिर जाएं, वे जल जाएं और नष्ट हो जाएं तो मनुष्य की आंखें, उसकी तरफ उठ सकती हैं, जो कि सत्य है और परमात्मा है।

सत्‍य का शुद्धतम वक्‍तव्‍य-अष्‍टावक्र महागीता(1)

‘साक्षी’ सूत्र है। इससे महत्वपूर्ण सूत्र और कोई भी नहीं। देखने वाले बनो! जो हो रहा है उसे होने दो; उसमें बाधा डालने की जरूरत नहीं। यह देह तो जल है, मिट्टी है, अग्नि है, आकाश है। तुम इसके भीतर तो वह दीये हो जिसमें ये सब जल, अग्नि, मिट्टी, आकाश, वायु प्रकाशित हो रहे हैं। तुम द्रष्टा हो। इस बात को गहन करो।

कांग्रेस नेतृत्व और उसकी गलाघोंटू नीति – स्वामी सहजानन्द सरस्वती 1949

लेकिन, 1945 के चुनावों की सफलता के बाद उसमें पतन के चिद्द दीखने लगे और 15 अगस्त, 1945 के आते-न-आते वह खाँटी भोग-संस्था, भोगियों की जमात, उनका मठ बन गयी। महात्माजी के उस समय के व्यथापूर्ण उद्गार इसे साफ बताते हैं। यही कारण है, उनने अपने बलिदान के एक दिन पूर्व-29 जनवरी को बेलाग ऐलान किया था कि कांग्रेस तोड़ दी जाये और उसका स्थान लोकसेवक संघ ले ले। सारांश, कांग्रेस-जन योगी बने रहकर अब उसे लोकसेवक संघ के रूप में बदल दें। यही बात वे लिखकर भी दे गये-इसी की वसीयत कर गये। मगर भोगी लोग इसे कब मानते? उनने महात्मा की महान आत्मा को रुलाया और कांग्रेस की भोगवादिता पर कसकर मुहर लगा दी। महात्मा चाहते थे कांग्रेस चुनावों के पाप-पक में न फँसे; मगर उनके प्रधान चेलों ने न माना। कांग्रेस भोगियों का अव बन गयी है, यह तो चोटी के नेता लोग साफ स्वीकार करते ही हैं। कौन-सी सार्वजनिक सभा नहीं है, जिसमें वे यह बात कबूल नहीं करते, सो भी साफ-साफ धिक्कार के साथ!

गुलामगीरी- जोतीराव गोविंदराव फुले

इस बात पर हमारे कुछ ब्राह्मण भाई इस तरह प्रश्न उठा सकते हैं कि यदि ये तमाम ग्रंथ झूठ-मूठ के हैं, तो उन ग्रंथों पर शूद्रादि-अतिशूद्रों के पूर्वजों ने क्यों आस्था रखी थी? और आज इनमें से बहुत सारे लोग क्यों आस्था रखे हुए हैं? इसका जवाब यह है कि आज के इस प्रगति काल में कोई किसी पर जुल्म नहीं कर सकता। मतलब, अपनी बात को लाद नहीं सकता। आज सभी को अपने मन की बात, अपने अनुभव की बात स्पष्ट रूप से लिखने या बोलने की छूट है।