Yogavatara (580 CE) by Dignag with Hindi Translation
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योगावतारः (Yogavatara)
दिग्नागपाद (580 CE)
नमस्तारायै
श्रुत्वा शास्त्रमुदारं निश्चित्य पारमार्थिकं तत्त्वम्।
मृद्वासनोपविष्टः सश्रद्धो योगमारभेद् योगी॥१॥ (Yoga)
ग्राह्यग्राहकमुभयं नोभयमहमेव निर्वृतिर्मग्न इति।
बहुविधविकल्पजालं प्रविज्ञाय मनःसमापत्तिः॥२॥ (Mind)
ज्ञेयं विलोक्य सकलं मा योगमेव निर्भासम्।
प्रविवाच्ये देहे यत् तत्तथताज्ञानवज्रेण॥३॥
सर्वाकार विवर्जितमाद्यन्त विभागरहितम विकल्पम्।
निमर्ल सहस्र दीधिति निर्भिन्नमेति सर्वं गगनमिव॥४॥
स्वाकारमात्रशेषं पश्यति चित्तं स्वमाद्यनुत्पन्नम्।
येनापि पश्यतीदं तदपि तथैवावलोकयति॥५॥ (Chitta)
सोऽनुपलम्भोऽचित्तं तथताज्ञानं तत्कोटिञ्च।
एवं तमसोऽभ्यासात् प्रज्ञावेदितनिरोधमाप्नोति॥६॥ (Pragya)
ताभिर्युक्तो योगी सत्त्वार्थमनेकधा कुरुते।
अस्मिन् परिनिष्पन्ने तिष्ठति योगी सदार्यमध्वानम्॥७॥
…………दनघवायौ निष्कम्प्यं क्लेशमाराद्यैः।
प्रज्ञापारमितां वास्मिन् सर्वदा प्रवृत्तस्य॥८॥ (Paramita)
…….
सिद्ध्यन्त्यन्ये बहवः समाधियोगदानरागाद्याः॥९॥ (Samadhi)
॥योगावतारः समाप्तः॥
ज्ञान प्राप्ति के लिए संवेदना और तर्क ही दो साधन हैं, क्योंकि दो गुण जानने योग्य हैं; विशिष्ट और सामान्य गुण के अलावा कोई जानने योग्य वस्तु नहीं है। मैं यह दिखाऊंगा कि संवेदना का विषय-वस्तु विशिष्ट गुण है, जबकि तर्क का विषय-वस्तु सामान्य गुण है। (Pramana-samuccaya: Ch-1)
संस्कृत योगावतारः श्लोकों का हिंदी अनुवाद:
(योग)
उदार शास्त्र को सुनकर, परम तत्व को निश्चित करके, योगी श्रद्धा सहित मृदु आसन पर बैठा और योग आरंभ किया॥१॥
(मन)
ग्राह्य (जिसे ग्रहण किया जाता है) और ग्राहक (जो ग्रहण करता है) दोनों नहीं हैं, न ही दोनों का अभाव है, केवल मैं ही निर्वृति में मग्न हूँ।
अनेक प्रकार के विकल्प-जाल को समझकर, मन की सम्पूर्ण समापत्ति (पूर्ण तल्लीनता) प्राप्त होती है॥२॥
(ज्ञेय – ज्ञान का विषय)
सम्पूर्ण ज्ञेय वस्तुओं को देखने के बाद, केवल निर्विकार योग को ही प्रकाशित किया जाता है।
इस देह में जो कुछ भी अव्याख्येय है, उसे तथता-ज्ञान के वज्र से भेद दिया जाता है॥३॥
(स्वरूप)
जो सर्वाकार से रहित है, आदि-अंत के भेद से परे है और विकल्प-रहित है,
वह निर्मल सहस्र दीप्ति के समान सब कुछ व्याप्त कर लेता है, जैसे आकाश में प्रकाश फैल जाता है॥४॥
(चित्त)
चित्त केवल अपने स्वरूप मात्र में शेष रह जाता है और अपने मूल अजन्मा स्वरूप को देखता है।
जिससे यह सम्पूर्ण दृश्य प्रकट होता है, वही इस दृश्य को उसी रूप में देखता है॥५॥
(प्रज्ञा)
जो अनुपलब्ध (ब्रह्म से अविभाज्य) है, जो अचित्त है, जो तथता-ज्ञान से प्रकाशित है, वह उसी कोटि में स्थित होता है।
इस प्रकार, अज्ञान का अभ्यास करने से प्रज्ञा-वेदित निरोध (ज्ञान से उत्पन्न समाधि) प्राप्त होता है॥६॥
(सत्त्वार्थ योगी)
इस ज्ञान से युक्त योगी अनेक प्रकार से सत्त्वों (जीवों) के कल्याण के लिए कार्य करता है।
इस सिद्धि को प्राप्त करके योगी सदा उच्चतम पथ पर स्थित रहता है॥७॥
(परमिता)
शुद्ध वायु में अविचल स्थिति के साथ, समस्त क्लेशों को पराजित करके,
वह प्रज्ञा-पारमिता में सदा प्रवृत्त रहता है॥८॥
(समाधि)
………
और अन्य अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, जैसे समाधि, योग, दान, राग आदि॥९॥
Translation: Tanmoy Bhattacharyya